भारत विभिन्न विचारों और भावनाओं वाला देश है। यहां एक ही समय में देश के एक हिस्से में किसी राजा के वध पर विजय का उत्सव मनाया जाता है और दूसरे हिस्से में उसी राजा को अपना पूर्वज, अपना पुरखा मानने वाले लोग शोक मना रहे होते हैं। एक जगह उसके वध को बुराई पर अच्छाई की जीत मानकर जश्न मनाया जाता है, तो दूसरी जगह उसी राजा के सम्मान में शोकसभाएं आयोजित की जाती हैं, उनका शहादत दिवस मनाया जाता है।
क्या हमने कभी विचार किया है कि हिंदू समाज के हर प्रमुख उत्सव ‘वधोत्सव’ क्यों हैं? वधोत्सव माने, पहले किसी का वध करो और फिर उसका उत्सव मनाओ। दुर्गापूजा में महिषासुर का सांकेतिक वध की परंपरा है तो दशहरा में रावण का पुतला दहन किया जाता है। होली के पीछे होलिका वध की कहानी भी इसी हिंसक परंपरा का हिस्सा है।
दशहरा के दिन रावण का पुतला दहन करने का रिवाज-सा हो गया है। दिल्ली से लेकर पटना-रांची हर छोटे-बड़े शहरों में रावण का पुतला जलाया जाता है। बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। इनमें प्रधानमंत्री से लेकर संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होते रहे हैं। लेकिन झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने रावण का पुतला दहन करने से इनकार कर दिया था। सितंबर, 2008 में वे झारखंड के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने रावण का पुतला जलाने का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था। रांची के मोरहाबादी मैदान में रावण का पुतला दहन करना था। शिबू सोरेन ने रावण को महान विद्वान और अपना ‘कुलगुरु’ बताया और पुतला जलाने से इनकार कर दिया था।
इसी तरह एक ओर दुर्गापूजा में महिषासुर वध का जश्न मनाया जाता है, तो दूसरी ओर झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी और दूसरे समुदाय के लोग शोक मनाते हैं। उनके घरों में चूल्हे नहीं जलते हैं।
यह कैसा विरोधाभास है? क्या यह धार्मिक आस्था का सवाल है? या फिर इसके पीछे इतिहास, सामाजिक अस्मिता और सांस्कृतिक वर्चस्व की कोई गहरी लड़ाई है? दुर्गापूजा, महिषासुर शहादत दिवस और रावण दहन से जुड़े विवाद हमें ऐसे ही सवालों के सामने खड़ा करते हैं।
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन, कला, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का बड़ा उत्सव है। लेकिन, इसी बंगाल में कुछ समुदाय महिषासुर को उस रूप में नहीं देखते, जिस रूप में प्रचलित पौराणिक कथा उन्हें प्रस्तुत करती है। पुरुलिया के गांवों में दशहरा शोक के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। संथाल जनजाति के खेरवाल अथवा असुर समुदाय के लोग सप्तमी से ही इन दिनों को शोक और विषाद के रूप में मनाते हैं। यहां लोग महिषासुर को हुदुड़ दुर्गा कहते हैं।

झारखंड के असुर और आदिवासी समुदायों में मान्यता है कि महिषासुर उनके पूर्वज और राजा थे। उनके लिए दुर्गापूजा के दौरान महिषासुर के वध का चित्रण केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि उनकी अपनी सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा सवाल है। उनका मानना है कि महिषासुर को एकतरफा नजरिए से दिखाया जाता है।
झारखंड के संथाल आदिवासी महिषासुर को दसाईं पर्व पर याद करते हैं। वे राजा महिषासुर के वध की स्मृति में परंपरागत तरीके से शोक मनाते हैं।
महिषासुर को लेकर यह विमर्श केवल बंगाल और झारखंड तक सीमित नहीं है।
छत्तीसगढ़ के जशपुर क्षेत्र में असुर समुदाय से जुड़ी मान्यताओं पर कई मीडिया रपटें प्रकाशित हुई हैं। कुछ समुदायों के लोग महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं और नवरात्र के दौरान प्रचलित महिषासुर-वध की कथा से दूरी रखते हैं।
इसी तरह, दक्षिण भारत के कई शहरों में भी महिषासुर शहादत दिवस मनाया जाता रहा है।
दरअसल, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों ने 2011 में महिषासुर को बहुजन अस्मिता और सांस्कृतिक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया था। इसी से महिषासुर प्रकरण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था। जेएनयू में 25 अक्टूबर, 2011 को महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम से जुड़े छात्रों की प्रमुख भूमिका थी। इसमें प्रगतिशील धारा के छात्रों का भी सहयोग था। महिषासुर शहादत दिवस के आयोजकों का मानना था कि प्रचलित पौराणिक कथा की वैकल्पिक व्याख्या होनी चाहिए। उन समुदायों के इतिहास पर चर्चा होनी चाहिए, जिन्हें सामाजिक व्यवस्था में लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।
यह आयोजन धीरे-धीरे एक बड़े विमर्श का हिस्सा बन गया। महिषासुर शहादत दिवस या स्मरण दिवस के कार्यक्रम बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और दक्षिण भारत के राज्यों में भी आयोजित होने लगे। इस आंदोलन का महत्व इस बात में भी है कि इसने ऐसे सवाल उठाए, जिस पर पहले सार्वजनिक चर्चा नहीं होती थी। सवाल और शंकाएं तो थीं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में दर्ज नहीं होते थे।
क्या किसी धार्मिक कथा या मिथक की व्याख्या करने का अधिकार केवल कुछ लोगों के पास है, या समाज के दूसरे समुदाय भी अपने अनुभवों के आधार पर उसकी समीक्षा कर सकते हैं?
यह चर्चा तब और तेज हुई जब बहुजन साहित्यकार व चिंतक प्रेमकुमार मणि के पूर्व में प्रकाशित एक आलेख को फारवर्ड प्रेस द्वारा अक्टूबर, 2011 के अंक में ‘किसकी पूजा करते हैं बहुजन’ शीर्षक से पुनर्प्रस्तुत किया गया। इस आलेख ने महिषासुर की कथा को बहुजन दृष्टिकोण से देखने वाली बहस को जन्म दिया। मणि ने प्रचलित धार्मिक आख्यानों की एक वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की। महिषासुर की कथा को केवल देवताओं और असुरों के संघर्ष के रूप में नहीं देखा, बल्कि सामाजिक सत्ता, सांस्कृतिक वर्चस्व और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े सवालों को भी गंभीरता से उठाया। लेख के विचारों और जेएनयू में लगाए गए पोस्टरों को लेकर विवाद हुआ। बाद के वर्षों में महिषासुर शहादत दिवस पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हुई। इस पूरी बहस के केंद्र में केवल महिषासुर या रावण नहीं हैं।
बहरहाल, बहुतेरे सवाल हैं। मसलन यह कि भारतीय समाज में इतिहास और संस्कृति की व्याख्या करने का अधिकार किसके पास है। क्या ऐतिहासिक या मिथकीय कथाएं केवल लिखित ग्रंथों से प्रामाणिक मानी जाएंगी? क्या लोकगीतों, मौखिक परंपराओं और आदिवासी-दलित-बहुजन स्मृतियों को भी उसमें स्थान मिलेगा? क्या किसी समुदाय की मान्यता को केवल इसलिए खारिज कर दिया जाना चाहिए कि वह प्रचलित धार्मिक आख्यान को चुनौती देता है? और क्या वैकल्पिक दृष्टिकोण रखने का अर्थ अनिवार्य रूप से किसी दूसरे समुदाय की आस्था का अपमान करना है? इन सवालों का जवाब एकतरफा नहीं हो सकता।
जिस तरह दुर्गा की आराधना करने वालों को अपनी आस्था के प्रदर्शन का अधिकार है, उसी तरह महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले समुदायों को भी अपनी सांस्कृतिक स्मृति व्यक्त करने का अधिकार है। किसी की आस्था की रक्षा के नाम पर दूसरे की आवाज दबाना उचित नहीं। लेकिन किसी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति का सम्मान करने के लिए दूसरे समुदाय को अपमानित करना भी जरूरी नहीं है। भारत की सांस्कृतिक एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी समुदाय एक ही कथा को एक ही तरह से स्वीकार करें। एकता का अर्थ यह है कि अलग-अलग कथाओं और मान्यताओं के बीच संवाद की गुंजाइश बनी रहे।
सनद रहे कि जिस समाज में केवल विजेताओं की कहानी सुनी जाती है, वहां इतिहास अधूरा रह जाता है। और जिस समाज में पराजित माने गए लोगों की आवाज भी सुनी जाती है, वहां इतिहास को अधिक व्यापक रूप से समझने का अवसर मिलता है। इसीलिए, महिषासुर और रावण से जुड़ी वैकल्पिक सांस्कृतिक अवधारणाओं को सार्वजनिक विमर्श में उचित स्थान मिलना ही चाहिए। यही इस विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण संदेश हो सकता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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