हमारा विदेशी राष्ट्र

सन् 1919 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो कि भारतीय राष्ट्रवाद का मूर्त स्वरूप थी, के अधिवेशनों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता था। सन् 1920 के बाद एक गुजराती महात्मा गांधी के दबाव में कांग्रेस ने अनमने भाव से हिन्दी (संस्कृत नहीं) का प्रयोग शुरू किया।

हिन्दू गायों को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाते क्योंकि वे गायों को पवित्र मानते हैं।

अधिकांश भारतीय राजनेता और सरकारी अधिकारी अपने देश और देश के लोगों को क्यों लूटते हैं? अधिकांश व्यवसायी कर चोरी कर अपने राष्ट्र को धोखा क्यों देते हैं?

क्योंकि हम यह नहीं मानते कि राष्ट्र पवित्र है। पश्चिम में शिक्षा प्राप्त भारतीयों की कई पीढ़ियों को यह सिखाया गया है कि राष्ट्र केवल एक निरर्थक ऐतिहासिक इक्तेफाक का नतीजा है।

 

फिर तिलक और गांधी की पीढ़ी, भारत की ऐसी पहली पीढ़ी क्यों और कैसे बनी, जिसकी सोच अलग थी। यहां तक कि इस पीढ़ी के लोगों को अपने राष्ट्र की खातिर अपनी जान कुर्बान करने से भी गुरेज न था, सन् 1857 में झांसी की रानी की तरह सिंहासन के लिए नहीं।

इसका कारण यह था कि इस पीढ़ी ने बाइबिल के इस विचार को स्वीकार कर लिया था कि राष्ट्र पवित्र है, उद्देश्यपूर्ण है और ईश्वरीय अविष्कार है।

सन् 1919 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो कि भारतीय राष्ट्रवाद का मूर्त स्वरूप थी, के अधिवेशनों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता था। सन् 1920 के बाद एक गुजराती महात्मा गांधी के दबाव में कांग्रेस ने अनमने भाव से हिन्दी (संस्कृत नहीं) का प्रयोग शुरू किया। परन्तु जिस हिन्दी का इस्तेमाल शिक्षित भारतीय करते थे वह तुलसीदास के रामचरितमानस की हिन्दी नहीं थी। वह बाइबिल के अनुवादकों की हिन्दी थी जो मिशनरी स्कूलों के जरिए भारतीयों तक पहुंची थी। कांग्रेस की बुद्धिजीवी संस्कृति का निर्माण करने वाली अंग्रेजी भी टाइण्डेल जैसे बाइबिल के अनुवादकों की देन थी और उसी के जरिए हम तक राष्ट्र का आधुनिक और विदेशी (यहूदी-प्रोटेस्टेण्ट) विचार पहुंचा।

क्या आपको इसमें संदेह है? निस्संदेह औपनिवेशिक शासन खराब था, परन्तु वह उसके पहले के मुस्लिम और हिन्दू राजाओं के शासन से अधिक खराब नहीं था। पहले के शासकों के दौर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अवधारणा ने जन्म क्यों नही लिया।

साम्राज्य बनाम राष्ट्र : क्या हमारे देश में महान साम्राज्य नहीं थे, बिल्कुल थे। पंरतु साम्राज्य राष्ट्र के विलोम होते हैं।

  • साम्राज्य में प्रजा होती हैं। राष्ट्र में नागरिक होते हैं, जिनके अधिकार और कर्तव्य होते हैं, सुविधाएं और जिम्मेदारियां होती हैं और जिन्हें अवसर और सहारा मिलता है।
  • साम्राज्य आप पर कर अधिरोपित करने के पहले आपसे सलाह नही लेता। राष्ट्र बाइबिल के इस सिद्धांत पर आधारित होता है कि प्रतिनिधित्व के बिना करारोपण नहीं।
  • साम्राज्य में आपका अस्तित्व राज्य के लिए होता है। राष्ट्र में राज्य का अस्तित्व आपकी सेवा के लिए होता है, क्योंकि जैसा कि ईसा मसीह ने कहा था कि यद्यपि वे स्वामी हैं तथापि वे अपनी सेवा करवाने के लिए नहीं आए हैं, अपितु वे सेवा करने के लिए और दूसरों की रक्षा के लिए अपनी जान देने आए हैं।

चूंकि राष्ट्र एक नैतिक अवधारणा है इसलिए राष्ट्रवाद एक नैतिक सदगुण है। बाइबिल के अनुसार मानव के बेबेल में एक सर्वजन साम्राज्य स्थापित करने के प्रयास को ईश्वर ने विफल किया था। ईश्वर ने हमें नस्लीय, भाषायी और भौगोलिक राष्ट्रों में बांटा। यही कारण है कि वेद, उपनिषद्, पुराण, मनुस्मृति, गीता या रामायण ने नहीं वरन् ईसा मसीह के एक बंगाली अनुयायी माइकल मधुसूदन दत्त (1824-1873) की कविताओं ने बांग्ला राष्ट्रवाद के बीज बोए।

क्या महात्मा गांधी द्वारा भारतीयों को नमक बनाने से रोकने वाले कानून के विरुद्ध शुरू किए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन से भारतीय राष्ट्रवाद ने गति नहीं पाई।

ऐसा अवश्य हुआ। परंतु गांधी की पीढ़ी को यह विचार किसने दिया कि किसी भी राष्ट्र के कानून न्यायपूर्ण होने चाहिए। वे शासितों के हितार्थ होने चाहिए। परन्तु क्या उन्नीसवीं सदी में राष्ट्रवाद का उदय अंग्रेजों के नस्लवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया बतौर नहीं हुआ था। विशेष तौर पर इसलिए क्योंकि अंग्रेजों ने एसएन बनर्जी को इण्डियन सिविल सर्विसेज का अधिकारी नहीं बनने दिया। अंग्रेज युवकों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से आईसीएस में भर्ती की अधिकतम आयु घटाई और एक नस्लवादी कानून बनाया, जिसके तहत भारतीय जज यूरोपियनों पर मुकदमा नहीं चला सकते थे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह की नस्लवादी हरकतों ने पढ़े-लिखे उच्च वर्ग के भारतीयों को क्रोधित किया, परन्तु भारत तो तब से नस्लवादी, जातिवादी रहा है जब से आर्यों ने इस उपमहाद्वीप के मूल निवासियों को अपने अधीन किया। नीची जातियों के हिन्दुओं और आदिवासियों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव ने तब तक हमारी अंतरात्मा को उद्वेलित नहीं किया जब तक कि बाइबिल ने बनर्जी की पीढ़ी को, मेकाले की दण्ड संहिता के जरिए यह नहीं सिखाया कि राष्ट्र एक नैतिक समुदाय है जहां हर एक, जिनमें विदेशी शामिल हैं, कानून के सामने बराबर है।

ईसाई महाविद्यालयों और इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालयों में पढ़े भारतीय सिविल सेवा और विधि व्यवस्था में व्याप्त नस्लीय भेदभाव से इतने खफा क्यों थे, क्योंकि 1854 का एजुकेशनल डिस्पेच बाइबिल के विश्वदर्शन पर आधारित था और इसके अन्तर्गत भारत में ऐसे विश्वविद्यालय खोले गए, जिनमें भारतीय विद्यार्थी ऐसे कौशल और शैक्षणिक योग्यताएं हासिल कर सकें जो उन्हें उनके देश का शासन स्वयं चलाने के लायक बनाएं और इसलिए भी क्योंकि ब्रिटिश संसद ने 1833 और 1853 में बाइबिल के सिंद्धातों के अनुरूप यह तय किया कि आईसीएस में भर्ती केवल योग्यता के आधार पर होगी, नस्ल, भाई-भतीजावाद या रिश्वतखोरी के आधार पर नहीं।

धर्म राष्ट्र को बांटता है या एक करता है?

क्या अंग्रेजों के पहले के साम्राज्य राष्ट्रवाद का सृजन इसलिए नहीं कर सके क्योंकि वे आवागमन के साधन, रेलवे, संचार, टेलीग्राफ , प्रशासन, आइसीएस और न्यायपूर्ण कानून, आईपीसी के जरिए राष्ट्र की एकता स्थापित नहीं कर सके। बिलकुल नहीं। यूरोपियन यूनियन में कहीं बेहतर आवागमन, संचार, प्रशासन व विधिक प्रणाली है और वहां की एक ही मुद्रा है और एकीकृत बाजार भी है। परन्तु इसके बाद भी यूरोपियन यूनियन का अस्तित्व खतरे में बना हुआ है, क्योंकि पिछले छह दशकों में यूरोप के धर्मनिरपेक्ष श्रेष्ठि वर्ग ने जानते-बूझते राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को कमजोर किया है। सोवियत संघ में साम्यवाद ने राष्ट्रवाद के विचार को कुचल दिया और सोवियत संघ चार दशकों में बिखर गया। ब्रिटिश-पूर्व के भारत में समस्या यह थी कि हमारे पास राष्ट्र और राष्ट्रवाद की भाषा तक नहीं थी। हमारे धर्म के कारण हमारे देश में राष्ट्र निर्माण की कोई संभावना ही नहीं थी।

एक मुख्य कारक था अश्वमेध यज्ञ। हमारे देश के सबसे प्रतिष्ठित और सबसे महंगे धार्मिक कर्मकाण्ड ने भारत को भौगालिक दृष्टि से इतने छोटे-छोटे राज्यों में बांट दिया कि अशोक या औरंगजेब जैसे सम्राटों के विशाल साम्राज्यों को भी एक रखना मुश्किल हो गया। छोटे-छोटे राज्यों को एक कर विदेशी आक्रांताओं से मुकाबला करने के लिए एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का विचार कभी जड़ ही नहीं पकड़ सका।

जहां एक तरह के धर्म ने भारत को बांटा, वहीं दूसरे प्रकार के धर्म ने इंग्लैण्ड के राज्यों को एक किया। हालैण्ड के प्रदेशों में एकता स्थापित की और संयुक्त राज्य अमेरिका के उपनिवेशों को एक महान राष्ट्र की शक्ल दी।

इंग्लैंड 5000 मील दूर, अटलांटिक महासागर के उस पार, उत्तरी अमेरिका में 13 अलग-अलग उपनिवेशों पर शासन कर रहा था। जार्ज विटफिल्ड (1714-1770) नामक एक ईसाई बाइबिल उपदेशक पहला अमेरिकन बना। एक सार्वजनिक व्यक्तित्व, जिसे सभी उपनिवेशों में प्रेम और सम्मान प्राप्त था। अमेरिका की सफल क्रांति उसकी मृत्यु के पांच साल बाद शुरू हुई। इसका अंत 13 अलग-अलग सल्तनतों के निर्माण में क्यों नहीं हो सका। कारण यह था कि विटफिल्ड जैसे लोगों के उपदेशों ने एक महान आध्यात्मिक जागृति की शुरुआत की, जिसने अमेरिकनों को बाईबिल पर श्रद्धा करने और उसका अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया और उससे उन्हें मिली राष्ट्र की निराली अवधारणा। ठीक उसी तरह जैसे कि बाईबिल ने इंग्लैंड, हॉलैंड और भारत को दी थी।

सच तो यह है कि यदि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने का निर्णय लिया तो उसका कारण महात्मा गांधी नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट थे, जिन्होंने चर्चिल को यह सलाह दी कि वे साम्राज्य का रोमन-एंग्लिकन विचार त्याग दें और उपनिवेशों को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने की बाईबिल की सोच को अपनाएं। उनके बीच 1941 में हस्ताक्षरित संधि, जिसे अटलांटिक चार्टर कहा जाता है ने महात्मा गांधी के 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बुनियाद रखी।

…अगले अंक में जारी

(फारवर्ड प्रेस के जून 2013 अंक में प्रकाशित)

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