‘वर्ण’ की नस्लीय जड़ें आईं सामने

लगभग 4000 साल पहले तक किसी मिश्रण के प्रमाण नहीं मिलते। फिर, व्यापक पैमाने पर मिश्रण हुआ, जिससे सभी भारतीय समूह प्रभावित हुए, यहां तक कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समूह भी। अन्तत:, अपने ही समूह में विवाह करने की परंपरा स्थापित हो गई और सब कुछ मानो अपने स्थान पर जम सा गया।

एक दूसरे में मिलाओ और फिर देखो! प्राचीन भारत में उत्तर व दक्षिण में रहने वालों ने पहले बड़े पैमाने पर एक दूसरे से विवाह किए परन्तु बाद में वे अपने-अपने क्षेत्रों में सिमट गए।

हाल में दक्षिण एशिया के विभिन्न जनसंख्या समूहों के अब तक के सबसे विस्तृत आनुवांशकीय अध्ययन से भारतीयों की नस्लीय जड़ों (विशेषकर वर्ण, जाति व्यवस्था के उदय के पश्चात) का स्पष्ट चित्र उभर कर सामने आया है। अध्ययन से भारतीय उपमहाद्वीप में नस्लों के क्रमगत विकास के विभिन्न चरणों का काल मोटे तौर पर निर्धारित करने में मदद मिली है।

 

“केवल कुछ हजार साल पहले तक, भारत की जनसंख्या का स्वरूप, आज के स्वरूप से बहुत अलग था”, हारवर्ड मेडीकल स्कूल में आनुवांशिकी के प्राध्यापक व अध्ययन के वरिष्ठ सहलेखक डेविड राइक कहते हैं- “जाति व्यवस्था बहुत समय से है परन्तु हमेशा से नहीं।”

सन् 2009 में राइक और हारवर्ड मेडीकल स्कूल के उनके सहकर्मियों ने भारत के 25 विभिन्न जनसंख्या समूहों की आनुवांशिकीय बुनावट का विश्लेषण किया। इस अध्ययन से यह सामने आया कि सभी भारतीय, दो प्राचीन समूहों का आनुवांशिकीय मिश्रण हैं, पैतृक उत्तर भारतीय (एएनआई), जिनका संबंध मध्य एशिया, मध्यपूर्व, यूरोप व कोकेसस के निवासियों से है व पैतृक दक्षिण भारतीय (एएसआई), जो मूलत: इसी उपमहाद्वीप के निवासी हैं।

हाल में हारवर्ड मेडीकल कालेज के आनुवांशिकीय विशेषज्ञों और हैदराबाद के “सेन्टर फॉर सेल्युलर एंड मालीक्यूलर बायोलाजी” (सीसीएमबी) के वैज्ञानिकों के एक अन्तर्राष्ट्रीय दल ने इस अध्ययन को और विस्तृत करते हुए, 73 सुपरिभाषित नस्लीय-भाषायी समूहों के 571 व्यक्तियों की आनुवांशिकीय बुनावट का अध्ययन किया। इनमें से 71 समूह भारत के हैं और 2 पाकिस्तान के। डा. राइक कहते हैं कि “हमारे अध्ययन से यह नतीजा निकला कि प्राचीन भारत के इतिहास को सांस्कृतिक दृष्टि से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है”।

“लगभग 4000 साल पहले तक किसी मिश्रण के प्रमाण नहीं मिलते। फिर, व्यापक पैमाने पर मिश्रण हुआ, जिससे सभी भारतीय समूह प्रभावित हुए, यहां तक कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समूह भी। अन्तत:, अपने ही समूह में विवाह करने की परंपरा स्थापित हो गई और सब कुछ मानो अपने स्थान पर जम सा गया।”

डा. राइक बताते है कि ताजा अध्ययन से साबित हुआ है कि (अ) लगभग 4,200 साल पहले, पैतृक उत्तर भारतीयों व पैतृक दक्षिण भारतीयों (जो कि तब तक अलग थलग रहते थे) के बीच बड़े पैमाने पर वैवाहिक संबंध स्थापित होने शुरू हुए। यह दौर लगभग 2000 सालों तक चला। (ब) इसके बाद, एक नाटकीय परिवर्तन हुआ, जिसकी शुरूआत लगभग 1900 साल पहले हुई। अचानक विभिन्न समूहों के बीच विवाह होने बंद हो गए और अपने नस्लीय, सामाजिक या सांस्कृतिक समूह के भीतर ही विवाह करने की परंपरा शुरू हो गई।

प्रोफेसर राईक की स्नातक विद्यार्थी व अध्ययन की सहलेखिका प्रिया मोरजानी के अनुसार “अचानक भारत में एक बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन आया और व्यापक नस्लीय मिश्रण वाले क्षेत्र से यह एक ऐसे इलाके में बदल गया जहां नस्लीय मिश्रण ना के बराबर होता था और यह इसलिए हुआ क्योंकि लोगों ने केवल अपने समूह में विवाह करना प्रारंभ कर दिया”।

अध्ययन के वरिष्ठ सह-लेखक लालजी सिंह बताते है कि “इस तथ्य कि भारत का हर समूह मिश्रित जनसंख्या से उभरा है, से ऐसा प्रतीत होता है कि मिश्रण के पहले, जाति व्यवस्था जैसा सामाजिक वर्गीकरण कम से कम वर्तमान स्वरूप में मौजूद नहीं रहा होगा”। लालजी सिंह पहले सीसीएमबी में थे और अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ाते हैं।

अनुसंधानकर्ता के अनुसार “इस तरह, वर्तमान जाति व्यवस्था बहुत पुरानी नहीं है परन्तु एक बार स्थापित हो जाने के बाद, आनुवांशिकीय दृष्टि से वह बहुत स्थिर हो गई क्योंकि समूहों के बीच विवाह बहुत कम होते थे”।

मोरजानी बताते है कि ‘उत्तर भारत के समूहों की तुलना में दक्षिण भारतीय समूहों की आनुवांशिकीय बुनावट अधिक पुरानी है। शायद इसका कारण यह है कि उत्तर भारत में मिश्रण के कई दौर चले’।

अध्ययन से उस काल का मोटा अंदाजा लगता है जब विशिष्ट जनसांख्यिकीय समूहों ने अपने ही समूह में विवाह करने की परंपरा अपनाई। उदाहरणार्थ, आंध्र के व्यसा लगभग 3,000 सालों से सगोत्र विवाह कर रहे हैं अर्थात इतने समय से उनकी आनुवांशिकीय बुनावट में कोई मिश्रण नहीं हुआ है। गुजरात के भील लगभग 2,220 सालों से अलग-थलग हैं। उत्तरप्रदेश के क्षत्रियों के पूर्वज कम से कम 2,200 साल पहले तक अन्य समूहों में विवाह कर रहे थे जबकि उत्तरप्रदेश के ब्राह्मण, 1,885 साल पहले तक ऐसा करते थे। सिंधियों के मामले में यह अवधि 1,940 वर्ष है।

सीसीएमबी के कुमार सामी थंगराज, जो अध्ययन के प्रथम सहलेखक हैं, कहते हैं कि ‘इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आनुवांशिकीय व समूह-विशेष को होने वाली बीमारियां, जो आज के भारत में आम हैं, में पिछले कुछ हजार सालों में वृद्धि हुई है। यह सिलसिला तब से शुरू हुआ जब विभिन्न समूहों ने सगोत्र विवाह को कड़ाई से अपनाना शुरू किया’।

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययनों से तथाकथित ‘प्राचीन’ इतिहास और पौराणिक मिथकों, जिनपर अधिकतर भारतीय विश्वास करते हैं, की जगह भारत का वास्तविक इतिहास सामने आता है।

(एचएमएस-सीसीएमबी अध्ययन के निष्कर्ष ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स’ के अगस्त अंक में प्रकाशित हैं)

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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