h n

निशा भगत की खुदकुशी से उठते सवाल

बात समझने की यह है कि मान लीजिए कि निशा भगत मिशनरियों के खिलाफ या फिर धर्मांतरण के खिलाफ मुहिम संघ या भाजपा के निर्देश पर नहीं चला रही थीं, लेकिन काम तो वही कर रही थीं जो संघ और भाजपा का काम है। रही जमीन माफिया की बात तो जमीन माफिया है कौन? आदिवासियों की जमीन लूट कौन रहा है? पढ़ें, विनोद कुमार का यह आलेख

पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर अपने विवादित टिप्पणियों की वजह से बेहद चर्चित रही आदिवासी युवा नेत्री निशा भगत ने कल 6 नवंबर, 2026 को फेसबुक पर लाइव हो कर आत्महत्या कर ली। देख कर लग रहा था कि वह बेहद अवसाद और अकेलेपन की स्थिति से गुजर रही थी। पहले तो इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह सचमुच आत्महत्या करने वाली है, लेकिन उन्होंने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली।

अपने लाइव वीडियो में निशा ने कहा था कि “मुझे फांसी लगाना नहीं आता…। मैं एकदम अकेली हूं…। मेरे माता पिता ने मुझे नाज से पाला था…। मेरे कारण उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ रहा है।” इसके साथ उनका क्रंदन और फिर सन्नाटा।

और अब भाजपा, एनडीए से जुड़े नेता और उसके समर्थकों ने उस कारुणिक मौत पर राजनीति शुरू कर दी है। भाजपा के शीर्ष नेता अर्जुन मुंडा और रघुवर दास का वक्तव्य सोशल मीडिया पर दिखाई दिया। राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी का समर्थन करने वाले झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के नेता जयराम महतो ने भी उनके प्रति संवेदना व्यक्त की है। हालांकि जयराम महतो ने उन्हें अपनी पार्टी से निकाल दिया था, क्योंकि निशा भगत ने कुड़मियों के एसटी सूची में शामिल होने की मांग का विरोध किया था।

निशा भगत ने अपने लाइव वीडियों में हेमंत सरकार की, उनके प्रशासन की आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि वे लोग भूमि माफियाओं का संरक्षण करते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह भाजपा और आरएसएस की दलाल नहीं है। वह आदिवासी हितों की बात कहती हैं। अब उनके इसी वक्तव्य को केंद्र में रख कर भाजपा के नेता झामुमो सरकार को घेरेन की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि निशा भगत ने स्पष्ट कह दिया है कि उनका भाजपा या आरएसएस से कोई रिश्ता नहीं।

हालांकि पिछले एक-दो वर्षों से जो वे कर रही थीं, वह भाजपा और संघ की राजनीति के अनुकूल था। वे ईसाई मिशनरियों पर धुआंधार आक्रमण कर रही थीं। उनके कथित धर्मांतरण का विरोध कर रही थीं। हजारीबाग के महापौर अरविंद कुमार राणा का एक पोस्ट भी देखने को मिला, जिसमें उनका दावा था कि वे 2008-09 में जब वे वहां विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री थे, तब उन्होंने निशा को, जो वहीं की रहने वाली थी और पढ़ती थी, को विद्यार्थी परिषद से जोड़ा था। हांलाकि, उस समय से लेकर निशा अब तक अनेक राजनीतिक दलों के संपर्क में रहीं। कांग्रेस, फिर जेएलकेएम और हाल के दिनों में संघी राजनीति के संपर्क में।

एक कार्यक्रम में निशा भगत

सामान्यतः आदिवासी युवा सांप्रदायिकता के जहर से मुक्त है। आदिवासी समाज मेहनतकश समाज है। वह समाज और धर्म की राजनीति नहीं करता। उसके आंदोलनों के केंद्र में जल, जंगल, जमीन ही रहे हैं। किसी के प्रति उसके मन में घृणा या द्वेष का भाव नहीं। लेकिन बहिरागतों की राजनीति के संपर्क में आने के बाद उसके दिमाग में भी उस तरह की भावनाएं घर करने लगती हैं। निशा भगत पिछले कुछ महीनों से जिस तरह ईसाई मिशनरियों के खिलाफ जहरीले वक्तव्य दे रही थीं, वह संघी राजनीति का ही प्रभाव माना जा सकता है।

इस बारे में झारखंड के एक प्रबुद्ध सोशल एक्टिविस्ट रतन तिर्की का कथन महत्वपूर्ण है कि “निशा भगत के पिता हांदू भगत आजसू [ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन] में 1986 से हमलोगों के साथ थे। निशा उस वक्त पैदा भी नहीं हुई थी। पैदा होने के बाद फुदकती थी जब हमलोग गुमला में उस वक्त जाते थे। मिशनरी स्कूल कालेज में शिक्षा लेकर निकली। लेकिन बाद में तथाकथित चकाचौंध ने उसकी जिंदगी को मोड़ दिया था। लंबी बातचीत होगी, इसलिए एक लाइन में कहता हूं कि अति उत्साह और अति महत्वाकांक्षा का जहर उसमें उसके तथाकथित संगी-साथियों का समूह और राजनीतिक दलों, संगठनों के दलाल नेताओं ने डाला!!! और जब वो अंधाधुंध निकल गई, जो आदिवासी समाज समुदाय का गुण है कि मन से करना, लेकिन जो भाषा तथाकथित फासीवादी संगठनों और व्यक्तियों और ताकतों द्वारा डाला गया, उसे वह समझ नहीं पाई और यहीं से उसके पतन की कहानी शुरू होती गई। बाद में तथाकथित पार्टी ने भी उससे किनारा करना शुरू कर दिया था और यह हताशा उसकी ज़ेहन में जहर की तरह फैलती चली गई। वह मानसिक तनाव और अवसाद की शिकार हो गई।”

अब निशा भगत द्वारा फेसबुक लाइव के जरिए कही गई बातों का भाजपा अपने ढंग से इस्तेमाल कर रही है। भाजपा और उसके समर्थक कह रहे हैं कि हेमंत सरकार के नकारेपन की वजह से निशा की जान गई।

पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता रघुवर दास कहते हैं– “सुश्री निशा भगत ने सरना-सनातन संस्कृति और आदिवासी पहचान के लिए जो संघर्ष किया, उसे हमेशा याद किया जाएगा। सरकार इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करे।”

भाजपा के ही पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी भूमि माफियाओं और प्रशासन-पुलिस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मामले की उच्च स्तरीय जांच की भी मांग की है।

जयराम महतो का कहना है कि फेसबुक लाइव में जिन-जिन लोगों के नाम लिए गए हैं, उनके खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए। सरकार झारखंड पुलिस और जमीन के दलालों पर लगाए गए आरोपों की भी गहराई से जांच करे।

कई लोगों ने इस बात को उठाया है कि निशा भगत ने स्पष्ट कहा है कि “वह आरएसएस और भाजपा की दलाल नही, फिर भी उनकी आत्ममहत्या के लिए भाजपा या संघ को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है?”

बात समझने की यह है कि मान लीजिए कि निशा भगत मिशनरियों के खिलाफ या फिर धर्मांतरण के खिलाफ मुहिम संघ या भाजपा के निर्देश पर नहीं चला रही थीं, लेकिन काम तो वही कर रही थीं जो संघ और भाजपा का काम है। रही जमीन माफिया की बात तो जमीन माफिया है कौन? आदिवासियों की जमीन लूट कौन रहा है? टाटा को जमींदारी झामुमो ने दी थी? जमींदारी का नवीकरण झामुमो ने किया था झारखंड बनने के बाद? डेढ़ दो सौ कारपोरेट घरानों से एमओयू झामुमो ने किया था? गोड्डा में छोटानागपुर-संथाल परगना टीनेंसी एक्ट का उल्लंघन कर अडानी को पावर प्लांट के लिए जमीन हेमंत सोरेन की सरकार ने दिया था?

जाने दीजिए बड़ी परियोजनाओं की बात, अपने झारखंड में जमीन माफिया कौन है? आदिवासी या गैर आदिवासी? यह संभव है कि आदिवासी समुदाय के कुछ लोग जमीन की दलाली में शामिल हों, लेकिन तमाम बड़े जमीन माफिया और बिल्डर्स बहिरागत ही हैं जो मूलतः भाजपा के समर्थक हैं।

बात इतनी सी लगती है कि निशा भगत का संघी राजनीति ने अपने हित के लिए इस्तेमाल किया और लगा कि वह उनके मिशनरी विरोधी मकसद में बहुत कामयाब नहीं हो रही थी और जमीन लूट के खिलाफ सक्रिय होने लगी थी, तो उसे मझधार में छोड़ दिया। और वह धीरे-धीरे गहरे अवसाद में चली गई। अब उसके नेता घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

संबंधित आलेख

राजस्थान : सरपंच पतियों का इलाज
जो महिला अपनी ही चुनाव प्रचार सामग्री में एक कोने में सिमटी नज़र आती है, जो आमसभाओं में भाषण नहीं देती और न ही...
विषमताओं पर विजय पाने वाली इस दलित-बहुजन दंपत्ति से मिलिए
रौदास गौतम अपनी आंखों से नहीं देख पाते, लेकिन यह उनके काम में बाधक नहीं है। पूछने पर बताते हैं कि मान्यवर कांशीराम की...
सिरपुर का इतिहास संरक्षित करे सरकार
यूनेस्को ने विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में सिरपुर को शामिल कर महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। लेकिन सिरपुर के इन पुरातात्विक धरोहरों के भ्रमण...
मीडिया नहीं, नागरिक पालिका ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
प्रेस को भी जब चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसका महत्व भी उसकी निगरानी के रूप में व्यक्त किया...
बिहार में मजदूरी मांगने पर हिंसा, उठते सवाल
चंदेश्वर चौधरी के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने ग्रामीण समाज में पीढ़ियों से चले आ रहे श्रम-संबंधों और शोषण पर भी...