सहारनपुर कांड और फूलन देवी के हत्यारे का शातिर दिमाग

सहारनपुर कांड में भीम आर्मी का नाम तो खूब चर्चा में है, लेकिन राजपूतों को कौन हवा दे रहा है? पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूत रेजिमेंट रणवीर सेना की तर्ज पर उभर रहा है। इनके लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहा है शेरसिंह राणा। सहारनपुर लौटकर सूरते हाल बता रहे हैं संजीव चन्दन। फारवर्ड प्रेस टीम की पडताल की अन्य खुलासे भी शीघ्र ही साया किए जाएंगे

ट‍्विटर पर शेरसिंह राणा की प्रोफाइल पिक

सहारनपुर के शब्बीरपुर की घटना की कडि़यों को जोडने पर आभास होता है कि यह राजपूतों की तात्कालिक प्रतिक्रिया भर नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित अभियान काम कर रहा था। इस अभियान को चलाने में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों से जुडे कुछ छुटभैये राजनीतिकर्मियों के अतिरिक्त जो सबसे चर्चित नाम सामने आता है, वह शेर सिंह राणा का है। 37 वर्षीय राणा फूलन देवी के हत्या के सजायाफ्ता आरोपी है तथा एक दशक से अधिक समय जेल में बिताकर सात महीने पहले बेल पर बाहर आया है। जेल से बाहर आने के बाद राणा कथित राजपूत गौरव के लिए काम कर रहा है तथा पर्दे के पीछे रहकर राजपूत रेजिमेंट जैसे अतिवादी संगठनों को सक्रिय कर रहा है।

महारणा प्रताप जयंती का खेल

17 मई को जब हम सहारनपुर पहुंचे उसके एक दिन पहले शब्बीरपुर गाँव में 5 मई, 2017 को दलित घरों पर हमला करने के दौरान दम घुटने से (पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार) मारे गये राजपूत युवक की तेरहवीं मनाई जा चुकी थी। उसकी तेरहवीं पर उपस्थित कुछ राजपूतों ने राजपूत रेजिमेंट के बैनर तले बैठक की। राजपूत रेजीमेंट को राजपूत समुदाय के लोग इलाके में दलित स्वाभिमान के लिए बनाई गई ‘भीम आर्मी’ का जवाब बताते हैं। तेरहवीं के दिन एक चर्चित नाम मृतक युवक के घर पहुंचा, वह था शेरसिंह राणा। शेर सिंह राणा शिमलाना गाँव में मनाये जा रहे महाराणा प्रताप जयंती में भी मुख्य अतिथि था, जहां से चलकर ही राजपूत युवकों का एक समूह पास के शब्बीरपुर गाँव में आगजनी के लिए इकट्ठा हुआ था। शिमलाना से ही गाँव पर हमले के लिए आये युवकों ने शब्बीरपुर में दो-तीन राजपूत युवकों की दलितों द्वारा ह्त्या की अफवाह फ़ैलाई थी, जबकि हकीकत थी कि गाँव पर हमला करने आया एक युवक हमले के दौरान घायल हुआ था और अस्पताल पहुँचने पर दम घुटने से मर गया। इस बीच शब्बीरपुर, जहां कुछ दिनों पहले ही बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति लगाने को लेकर तनाव हो चुका था, के पास शिमलाना गाँव में महाराणा प्रताप जयंती पर इलाके के राजपूतों का जुटान और वहाँ होने का क्या अर्थ है इसे समझना बहुत कठिन नहीं है।

झूठ की पोल : 5 मई को शिमलाना में राजपूत रेजिमेंट की बैठक में मौजूद शेर सिंह राणा की तस्वीर

शब्बीरपुर के कर्मवीर के अनुसार 5 मई को गाँव में राजपूत लड़कों के उत्पात शुरू होने के पहले और शिमलाना जाने के पूर्व राणा नानौता प्रखंड में एक मीटिंग में उपस्थित था। 8 बजे से मीटिंग थी, जहां से ब्लाक प्रमुख चांदनी राणा, उनके पति सुरेन्द्र राणा और शेरसिंह राणा इकट्ठे महाराणा प्रताप की जयंती के लिए शिमलाना रवाना हुए थे।

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शब्बीरपुर की घटना के दौरान महाराणा प्रताप जयंती में राणा की उपस्थिति तो दर्ज है लेकिन घटना स्थल पर वह स्वयं नहीं था, जिसे वह खुद बताता है कि राजपूत युवकों ने अंजाम दिया। जिले के कलक्टर भी कहते हैं कि वह गाँव में घंटना के दौरान नहीं था। और एक बार फिर राजपूत रेजिमेंट की मीटिंग
के दिन तो वह मारे गये युवक के गाँव में था, लेकिन वह इस घोषणा की जानकारी से भी इनकार करता है। हालांकि वह स्वीकार करता है कि राजपूतों की करणी सेना ने भी उसे अध्यक्ष बनाने की बात की थी, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उसके अनुसार वह ऐसे किसी संगठन के निर्माण की योजना में नहीं है।

सहारनपुर के घडकौली गाँव में साल भर पहले ‘आंबेडकर नगर और द ग्रेट चमार’ लिखे बोर्ड को हटाने की कोशिश करते राजपूतों, पुलिस और दलितों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। उस गाँव में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति को भी पेंट कर दिया गया था। पिछले 16 मई को राजपूत रेजिमेंट की बैठक के बाद घोषणा की गई है कि या तो वह बोर्ड स्वयं हटा लिया जाये या राजपूत उसे हटा देंगे। घडकौली के लोग बताते हैं कि उस वक्त शेर सिंह राणा वहाँ उपस्थित था। लेकिन ऐसी किसी घोषणा की जानकारी से वह इनकार करता है और यह भी जोड़ता है कि वह राजपूत रेजीमेंट की बैठक में शामिल नहीं था। जिले के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नागेन्द्र प्रसाद सिंह स्पष्ट करते हैं कि राजपूत रेजिमेंट के गठन और बोर्ड हटाने की धमकी की खबर उन्हें है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनकी और जिला मशीनरीज की नजर शेर सिंह पर लगातार है।

अब तक का इतिहास  

आइए पहले जानें कि शेर सिंह राणा की गतिविधियां क्या-क्या रही हैं।  शेर सिंह राणा का जन्म सहारनपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के रूडकी शहर में

रूडकी स्थित शेर सिंह राणा मार्केट : घर के साथ-साथ आमदनी का एकमात्र जरिया भी

17 मई, 1979 में हुआ। वह अपने तीन भाइयों में सबसे बडा है। स्वयं उसके अनुसार, उसके दादा किशन  सिंह के पास 7 हजार बीघे जमीन थी, लेकिन पिता सुरेंद्र  सिंह राणा तक आते-आते संपत्ति छीजती गई और अमीरी की कब्र पर पनप रही गरीब की घास उसे बहुत जहरीली लगने लगी। हलांकि समय ने फिर पलटी मारी और बची हुई जमीनों की कीमतें बढीं। आज उसके पास रूडकी के सबसे भीड-भाड वाली जगह में उच्च मध्यवर्ग की हैसियत का घर है और यही उसकी आमदनी का एकमात्र जरिया भी है। इस घर के अधिकांश हिस्से में “शेर सिंह राणा मार्केट है”, जिसमें विभिन्न प्रकार की लगभग 60 दुकानें हैं। राणा कहता है कि उसे इन दुकानदारों से 4-5 लाख रूपए मासिक आमदनी होती है,  इस कारण वह चाहे तो “समाज और धर्म की सेवा” को छोडकर अपनी बाकी बची जिंदगी रइसों की तरह बसर कर सकता है।

2001 के बरसात के दिनों में, जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था तब (25 जुलाई को) सांसद फूलन देवी की उनके घर पर हत्या कर देने वाला राणा 2004 में तिहाड़ जेल से फरार होने के बाद 2006 में कोलकाता से फिर गिरफ्तार हुआ था। इस गिरफ्तारी के बाद उसने दावा किया कि वह दो सालों की अपनी फरारी के दौरान ‘अंतिम अखिल भारतीय राजपूत शासक (12वीं सदी)’ पृथ्वीराज चौहान का अवशेष अफगानिस्तान से लाने में सफल हुआ था. अफगानिस्तान में मुहम्मद गोरी के मकबरे से लगकर पृथ्वीराज चौहान को दफनाया गया था, जिसे खोदकर उनके अवशेष लाने का दावा करते हुए शेर सिंह राजपूत गौरव के रूप में खुद को प्रजेक्ट करने लगा। उसके बाद लगभग 10 सालों तक तिहाड़ में सजा काट चुका राणा आजकल जमानत पर है, जिसे 24 अक्टूबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दी है।

विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में शेर सिंह राणा का भव्य स्वागत

चंबल में डकैत गिरोह को नेतृत्व देकर दलितों-पिछड़ों के रोबिनहुड की तरह चर्चा में आई फूलन देवी आत्मसमर्पण के बाद दो बार सांसद रहीं।अपनी ह्त्या के दौरान भी वह मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की सांसद थीं। अपने ऊपर हुए बलात्कार और राजपूतों द्वारा दलित-पिछड़ी जातियों के दमन का कथित बदला लेने के लिए फूलन देवी ने उत्तरप्रदेश के बह्मई गाँव में 22 राजपूतों की ह्त्या कर दी थी। इस घटना को राजपूतों ने बर्दाश्त नहीं किया, तब दवाब के कारण उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राजपूत मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया। शेर सिंह राणा ने फूलन देवी की ह्त्या के बाद देहरादून में आत्मसमर्पण के वक्त पुलिस के सामने इस ह्त्या की जिम्मेवारी अपने ऊपर ली थी। फूलन देवी की ह्त्या को राजपूतों ने बहमई काण्ड का बदला माना।

फूलन देवी की ह्त्या और पृथ्वीराज चौहान के कथित अवशेष को भारत लाने के कारण शेर सिंह राणा को राजपूतों ने हाथो-हाथ लिया है। यही कारण है कि जेल से जमानत पर छूटने के बाद राणा देश भर की राजपूत सभाओं में बुलाया जाता रहा है। शब्बीरपुर की घटना के दिन कुछ युवाओं द्वारा पास के गाँव शिमलाना में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती में शेर सिंह राणा की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति  छीजते हुए सामंती परिवेश में पल रहे ग्रमीण ईलाकों के राजपूत युवाओं के बीच उसके रोल मॉडल होने की कहानी कहती है। गत 27 जनवरी 2017 को पद्मावत फिल्म की शूटिंग के दौरान फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली पर हमले का पटकथा लेखक भी यही शख्स दिखता है। 24 दिसंबर 2016 को शेर सिंह करणी सेना के द्वारा आयोजित ‘जौहर सम्मान समारोह’ में भी मुख्य अतिथि था, जहां उसने मंच से कहा कि ‘यदि संजयलीला भंसाली शूटिंग बंद नहीं करता है तो वह थप्पड़ खायेगा।’

राजपूत रेजिमेंट ने जला डाला शब्बीरपुर

चेहरे से सौम्य और व्यवहारकुशल शेर सिंह के काम करने का एक ख़ास पैटर्न रहा है। घटना-स्वीकारोक्ति-घोषणा- काम को अंजाम और उसका प्रचार-प्रसार- यह एक ख़ास मोड्यूल है शेर सिंह के काम का फूलन देवी की ह्त्या के पूर्व राणा ने पूर्व सांसद के संगठन एकलव्य सेना की रुड़की-अध्यक्ष उमा कश्यप के साथ जान-पहचान और प्रगाढ़ता बढ़ाई, जिसके सहारे वह फूलन देवी के सांसद-आवास पर आने जाने लगा, उनके पति उम्मेद सिंह से ताल्लुकात बढाये। 25 जुलाई को ह्त्या के  दो दिन बाद उसने देहरादून में प्रेस कांफ्रेंस कर ह्त्या की जिम्मेदारी ली और आत्मसर्पण किया। हालांकि बाद में हत्या में शामिल न होने का तर्क न्यायालय में देता रहा है. आत्मसर्पण के बाद तिहाड़ जेल जाते हुए उसने घोषणा की कि बहुत दिनों तक तिहाड़ जेल उसे रोक नहीं सकेगा। और सच में दो-ढाई साल के भीतर 17 जनवरी 2004 को वह तिहाड़ से फरार हो गया। पुलिस उसे हरिद्वार, रूडकी, देहरादून में खोजती रही, वह रांची, गया, पटना में घूमता रहा, मीडिया को इंटरव्यू तक देता रहा। कोलकाता, बंगलादेश होते हुए बाकायदा पासपोर्ट और वीजा लेकर अफगानिस्तान में काबूल, गजनी तक पहुँच गया और वहाँ से 12वीं सदी के राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान का कथित अवशेष लेकर आया। मुहम्मद गोरी के मकबरे के पास से पृथ्वी राज चौहान का कथित अवशेष लाते हुए उसने वीडियो फिल्माया और बाद में जारी भी कर दिया। फिर 2006 में उसे पुलिस ने कोलकाता से गिरफ्तार किया, जिसे शेर सिंह ने अपनी मर्जी से आत्मसमर्पण बताया। पिछले दिनों रानी पद्मावती फिल्म के निदेशक संजय लीला भंसाली के थप्पड़ खाने की बात राजपूतों की “करणी सेना” के आयोजन में कही और कुछ ही सप्ताह के भीतर  सेना ने इस काम को अंजाम भी दे दिया।

क्या कहता है राणा अपनी सक्रियता के संबंध में

फारवर्ड प्रेस की टीम ने राणा का इंटरव्यू उसके रूडकी स्थित घर पर किया।  एक घंटे से अधिक समय तक चले इस ऑन कैमरा इंटरव्यू में वह हर सवाल के इतने लंबे और लुभावन उत्तर देता रहा है कि हम हैरान थे। वह हमारी किसी प्रश्न का न तो सीधा उत्तर देता था, न ही उत्तर देने से इंकार करता था। अपनी छवि के निर्माण में माहिर यह सख्श एक सवाल करता है अपने हर इंटरव्यू में, यह सवाल उसने हमसे भी किया कि ‘आतंकवादियों को सामान्य जीवन जीने का हक़ है तो मुझे क्यों नहीं?’ वह कहता है कि ‘मैं कोई अपराधी नहीं हूँ, एक, दो क्राइम के मुकदमे मेरे ऊपर हैं तो उसमे बेगुनाही की लड़ाई मैं लड़ रहा हूँ।’ अपनी अति सक्रियता के सवाल पर राणा का कहना है कि ‘मैं जमानत पर छूट कर आने के बाद हर महीने देश के कई हिस्सों में 10-15 राजपूत सभाओं में बुलाया जाता हूँ। शब्बीरपुर की घटना के दिन भी मैं शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती के दौरान मंच पर था। वहाँ एक युवक के मरने की खबर अफवाह की तरह आई. किसी ने कहा कि उसे गोली मारी गई है। मैं मंच पर बैठे लोगों को कहता रहा कि हमलोग लड़के को देखने अस्पताल चलें। सभा स्थल पर सैकडों की संख्या में लोग थे. कुछ युवक धीरे-धीरे, 10-20 की संख्या में एक-एक कर निकलने लगे। मैं जल्द ही घायल युवक से मिलने अस्पताल पहुंचा तो वहाँ तब तक वह मर चुका था।’

शेर सिंह के लगभग हर विषय पर अपने विचार हैं, राष्ट्रवाद, राजपूत गौरव, दलितों के उत्पीडन, आरक्षण और उसके बेजा इस्तेमाल से लेकर नक्सलवाद और आतंकवाद पर। लोकप्रिय सवर्ण हिन्दू मान्यताओं के अनुरूप वह राष्ट्रवाद की बात करता है। आरक्षण को लेकर उसका मानना है कि एक पीढी तक ही मिले। मुसलमानों के लेकर राय है कि पूरी दुनिया में मुसलमान ही क्यों तनाव के कारण हैं? राजपूतों को लेकर उसका मत है कि उन्हें पढ़ना चाहिए और अधिकतम नौकरियाँ लेनी चाहिए। उसके अनुसार ‘दलितों से आरक्षण यदि छीन भी लिया जाए तो राजपूतों का क्या फायदा? सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ आदि जातियों का कब्जा है और उनका ही बढेगा यदि राजपूत नहीं पढेंगे-लिखेंगे तो।’

शेर सिंह राणा की इस किताब पर बन रही है फिल्म

शेर सिंह की किताब ‘जेल डायरी : तिहाड़ से काबुल कंधार तक’ पर आधारित बायोपिक (जीवनी पर आधारित फिल्म) भी बनाने की तैयारी हो रही है। खुद शेर सिंह के अनुसार इस फिल्म के डायरेक्टर होंगे अनुराग कश्यप। फिल्म के कास्ट साइन होने अभी बाकी हैं।

सहारनपुर में बढ़ते जातीय तनाव, भीम आर्मी सेना के जवाब में गठित राजपूत रेजीमेंट के अस्तित्व आदि के बीच शेर सिंह की सक्रियता को देखते हुए एक सवाल सहज उठता है कि शेर सिंह बिहार में जातीय नरसंहारों का जिम्मेवार दलितों का कत्लेआम करने वाली रणवीर सेना के सुप्रीमो बमेसर मुखिया और शेर सिंह में कोई समानता है? क्या पश्चिम यूपी का वह इलाका बिहार की तरह जाति-हिंसा के लिए पक रहा है और शेर सिंह के राजपूती गौरव का अभियान उसे नेतृत्व देगा? मीडिया, संचार माध्यमों के कुशल उपयोग के साथ कदम-दर-कदम अपनी छवि निर्माण और अपनी राजनीतिक/सामाजिक योजनाओं को अंजाम देने में लगे शेर सिंह से जुड़े इन प्रश्नों के उत्तर समय के गर्भ में हैं। फिलहाल उसकी सक्रियता संदेह पैदा करती है. और वह संदेह राज्य की मशीनरी को भी है, तभी जिले के कलक्टर कहते हैं कि ‘वे उसपर पूरी नजर बनाये हुए हैं। वह अवांछित गतिवधियों में संलिप्त होगा तो नपेगा।’


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  1. turaiha rameshwardayal Reply
  2. Balram kumar Mahey Reply
  3. वेद प्रकाश सिंह Reply

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