शरणार्थियों का मुद्दा पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए एक ज्वलंत समस्या बन गया है। पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय से, उपमहाद्वीप राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, जातीय, धार्मिक, भाषाई और आर्थिक संघर्षों के कारण तनाव के दुष्चक्र में फंसा हुआ है। सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करने और उसका उचित प्रबंधन करने में कठिनाई अल्पसंख्यक समूहों के उत्पीड़न का एक प्रमुख कारण है, और कई मामलों में यही शरणार्थी समस्या की जड़ है।
जब से जन्म लिया तब से चेतना आने तक और आज भी शरणार्थी शब्द सुनने को मिला। मेरा परिवार सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध में शरणार्थी के रूप में आया और आज भी इस दंश को झेल रहा है। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान विस्थापित हुए सिंधी शरणार्थियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति सामाजिक, आर्थिक और कानूनी रूप से अत्यधिक जटिल और संवेदनशील थी। आज भी इनके गांव-मोहल्लों को ‘शरणार्थी’ शब्द मजबूरन झेलना पड़ता है। जबकि उस वक्त आने वाले अधिकतर शरणार्थी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन लोग अब भी यह कहते हैं कि “तुम तो शरणार्थी थे, हमने तुम्हें अपने गांव-मोहल्लों में बसाया है।” फिलहाल मैं पश्चिमी राजस्थान में जहां रहता हूं उस मोहल्ले को आज भी दकियानूसी लोग ‘शरणार्थी पाड़ा’ कहते हैं, अर्थात शरणार्थियों का मोहल्ला! यहां तक कि सरकारों के रिकॉर्डों में भी वह आज तक शरणार्थी हैं।
राजस्थान में 1965 के बाद के पाकिस्तानी शरणार्थी
भारत में वर्तमान में रह रहे विभिन्न शरणार्थी समूहों में से सबसे उपेक्षित समूह पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए शरणार्थी हैं, जो 1965 और उसके बाद कई चरणों में भारत में आकर बस गए। ये हिंदू हैं और विभिन्न जातियों से संबंध रखते हैं। उनकी दुर्दशा और नागरिकता अधिकारों एवं पुनर्वास के लिए उनके संघर्ष को उजागर करने के लिए ही 1999 में पाक विस्थापित संघ (पीवीएस) की स्थापना की गई थी।
इनमें से अधिकतर शरणार्थी सिंध के थार पारकर जिले से हैं। अन्य शरणार्थी सिंध के ही पड़ोसी जिलों जैसे उमरकोट, मीरपुर खास और हैदराबाद के साथ-साथ दक्षिणी पंजाब के रहीमयार खान और बहावलपुर से हैं। ये शरणार्थी उन सिंधी हिंदू शरणार्थियों से भिन्न हैं, जो 1947 में विभाजन के बाद भारत में आकर बस गए थे। वे मुख्यतः सिंधी भाषी और जातीय रूप से सिंधी हैं। थार पारकर के शरणार्थियों की अपनी भाषा धत्की है और उनकी एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, जो सीमा पार भारत में रहने वाले लोगों से काफी मिलती-जुलती है। सिंध से आए अन्य हालिया शरणार्थियों में मारवाड़ी और गुजराती भाषी समुदाय शामिल हैं, जो पारंपरिक रूप से सिंध के खेतों में कृषि कार्य करने के लिए मौसमी प्रवास करते थे। इनमें से कई भूमिहीन दलित और आदिवासी हैं।
थार पारकर एक शुष्क क्षेत्र है, जो राजस्थान और सिंध के बड़े हिस्से में फैले विशाल थार रेगिस्तान का हिस्सा है। यह दक्षिण में गुजरात के कच्छ और पश्चिम में राजस्थान के बाड़मेर से घिरा हुआ है। थार पारकर में सिंधु घाटी सभ्यता काल से ही मानव बस्ती के प्रमाण मिलते हैं। इस क्षेत्र के सबसे पुराने संदर्भों में से एक छठी शताब्दी में परमारों के शासन की ओर इशारा करता है। इसके बाद इस पर सुमरों का शासन रहा, जिनके बाद सोढ़ा राजपूतों, फिर कलहोरों और अंत में तालपुर बलूचियों का शासन आया। अंग्रेजों ने 1843 में इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और इसे सिंध प्रांत में शामिल कर लिया।
थार पारकर में मिश्रित हिंदू-मुस्लिम आबादी है। मुसलमानों में राजपूत, बलूची, सैयद और लोहाना शामिल हैं। हिंदू जातियों में मेघवाल, भील, सांसी, जोगी, ओध, राजपूत, ब्राह्मण, माली, रबारी, सोनार, जाट, नाई, दर्जी और कई अन्य शामिल हैं।
भारत के विभाजन के बाद, थार पारकर क्षेत्र में हिंसा या शरणार्थियों का पलायन न के बराबर हुआ। इस क्षेत्र के निवासी, हिंदू और मुसलमान, सदियों से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रह रहे थे। हालांकि, पाकिस्तान के गठन के पच्चीस साल बाद थार पारकर में एक बड़ा शरणार्थी संकट पैदा हो गया। थार पारकर से भारत में बड़े पैमाने पर पलायन की पहली लहर 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद आई, जब लगभग दस हजार लोग भारत चले गए। फिर, 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के दौरान, भारत ने थार पारकर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र के लगभग 90 हजार हिंदू भारत चले गए और उन्होंने वापस न लौटने का फैसला किया।

1972 के शिमला समझौते के तहत, भारत इस क्षेत्र को वापस देने पर सहमत हुआ था, बशर्ते पाकिस्तान अपने 90,000 नागरिकों को, जिनमें मुख्य रूप से थार पारकर के हिंदू थे और जिन्होंने युद्ध के दौरान भारत में शरण ली थी, वापस लेने पर सहमत हो। भारत ने ज़मीन तो वापस कर दी, लेकिन पाकिस्तान ने इन लोगों को स्वीकार करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिनमें से अधिकांश ने पश्चिमी राजस्थान में शरण ली थी और उनमें से कुछ ही पाकिस्तान लौटना चाहते थे।
थार पारकर और दक्षिणी सिंध के अन्य हिस्सों से हिंदुओं का भारत में पलायन धार्मिक उत्पीड़न और भेदभाव के कारण बाद के वर्षों में और भी बढ़ गया। यह पलायन आज भी जारी है। ये शरणार्थी विभिन्न जाति समूहों से हैं। हालांकि, सबसे अधिक पीड़ित अनुसूचित जनजातियां और अनुसूचित जातियों के लोग हैं। ये लोग अधिकतर अशिक्षित और बेहद गरीब हैं और थार रेगिस्तान के मूल निवासी हैं। पाकिस्तान में वे मुख्य रूप से जमींदारों के खेतों में भूमिहीन मजदूर के रूप में काम करते थे। भारत में भी वे गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं।
शिविरों में शरणार्थी
1971 के युद्ध के बाद, थार पारकर और दक्षिणी सिंध के पड़ोसी क्षेत्रों से आए शरणार्थियों को राजस्थान के बाड़मेर जिले में भारत सरकार द्वारा स्थापित 24 शरणार्थी शिविरों में सीमित कर दिया गया था। शरणार्थियों को शिविरों के भीतर ही सीमित रहने के लिए मजबूर किया गया था। विशाल खुले मैदानों में स्वतंत्र रूप से रहने के आदी शरणार्थियों के लिए शरणार्थी शिविरों में आवागमन प्रतिबंधित था और यह उनके लिए कष्टदायक साबित हुआ। इसके अलावा, शरणार्थियों के रहने से संबंधित सख्त नियम थे। उन्हें प्रतिदिन हाजिरी लगानी पड़ती थी और उन्हें अपने रिश्तेदारों से मिलने की अनुमति नहीं थी। सीमित संख्या में तंबू थे, जो संयुक्त परिवारों को आवंटित किए गए थे। कई बार एक तंबू में दो या तीन से अधिक परिवार रहते थे। इन तंबूओं में रहने वाले परिवारों के मुखिया को राशन कार्ड जारी किए गए थे। ये शिविर 1978 तक कार्यरत रहे।
1977 में केंद्र और राजस्थान राज्य में जनता सरकार सत्ता में आई। 1978 में भारत सरकार ने शिविरों में रह रहे शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की, जिनमें 1965 और 1971 में आए शरणार्थी भी शामिल थे। सरकार ने 1955 के नागरिकता अधिनियम के आधार पर गुजरात और राजस्थान के जिला मजिस्ट्रेटों को ऐसा करने का अधिकार दिया। राजस्थान ने भारत सरकार के सहयोग से 1971 के शरणार्थियों के लिए पुनर्वास पैकेज की घोषणा की।
1965 में आए अधिकांश शरणार्थियों को उन गांवों का आवंटन किया गया था जिनमें 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान में पलायन करने वाले मुस्लिम रहते थे। 1971 में आए प्रवासियों के लिए घोषित पुनर्वास पैकेज में भूमि और केंद्र सरकार की ओर से कुल 9 करोड़ रुपए नकद शामिल थे। पुनर्वास पैकेज के अनुसार, प्रत्येक परिवार को नहर क्षेत्र में 25 बीघा या रेगिस्तान में 75 बीघा बंजर भूमि आवंटित की जानी थी। हालांकि, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अज्ञानता के कारण वास्तव में शरणार्थी परिवारों को आवंटित भूमि का केवल एक हिस्सा ही प्राप्त हुआ। शेष भूमि राष्ट्रीय रेगिस्तान पार्क में शामिल कर ली गई या स्थानीय लोगों के कब्जे में आ गई। कई मामलों में, डर के कारण प्रवासी विरोध नहीं कर सके।

दक्षिण पाकिस्तान से हिंदू शरणार्थियों का आना 1971 के बाद भी नहीं रुका। धार्मिक उत्पीड़न, असुरक्षा, कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति, बढ़ते धार्मिक कट्टरवाद, जबरन धर्मांतरण, बार-बार मार्शल लॉ लागू होने आदि के कारण यह सिलसिला उसके बाद के वर्षों में भी जारी रहा। 1972 से 1989 के बीच शरणार्थियों की संख्या में कमी आई, लेकिन यह सिलसिला अभी भी जारी है। पाकिस्तान में रहने वाले कई हिंदू भारत में बसना चाहते हैं, लेकिन अक्सर यह उनके लिए संभव नहीं हो पाता।
1947 में, कई धनी सिंधी हिंदू भारत में आकर बस गए थे। इसके अलावा, 1965 और 1989 के बीच थार पारकर के कई सामंती और ‘उच्च’ जाति के हिंदू भी भारत में आ गए। हाल के शरणार्थी अधिकतर अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के हैं, लगभग पूरी तरह से निरक्षर और बेहद गरीब हैं। इनमें से अधिकांश वैध दस्तावेजों के साथ पंजाब के अटारी चेक पोस्ट से सीमा पार करते हैं। इससे पहले, इनमें से कई लोग सिंध और राजस्थान के बीच की खुली सीमा को पार कर जाते थे, जिसे बाद में 1990 के दशक की शुरुआत में बाड़ लगाकर सुरक्षित कर दिया गया था।
1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद मुसलमानों पर हुए व्यापक हमलों के मद्देनजर शरणार्थियों का प्रवाह अचानक बढ़ गया। पाकिस्तान में प्रतिक्रिया इतनी हिंसक थी कि देश के दक्षिणी भाग के कई हिंदू भारत की ओर पलायन करने लगे। थार पारकर के लोगों के अलावा, उनमें से कई वास्तव में राजस्थानी और कुछ हद तक गुजराती मूल के थे। वे सिंध और दक्षिणी पंजाब में जमींदारों के खेतों में काम करने के लिए राजस्थान और गुजरात से सीमा पार करते थे। यह मौसमी पलायन 1960 के दशक के मध्य तक जारी रहा, जिसके बाद पाकिस्तान और भारत के बीच सीमा पर बाड़बंदी के कारण वे भारत में अपने घरों को वापस नहीं लौट सके।

सन् 1965 के बाद दक्षिणी सिंध से भारत आए अधिकांश प्रवासी राजस्थान में बस गए हैं। इसका कारण यह है कि उनमें से अधिकतर के रिश्तेदार राज्य में, विशेषकर बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर और श्रीगंगानगर जैसे सीमावर्ती जिलों में रहते हैं। उन्हें नियमित रूप से अपने वीजा के नवीनीकरण के लिए आवेदन करना पड़ता है, जिसे अक्सर अस्वीकार कर दिया जाता है। जिन प्रवासियों को भारतीय नागरिकता नहीं मिली है, उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्हें सीमावर्ती जिलों में जाने की अनुमति नहीं है, जहां उनमें से अधिकतर के रिश्तेदार रहते हैं। इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग पाकिस्तानी नागरिकों को इन जिलों में यात्रा करने के लिए वीजा देने से इनकार करता है। इस नियम से बचने के लिए, पाकिस्तान के कुछ लोग, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जो भारतीय नागरिकता के बिना भारत में रह रहे हैं, पहले अन्य स्थानों के लिए वीजा लेकर सीमावर्ती जिलों की यात्रा करते थे। यह भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले की बात है। तकनीकी रूप से, यह अवैध है। वे अपनी पहचान छिपाकर रखते थे। उन्हें कानूनी रूप से भारत में काम करने की अनुमति नहीं थी, लेकिन वे अक्सर अपना जीवन यापन करने के लिए कृषि श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते थे। उन्हें सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय लोगों द्वारा अत्यधिक शोषण का सामना करना पड़ा क्योंकि उनके पास दावा करने का कोई अधिकार नहीं था। हाल ही में भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले, जो आंशिक रूप से पाक विस्थापित संघ के प्रयासों का परिणाम थी, उनमें से कई ने भारत में न्यूनतम पांच वर्ष की अवधि बिता ली थी, जो पहले भारतीय नागरिकता के लिए पात्र होने के लिए आवश्यक थी, हालांकि इसमें लगातार वीजा विस्तार की जटिल प्रक्रिया शामिल थी, जो अक्सर स्वीकृत नहीं होती थी।
भारत में पांच वर्ष बिताने वाले लोग तकनीकी रूप से भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते थे [धारा 5(1)(ए) भारतीय मूल के लोगों के लिए, धारा 5(1)(सी) भारतीय नागरिकों से विवाहित और पांच वर्ष से अधिक समय तक साथ रहने वाले लोगों के लिए, धारा 5(1)(डी) जिनके माता-पिता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हुई है और धारा 5(1)(ई) बालिग बच्चों के लिए]। लेकिन यह आसान काम नहीं था क्योंकि अधिकांश शरणार्थी निरक्षर और गरीब थे।
शरणार्थियों की स्थिति को समझने के लिए मैंने पाक विस्थापित संघ के योगिंदर सिकंद और हिंदू सिंह सोढ़ा के लेख का हवाला लिया है। लेकिन गरीब और निचले तबके के आम दलित-आदिवासी शरणार्थियों के हालात को समझने के लिए हमें उनके मुंह की सुननी होगी। पश्चिमी राजस्थान के गांव-देहात में जब वहां के स्थानीय निवासियों और शरणार्थी (हालांकि अब वे शरणार्थी नहीं हैं) लोगों के मध्य जब भी कोई विवाद होता है, तो कई बार उन्हें शरणार्थी कह कर दुत्कारा जाता है। कहा जाता है– “हम लोगों ने तुम्हें शरण दी, रहने के लिए अपना गांव दिया, तुम शरणार्थियों को!”, “शरणार्थियों की जगह तो हमारे लिंग के ऊपर हैं।” ऐसे ही भद्दे और गंदे उलाहने दिये जाते हैं अब भी। देते भी कौन है उन्हीं के अपने लोग। फ़र्क बस इतना है कि एक खुद को वास्तविक निवासी मानते हैं और दूसरे को शरणार्थी मानते हैं।
चुनाव का चक्कर हो तब भी शरणार्थी, ज़मीन-ज़ायदाद का विवाद हो तब भी शरणार्थी, गांव-मोहल्लों में हक़ की बात हो तब भी शरणार्थी। जो यह शरणार्थी का टैग है ना, आज भी देहात से दिल्ली तक मौजूद है। गरीब पिछड़े लोग अब भी अपने साथ लाई हुई अपनी स्थानीय कांच कशीदाकारी और पैचवर्क के बल पर आजीविका चलाते हैं। सरकार ने कुछ बीघा ज़मीनें दे दी, उसमें से भी अधिकतर सरकार के कागजों में दफ़न हो गई। सरकार ने आज तक उनके रोज़गार को नहीं देखा, उनके बच्चों की शिक्षा को नहीं देखा और न ही उनके जीवन स्तर को देखा। शरणार्थी सबसे ज्यादा आकर बाड़मेर के चौहटन क्षेत्र के गांवों में बस गए, क्योंकि यहां उनके जान-पहचान के लोग थे, इनके रिश्तेदार थे।
आज भी इस क्षेत्र में शिक्षा के हाल बहुत खराब हैं। चौहटन क्षेत्र में ही एक धनाऊ ब्लॉक आता है जो पूरी तरीके से सीमावर्ती क्षेत्र है। यहां 44 हाईस्कूल हैं, लेकिन केवल 4 स्कूलों में ही प्रिंसिपल हैं। और यहां सबसे ज्यादा पढ़ने वाले बच्चे ग़रीब-पिछड़े परिवारों से हैं। सरकार आज तक आपको नागरिक साबित नहीं कर पाई। यह लेख बस एक छोटा-सा ब्यौरा है। वो तमाम सुविधाएं आज भी दूर हैं उन लोगों से जो पहले भी दूर थीं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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