सामाजिक न्याय के कारण झेलनी पड़ी कई बार प्रताड़ना : पी. एस. कृष्णन

पी. एस. कृष्णन ने आईएएस अधिकारी बनने के बाद अपनी पोस्टिंग के दौरान ही सामाजिक न्याय के पक्ष में कई पहल की। इसके बदले उन्हें कई बार अपमान भी झेलना पड़ा। फिर एक दिन ऐसा भी हुआ कि आंध्र प्रदेश सरकार ने उन्हें केंद्रीय सेवा में भेजने की सिफारिश की

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन  भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं – संपादक )


आजादी के बाद का सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 6

  • वासंती देवी

वासंती देवी : आंध्र प्रदेश कैडर के एक युवा आईएएस अधिकारी बतौर आपने एससी-एसटी व निम्न बीसी को कुछ हद तक न्याय दिलवाने के लिए क्या प्रयास किए? आपको गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा और आपके प्रति लोग वैर भी रखते होंगे। आपने इनपर कैसे विजय प्राप्त की? आपके प्रति आपके उच्चाधिकारियों, सहकर्मियों और जातिवाद से ग्रस्त ग्रामीण समाज का क्या दृष्टिकोण था? क्या आप इनमें से कुछ की सोच बदल सके? उन दिनों के बारे में हमें कुछ बतायें।

पी. एस. कृष्णन : मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का मौका पहली बार तब मिला जब मुझे रायदुर्ग तालुका (उत्तर भारत में तहसील) का प्रभारी तहसीलदार नियुक्त किया गया। आईएएस अधिकारियों के 15 माह के मैदानी प्रशिक्षण के अंतिम चरण में उन्हें किसी तालुका में प्रभारी तहसीलदार के रूप में नियुक्त किया जाता है। मेटकाफ हाउस दिल्ली में स्थित आईएएस ट्रेनिंग स्कूल (जिसे 1950-60) में मसूरी में स्थापित कर उसका नाम लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी रख दिया गया) में एक साल के प्रशिक्षण के बाद, आईएएस अधिकारियों का जिला स्तर का प्रशिक्षण शुरू होता था। तहसीलदार के रूप में मेरी पदस्थापना नौ सप्ताह तक खिंच गयी (अगस्त, 1958 से लेकर उस साल के अक्टूबर के प्रारंभ तक) क्योंकि मुझे तृतीय श्रेणी मजिस्ट्रेट के अधिकार प्रदान किये जाने में छह माह की देरी हुई और मुझे द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट के अधिकार भी देरी से प्रदान किए गए। ये अधिकार प्रदान किये जाने इसलिए जरूरी होते हैं क्योंकि आईएएस अधिकारियों को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आपराधिक प्रकरणों की सुनवाई कर उनका निपटारा करना होता है। जिला स्तर का प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद, प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के अधिकार प्रदान कर दिए जाते हैं, जो कि सब-कलेक्टर (कुछ उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय राज्यों में असिस्टेंट कलेक्टर) के रूप में कार्य करने के लिए जरूरी होते हैं। मेरे मामले में इन्हें प्रदान करने में देरी मेदक (जो मूलतः पूर्व हैदराबाद राज्य का हिस्सा था) में मेरे प्रशिक्षण के प्रथम चरण में नहीं वरन आंध्र क्षेत्र के अनंतपुर जिले में प्रशिक्षण के दूसरे चरण के लिए मेरे स्थानांतरण के बाद हुई।

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मैंने नौ सप्ताह की इस अवधि का पूरा उपयोग किया और मैं अपने तालुका के लगभग हर गाँव में गया। चूंकि मुझे तहसीलदार की शक्तियां प्राप्त थीं, इसलिए मैं दलितों और अन्य भूमिहीन गरीबों को, उस सरकारी खेती की जमीन के पट्टे दे सकता था जिसे वे जोत रहे थे और उस सरकारी जमीन के भी, जो खेती-योग्य तो थीं परन्तु किसी के द्वारा जोती नहीं जा रही थीं। मुझे गांवों और शहरों में घर के निर्माण के लिए जमीन के पट्टे देने का अधिकार भी था।

भूमि सुधार का मेरा पहला अनुभव

मैंने अपने प्रशिक्षण के दौरान इसके लिए अपने को पूरी तरह तैयार कर लिया था। मैंने एससी, एसटी व अन्य भूमिहीन गरीबों को कृषि भूमि आवंटित करने सम्बन्धी नियमों और शासकीय आदेशों का गहराई से अध्ययन किया था और इस सम्बन्ध में विभिन्न स्तर के अधिकारियों की शक्तियों का भी। मैंने भू-राजस्व प्रणालियों पर पुस्तकों का गहन अध्ययन किया था, जिनमें ब्रिटिश भारत की भू-राजस्व व्यवस्था पर बेडेन-पोवेल की प्रसिद्ध पुस्तक (1892) और थर्सटन व रंगाचारी की बहुखण्डीय पुस्तक ‘‘कास्ट्स एंड ट्राइब्स ऑफ सदर्न इंडिया” (1909) शामिल थीं।

इस सिलसिले में मुझे एक गाँव, जिसे तेलुगू में थातिचेरला और कन्नड़ में तल्लाकेरा कहा जाता था, की अपनी यात्रा अच्छी तरह से याद है। रायदुर्ग, कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। वह पहले बेल्लारी जिले में था। बेल्लारी, रायलसीमा के चार जिलों में से एक था और मूलतः मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। चूंकि वह कन्नड़-भाषी इलाका था, इसलिए उसे राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर, राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन के दौरान, मैसूर राज्य (जिसका नाम बाद में बदलकर कर्नाटक कर दिया गया) में शामिल कर दिया गया। परन्तु चूंकि रायदुर्ग, तेलुगू-बहुल तालुक था, इसलिए उसे बेल्लारी से अलग कर अनंतपुर में मिला दिया गया और वह आंध्रप्रदेश का हिस्सा बना रहा।

पी. एस. कृष्णन, भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह

मैं लगातार तीन दिन तक थातिचेरला में रहा। मैं एक दलित बस्ती में स्थित एक मंदिर के सामने की जगह में रुका और मैंने सुबह से लेकर रात तक वहां के निवासियों जैसी दिनचर्या का पालन किया। मैं भोजन भी दलितों के घरों में करना था और उसमें चावल नहीं बल्कि मोटा अनाज होता था। मैं अपने यात्रा भत्ते में से अपने स्टाफ को भी कुछ पैसे देता था ताकि वे गाँववालों पर बोझ न बनें। थातिचेरला में मुख्यतः दो वंचित समुदाय थे। पहला, मडिगा नाम का एससी समुदाय, जिनके प्रवक्ता मडिगा मराप्पा मुझे आज भी याद हैं।  दूसरा वंचित समुदाय था बोया, जो कि एक अति-पिछड़ी जाति है और जो पहले ‘‘डिप्रेस्ड क्लासेज” में शामिल थी। मुझे इस समुदाय के मुख्य प्रवक्ता बोरा ओमाज्जाप्पा भी याद हैं। किसी सरकारी अधिकारी का उनके बीच आकर रहना, गांव वालों के लिए एक अनोखा अनुभव था। गाँव के सभी महिला और पुरुष मुझे घेर कर बैठ जाते थे। मुझे पता था कि मडिगाओं और बोयाओं के परस्पर रिश्ते तनावपूर्ण थे। मैंने उनसे कहा कि अगर वे एक हो जाएं तो मैं उन्हें उस सरकारी जमीन, जिस पर वे खेती कर रहे हैं और अन्य खाली सरकारी जमीनों के पट्टे दे दूंगा। जिस सरकारी जमीन पर खेती की जाती थी वह ‘‘सिवाई जमा” अर्थात ऐसी भूमि जिस पर देय भू-राजस्व का आकलन न किया गया हो, कहलाती थीं। ‘‘सिवाई जमा” पर खेती, गांवों में जमीन का हिसाब-किताब रखने वालों – जिन्हें आंध्र में करनम और तेलंगाना में पटवारी (तमिलनाडु के मनियाक्करन की तरह) कहा जाता था – के लिए गैर-कानूनी आमदनी का बड़ा स्त्रोत था। सिवाई जमा खेती करने वालों का नाम अभिलेखों पर चढ़ाना या न चढ़ाना, उनकी मर्जी पर था। इस तरह, सिवाई जमा किसान, करनम/ पटवारी के रहमो-करम पर होते थे। दलित व अन्य भूमिहीन किसानों को इससे बचाने का एक ही रास्ता था –  उन्हें जमीन का पट्टा दे देना। और मैंने थातिचेरला और अन्य जितने गांवों में संभव था, ठीक यही किया। किस जमीन पर कौन सचमुच खेती कर रहा है, यह पता लगाने के लिए मैं दलितों, बोयाओं और अन्य भूमिहीन गरीबों की सभा बुलवाता था और इस कारण मुझे करनम के सरकारी अभिलेखों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था, जिनमें अक्सर असली किसानों के नाम दर्ज नहीं होते थे और झूठी प्रविष्टियां की जाती थीं। खाली भूमि के पट्टे किसे दिए जायें, इसका निर्णय भी उसी सभा में होता था। वहां मौजूद लोग अपने में से सबसे जरूरतमंद की पहचान करते थे। वे सभी गरीब और जरूरतमंद होते थे परन्तु वे सबसे जरूरतमंद की पहचान करने की क्षमता रखते थे, और वह भी बिना किसी विवाद के और संदेह से परे।

दलितों और अन्य गरीबों से मेलजोल रखने की मिली सजा   

मुझे ‘‘दलितों और अन्य गरीब लोगों के साथ मेलजोल रखने” के लिए सजा स्वरुप सन 1959 में अनंतपुर में असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में पदस्थ किया गया। मडिगा मराप्पा और ओमाज्जाप्पा को किसी तरह पता चल गया कि में अनंतपुर में हूँ और वे मुझसे मिलने आये। मुझे यह जान कर बहुत प्रसन्नता हुई कि इस इलाके के दो सबसे दमित समुदायों की एकता कायम थी।

एक अन्य गाँव जहाँ मैं प्रभारी तहसीलदार बतौर तीन दिन तक लगातार रुका, वह था रेकतला। उस गाँव में बड़ी संख्या में दलितों और अन्य निर्धन लोगों ने सरकारी जमीनों पर अपने घर बना लिए थे, परन्तु उन्हें उस जमीन का पट्टा नहीं मिला था। दूसरी ओर, प्रभावशाली वर्गों के भूस्वामियों ने गाँव के बड़े क्षेत्र में अपने भूसे के ढेर (जिन्हें तेलुगू में वामिदोद्दी कहा जाता था) लगाकर कब्जा जमा लिया था। मेरा कर्तव्य यह था कि मैं भूमिहीनों को उनकी जमीन का पट्टा दूं और भूस्वामियों के अवैध कब्जे की जमीन को खाली करवाऊं ताकि दलितों और अन्य गरीबों को उनके घर बनाने के लिए जमीन उपलब्ध हो सके। मैं उस गाँव में तब तक रुका जब तक मैंने वहां के प्रत्येक दलित और गरीब रहवासी की शिकायत सुनकर, अपनी योग्यता और शक्ति अनुसार, उसका निवारण नहीं कर दिया।

तीन बंधुआ मजदूर भाइयों की कहानी

जब मैं रेकतला से लौट रहा था, उस समय चिन्नाकोव्कुंतला, जो कि पेद्दकोल्कुंतला का एक टोला था, के निवासी तीन दलित भाईओं ने मुझे रुकने का इशारा किया। तीनों का एक ही नाम था, रमैय्या। तीनों के नाम के पीछे ‘पेद्दा’ (बड़ा), चिन्ना (सबसे छोटा) और नदिमी (बीच का) लगा कर, वरिष्ठता के आधार पर उनमें विभेद किया जाता था। नामों की इस कमी के बावजूद, नदिमी रमैय्या का यह सौभाग्य था कि उसका एक दूसरा नाम भी नाम था – कतावाप्पा। परन्तु इसे सौभाग्य कहा जाए या नहीं, यह भी संदेहास्पद था क्योंकि कटवा का अर्थ होता है काली, कठोर चट्टान, जो उस क्षेत्र में बहुतायत से पाई जाती है। मैं उनकी बात सुनने के लिए वहां रुक गया। उन्होंने मुझसे शिकायत की कि गाँव के एक रईस भूस्वामी केसानी नरसैय्या, जो एक स्थानीय वर्चस्वशाली जाति से था, से उन्होंने ऋण लिया था। इस ऋण को चुकाने के लिए उन्हें उसके खेतों में बिना मजदूरी लिए काम करना था। उनका कहना था कि उन्होंने काम करके अपने ऋण से ज्यादा धनराशि चुका दी थी परन्तु फिर भी उन्हें मुक्त नहीं किया जा रहा था। मैंने उस धनी, भूस्वामी साहूकार को बुलवाया और उसका पक्ष सुना। अनंतपुर लौटने के बाद मैंने कृष्णा रेड्डी नामक एक वकील को बुलवाया, जिसे कम्युनिस्ट बताया जाता था। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम अगर सचमुच कम्युनिस्ट हो तो इस मामले को देखो और पीड़ितों की मदद करो”। मैंने उसे रमैय्या बंधुओं का पूरा मामला समझाया। उसने वकील के रूप में उस भूस्वामी साहूकार को नोटिस जारी किया। नोटिस में बताया गया था कि तीनों भाइयों ने उसके खेतों में कितने दिन बिना मजदूरी के काम किया था और इस प्रकार न केवल अपना ऋण और उस पर देय उचित ब्याज चुका दिया था बल्कि उन्होंने जितना काम किया था, उसके चलते वे साहूकार से धन प्राप्त करने के अधिकारी थे। ब्याज की गणना एपी एग्रीकल्चरिस्ट डेट रिलीफ एक्ट के प्रावधानों के तहत की गयी थी।

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इसके बाद रमैय्या बंधु मेरे पास आये और मुझसे शिकायत की कि नोटिस मिलने की बाद से, भूस्वामी साहूकार उनके खिलाफ हिंसा कर रहा है। सौभाग्य से उस इलाके के इंस्पेक्टर श्री ओबय्या नामक एससी समुदाय के थे। मैंने मामला उन्हें सौंप दिया और उन्होंने यह सुनिश्चित किया की तीनों भाईयों के साथ कोई हिंसा न हो।

यह शायद बंधुआ मजदूरी का पहला ऐसा प्रकरण था को आंध्र प्रदेश सरकार के ध्यान में आया, या शायद देश में यह पहला ऐसा मामला था। कई सालों बाद, जब मैं भारत सरकार के गृह मंत्रालय में एससी व बीसी विकास व कल्याण के प्रभारी संयुक्त सचिव के पद पर पदस्थ था, एक बार में कोई टेस्ट करवाने राममनोहर लोहिया अस्पताल गया। वहां के एक बायोकेमिस्ट श्री रमेश ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने कभी अनंतपुर जिले में काम किया है। मेरा उत्तर था हाँ। तब उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरे बारे में अपने पिता, तत्कालीन इंस्पेक्टर श्री ओबय्या से सुना था। इसके कुछ समय पश्चात, जब श्री ओबय्या दिल्ली आये तब श्री रमेश उन्हें मुझसे मिलवाने लाये। मुझे पता चला कि वे उप पुलिस अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं परन्तु उन्हें लम्बे समय से उनकी पेंशन नहीं मिल रही है। उन्होंने मेरे कहने पर उन तीन बंधुआ मजदूरों की जो मदद की थी, उसके चलते मेरा इतना कर्तव्य तो था ही कि मैं उनकी मदद करूं। मैंने सम्बंधित विभाग से बात कर यह सुनिश्चित किया कि उनकी पेंशन उन्हें बिना किसी विलम्ब के तुरंत मिलनी शुरू हो जाए।

जब मुसलमानों ने मान ली मेरी बात

इस अवधि में मैं वरिष्ठ कांग्रेस नेता और रायदुर्ग के विधायक श्री एम. सत्यनारायणन के संपर्क में दो बार आया। पहली बार वे मुझसे इस शिकायत के साथ मिले कि एक इलाके में मुसलमान मस्जिद बना रहे हैं और इससे उस इलाके के हिन्दुओं में बेचैनी है। मैंने अपनी साइकिल उठाई और उस इलाके में पहुँच गया। मैंने मुसलमानों से पूछा कि उनका इरादा क्या है। उन्होंने मुझे बताया कि जो मस्जिद बनाई जा रही है, वह अस्थायी है और स्थायी मस्जिद, इस हेतु आवंटित जमीन पर बनाई जाएगी। मैंने जब यह बात हिन्दुओं को बताई तब उन्होंने कहा कि उन्हें निर्धारित स्थान पर मस्जिद बनने तक, अस्थायी ढांचे में नमाज अदा किये जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। दोनों पक्षों से बातचीत हुई और मामला सुलझ गया। दोनों को ही कोई शिकायत नहीं थी। इसके कुछ समय बाद, विधायक श्री सत्यनारयाणन मुझसे पुनः मिलने आये। मैंने सोचा कि वे उसी मसले को फिर से उखाड़ना चाहते हैं और इसलिए मैंने कुछ तल्ख अंदाज में उनसे कहा मैंने मामले को सुलझा दिया है और दोनों ही पक्ष संतुष्ट हैं। श्री सत्यनारायणन ने तुरंत यह साफ किया कि वे उस मामले में बात करने नहीं आये हैं बल्कि गांवों की दलित बस्तियों में रुकने के लिए मेरा आभार व्यक्त करना चाहते हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘उनके मित्र श्री संजीव रेड्डी”, जो तत्कालीन मुख्यमंत्री थे और आंध्रप्रदेश सरकार और प्रदेश कांग्रेस के सबसे शक्तिशाल्ली नेता थे, मेरे बारे में सुनकर बहुत प्रसन्न होंगे। श्री सत्यनारायणन की पहचान एक ईमानदार और सत्यनिष्ठ राजनेता के रूप में थी परन्तु बाद के घटनाक्रम से यह स्पष्ट हुआ कि शायद अपने सीधेपन के चलते के चलते वे ‘अपने मित्र’ संजीव रेड्डी को समझ नहीं सके थे।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

मेरी पहली इंडिपेंडेंट पोस्टिंग

अक्तूबर 1958 के मध्य में मुझे ओंगोल के असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में पदस्थ किया गया। उस समय ओंगोल, गुंटूर जिले का अनुभाग था। बाद में, पड़ोसी जिले नेल्लोर के कुछ हिस्से उसमें मिलकर, उसे एक स्वतंत्र जिला बना दिया गया और उसे एक नया नाम मिला प्रकाशम। यह प्रशिक्षण के पश्चात मेरी पहली स्वतंत्र पदस्थापना थी। इसके पहले भी मैं रायदुर्ग में प्रभारी तहसीलदार के रूप में स्वतंत्र प्रभार में था परन्तु वह मेरे प्रशिक्षण का भाग था। कनिष्ठ आईएएस अधिकारियों को तब तक असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में कार्य करना पड़ता है जब तक कि वे निर्धारित विभागीय परीक्षा न उत्तीर्ण कर लें। इसके बाद उन्हें सब-कलेक्टर के पद पर नियुक्त किया जाता है और वे वरिष्ठ वेतनमान के पात्र हो जाते हैं। मैंने 17 अक्तूबर को अपना पदभार सम्हाला। जब असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में मेरे पदभार ग्रहण करने के सभी कागजात तैयार हो गए थे, तभी यह खबर आई कि मैंने विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और फिर मैंने ओंगोल के सब-कलेक्टर का पदभार ग्रहण किया।    

असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में मेरी पदस्थापना के दौरान, अन्य आईएएस अधिकारियों की तरह, मैं भी निर्धारित विभागीय परीक्षाओं में सम्मलित हुआ। इन परीक्षाओं के बारे में मुझे दो-तीन दिलचस्प चीजें याद हैं। हिंदी की मेरी मौखिक परीक्षा के परीक्षक थे श्री आर. प्रसाद, जो कि आईसीएस अधिकारी थे और उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। वे अत्यंत ईमानदार और संवेदनशील व आत्माभिमानी थे। एक बार, एजी ने उनके यात्रा भत्ता देयक में दो स्थानों के बीच दिखाई गयी दूरी के बारे में शंका प्रकट की। वे तुरंत उस स्थान पर गए, वहां का मील का पत्थर उखाड़ा और उसे एजी को भेज दिया। उसके बाद से उन्होंने यात्रा भत्ता देयक ही प्रस्तुत करने बंद कर दिया और फिर कभी यात्रा भत्ता लिया ही नहीं। मुझसे हिंदी में कुछ देर बात करने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उत्तरप्रदेश से हूँ। किसी व्यक्ति के हिंदी भाषा के ज्ञान की इससे बड़ी तारीफ उत्तरप्रदेश का कोई निवासी कर ही नहीं सकता था। तेलुगू के मौखिक परीक्षक ने मुझसे पूछा कि मैंने तेलुगू कब और कहाँ सीखी। मैंने उन्हें बताया कि जब मैं त्रिवेंद्रम और कांचीपुरम (जहाँ के पचैयाप्पा कॉलेज में 1954-56 मैं व्याख्याता था) में था, तब मैंने स्वाध्याय से यह भाषा सीखी थी। मैंने उन्हें यह भी बताया कि मैंने तेलुगू में कुछ पुस्तकें भी पढ़ी हैं। पूछने पर मैंने उन्हें उन लेखकों के नाम बताये, जिनकी पुस्तकें मैंने पढ़ीं थीं। इनमें चालम नामक एक नए जमाने के लेखक शामिल थे। चालम, लीक से हटकर लिखते थे। वे पहले ऐसे तेलुगू उपन्यासकार थे, जिन्होंने जिन्दगी को महिलाओं के नजरिए से देखा। उनकी रचनाओं के मुख्य चरित्र, स्वतंत्र सोच और मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिलाएं हुआ करती थीं। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने चालम की कौनसी पुस्तकें पढ़ीं हैं, तब मैंने ‘अरुणा’ का नाम लिया। ‘अरुणा’ एक स्वतंत्र और अपारंपरिक महिला की कहानी है। परीक्षक ने मुझसे जानना चाहा कि मैं अरुणा के बारे में क्या सोचता हूँ। मेरा जवाब था कि आंध्रप्रदेश की वर्तमान सामाजिक स्थिति में अरुणा जैसी महिला की कल्पना करना मुश्किल है। उनका अगला प्रश्न था कि क्या भविष्य में कभी अरुणा जैसी स्त्री यथार्थ बन सकेगी। मैंने कहा कि समय गुजरने के साथ, अरुणा जैसे स्त्रियाँ समाज में उभरेंगीं। परीक्षक के चेहरे से यह साफ था कि इस तरह की सम्भावना से वे बहुत प्रसन्न नहीं थे।

मैं पदभार ग्रहण करने की तिथि से दो दिन पहले ओंगोल पहुँच गया। जिस दिन – अर्थात 16 अक्टूबर – को मैंने मेरे पूर्ववर्ती श्री वी. पी. रामा राव से पदभार ग्रहण किया, उसी दिन वे मुझे श्री के. पुरुषोत्तम नायडू के घर ले गए। श्री नायडू अब इस दुनिया में नहीं हैं। श्री रामा राव एक अत्यंत सज्जन व्यक्ति थे। मैंने उन्हें कभी ऊंची आवाज में बात करते तक नहीं सुना। बहरहाल, श्री नायडू से मेरी वह मुलाकात एक लम्बी दोस्ती की शुरुआत थी, जो उनके जीवनपर्यंत चली। श्री के. पुरुषोत्तम, सीधी भर्ती से डिप्टी कलेक्टर पद पर नियुक्त हुए थे और बाद में वे आईएएस में पदोन्नत हो गए। उस समय वे ओंगोल में असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर थे। वे बेल्लारी जिले – जो पहले रायलसीमा और आंध्र का हिस्सा था और 1956 के बाद से कर्नाटक का – के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे थे। मैं उनके साथ-साथ, उनकी पत्नी श्रीमती कोमला और उनके दो गोद लिए बच्चों से भी मिला। उनसे कुछ देर बात करने के बाद, मैंने श्रीमती पुरुषोत्तम नायडू से कहा कि जब वे तेलुगू बोलतीं हैं तब मुझे समझ में आता है कि तेलुगू कितनी मधुर भाषा हो सकती है।

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मैं भाग्यशाली था कि मेरे कलेक्टर श्री एम. ए. हलीम थे, जो कि मूलतः हैदराबाद सिविल सेवा के सदस्य थे और हैदराबाद के आंध्र राज्य में विलय के पश्चात, आईएएस के सदस्य बने। उनके बारे मैं आगे और बताऊँगा।

मेरी यह मान्यता है कि किसी भी मसले का सच और उसके संबंधित सही तथ्य, मैदान में कार्य करने वाले को सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। संचिकाएं और दस्तावेज अक्सर सच को उसकी पूर्णता में प्रस्तुत नहीं करते और उसे विरूपित भी करते हैं। जब हम किसी गाँव के सभी लोगों की उपस्थिति में पूछताछ करते हैं तो गाँव/बस्ती के किसी रहवासी की हिम्मत नहीं होती कि वह जमीन, उसके मालिकाना हक, उस पर कब्जे, किसी की जाति आदि के बारे में झूठ बोले। इसके दो दिलचस्प और आँखें खोलने वाले उदाहरण, जो कि अनंतपुर जिले के हिन्दुपुर तालुका के पुलामाथि और कोटिपि गांवों और तत्कालीन कुरनूल जिले के मोक्षगुंडम से संबंधित हैं, मैं आगे दूंगा।

जब दलितों ने जमीन लेने से किया इंकार

जब भी कोई नया मुद्दा या समस्या मेरे सामने आती, मैं सम्बंधित गाँव में जाता, लोगों से बात करता, उनका पक्ष समझता और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता। इस तरीके से मैं लगभग हमेशा सच तक पहुँच जाता था, विशेषकर दलितों और अन्य वंचित समुदायों व उनके अधिकारों के सम्बन्ध में। ओंगोल में मेरे कार्यकाल के दौरान मैं पहली बार (इसके पहले, थातिचेरला, रेकतला आदि की मेरी यात्राएं मेरे प्रशिक्षण का हिस्सा थीं) ऐसी ही एक सत्यान्वेषण यात्रा पर एक ऐसे गाँव में पहुंचा, जहाँ दलितों को घर बनाने के लिए जमीन उपलब्ध करवाने हेतु भूअर्जन अधिनियम के अंतर्गत भूमि अर्जित की गयी थी। दलितों ने उन्हें दिए जा रहे भूखंड लेने से इनकार कर दिया। जिला समाज कल्याण अधिकारी ने प्रस्ताव किया कि भूअर्जन रद्द कर दिया जाए। मुझे पता है कि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए, विशेषकर दलितों और अन्य वंचित समुदायों की भलाई के लिए, भू-अर्जन करना कितना कठिन होता है और इसमें कितना समय लग जाता है। मुझे यह बिलकुल ठीक नहीं लग रहा था कि दलितों को उनके सिर पर छत उपलब्ध करवाने के लिए इतनी कठिनाई ने अर्जित जमीन को वापस लौटाया जाये। मैं उस गाँव में गया और दलितों से जानना चाहा कि आखिर वे प्लाॅट लेना क्यों नहीं चाहते। उनका उत्तर था कि वे कि ईशान्य-कोण (अर्थात दक्षिण-पूर्व) मुखी हैं और वे इसे अपशकुन मानते हैं। मैंने उनसे पूछा कि अगर प्लाट पूर्व-मुखी हों तो क्या वे उन्हें स्वीकार करेंगे। उनका उत्तर था हाँ। यह बहुत आसान था। लेआउट में छोटा सा परिवर्तन कर, प्लाटों को पूर्व-मुखी बनाया जा सकता था। करना केवल इतना था कि लेआउट के दोनों कोनों में जमीन के एक छोटे से हिस्से को प्लाॅटों से अलग कर दिया जाए। अलग की गयी जमीन का इस्तेमाल किसी सार्वजनिक प्रयोजन के किये किया जा सकता था। इस परिवर्तन के साथ, उन्होंने प्लाॅट स्वीकार कर लिए और भू-अर्जन निरस्त करने का मुद्दा समाप्त हो गया।

अपने सामने बनवाये मैला ढोने वालों के मकान

उन दिनों वंचित वर्गों के लिए बजट में बहुत कम धनराशि आवंटित की जाती थी। मैं बजट दस्तावेजों को खंगाल कर ऐसे प्रावधान ढूँढता रहता था, जिनका इस्तेमाल ऐसे लोगों के हितार्थ किया जा सके। बजट में घुमंतू/विमुक्त जातियों के सदस्यों के घर के निर्माण के लिए रुपये 500 प्रति मकान का प्रावधान था, जो कि स्पष्टतः बहुत कम था। विमुक्त जातियों को पहले ‘‘आपराधिक जनजातियों’’ के नाम से जाना जाता था। उनका यह नामकरण ब्रिटिश काल में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत किया गया था। इस कारण उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता था। ऐसे समुदायों के प्रत्येक सदस्य को अपराधी माना जाता था, जो कि कतई सही नहीं था। कई विमुक्त जातियां, घुमंतू भी हैं। उनमें से एक थी येनाडी। मेरे लिए यह समझना मुश्किल था कि उसे ‘आपराधिक जनजाति’ क्यों कहा जाता था क्योंकि उसके सदस्य बहुत ही दब्बू किस्म के थे। ओंगोल के येनाडी हाथ से मैला साफ करने का काम भी करते थे। चेन्नई के अधिकांश हाथ से मैला साफ करने वाले कर्मी इसी समुदाय के हैं। उस समय ओंगोल के हिल बंग्लो की ढलान पर एक येनाडी बस्ती थी, जिसमें झोपड़ियाँ और अन्य अस्थायी व कच्चे ढांचे थे, जिनमें इस समुदाय के सदस्य रहते थे। हिल बंग्लो, एक गेस्ट हाउस था जिसमें ओंगोल के दौरे पर आने वाले अधिकारी रुकते थे।

मैं येनाडी बस्ती में गया और वहां रहने वालों को सरकार की इस योजना के बारे में बताया। वे पक्के घरों में रहने के इच्छुक थे और उन्होंने मुझसे कहा कि वे अपने लिए मकानों के निर्माण में शारीरिक श्रम करने को तैयार हैं ताकि सरकार से प्राप्त धन का भरपूर उपयोग हो सके। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं उन्हें, उनके काम से बारी-बारी से छुट्टी दिला दूं तो वे अपने मकान बनाने के लिए काम कर सकेंगे। मैंने म्युनिसिपेलिटी के अध्यक्ष श्री सीतारमैय्या से बात की और वे सहजता से उन्हें उनके काम से अनौपचारिक रूप से बारी-बारी से छुट्टी देने को तैयार हो गए। वे आधिकारिक रूप से ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि उन लोगों को छुट्टी की पात्रता नहीं थी। ओंगोल के बाहर, पत्थरों की एक खदान थी। मैंने खदान के ठेकेदार से बात की और उनसे  कहा की जब भी वे खदान से निकाले गए पत्थरों का परिवहन करें, तो एक ट्रक पत्थर येनाडी कॉलोनी की पास डाल दें। इससे हमें मकानों की लागत कम करने में मदद मिली। मैं अक्सर कॉलोनी में किसी पेड़ के नीचे बैठ जाता और वहीं ऑफिस से फाइलें बुलवाकर उन्हें निपटाते हुए, मकानों के निर्माण की प्रगति को देखता रहता। निर्माण कार्य के दौरान एक येनाडी के अंगूठे पर पत्थर गिरने से वह घायल हो गया। यद्यपि उसे बिना किसी देरी के इलाज उपलब्ध हो गया परन्तु वह अपना अंगूठा खो बैठा। उसका नाम इन्द्ला वेंकय्या था। मैं इस घटना का विवरण एक विशिष्ट कारण से कर रहा हूँ। लगभग दो दशक बाद, मैं इस येनाडी बस्ती में गया। उस समय मेरी पत्नी शांता जी और मेरी पुत्री शुभा मेरे साथ थे। बस्ती में एक नयी पीढ़ी जन्म ले चुकी थी परन्तु मैंने ज्योंही इन्द्ला वेंकय्या के अपना अंगूठा खोने की घटना का जिक्र किया, लोगों ने मुझे पहचान लिया। सौभाग्यवश, इन्द्ला वेंकैया जीवित थे और उन्हें मुझसे मिलने के लिए बुलवाया गया।

जब मेरे सीनियर ने पूछी मेरी जाति

इसके कुछ ही समय बाद, आंध्रप्रदेश राजस्व मंडल के तीसरे सदस्य श्री अनंतरमण, आईसीएस, ओंगोल आये। राजस्व मंडल में पांच सदस्य थे, जिनमें से तीन आईसीएस अधिकारी और दो हैदराबाद सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी थे, जिन्हें आईएएस का सदस्य बना दिया गया था। इस दौरे में आंध्र प्रदेश के वरिष्ठतम अधिकारियों में से एक – वरिष्ठता क्रम में चौथे – श्री अनंतरमण और सबसे कनिष्ठ अधिकारियों में से एक – अर्थात मेरे – बीच अजीबोगरीब बातचीत हुई। जब भी कोई वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री किसी जिले के दौरे पर आता है, तो ऐसी परंपरा है कि जिले/संभाग के अधिकारी उससे शिष्टाचार भेंट करते हैं। अतः मैं भी श्री अनंतरमण से मिलने हिल बंग्लो, जहां वे ठहरे थे, पहुंचा। वे अपने कमरे से बाहर निकले और बालकनी में मुझसे मिले। मैंने अपना परिचय दिया, जिसके तुरंत बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं अमुक जाति से हूं।

मैंने जवाब दिया, ‘‘सर, मुझे गलत मत समझिए परंतु मैं अपनी जाति की चर्चा नहीं करता‘‘।

इसपर उन्होंने व्यंगपूर्वक कहा कि, ‘‘आपके जैसे युवा अधिकारियों के साथ समस्या यह है कि आप लोग हमेशा अपने आपको दूल्हा समझते हैं‘।

मैंने जवाब में उनसे कहा कि ‘‘सर, मैं अपने आपको दूल्हा समझ सकता, उसके बहुत पहले से मुझे जाति व्यवस्था से इतनी वितृष्णा है कि मैं कभी इतना नहीं गिर सकता कि अपनी जाति के बारे में कुछ बोलूं‘‘।

मेरे बोलने के लहजे से यह जाहिर था कि मेरे मन में जाति प्रथा के प्रति कितनी घृणा है और इस तरह के प्रश्नोें के प्रति भी।

श्री अनंतरमण को यह सुनकर बहुत बुरा लगा और वे गुस्से में ‘‘ठीक है, ठीक है‘‘ कहते हुए अपने कमरे में चले गए। इस मुठभेड़ के दो गवाह थे – जिला सर्वे अधिकारी श्री पीएसके शास्त्री और श्री पुरूषोत्तम नायडू, जो उस समय तक मेरे काफी नजदीकी मित्र बन चुके थे। वे दोनों इस बातचीत को सुनकर हैरान थे। बाद में श्री पुरूषोत्तम नायडू, श्री अनंतरमण को पहाड़ के किनारे पैदल सैर पर ले गए। इस दौरान जो कुछ हुआ, वह श्री पुरूषोत्तम नायडू ने बाद में मुझे बताया। श्री अनंतरमण ने उनसे पूछा ‘‘क्या कृष्णन हमेशा ऐसे ही दंभपूर्ण लहजे में बात करता है?‘‘ श्री पुरूषोत्तम नायडू ने उन्हें येनाडियों के पक्के घर दिखाए, जिन्हें देखकर श्री अनंतरमण बहुत प्रभावित हुए। श्री पुरूषोत्तम नायडू ने फिर श्री अनंतरमण को बताया कि श्री कृष्णन ने ये मकान बनवाए हैं। श्री नायडू की कोशिश यही थी कि मैं श्री अनंतरमण के कोप का शिकार न बन जाऊं। श्री अनंतरमण, ओंगोल के दक्षिण में नैल्लोर के दौरे पर निकल गए और फिर दो-तीन दिन बाद हैदराबाद जाते हुए ओंगोल में रूके। पुरूषोत्तम नायडू ने मुझे यह सलाह दी कि मैं श्री अनंतरमण को फोन कर उन्हें अपने घर भोजन पर बुलाऊं। श्री अनंतरमण ने मुझसे कहा कि वे भोजन तो नहीं करेंगे परंतु मेरे घर पर दूध पी लेंगे। वे मेरे घर आए और एक कप दूध पिया। मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने हैदराबाद पहुंचकर कुछ लोगों से कहा कि ‘‘कृष्णन ने मेरा अपमान किया और फिर मुझे खाने पर बुलाया। इसलिए मैंने उसके घर खाना नहीं खाया और केवल दूध पिया‘‘। यह घटना एक चुटकुला बन गई।

प्रशासनिक गलियारे से लेकर सियासी गलियारे तक

जल्दी ही पूरे राज्य के प्रशासनिक हल्कों में मेरी व श्री अनंतरमण की मुठभेड़ चर्चा का विषय बन गई। इसके बाद मेरे खिलाफ एक जांच हुई, जिसमें श्री अनंतरमण जांच अधिकारी थे। इसके बारे मेें मैं आगे बताउंगा। इस बीच, मैं गांव-गांव जाकर भूमिहीन दलितों और अन्य भूमिहीन गरीब खेतिहर मजदूर परिवारों को सरकारी खेती के जमीन के पट्टे बांटता रहा। मैंने ऐसे दलितों और अन्य गरीब परिवारों, जिनके पास खुद के घर नहीं थे, को भी जमीन के पट्टे दिए। अधिकांश गैर-दलित गरीब, पिछड़े वर्गों, घुमंतु और विमुक्त जातियों के थे। मैंने दलित बस्तियों में भोजन करना भी जारी रखा। उन दिनों के एक वरिष्ठ दलित विधायक श्री टी. जी. आर. दास ने राज्य विधानसभा में मेरे दलित बस्तियों में रूकने के बारे में बात की और सरकार से कहा कि वह सभी आईएएस अधिकारियों को यह सलाह दे कि वे भी ऐसा हीं करें। यह खबर ‘आंध्र प्रभा‘ नामक तेलुुगू दैनिक में ‘‘कन्नू विप्पू‘‘ (जिसका अर्थ होता है अपनी आंखें खोलो) शीर्षक से प्रकाशित हुई। इसके बाद, राजस्व मंडल के प्रथम सदस्य श्री केएम उन्नीथन ने उक्त विधायक को बुलाया और उनसे जानना चाहा कि क्या वे मेरा नुकसान करना चाहते हैं। विधायक ने कहा कि नुकसान पहुंचाना तो दूर रहा वे तो मुझे एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। श्री उन्नीथन ने विधायक से कहा कि वे जो कह रहे हैं उससे मेरा नुकसान ही होगा। यह बात श्री उन्नीथन ने मुझे तब बताई जब मैं हैदराबाद की अपनी एक यात्रा के दौरान उनसे मिला।

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श्री उन्नीथन एक अलग किस्म के अधिकारी थे। वे बौद्ध धर्म में असीम श्रद्धा रखते थे और किसी के आगे झुकने के आदी नहीं थे। यही कारण था कि वरिष्ठतम अधिकारी होते हुए भी उन्हें मुख्य सचिव नहीं बनाया गया। मुख्य सचिव श्री एमपी पई, वरिष्ठता क्रम मंे दूसरे नंबर पर थे। श्री उन्नीथन का पद भी उनके समकक्ष था परंतु उनसे कहीं कम महत्वपूर्ण।

अन्य जिलों को आवंटित बजट का जो हिस्सा खर्च नहीं हो पाता था, मैं उसे, विभाग प्रमुख अर्थात संचालक, समाज कल्याण, के जरिए अपने जिले में स्थानांतरित करवा लेता था। ऐसा कर मैंने हाथ से मैला साफ करने वाले येनाडियों की एक और बस्ती में पक्के मकान बनवाए। यह बस्ती महातमाघनधिपूरम् में थी, जो कि बपतला शहर के बाहर स्थित थी। बपतला, मेरे संभाग के एक तालुका बपतला का मुख्यालय था। सरकारी सहायता से मकान बनवाने में उनकी मदद करने के अलावा, मैं उनकी बस्ती में काफी समय बिताता था। मैं उनसे बातचीत करता और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करता था।

जाति प्रमाण पत्र की दास्तां

मेरी यह आदत थी कि मैं एससी बच्चों को उनकी ही बस्तियों में जाकर जाति प्रमाणपत्र प्रदान करता था। उनकी बस्तियों में यह काम करने से इस बात की तनिक भी संभावना नहीं रहती थी कि कोई गैर-एससी झूठा प्रमाणपत्र बनवाने की कोशिश करेगा। सामान्य प्रक्रिया यह थी कि जब भी कोई व्यक्ति जाति प्रमाणपत्र बनवाने का आवेदन पत्र देता था, तो वह आवेदन पत्र सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे चलता हुआ गांव के करनम तक जाता था। उन दिनों कारनामों की नियुक्ति पुश्तैनी आधार पर होती थी। फिर, करनम अपनी रपट देता था जिसमें वह बताता था कि आवेदक की जाति क्या है और क्या वह जाति एससी (या एसटी अथवा बीसी, जैसा भी मामला हो) सूची में आती है। उसके बाद आवेदनपत्र फिर से उसी रास्ते, अर्थात राजस्व निरीक्षक व तहसीलदार के कार्यालयों से होता हुआ, सब-कलेक्टर/आरडीओ तक पहुंचता था। यह प्रक्रिया न केवल धीमी थी बल्कि इसमें सही व्यक्ति को भी अपना जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए कई बार रिश्वत देनी पड़ती थी। मैंने जो प्रक्रिया अपनाई वह यह थी कि लोग सीधे मुझे आवेदनपत्र देते थे, जिसे मैं तुरंत करनम को सौंप देता था। करनम वहीं अपनी रिपोर्ट तैयार करता था और वहां मौजूद राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार उस पर अपना अभिमत देते थे। फिर वहीं जाति प्रमाणपत्र तैयार किया जाता था और मैं उस पर हस्ताक्षर कर संबंधित बच्चे के माता-पिता को सौंप देता था। इस प्रकार, सारी प्रक्रिया मिनटों में निपट जाती थी। मैं सभी एससी परिवारों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करता था कि वे अपने बच्चों के जाति प्रमाणपत्र अवश्य बनवाएं क्योंकि वे भविष्य में उनके काम आएंगे।

इसके लगभग तीन दशक बाद, सन् 1986-87 में, जब मैं आंध्र प्रदेश सरकार में प्रमुख सचिव था, उस समय एक सज्जन एक युवा लड़के के साथ मेरे घर आए। उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वे वेंकटेश वरलू हैं और आबकारी विभाग में उपायुक्त हैं। उनके साथ जो लड़का था, वह उनका पुत्र था और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। उन्होंने मुझे बताया कि वे महातमाघनधिपूरम् मेें रहने वाले एक येनाडी परिवार से हैं और जब मैं महातमाघनधिपूरम् गया था तब वे छह वर्ष के थे। उन्होंने बताया कि उन्हें याद है कि मैंने उस समय सभी बच्चों के जाति प्रमाणपत्र उसी स्थल पर बनाए थे। फिर उन्होंने अपने थैले में से मेरा हस्ताक्षर किया हुआ जाति प्रमाणपत्र निकाला, जो उन्होंने फ्रेम करवाया हुआ था। यह प्रमाणपत्र मैंने उनके माता-पिता को 1958 में जारी किया था। उन्होंने मुझे बताया कि यह प्रमाणपत्र उनके बहुत काम आया और अब उनके इंजीनियरिंग विद्यार्थी पुत्र के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो रहा है। उनकी बात सुनकर मुझे बहुत संतोष और सुख का अनुभव हुआ।

जैसा कि मैंने पूर्व में बताया, बाद में येनाडी और उनके साथ-साथ येरूकुला व बंजारा (जिन्हें सुगाली भी कहा जाता है) को आंध्रप्रदेश में एसटी सूची में शामिल कर लिया गया। अतः, येनाडी के रूप में उन्हें जारी इस प्रमाणपत्र से उन्हें एसटी के रूप में अपनी पहचान साबित करने में भी मदद मिली।

गरीबों को जमीन पर दिलाया हक  

प्रशासन की सबसे निचली सीढ़ी है राजस्व ग्राम, जिसमें एक या एक से अधिक बस्तियां हो सकती हैं। उस समय (तब से अब तक कुछ परिवर्तन हो चुके हैं) आंध्र क्षेत्र के गांवों में, मद्रास प्रेसिडेंसी की तर्ज पर, दो ग्राम अधिकारी हुआ करते थे। तेलंगाना क्षेत्र में बंबई प्रेसिडेंसी की तरह तीन ग्राम अधिकारी होते थे। इन ग्राम अधिकारियों की मदद करने के लिए तीन अन्य व्यक्ति हुआ करते थे, जिन्हें आंध्र क्षेत्र में ग्राम सेवक और तेलंगाना क्षेत्र में सेठसिन्धी कहा जाता था। ओंगोल, आंध्र क्षेत्र में था और वहां दो ग्राम अधिकारी हुआ करते थे। पहला था मुंसिफ या मुखिया, जिसके कर्तव्यों में शामिल था किसानों से भू-राजस्व और अन्य शासकीय शुल्क वसूलना और उसे जल्द से जल्द सरकारी खजाने में जमा करवाना। वह जमीनी स्तर पर प्रशासन की आंख और कान भी हुआ करता था, और अधिकारियों को समय-समय पर ऐसे मसलों के बारे में जानकारी देता था जिनका संबंध कानून और व्यवस्था से था। दूसरा ग्राम अधिकारी था, करनम या गांव का लेखाकार, जो ग्राम स्तर पर भू-राजस्व अभिलेखों का संधारण करता था और हर साल किस किसान ने किस खेत में कौनसी फसल बोई, इसका हिसाब-किताब रखता था। ये पद भू-प्रशासन की पुरानी सामंती व्यवस्था की निशानी थे और इन पर नियुक्तियां जाति के आधार पर होती थीं। नियुक्ति करने का अधिकार सब कलेक्टर/डिप्टी कलेक्टर/रेविन्यू डिवीजनल ऑफिसर को हुआ करता था। वह केवल ऐसे परिवारों के सदस्यों को इन पदों पर नियुक्त कर सकता था, जो पुश्तैनी रूप से इसके लिए पात्र थे। नियुक्ति के लिए अर्हकारी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य था। ग्राम सेवकों/सेठसिन्धियों की नियुक्तियां, दलितों व सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में से की जाती थीं। यह पुश्तैनी व्यवस्था, उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के बाद समाप्त कर दी गई।

ग्राम स्तर के अधिकारी दो प्रकार की अनियमितताएं करते थे। पहली, वे दलितों या अन्य गरीब लोगों के कब्जे की खेती की जमीनों व उनके रहवास स्थलों की प्रविष्टि या तो अभिलेखों में करते ही नहीं थे या गलत करते थे। दूसरी, वे किसानों से वसूला गया भू-राजस्व या अन्य शुल्क सरकारी खजाने में या तो जमा ही नहीं करते थे या देरी से जमा करते थे। कई करनम, अभिलेखों से इस प्रकार छेड़छाड़ करते थे जिससे सरकारी जमीन पर खेती करने वाले दलितों और अन्य भूमिहीन गरीबों को क्षति होती थी। करनम लगभग हमेशा ब्राम्हण हुआ करते थे। यही परंपरा दक्कन के अन्य राज्यों में भी थी। बंबई/महाराष्ट्र में वे पटवारी अथवा कुलकर्णी कहलाते थे और मैसूर/कर्नाटक में शानबाग। गांव का मुखिया लगभग हमेशा उस क्षेत्र के वर्चस्वशाली भूमिस्वामी वर्गों से हुआ करता था। मुझे याद है कि मैं चिराला के नजदीक वेटापलेम गांव में खेत-खेत जाकर सरकारी जमीन पर खेती कर रहे दलितों और अन्य गरीब किसानों की प्रविष्ठियां सरकारी अभिलेखों में करता था। ये वे लोग थे जिनका नाम करनम द्वारा जानबूझकर अभिलेखों में दर्ज नहीं किया जाता था। मैं हर उस गांव में यह करता था, जहां मैं दौरे पर जाता था। करनम द्वारा प्रविष्ठियां न करने या गलत प्रविष्ठियां करने से न केवल दलितों और अन्य गरीब लोगों को बहुत तकलीफ भुगतनी पड़ती थी वरन् यह करनमों की अवैध कमाई का जरिया भी था। गांव के मुंसिफ या मुखिया, अक्सर किसानों से वसूला गया भू-राजस्व स्थायी या अस्थायी रूप से खा जाते थे जबकि नियम यह था कि वह राशि उन्हें तुरंत सरकारी खजाने में जमा करनी होती थी।

मैं इस तरह की अनियमितताएं करने वाले ग्राम स्तर के अधिकारियों से काफी कड़ाई से पेश आता था। मैं उन्हें निलंबित कर उनके विरूद्ध जांच का आदेश देता था और जांच में उनके दोषी पाए जाने पर उन्हें दंडित भी करता था। मुरूकोंडापाडू नामक गांव के करनम श्री सुब्रमण्यम को मेरे कार्यकाल में निलंबित किया गया था। नजदीक के गांव कनकटापालेम के करनम को मुरूकोंडापाडू का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। जब मैं किसी काम से मुरूकोंडापाडू गया तब वे और कनकटापालेम के ग्राम सेवक मेरे साथ थे। मैंने पाया कि कनकटापालेम का थोटी (एक ग्राम सेवक जो पारंपरिक रूप से एससी होता था) काफी होशियार था। उसके पास करनम की परीक्षा देने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी थी। उसका नाम श्री काठी आनंद राव था। उन दिनों मैं ऐसे तरीकों की तलाश में था, जिससे पुश्तैनी और जाति के आधार पर ग्राम अधिकारियों की नियुक्ति की व्यवस्था को परिवर्तित किया जा सके। मैं किसी दलित को गांव का करनम, जो कि ग्राम स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पद होता है, बनाना चाहता था। मैंने अपने डिवीजन में एक गांव खोज निकाला जिसमें सहायक करनम का पद गैर-पुश्तैनी था। यह गांव था मेरे डिवीजन के पोन्नूर उप तालुका का मुनिपल्ले।

मैं एक ऐसे दलित की खोज कर रहा था जिसके पास करनम की परीक्षा देने के लिए आवश्यक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हो ताकि मैं उसे परीक्षा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित और तैयार कर सकूं। मैंने श्री काठी आनंद राव से कहा कि वे करनम की अगली परीक्षा में शामिल हों। मैंने बकताला के राजस्व निरीक्षक श्री पालोस, जो कि एक दलित ईसाई थे, से कहा कि वे परीक्षा की तैयारी करने में आनंद राव की मदद करें। श्री आनंद राव मेरी अपेक्षाओं पर खरे उतरे और उन्होंने पहले ही प्रयास में परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इस पद पर नियुक्ति के लिए पुश्तैनी रूप से पात्र परिवारों के सदस्य शायद ही कभी पहले प्रयास में यह परीक्षा पास कर पाते थे। मैंने सन् 1959 में उन्हें मुनिपल्ले का उप-करनम नियुक्त किया। यह आंध्र प्रदेश, और शायद पूरे देश में इस पद पर, जो कि चन्द स्थानों को छोड़कर पुश्तैनी था, किसी दलित की नियुक्ति का पहला उदाहरण था। किसी दलित की करनम के पद पर नियुक्ति, वंचित तबकों के लिए एक बहुत बड़ी घटना और मील का पत्थर थी। उनके जीवन में करनम सबसे शक्तिशाली अधिकारी होता है। कलेक्टर और अन्य उच्चाधिकारी, उनसे इतने दूर होते हैं कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से उच्चाधिकारियों का कोई वास्ता ही नहीं होता। मेरे इस निर्णय से पूरे अनुभाग और जिले का श्रेष्ठि वर्ग नाराज हो गया। इसकी खबर सिर्फ एक अखबार में छपी और वह था मद्रास से प्रकाशित ‘द मेल‘, जो बाद में बंद हो गया। ‘द मेल‘ में भी यह खबर इसलिए छप सकी क्योंकि उसका स्थानीय संवाददाता एक दलित ईसाई था।  

दलितों और अन्य भूमिहीन गरीबों को खेती की ज़मीन आवंटित करने के मेरे अभियान के तहत, मैंने चिराला के नज़दीक एक क्षेत्र में काफी समय बिताया। इस क्षेत्र में रोमपेरू ड्रेन का निर्माण चल रहा था। यह ड्रेन इसलिए बनाई जा रही थी ताकि खेतों में सिंचाई के बाद अतिरिक्त पानी को बाहर निकाला जा सके। अगर पानी खेतों में बना रहता है तो वह मिट्टी में अवशोषित होकर जमीन को अम्लीय या क्षारीय बना देता है। बड़ी संख्या में वहां के दलित और अन्य गरीब परिवारों ने क्षेत्र की सरकारी ज़मीन को छोटे-छोटे खेतों में बांट लिया था और उन पर खेती करते थे। इस ज़मीन का हस्तांतरण प्रतिबंधित था इसलिए मैं उन्हें उनके कब्ज़े वाली ज़मीन पर खेती करने की अनुमति वार्षिक आधार पर देता था। जब ड्रेन का निर्माण कार्य खत्म हो गया और जो ज़मीनें ड्रेन के लिए आवश्यक नहीं थीं, उन्हें मुक्त कर दिया गया, तब वार्षिक (एकसाला) परमिट के ये दस्तावेज़, उनके लिए उपयोगी सिद्ध हुए। इन दस्तावेजों की सहायता से वे यह साबित कर सके कि ज़मीनों पर उनका कब्ज़ा है और उन्हें उन ज़मीनों के पट्टे मिल गए। जो लोग इन ज़मीनों से जुड़ी समस्याओं के सिलसिले में मुझसे मिलते रहते थे उनमें से कुछ के नाम मुझे याद हैं। एक थी लिंगम मरियम्मा और उनके पति लिंगम राजारत्नम, जो कि मज़बूत कद-काठी के व्यक्ति थे। देता जार्ज और दोखा कोन्डैया भी मुझसे मिलते रहते थे। वे लोग चिराला-पिराला के दलित ईसाई थे। समाज, दलितों के साथ, चाहे वे हिन्दू हों या ईसाई, एकसा व्यवहार करता था। उस क्षेत्र में सरकारी ज़मीनों पर खेती करने वाले गरीबों से जुड़े मसलों में जो एक व्यक्ति बहुत रूचि लेते थे वे थे श्री शेख मस्तान। वे एक कम्युनिस्ट थे और जब मैं खेत-खेत जाकर कब्जे़धारियों को चिन्हित करता था तब वे लोगों के साथ रहते थे, उनकी मदद करते थे और मुझे भी सही-सही जानकारी देते थे।

सन 2010 में मैं एक बार फिर चिराला गया। तब तक लिंगम मरियम्मा इत्यादि इस दुनिया में नहीं रहे थे परंतु मेरी उनके लड़कों, लड़कों की पत्नियों और उनके परिवारों के अन्य युवा सदस्यों से मुलाकात हुई। मुझे यह जानकर बहुत खुषी हुई कि इन लोगों को रोमपेरू क्षेत्र में अतिषेष भूमि के हस्तांतरण पर लगा प्रतिबंध उठने के बाद खेती करने के लिए ज़मीनों के पट्टे मिल गए थे।

इस अवधि में भूमिहीन गरीब दलितों और अन्य भूमिहीन गरीबों को ज़मीनें आवंटित किए जाने की राह में रोड़ा बने श्री काशी विश्वनाथन। वे ‘‘राजनीतिक पीड़ितों’’ का प्रतिनिधित्व करते थे। ‘‘राजनीतिक पीड़ित’’ वे लोग थे जिन्हें स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के कारण पीड़ा भुगतनी पड़ी थी। स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने भी भाग लिया, उन्होंने अपनी देशभक्ति के चलते स्वेच्छा से ऐसा किया और उन्हें बदले में किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए थी। स्वतंत्रता के बाद सरकार से स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने का ‘मुआवज़ा’ मांगना, न केवल अनुपयुक्त था बल्कि विडंबनापूर्ण भी था। ऐसी भी शिकायतें थीं कि कुछ लोगों, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया था या ना के बराबर हिस्सा लिया था, उन्होंने भी स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के झूठे प्रमाणपत्र हासिल कर लिए थे। ‘राजनीतिक पीड़ित’ किसान नहीं थे। यह सर्वज्ञात था कि बहुत से ‘राजनीतिक पीड़ितों’ ने उन्हें आवंटित ज़मीनों को बेच दिया था। परंतु चूंकि सरकार की यह नीति थी कि राजनीतिक पीड़ितों को ज़मीनें आवंटित की जाएं और इस आशय के आदेश भी जारी कर दिए गए थे, अतः मुझे उन्हें ज़मीनें आवंटित करनी पड़ती थीं। परंतु मेरी कोशिश यही रहती थी कि मैं राजनीतिक पीड़ितों को ज़मीन आवंटित करते समय यह सुनिश्चित करूं कि इससे गरीबों के हितों को चोट न पहुंचे क्योंकि वे कहीं अधिक ज़रूरतमंद और पात्र थे और आज भी हैं। इसके बाद भी, श्री काशी विश्वनाथन और ‘राजनीतिक पीड़ितों’ के अन्य नेताओं व सत्ताधारी दल के ज़िला-स्तरीय नेताओं ने सरकार के उच्च राजनीतिक स्तर पर यह शिकायत की कि मैं राजनीतिक पीड़ितों की मदद नहीं कर रहा हूं। एक बार तत्कालीन राजस्व मंत्री श्री कला वेंकटराव, जो राज्य के वरिष्ठतम राजनीतिक नेताओं में से एक थे, और श्री संजीव अय्या, जो कि मंत्री और वरिष्ठतम एससी नेता थे, पोन्नूर के दौरे पर आए। पोन्नूर, मेरे अनुभाग के एक उपताल्लुक का मुख्यालय था। वे पोन्नूर के गेस्ट हाउस में ठहरे। जैसा कि स्वाभाविक था, बड़ी संख्या में लोग अपनी-अपनी शिकायतें और आवेदन लेकर उनसे मिले। उनमें ‘राजनीतिक पीड़ितों’ के प्रतिनिधि भी शामिल थे, जिनकी ज़मीन की भूख कभी न समाप्त होने वाली थी। जब उन्होंने शिष्टता की सारी सीमाएं लांघ लीं, तब, श्री कला वेंकटराव, जो कि शिष्ट और उचित व्यवहार के हामी थे, ज़ोर से चिल्ला पड़े और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसके बाद उन्होंने इस मुद्दे पर मुझसे अलग से चर्चा की। मैं अपनी बात पर कायम रहा। मैंने उनसे कहा कि दलितों और अन्य भूमिहीन कृषकों को ज़मीन की सबसे अधिक जरूरत है और सरकार की नीति और आदेश हैं कि एससी, एसटी और अन्य भूूमिहीन गरीबों को सरकारी ज़मीनें आवंटित की जाएं। मैंने उनसे कहा कि मैं सरकार की इस पुरानी नीति और ‘राजनीतिक पीड़ितों’ के संबंध में नई नीति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रहा हूं। श्री कला वेंकटराव मेरे स्पष्टीकरण से संतुष्ट दिखे और मैं श्री संजीव अय्या के चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान देख सकता था। मुझे लगा कि यह मुद्दा समाप्त हो गया है परंतु, जैसा कि मैं आगे बताउंगा, ऐसा नहीं था।

तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन की पहल

दलितों को खेती योग्य ज़मीन की ज़रूरत सबसे अधिक है। इसका कारण यह है कि ऐसे मौकों को छोड़कर, जब इन वर्गों के प्रति सहानुभूति रखने वाला कोई व्यक्ति कलेक्टर/डिप्टी कमिश्नर रहा हो, भारत में दलित परिवारों और भूमिहीन गरीबों को खेती की ज़मीन उपलब्ध करवाने के संगठित और सुनियोजित प्रयास कभी नहीं हुए। कुछ समय पहले, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन ने राज्यपालों की एक समिति बनाकर उसे यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह ग्रामीण दलित परिवारों को आवंटित किए जाने हेतु सरकारी ज़मीनों की उपलब्धता के मुद्दे पर विचार करे। इस समिति के अध्यक्ष डाॅ. पी.सी. एलेक्जेंडर थे। डाॅ. पी.सी. एलेक्जेंडर, अत्यंत प्रतिष्ठित पूर्व आईएएस अधिकारी थे जो उस समय महाराष्ट्र के राज्यपाल थे। उसके पहले वे तमिलनाडू के राज्यपाल रह चुके थे।

डाॅ. एलेक्जेंडर की ख्याति एक अत्यंत कार्यकुशल अधिकारी के रूप में थी। जब श्रीमती इंदिरा गांधी की सन 1980 में सत्ता में वापसी हुई, तब उन्होंने डाॅ. एलेक्जेंडर को, जो उस समय अपनी सेवानिवृत्ति के बाद विदेश में काम रहे थे, अपने निजी सचिव का कार्य संभालने के लिए आमंत्रित किया। सन 1973-76 में, जब मैं आंध्रप्रदेश में संचालक, उद्योग था और डाॅ. एलेक्जेंडर भारत सरकार में लघु उद्योग विभाग के महानिदेशक थे, उस समय मैं उनके निकट संपर्क में था। वे मेरे काम के प्रशंसक थे, विशेषकर एससी महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों के उद्यमियों को, उस समय प्रारंभ हुई शिक्षित बेरोज़गारों के लिए स्वरोज़गार योजना के लाभ दिलवाने के मेरे प्रयासों के। बाद में सन 1983-84 में मुझे एससी पर मेरे शोध के परिणामों पर उनसे चर्चा करने का मौका मिला। मैंने उनसे कहा कि इस आशय के लिखित प्रमाण हैं कि केरल में 19वीं सदी तक एससी लोगों को गुलामों के रूप में खरीदा और बेचा जाता था। यह तब, जब कि ब्रिटिश संसद ने संपूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया था। परंतु केरल में गुलामी की प्रथा जारी रही और 20वीं सदी तक इसका अस्तित्व बना रहा। डाॅ. एलेक्जेंडर ने अत्यंत स्पष्टवादिता और ईमानदारी से बताया कि उन्हें याद पड़ता है कि उनके पैतृक घर और खेतों में गुलाम लड़के रहा करते थे। उन्होंने यह बात मेरी उपस्थिति में अपनी पत्नी से भी कही।

जो अन्य राज्यपाल इस समिति के सदस्य थे, उनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश के राज्यपाल डाॅ. सूरजभान, जो बाद में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बने। वे हरियाणा के अंबाला से थे और विद्वान व प्रतिष्ठित दलित नेता थे। वे इस समिति के सबसे सक्रिय सदस्य थे और डाॅ. एलेक्जेंडर के रूप में समिति को एक निष्पक्ष नेतृत्व उपलब्ध था। अपनी रपट में समिति ने सरकार के कब्ज़े की खेती की ज़मीनों का विवरण शामिल किया। इसमें वे ज़मीनें तो शामिल थीं ही, जो वर्तमान में खेती योग्य थीं वरन ऐसी ज़मीनें भी शामिल थीं, जिन पर वर्तमान में खेती करना संभव नहीं था परंतु जिन्हें खेती योग्य बनाया जा सकता था। इनमें उत्तर प्रदेश की ऊसर भूमि और चंबल घाटी की भूमि शामिल थी। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि देश में इतनी भूमि उपलब्ध है कि भारत के हर एससी परिवार को उसके जीवनयापन के लिए पर्याप्त आकार का भूमि का टुकड़ा खेती के लिए आवंटित किया जा सकता है। यह रपट आज भी सरकारी दफ्तरों में धूल खा रही है। इतनी प्रमाणिक रपट के उपलब्ध होने के बावजूद भी किसी सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर हर ग्रामीण एससी परिवार और भूमिहीन गरीब खेतिहर श्रमिक परिवार को उसके जीवनयापन के लिए पर्याप्त आकार की खेती योग्य भूमि आवंटित करने का कोई सुनियोजित अभियान नहीं चलाया। अधिकांश भूमिहीन निर्धन खेतिहर मजदूर, शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में से सबसे पिछड़ी जातियों में आते हैं।

जब मैंने एक दलित परिवार के यहां खाना खाया

ओंगोल के सब कलेक्टर के रूप में मुझे चिन्नागंजम, जो कि पेड्डागंजम का एक छोटा सा गांव था, के मडिगा समुदाय से यह शिकायत मिली कि उन्हें वहां के एक दूसरे बड़े एससी समुदाय माला द्वारा पीने के पानी के उस कुएं से पानी भरने से रोका जा रहा है, जिसे समाज कल्याण विभाग ने एससी के लिए गांव में खुदवाया है। इस समस्या का समाधान निकालने के लिए मैं चिन्नागंजम पहुंचा। उस समय चिन्नागंजम में अफरा-तफरी मची हुई थी क्योंकि दोनों ही एससी समुदायों के कुछ बच्चों को हैजा हो गया था। मैंने तुरंत अपनी गाड़ी नज़दीकी शहर चिराला भेजी और वहां से एक स्वास्थ्य निरीक्षक को गांव बुलवाया। उसने रोग से पीड़ित बच्चों को दवाईयां दीं और अन्य दलित बच्चों को हैजा से बचाव के टीके लगाए। उसके बाद मैंने गांव वालों को इकट्ठा कर उनसे कहा कि मैंने वह कर दिया है, जो वे चाहते थे और अब उन्हें वह करना चाहिए, जो मैं चाहता हूं। मैंने दोनों दलित समुदायों के प्रतिनिधियों से कहा कि वे मेरे साथ कुएं तक चलें और एकसाथ मिलकर कुएं से पानी निकालें। दोनों ने मेरी बात मान ली। इसके बाद मैंने उनसे कहा कि मैं एक मडिगा परिवार में सुबह का भोजन करूंगा और मेरी इच्छा है कि माला समुदाय के प्रतिनिधि भी वहां मेरे साथ खाना खाएं। उसके बाद मैं एक माला परिवार के घर खाना खाउंगा और मडिगाओं के प्रतिनिधियों को भी वहां रहना चाहिए। उन्होंने ऐसा ही किया। उसके बाद मैंने उनकी एक छोटी सी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जाति प्रथा और जातिगत भेदभाव, अतार्किक और उनके लिए नुकसानदेह हैं और उन्हें, इन्हें त्यागना चाहिए। कुछ मुसलमानों, जो वहीं नज़दीक बैठे थे, ने कहा कि उनमें जातिगत भेदभाव नहीं है। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे माला और मडिगा समुदाय के लोगों को अपनी मस्जिद में जाने देंगे। उन्होंने हामी भरी और फिर मैं माला और मडिगा समुदाय के कुछ लोगों के साथ मस्जिद में गया। इस घटना का दोनों एससी समुदायों पर गहरा प्रभाव पड़ा। इससे दो चीजें साबित होती हैं। पहली यह कि एससी समुदायों के बीच विवादों को सौहार्दपूर्वक सुलझाया जा सकता है। दूसरी यह कि एससी समुदायों के मन में हमेशा यह इच्छा रहती है कि उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए। यह इससे जाहिर है कि वे तब बहुत प्रसन्न हुए जब गांव के मुसलमान उन्हें अपनी मस्जिद में ले गए।

इसके कई सालों बाद, सन 2010 में मैं अपनी पत्नी श्रीमती शांता कृष्णन के साथ चिन्नागंजम गया। तब तक वह कुंआ भर दिया गया था परंतु जहां वह था, उस स्थान पर मुझे ले जाया गया। गांव में अब पीने के पानी की सप्लाई पाईपों द्वारा होती थी। वहां केवल एक बूढ़ा व्यक्ति बचा था जिसे 1958-59 की वह घटना याद थी। मैं मालाओं और मडिगाओं, दोनों की बस्ती में गया। दोनों की बस्तियां अलग-अलग थीं और उनके बीच एकता कायम नहीं हो सकी थी। मालाओं की हालत खराब थी और मडिगांओं की उनसे भी ज्यादा खराब। समय के साथ उनमें से एक समुदाय ने शिक्षा ओर शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेकर अपनी स्थिति सुधार ली थी। दूसरा समुदाय ऐसा नहीं कर सका था और इसके कारण दोनों की आर्थिक स्थिति के बीच काफी अंतर आ गया था। ऐसा ही कुछ अन्य राज्यों में भी हुआ है। इस समस्या का हल यह है कि सभी एससी समुदायों को एक करने का प्रयास किया जाए और उनके बीच के मतभेदों को इस तरह से सुलझाया जाए कि दोनों को ही लगे कि वे जीते हैं और कोई हारा नहीं है। दुर्भाग्यवश, राजनीतिक दल विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद को और बढ़ावा देते हैं ताकि वे किसी एक समुदाय के वोट हासिल कर सकें और वह भी उनकी भलाई के लिए कुछ किए बगैर।

जब मुझ पर लगाया गया जाति युद्ध भड़काने का आरोप

सब-कलेक्टर के रूप में मेरे कार्यकाल की दो-तीन अन्य घटनाओं की चर्चा भी मैं करना चाहूंगा। एक का संबंध वार्षिक जमाबंदी से है। भूराजस्व की राशि का निर्धारण करने की प्रक्रिया को जमाबंदी कहा जाता है। यह हर साल सब-कलेक्टर/डिप्टी कलेक्टर/रेवेन्यू डिवीज़नल ऑफिसर के मुख्यालय में होती है। तहसीलदार और ताल्लुक के अन्य कर्मचारियों के साथ-साथ ग्राम स्तर के अधिकारी, हर गांव के अभिलेखों के साथ इकट्ठा होते हैं। इन अभिलेखों की जांच कर उन्हें अनुमोदित किया जाता है और हर गांव से वसूले जाने वाले भू-राजस्व की गणना और उसका निर्धारण होता है। यह काम दो या तीन दिनों तक चलता है। वार्षिक जमाबंदी के आखिरी दिन को याचिका जमाबंदी कहा जाता है। उस दिन ग्रामीण इलाकों के लोगों की शिकायतें सुनी जाती हैं। कोई भी ग्रामीण नागरिक अपनी शिकायत या आवेदनपत्र अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है और उनका निराकरण या तो तत्काल कर दिया जाता है या यदि ऐसा करना संभव न हो तो तहसीलदारों या अन्य अधिकारियों को आगे की कार्यवाही के संबंध में निर्देश जारी कर दिए जाते हैं। जमाबंदी का यह हिस्सा अर्थात याचिका जमाबंदी, गांव के आम लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। मेरे मामले में इसका महत्व कम था क्योंकि मैं पूरे साल दलितों की बस्तियों में घूम-घूम कर उनकी शिकायतें सुनता और उनका तत्काल निराकरण करता रहता था। मैं दलितों की खेती की ज़मीनों, मकानों और जाति प्रमाणपत्रों आदि से संबंधित समस्याओं को सुलझाने का काम पूरे साल करता था। इस दौरान मैं अन्य समुदायों के लोगों की समस्याओं को भी सुनता था। जल्दी ही पूरे इलाके में यह बात फैल गई कि मैं दलित बस्तियों में लगभग हर दिन जमाबंदी करता हूं। अब से लगभग तीन साल पहले, हैदराबाद के राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एनआईआरडी) में आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान मुझे तब बहुत आश्चर्य हुआ जब 1967 बैच के आईएएस अधिकारी श्री मुनीवेंकाटप्पा (जिनकी 2015 में मृत्यु हो गई) ने अपने भाषण में कहा कि मैं दलित बस्तियों में जमाबंदी करता था और यह मेरे मेरे काम करने के तरीके का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष था।

वंचित वर्गों व विशेषकर दलितों के लिए मैं जो कुछ कर रहा था, उसके कारण मेरी प्रसिद्धि मेरे क्षेत्र, मेरे जिले और पूरे राज्य में फैल गई। परंतु जिले और सरकार में कई ऐसे लोग थे जिन्हें मेरा यह तरीका पसंद नहीं आ रहा था। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री श्री एन संजीवा रेड्डी थे और तत्कालीन वित्त मंत्री ब्रह्मनंद रेड्डी उनके विष्वस्त सिपहसालार थे। नौकरशाही में भी मुझे नापसंद करने वालों की कमी नहीं थी और इनमें तत्कालीन मुख्य सचिव श्री एनपी पई शामिल थे। श्री ब्रह्मनंद रेड्डी, गुंटूर जिले के निवासी थे और ओंगोल, गुंटूर का अनुभाग था। वे जिले के ऊपरी हिस्से में स्थित नरसराओपेट अनुभाग से थे। मुझे यह पता चला कि ओंगोल अनुभाग के भूस्वामी वर्गों के कुछ सदस्यों, जो दलितों को धन उधार दिया करते थे, ने वित मंत्री और उनके ज़रिए मुख्यमंत्री को यह शिकायत की थी कि मैं दलितों को उनके ऋण न चुकाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं। तथ्य यह था कि, जैसा कि चिन्नाकोव्कुंतला के रमैय्या बंधुओं के मामले से जाहिर था, अक्सर कर्ज़ के पूरा चुक जाने के बाद भी भूस्वामी-साहूकारों द्वारा अत्यंत ऊंची और गैरकानूनी दरों पर ब्याज की गणना किए जाने के कारण कागज़ों पर ऋण न केवल बकाया रहता था वरन उस पर लगने वाला ब्याज भी बढ़ता जाता था। इस कभी न खत्म होने वाले कर्ज़ के ज़रिए ही इलाके के ज़मीदार और साहूकार, जो वहां की वर्चस्वशाली जाति के थे, दलितों और अन्य खेतिहर श्रमिकों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते थे। इन परिस्थितियों में दलितों का कर्ज़ चुकाना बंद कर देना पूरी तरह से औचित्यपूर्ण था क्योंकि वे अपना कर्ज़ पहले ही चुका चुके होते थे। वे जानते थे कि ज़मीदारों-साहूकारों की हिसाब की किताबों में जानबूझकर हेराफेरी की जाती थी। यह हो सकता है कि मेरे उनकी बस्तियों में रूकने के कारण उनमें यह नैतिक साहस जागता हो कि वे ज़मींदारों-साहूकारों के अन्यायपूर्ण और अनुचित दावों को नकार दें। चूंकि सब-कलेक्टर के रूप में मैं गांव की दलित बस्तियों में ही रूकता था इसलिए वे ही गांव का मुख्यालय बन जाती थीं और जिन अन्य लोगों को कोई शिकायत या मांग करनी होती थी, उन्हें भी मुझसे मिलने दलित बस्तियों में आना पड़ता था। इससे दलितों का आत्मविश्वास और प्रतिष्ठा बढ़ती थी और उनमें इतनी हिम्मत आ जाती थी कि वे झूठे दावों को नकार दें। मैंने कभी भी उनसे यह नहीं कहा कि वे अपने कर्ज़ न लौटाएं। ज़मींदारों-साहूकारों ने श्री के ब्रह्मनंद रेड्डी और उनके जरिए श्री एन संजीवा रेड्डी को की गई शिकायत में दलितों द्वारा कर्ज़ चुकाना बंद कर देने को मुख्य मुद्दा बनाया। यह शिकायत भी की गई कि मैं ऊंची जातियों के लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर रहा था कि वे दलित बस्तियों में खाना खाएं। सच यह है कि मैं किसी को कहीं खाना खाने या न खाने के लिए नहीं कहता था। दलित बस्तियों की मेरी यात्राओं के दौरान स्थानीय दलित शिष्टाचारवश अपने घरों में पका खाना मेरे लिए लाते थे और मैं उसे सहज स्वीकार कर लेता था। दलित बस्तियों में दलितों द्वारा दिया गया खाना और पानी स्वीकार करने का अत्यंत गहरा असर पड़ता था – जो कि प्रतीकात्मक भी था और ठोस भी। यह ‘‘अछूत प्रथा‘‘ पर हमला था और जाति की दीवारों पर चोट करता था। मेरी यात्राओं के दौरान दलित, मेरे साथ आए कर्मचारियों और स्थानीय ग्राम अधिकारियों को भी भोजन और पानी देते थे। वे उसे स्वीकार करने से इंकार नहीं कर पाते थे क्योंकि सब कलेक्टर के रूप में मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता था। इसे उनके नेताओं ने मेेरी जबरदस्ती बताया गया। श्री एमटी राजू एक आईसीएस अधिकारी थे जो बहुत प्रभावशाली माने जाते थे। एक बड़े भूस्वामी परिवार से आने वाले श्री राजू, एक वर्चस्वशाली जाति से थे। वे बाद में मुख्य सचिव और सेवानिवृत्ति के पश्चात लोकसभा सदस्य बने। नैल्लोर के अपने दौरे के दौरान उन्होंने मेरे बैचमेट श्री व्ही नारायण राव से पूछा कि ‘‘ओंगोल का ये कौन सब-कलेक्टर है जो जाति युद्ध भड़का रहा है?‘‘ श्री नारायण राव ने मुझे बताया कि उन्होंने श्री राजू को दलितों के लिए जो मैं कर रहा था, उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझाने की कोषिष की। परंतु इसके बाद भी मेरा दलित बस्तियों में रूकना, दलितों की समस्याओं, विशेषकर कृषि भूमि, मकान के लिए जमीन और जाति प्रमाणपत्रों से संबंधित समस्याओं, को स्थल पर सुलझाना और ऐसी स्थिति बनाना जिससे अन्य जातियों के लोगों को भी दलित बस्तियों में आना पड़े, को ‘जाति युद्ध भड़काना‘ कहा जाता रहा।

एक मंत्री, जो मुझे समझते थे और मेरे प्रति सहानुभूतिपूर्ण रूख रखते थे, उनका नाम था श्री अनागनि भगवंतराव। वे ताड़ी निकालने वाली शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी जाति से थे जिसे आंध्रप्रदेश में इडीगा कहा जाता है। यही काम करने वालों को तमिलनाडू में नाडर, केरल में इड़ीवा और दक्षिण कनारा में बिलावा कहा जाता है। तमिलनाडू, केरल और उससे लगे कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के विपरीत, आंध्रप्रदेश में इडिगाओं को अछूत नहीं माना जाता था। राज्य के कुछ इलाकों में इडीगाओं को ‘सेट्टी बलिजा‘ कहा जाता था, जो उनके पारंपरिक नाम की तुलना में अधिक सम्मानीय था। परंतु आज, आंध्र के इडीगाओं की हालत केरल के इडिवाओं और तमिलनाडू के नाडरों से सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक तीनों ही दृष्टियों से कहीं खराब है। उनका एक बड़ा तबका आज भी ताड़ी निकालने का काम ही कर रहा है। हाल की हमारी यात्राओं के दौरान हम रास्ते में आम लोगों से मिलकर चर्चा करते रहे हैं। इनमें से वे जो बहुत पुराने-धुराने कपड़े पहने रहते थे और जिनमें से कई के पास तो कमीजें तक नहीं होती थीं (और जिन्हें देखकर क्रांति के पूर्व के फ्रांस के ‘सेन क्यूलोथ्स‘ की याद आती थी), उनमें से अधिकांश या तो इडिगा होते थे या भेड़ चराने वाले कुरूमा। भेड़ चराने वाले भेड़ों के अपने झुंड के साथ सड़क पर अक्सर दिखलाई देते हैं। हमें इडीगा भी दिखते थे जो अपने पारंपरिक परिधान में होते थे और ताड़ी निकालने के औजार साथ में लिए होते थे। वे सभी पैदल चलते दिखते थे यद्यपि हाल के वर्षों में कुछ को हमने साईकल पर भी अपने काम पर जाते देखा। उनमें से कई मैट्रिक या उच्च परीक्षाएं पास युवक भी थे। मेरी श्री अनागनि भगवंतराव से पहली मुलाकात चिराला गेस्ट हाउस में हुई। वे मेेरे अनुभाग से लगे तेनाली से थे। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से मुझसे बातें कीं और मेरे काम की प्रशंसा की। वे अन्य लोगों से बात करते हुए भी काफी देर तक मेरा हाथ थामे रहे।

मेरे खिलाफ शिकायतों का अंबार

श्री अनंतरमण, जिनके साथ ओंगोल के हिल बंग्लो में पहली बार 1958 में मेरी मुठभेड़ हुई थी, मेरे विरूद्ध जांच करने जिला मुख्यालय गुंटूर आए। उन्होंने मुझे गुंटूर के गेस्ट हाउस में बुलवाया। जब मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने कागजों के एक ढेर की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा कि ये मेेरे खिलाफ शिकायतें हैं जिनमें यह कहा गया है कि मैं दलितों के साथ ‘मेलजोल‘ रखता हूं और उन्हें बढावा देता हूं। मैंने उनसे कहा कि दलित अछूत प्रथा के पीड़ित हैं और इस प्रथा का संविधान में उन्मूलन कर दिया गया है परंतु यह अब भी अस्तित्व  में बनी हुई है। एक आईएएस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह उनकी समस्याओं को सुलझाने में दलितों की मदद करे। मैंने उनसे कहा कि मैं तो केवल अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूं। तत्पश्चात श्री अनंतरमण ने कहा कि ‘हमारे धर्म में अछूत प्रथा जैसी कोई चीज नहीं है‘‘। मैंने जवाब में कहा कि दुर्भाग्यवश, मनुस्मृति, अपराधी की जाति के आधार पर उसके लिए विभिन्न सजाओं का प्रावधान करती है और इसी आधार पर ब्याज की अलग-अलग दरों का निर्धारण भी करती है। इसके जवाब में श्री अनंतरमण बहुत आसानी से कह सकते थे कि मनुस्मृति हिन्दू धर्म का भाग नहीं है, जैसा कि हिन्दू धर्म के दो अग्रणी समाजसुधारकों और टीकाकारों स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद और स्वामी श्रद्धानंद जैसे लोगों का भी कहना था। इसकी जगह श्री अनंतरमण गुस्से में फट पड़े। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यहां अपने धर्म की बुराई सुनने नहीं आया हूं‘‘। उनके जवाब से मुझे ऐसा लगा कि मानो वे मानते हैं कि मनुस्मृति, हिन्दू धर्म का भाग है। इतना कहने के बाद वे अंदर चले गए। मैं कतई हिन्दू धर्म को बदनाम नहीं कर रहा था बल्कि मैं तो केवल जाति प्रथा व अछूत प्रथा, जिसे मनुस्मृति सहिंताबद्ध करती है, के आधार पर होने वाले सामाजिक भेदभाव की आलोचना कर रहा था। इस टिप्पणी के साथ ही जांच खत्म हो गई परंतु मुद्दा खत्म नहीं हुआ। मेरी गोपनीय चरित्रावली में यह उल्लेख किया गया कि मैं अपने ‘‘संस्कृत के ज्ञान का इस्तेमाल धर्म को लांछित करने के लिए‘ करता हूं‘‘।

जांच के दौरान श्री अनंतरमण ने यह भी कहा कि ऐसी शिकायत है कि मैं कम्युनिस्ट हूं। मेरा उत्तर था कि यह मानना कि कोई अधिकारी दलितों व अन्य वंचित वर्गों के प्रति न्याय तभी कर सकता है जब वह कम्युनिस्ट हो, ऐसा आरोप लगाने वालों को ही कटघरे में खड़ा करता है। मुझे मालूम था कि मुझ पर आरोप लगाने वालों में धनी भूस्वामियों के अतिरिक्त श्री रोंडा नरप्पा रेड्डी नामक संसद सदस्य भी थे जो ओंगोल से थे और बाद में मंत्री भी बने। वे दो-तीन बार मुझसे दलित राज्यसभा सदस्य श्री व्हीसी केसवराव के साथ मिले थे। बातचीत के दौरान केसवराव चुपचाप खड़े रहते थे और केवल श्री नरप्पा रेड्डी बोलते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि पहले वे सोचते थे कि मैं दलित हूं। बाद में उन्हें पता चला कि मेरा जन्म एक उच्च जाति में हुआ था और अब वे मानते थे कि दलितों के प्रति मेरी सहानुभूति के पीछे मेरी विचारधारा है। दूसरे शब्दों में, मैं कम्युनिस्ट हूं। मैंने उन्हें याद दिलाया कि गांधीजी, जिनका नाम वे अक्सर लेते रहते हैं, भी ऐसी बस्तियों में जाते थे और यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि वे यह मानते हैं कि जिस भी व्यक्ति की दलितों के प्रति सहानुभूति है वह कम्युनिस्ट ही होगा और यह भी कि गांधीजी के अनुयायी दलितों के प्रति सहानुभूति नहीं रख सकते। उनसे मेरी आखिरी मुलाकात में उन्होंने इस बात पर अप्रसन्नता व्यक्त की कि मैंने अपनी एक जांच रिपोर्ट में वैटापलम पंचायत समिति के निर्वाचित अध्यक्ष, जो कि एक कम्युनिस्ट थे, और उस समिति के बीडीओ के खिलाफ उनकी शिकायतों का समर्थन नहीं किया। इस तरह की जांचों में मैं कभी राजनीति को नहीं आने देता था और निष्पक्षता से काम करता था। विस्तृत जांच और संबंधित क्षेत्र के दौरे के बाद मैंने पाया कि पंचायत अध्यक्ष और बीडीओ के खिलाफ की गई शिकायतें गलत थीं और इस आशय की रिपोर्ट कलेक्टर को भेज दी। मैंने इन सभी तथ्यों से श्री अनंतरमण को अवगत कराया।    

मुझे बताया गया कि आंध्रप्रदेश की कैबिनेट ने, ओंगोल के सब-कलेक्टर के व्यवहार पर चर्चा की, इस बात पर विचार किया गया कि किस प्रकार वह जिले और क्षेत्र की वर्चस्वशाली जाति – जिसके सदस्य बड़े भूस्वामी होने के साथ-साथ साहूकार भी थे, सिवाय नारसोपेट इलाके में, जहाँ उसी तरह का एक दूसरा समुदाय इस भूमिका में था – की राह में काँटा बन गया है और यह भी कि उससे कैसे मुक्ति पाई जाए। यह शायद पहला ऐसा मामला था जब किसी सब-कलेक्टर और उसके काम करने के तरीके पर कैबिनेट में इतने विस्तार से चर्चा की गयी। श्री अनागनी भगवंत राव एकमात्र ऐसे मंत्री थे जिन्होंने मेरा बचाव किया। उन्होंने कहा जब भी कोई अधिकारी, सत्यनिष्ठा से कमजोर वर्गों के हित में काम करता है, तब उसके साथ यही होता है (अर्थात उस पर हमले होते हैं और उसके खिलाफ कार्यवाही करने पर विचार होता है)।

मेरे ओंगोल के सब-कलेक्टर का पद सम्हालने के बाद से ही, जमींदार-साहूकार वर्ग/जाति यह प्रचार कर रही थी कि मैं लम्बे समय तक नहीं चलूँगा। यह प्रचार ओंगोल में मेरे पहुँचने के एक या दो माह बाद से ही शुरू हो गया था। लिंगम मरिअम्मा और लिंगम राजारत्नम यह कहते नहीं थकते थे ‘‘उनीरू, उनीरू” (जिसका अर्थ है, ‘‘वे तुम्हें यहाँ नहीं रहने देंगे‘‘)।

मुझे सत्ताधारी राजनैतिक नेतृत्व की प्रतिक्रिया और उसके द्वारा उठाये गए कदमों से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैं यह जानता ही था कि वह वर्चस्वशाली जातियों और भूस्वामियों का हमजोली है। इस सिलसिले में मुझे श्री एन. संजीवा रेड्डी के दो भाषण याद हैं – पहला, जब वे मुख्यमंत्री थे और दूसरा, जब उन्हें एक प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा उनके विरुद्ध की गयी कुछ टिप्पणियों के कारण अपने पद से त्यागपत्र देकर केंद्र में जाना पड़ा था। मेरे अनुभाग में मद्दिपदु में दिए गए अपने भाषण में, श्री कला वेंकट राव को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि श्री राव इस बात से व्यथित थे कि एससी, उन्हें खेती की जमीन उपलब्ध करवाने का वायदा करने वालों के पिछलग्गू बन गए हैं। अनंतपुर जिले, जहाँ मुझे सजा स्वरुप असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में पदस्थ किया गया था, के मुख्यालय में उनका भाषण भी मुझे याद है। मैं भी भीड़ में खड़ा होकर उनका भाषण सुन रहा था। भाषण का खासा हिस्सा उनके द्वारा राज्य और उसके लोगों की भलाई के लिए उठाए गए कदमों पर केन्द्रित था। उन्होंने राज्य के लोगों के लिए जो कुछ किया था, उसका वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि चूंकि भूमि सीलिंग लागू करना उनकी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यक्रम का हिस्सा था इसलिए मुख्यमंत्री बतौर उन्हें उसे लागू करना पड़ा। परंतु भूमि सीलिंग कानून बनाते समय उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि जिनके पास अतिशेष भूमि है, उन्हें उसका इस प्रकार समायोजन व बंटवारा करने का समय व अवसर मिल सके जिससे उनकी जमीनें सीलिंग की सीमा के भीतर आ जाएं। उस समय यह सबको मालूम था कि भूमि सीलिंग कानून से बचने के लिए बड़े भूस्वामियों ने अपनी जमीनें, अपने परिवार के सदस्यों के बीच बांट दीं और कईयों ने तो नकली तलाक तक ले लिए। जाहिर है कि इससे दलितों और अन्य भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों को नुकसान हुआ क्योंकि भूमि सीलिंग अधिनियम के तहत अतिशेष भूमि के पट्टे उन्हें दिए जाने थे।

मुझ पर शासन का कहर बरपा होने तक मैं गांवों, दलित बस्तियों और मछुआरों के रहवासी क्षेत्रों में पहले की तरह जाता रहा और स्थल पर ही उनकी समस्याओं का समाधान करता रहा। जब ऐसी ही एक यात्रा पर मैं थिमासमुंदरम नामक गांव जा रहा था, जहां के दलितों ने मुझे एक शिकायती पत्र भेजा था, तब मेरी मुलाकात श्री एसआर शंकरन से हुई, जो उस समय जिला स्तर पर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। इस मुलाकात और उसके परिणामों के बारे में मैं आगे बताउंगा।

अपमानित करने के लिए हुई मेरी पोस्टिंग

जल्दी ही मुझे मुख्य सचिव का पत्र मिला जिसमें यह कहा गया था कि यह निर्णय लिया गया है कि मुझे सेटिलमेंट आफिसर (जिला कलेक्टर के समकक्ष एक पद जिसे दोयम दर्जे का माना जाता है) के रूप में पदस्थ किया जाना है और इसलिए मुझे फिलहाल अनंतपुर में असिसटेंट सेटिलमेंट आफिसर (एएसओ) के पद पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया है। यह मुझे प्रशासनिक तंत्र के हाशिए पर ढकेलने के योजनाबद्ध प्रयास का हिस्सा था। इस पद पर रहने से मेरा जनता से कोई सीधा संपर्क नहीं रह जाता और ना ही मैं जिला कलेक्टर व सब-कलेक्टर जैसे ‘मुख्यधारा‘ के अधिकारियों की तरह, सार्वजनिक हित में काम कर पाता। मुझसे पहले, किसी आईएएस अधिकारी को एएसओ के पद पर नियुक्त नहीं किया गया था। एएसओ के पद पर डिप्टी कलेक्टरों को नियुक्त किया जाता था। स्पष्टतः, मुझे एएसओ के रूप में इसलिए पदस्थ किया गया ताकि मुझे ‘अपमानित‘ किया जा सके और मुझे सब-कलेक्टर के रूप में मेरे द्वारा एससी और अन्य गरीब लोगों का ‘पक्ष‘ लेने के लिए सबक सिखाया जा सके ताकि अन्य अधिकारी यह समझ सकें कि मेरी तरह कार्य करने पर उन्हें सरकार की नाराजगी भुगतनी पड़ेगी। मैंने अपना पदभार श्री कटूरी वेंकटेश्वर राव को सौंपा, जो डिप्टी कलेक्टर थे और अत्यंत सज्जन व्यक्ति थे। इसके पहले जब मैं और मेरे बैच के अन्य अधिकारी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे, उस समय हम लोगों ने एक माह तक विशाखापट्टनम जिले (जिसे बाद में विशाखापट्टनम और विजयनगरम् जिलों में बांट दिया गया) में बंदोबस्ती का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। हमारे प्रशिक्षण के केन्द्र थे अनकापल्लै व विजयनगरम्। श्री वेंकटेश्वरर राव, जो उस समय उस क्षेत्र के एएसओ थे, हमारे प्रशिक्षण के प्रभारी थे। इसलिए जब वे मुझसे पदभार ग्रहण करने आए तो हम लोग पुराने परिचितों की तरह मिले। वे मेरी पृष्ठभूमि से परिचित थे और मेरी ‘दुर्दशा‘ के प्रति सहानुभूति रखते थे। उन्होंने दलितों और अन्य वंचित वर्गों के लिए मेरे काम की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘कृष्णन गारू, स्वच्छमयना-कुलमलो पुट्टी, इदंता ऐंडुकू‘‘ (शुद्ध जाति में जन्म लेने के बाद यह सब क्यों?)। मैंने 18 नवंबर 1959 को सब-कलेक्टर का अपना पदभार सौंप दिया। मैं ठीक एक साल एक महीने और एक दिन इस पद पर रहा। व्यवस्था को मेरा उस पद पर एक दिन भी और रहना गवारा नहीं था।

अनंतपुर के एएसओ के रूप में 1959-60 और बाद में कुरनूल के एसओ के रूप में 1960-61 में मेरी पदस्थापना के दौरान, मेरे कार्यक्षेत्र में रायलसीमा इलाके के तीन जिले – अनंतपुर, कुरनूल और कड़प्पा – थे। मुुझे इन जिलों में ‘‘आंध्रप्रदेश (आंध्र एरिया) इनाम एस्टेट्स (एबालिशन एंड कनर्वजन इंटू रायतवारी) एक्ट 1956‘‘ को कार्यान्वित करना था। यह अधिनियम, ‘‘मद्रास एस्टेट्स (एबालिशन एंड कनर्वजन इंटू रायतवारी) एक्ट 1948‘‘ (ईएए) की तर्ज पर बनाया गया था। ईएए ऐसी बड़ी जागीरों पर लागू होता था, जिनमें कई गांव शामिल थे। इनाम एस्टे्टस वे जागीरें थीं, जिनमें से प्रत्येक में एक पूरा गांव आता हो। एक तीसरी श्रेणी भी थी जो लघु इनाम कहलाती थी। इनमें वे जागीरें आती थीं जिनमें किसी गांव का एक हिस्सा ही शामिल होता था। इनके उन्मूलन व इन्हें रैयतवारी व्यवस्था के अंतर्गत लाने के लिए एक अन्य अधिनियम बनाया गया था जिसका नाम था ‘इनाम्स अबालिशन एक्ट‘। इसे कार्यान्वित करने की जिम्मेदारी सब-कलेक्टर/आरडीओ की होती थी। ओंगोल के सब-कलेक्टर के रूप में मुझे इनाम्स अबालिशन एक्ट को लागू करने का अनुभव था। इनाम वे जागीरें थीं जो पूर्व के शासकों द्वारा उन लोगों को दी गईं थीं, जो उन्हें सैन्य, पुरोहिताई या अन्य सेवाएं उपलब्ध करवाते थे। इन जागीरों में पूरे गांव या गांव के कुछ हिस्से हुआ करते थे और इन पर या तो कोई भू-राजस्व देय नहीं होता था या भू-राजस्व की गणना रियायती दर पर की जाती थी।

जागीरों इनाम जागीरों या इनाम के जरिए, शासक अपने प्रियपात्रों को या तो उन जमीनों का मालिक बना देते थे या उन्हें वहां खेती करने वालों से भू-राजस्व वसूलने का अधिकार दे देते थे। ये जागीरें अलग-अलग कारणों से दी जाती थीं। हिन्दू और मुसलमान, दोनों धर्मों के शासक ये जागीरें दिया करते थे और यह व्यवस्था ब्रिटिश राज्य में भी कायम रही। जिन व्यक्तियों को जागीरें दी जाती थीं, उनमें एक ओर ब्राम्हणों और लड़ाकू कौमों के विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति होते थे तो दूसरी ओर देवदासी जैसे समुदायों के सदस्य। पहले मामले में जागीरें शासक की किसी सेवा के लिए इनाम बतौर या भविष्य में कोई सेवा उपलब्ध करवाने के वायदे के बदले दी जाती थीं। दूसरे मामलों में ये मंदिरों का खर्च चलाने के लिए होती थीं। स्वतंत्रता के बाद जो कानून बने उनमें यह प्रावधान था कि जागीरदारों के मामले में, जितनी जमीन पर जागीरदार स्वयं खेती करता है, उसका पट्टा उसे दे दिया जाए। जिस जमीन पर रायत (जागीरदारों के पट्टेदार) खेती करते थे उसके पट्टे संबंधित रायतों को दिए जाने थे। ऐसे मामलों में, जिनमें जागीरदारों द्वारा अपनी जागीर में से कुछ भूमि इनाम के तौर पर एक या एक से अधिक परिवारों को जागीरदार की व्यक्तिगत सेवा करने की शर्त पर दी गई हो, उस शर्त को समाप्त कर संबंधित किसान को पट्टे दिए जाने थे। इन कानूनों का उद्देश्य सामंती व्यवस्था को खत्म करना था। जिन किसानों को उनकी जमीन के पट्टे दे दिए जाते थे, उनका सरकार से सीधा संबंध स्थापित हो जाता था और उन्हें जमींदार, इनामदार या जागीरदार जैसे किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं रह जाती थी। वे सरकार को सीधे उसी तरह भू-राजस्व चुकाते थे, जैसे रैयतवारी व्यवस्था के अंतर्गत खेती करने वाले किसान। जमींदार या इनामदार को केवल उस जमीन का पट्टा मिलता था जिस पर वे व्यक्तिगत रूप से खेती करते थे। ‘व्यक्तिगत रूप से खेती‘ शब्द की मद्रास लैंड एस्टेट्स एक्ट 1908 के अंतर्गत विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों के आधार पर इतनी विस्तृत व्याख्या कर दी गई थी कि कई जमीनें, जिनके पट्टे, मेरे विचार से, जमीन जोतने वालों को दिए जाने थे, भी जागीरदारों को दे दिए गए। इससे भू-सुधार के लिए उठाया गया यह कदम उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ जितना कि हो सकता था। परंतु इन सारी कमियों के बाद भी यह निश्चित रूप से सही दिशा में एक छोटा सा कदम था।

जागीरों में भू-सर्वेक्षण की प्रणाली उतनी सुपरिभाषित और सुव्यवस्थित नहीं थी, जितनी कि उन गांवों में जो सीधे सरकार के अधीन थे। इसलिए सबसे पहले सारी जागीरों का ठीक से सर्वेक्षण कर उनकी सीमाओं का निर्धारण किया जाना था। हर खेत और उसे जोतने वाले के संबंध में अभिलेख तैयार किए जाने थे। इसके बाद इन जमीनों पर देय भू-राजस्व की गणना की जानी थी। यह एक सामान्य प्रक्रिया थी जिसे एएसओ द्वारा अंतिम रूप से अनुमोदित किया जाता था। कुछ मामलों में सेटिलमेंट आफिसर से अपील की जा सकती थी और वह अभिलेखों में सुधार करने के निर्देश दे सकता था। लोगों की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था कि खेतों, उनके कब्जेधारियों व उन पर खेती करने वालों का ठीक-ठीक अभिलेख तैयार किया जाए और यही एससी, शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों और अन्य गरीब किसानों की कीमत पर पुराने जागीरदारों या बड़े भू-स्वामियों को लाभ पहुंचाने का मौका देता था। इसमें भ्रष्टाचार भी किया जाता था। मेरे प्रशिक्षण के दौरान, मेदक जिले के निजामपेठ गांव में मडिगाओं द्वारा जोती जा रही दो सौ एकड़ भूमि का सरकारी अभिलेखों में उल्लेख न होने की घटना मुझे याद थी। एएसओ के रूप में वह मेरे लिए उपयोगी सिद्ध हुई। मैंने खेती की जमीनों के कब्जेधारियों के नामों की पुष्टि करना शुरू कर दिया और जहां जरूरी हुआ, वहां उनमें संशोधन भी करवाया। सर्वेक्षण स्टाफ द्वारा तैयार किए गए सर्वेक्षण अभिलेखों के आधार पर सेटिलमेंट अधिकारी और सेटिलमेंट तहसीलदार उन लोगों के नाम कच्चे पट्टे जारी करते थे जिन्हें अभिलेखों में किसान बताया जाता था। इससे उन किसानों को, जिन्हें ऐसा लगता था कि उनके साथ अन्याय हुआ है, अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अवसर मिलता था। असिस्टेंट सेटिलमेंट आफिसर, कच्चे पट्टों पर आपत्तियां सुनकर उनका निराकरण करता था ओर हर अभ्यावेदन पर आदेश जारी कर पट्टों को अंतिम रूप देता था। इसके बाद पक्के पट्टे जारी किए जाते थे। मैं इस प्रक्रिया को बहुत महत्व देता था और जिन मामलों में भी मुझे कोई संदेह होता था मैं स्थल निरीक्षण पर जाता था। एक समस्या यह थी कि अधिकांश छोटे किसान अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित थे और वे यह समझ ही नहीं पाते थे कि कच्चे पट्टों मेें क्या लिखा है। मैंने एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित की जिससे गांव का हर निवासी अपने गांव की सभी जमीनों के बारे में संपूर्ण जानकारी ठीक से समझ सके।

भूमि सुधार को लेकर मेरे प्रयोग

अपने अनुभव केे आधार पर मैंने जमीनों और उन पर खेती करने वालों की सर्वेक्षण रिपोर्ट की सत्यता की जांच करने के लिए एक सटीक कार्यप्रणाली विकसित की। इसके निम्न चरण थे :

  1. गांव के किसी खुले स्थान में गांव के विस्तृत नक्शे के साथ, एक अस्थायी कार्यालय स्थापित करना। यह नक्शा इतना विस्तृत होता था कि उसमें जमीन के हर टुकड़े का सर्वेक्षण क्रमांक रहता था। किसी कार्यालय के बंद कमरे में बैठने से मनोवैज्ञानिक रूप से आम लोग अपने आपको दबाव में महसूस करते हैं। खुली जगह में वे अपनी बात खुलकर कह पाते हैं।
  2. इस अस्थायी कार्यालय के संबंध में पूर्व सूचना देना ताकि सभी गांववाले इकट्ठा होकर कार्यवाही में भाग ले सकें।
  3. इसके लिए सामान्यतः शाम का समय चुना जाता था ताकि लोग अपने खेती के व अन्य काम निपटाकर वहां इकट्ठा हो सकें।
  4. कार्यवाही का संचालन ऐसी भाषा में किया जाना, जिसे लोग समझते हों और ऐसी भाषा का तनिक भी उपयोग न करना, जिसे लोग न जानते हों। मेरे क्षेत्र के संदर्भ में इसका अर्थ था सारी कार्यवाही तेलुगू में करना और अंग्रेजी बोलने से बचना। अगर कोई शिक्षित व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए या सत्ताधारियों से अपनी निकटता का प्रदर्शन करने के लिए मुझसे अंग्रेजी में बात करता था तो मैं उसे टोककर उससे पूछता था कि क्या वह तेलुगू है और उसका उत्तर हां में आने पर मैं उससे केवल तेलुगू में ही अपनी बात कहने को कहता था। जो वकील कार्यवाही में अपने मुवक्किलों की तरफ से भाग लेते थे, उन्हें भी तेलुगू में ही बोलना होता था। कई जटिल मामलों में लोग वकीलों की सेवाएं लेते थे। ऐसे मामलों में भी जब कार्यवाही तेलुगू में होती थी तो लोगों को समझ में आता था कि वे अपने वकीलों की तुलना में अपनी बात बेहतर ढंग से मेरे सामने रख सकते हैं। वकीलों का जोर प्रक्रियात्मक पक्षों पर रहता था और उनकी कोशिश यही रहती थी कि बगैर किसी कार्यवाही के अगली तारीख ले ली जाए। नतीजा यह होता था कि जो लोग शुरूआत में वकीलों को लेकर आते थे, वे भी बाद में अपनी पैरवी स्वयं करने लगते थे।
  5. स्थानीय लोगों के साथ विचार-विमर्श कर गांव के किसी जाने-माने स्थल को चुनना। वह कोई मंदिर हो सकता था या वह बिन्दु, जहां से कोई स्थानीय नाला या पानी की धारा, गांव में प्रवेश करती हो। उस स्थल से शुरू कर मै उसके ठीक बगल की भूमि को उसकी दिशा – अर्थात उत्तर, दक्षिण, पूरब या पश्चिम के – आधार पर चिन्हित करता जाता था और वहां से शुरू कर हम पूरे गांव के सभी खेतों को चिन्हित करते थे। जमीन के टुकड़े का आकार और अभिलेखों (जिन्हें सर्वे लैंड रिकार्ड या एसएलआर कहा जाता था) में दर्ज उसके मालिक या कब्जेदार का नाम मैं जोर से पुकारता था। मैं सभी लोगों से कहता था कि जो मैं कह रहा हूं अगर वह सही है तो सब हामी भरें और अगर उसमें किसी को कोई आपत्ति हैं तो वह उसे उठाने में गुरेज न करें। इस कार्यवाही में लोग अत्यंत उत्साहपूर्वक और गंभीरता से हिस्सा लेते थे। कई बार जब कार्यवाही देर रात, या कभी-कभी अगली सुबह तक भी चलती रहती थी, तब भी लोग वहां से हिलते नहीं थे। मुझे ऐसे अनेक उदाहरण याद हैं जब प्रविष्ठियों में इस तरह से हेरफेर की गई थी जिससे गरीब किसानों, विशेषकर एससी या बीसी समुदाय के किसानों, को क्षति हो और धनी भूस्वामियों और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचे। जब कार्यवाही खुले में होती थी और ऐसी भाषा में संचालित की जाती थी जिसे सभी लोग जानते थे, तब धनी या प्रभावशाली व्यक्ति के लिए भी झूठ बोलना मुश्किल हो जाता था क्योंकि उसकी कलई वहीं खुल जाती थी और लोग उसकी हंसी उड़ाते थे। ऐसे दिलचस्प मामले अनंतपुर जिले के पेनूकोंडा तालुक के इरगमपल्लै गांव, इसी जिले के हिन्दूपुर तालुक के पुलामत्थी और कोटिप्पी और कुरनूल जिले के अलूर तालुक के एक गांव (जिसका नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है और इसके लिए मुझे अपनी यादादश्त को खंगालना होगा) में सामने आए।
  6. कोई भी विवाद या संदेह होने पर, मैं गाँव के सभी लोगों के साथ स्थल निरीक्षण करता था।

इस कार्यपद्धति से मैं और गाँव के लोग यह सुनिश्चित कर पाते थे कि जमीन पर कब्जे (जो वस्तुतः मालिकाना हक ही होता था) की प्रत्येक गलत प्रविष्टि पकड़ी जाए और उसे सुधार जाये। सेटलमेंट महकमे के अधिकारी यह कहते न थकते थे कि लोग सेटलमेंट की प्रक्रिया में रूचि नहीं लेते और उन तक पहुंचना मुश्किल होता है। मेरा अनुभव ठीक इसके विपरीत था। और केवल इसलिए क्योंकि मैं सारी कार्यवाही तेलुगू में करता था, उन्हें सारी जानकारियां इस तरह से देता था जिससे वे उन्हें समझ सकें और कभी भी जल्दबाजी में काम निपटाने की कोशिश नहीं करता था।

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सन 1959-1961 की अवधि के कुछ दिलचस्प उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जायेगा कि जमीनों पर कब्जे और उनके मालिकाना हक से सम्बंधित कार्यवाही से गांवों की पूरी आबादी को जोड़ने के क्या लाभ थे।

अनंतपुर जिले के हिन्दुपुर तालुक के पुल्माथि गाँव के गरीब किसानों, जिनमें दलित शामिल थे, ने मुझसे शिकायत की कि उन्हें कच्चे पट्टे जारी नहीं किये गए हैं। सर्वे कर्मचारियों ने मुझे बताया कि इन किसानों को कच्चे पट्टे इसलिए जारी नहीं किये गए क्योंकि उनकी जमीनें तालाब की तलहटी में है। सच यह था कि तालाब की तलहटी की भूमि उस गाँव और क्षेत्र की वर्चस्वशाली जाति के कुछ बड़े और प्रभावशाली भूस्वामियों की थी और सर्वे कर्मचारियों ने जानबूझ कर, दलितों और अन्य गरीब किसानों की भूमि, जो तलहटी में नहीं थी, को इन भूस्वामियों के नाम चढ़ा दिया था, और दलितों व गरीब किसानों को तालाब की तलहटी की भूमि पर अवैध कब्जाधारी दिखा दिया था। तालाब की तलहटी की भूमि “पोरोम्बोक” – अर्थात वह जमीन जो सिंचाई की सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थी – कहलाती थी और पोरोम्बोक, को रैयती भूमि के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जाता था। केवल रैयती भूमि के ही पट्टे दिए जा सकते थे। अभ्यावेदन प्रस्तुत करने वालों का कहना था कि सर्वे कर्मचारी गलत कह रहे हैं और उनकी जमीनें तालाब की तलहटी में नहीं हैं। मैंने जमीनों का निरीक्षण किया। आवेदनकर्ताओं ने सर्वे कर्मचारियों और गांव वालों की मौजूदगी में अपनी जमीनें मुझे दिखाईं। यह साफ था कि वे जमीनें तालाब की तलहटी में नहीं थी परन्तु सर्वे कर्मचारियों ने उनकी जमीनों को तालाब की तलहटी में, और वर्चस्वशाली समुदाय के प्रभावशाली भूस्वामियों की जमीनों को उसके बाहर दिखा दिया था। मैंने वहीं अभिलेखों को सुधरवाया और दलितों और अन्य गरीब किसानों को पट्टे देने के आदेश जारी किये। मैंने प्रभावशाली बड़े किसानों को पहले जारी किये गए कच्चे पट्टे निरस्त कर दिए। गांववालों के मौजूदगी के कारण उनकी अपने झूठे दावे को सही ठहराने की हिम्मत नहीं हुई।  

कोटिपी गाँव में, दो एकड़ का जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा विवादित था। विवाद, उप्पारा जाति के गरीब किसानों और गाँव के सबसे रईस भूस्वामी के बीच था। उप्पारा जाति के लोग परंपरागत रूप से जमीन खोद कर रेत इक्कठा करने का काम करते हैं। पहले इस जाति के लोग चट्टानों से नमक भी निकलते थे। शब्द-व्युपत्ति और परंपरागत पेशे, दोनों की दृष्टि से, उप्पारा, उत्तर भारत की सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी लोनिया जाति के समकक्ष थी। लोनिया शब्द की व्युत्पत्ति, संस्कृत शब्द “लवणं” से हुई है, जिसका अर्थ होता है नमक। लोनिया भी परंपरागत रूप से चट्टानों से नमक निकलने का काम करते थे। उप्पारा शब्द, उप्पू से बना है, जिसका तेलुगू और सभी दक्षिण भारतीय भाषओं में अर्थ होता है नमक। उप्पारा भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी जाति है। जमीन का दूसरा दावेदार न केवल गाँव का सबसे धनी भूस्वामी था वरन मुंसिफ या गाँव का मुखिया भी था, जिसे रायलसीमा में “रेड्डी” कहा जाता था। रायलसीमा के अधिकांश गांवों के मुखिया इसी जाति के थे। इस जाति का असली नाम “कापू” है परन्तु आम बोलचाल की भाषा में उन्हें रेड्डी कहा जाता है। अपवादस्वरुप, जिन गांवों के मुखिया अन्य जातियों के होते थे, उन्हें भी रेड्डी ही कहा जाता था। गाँव के मुखिया के पद के उत्तराधिकार में प्राप्त होने की व्यवस्था समाप्त होने तक, पूरे देश में, सामान्यतः, मुखिया उसी जाति के हुआ करते थे जिस जाति के लोग उस गाँव या इलाके के सबसे बड़े भूस्वामी होते थे। इसी तरह, गाँव के पटवारी या करनम, अर्थात लेखाधिकारी, ब्राह्मण या कायस्थ या ऐसी ही किसी जाति के होते थे। निश्चित तौर पर इसके अपवाद भी थे। गांवों की अपनी यात्राओं के दौरान मेरी मुलाकात एक बोया करनम और एक मुस्लिम करनम से भी हुई थी।

गाँव के सर्वे लैंड रिकार्ड्स (एसएलआर) में, गाँव के मुखिया को जमीन का कब्जेदार बताया गया था। मैंने कुछ प्रश्न पूछ कर सच जानने का प्रयास किया। मैंने मुखिया से पूछा कि उसने जमीन के उस टुकड़े पर इस साल, पिछले साल और उसके पिछले साल कौन-सी फसल बोई थी। उसके उत्तर सुनकर आसपास खड़े लोग जोर-जोर से हँसने लगे क्योंकि वे जानते थे कि वह जो बोल रहा था, सफेद झूठ था। सच तक पहुँचने के लिए जो सबूत जरूरी थे, वे सब जुटाने के बाद मैंने मामले की सुनवाई अगले दिन, तालुका (उत्तर भारत में तहसील) मुख्यालय पेनुकोंडा में निर्धारित कर दी और सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा की। पेनुकोंडा में भी भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। कार्यवाही शुरू होते ही गांव के मुखिया ने कहा कि वह जमीन पर अपना दावा छोड़ना चाहता है। गांव में जहां वह आत्मविश्वास से भरपूर, बल्कि अहंकारी, नजर आ रहा था वहीं  पेनुकोंडा में सुनवाई के दौरान वह बहुत दब्बू और डरा हुआ सा दिख रहा था। यहां तक कि वह जोर से बोल तक नहीं पा रहा था। न्याय का तकाजा था कि मैं उसकी इस कमजोरी का लाभ न उठाऊं। मैंने उससे पूछा कि क्या उसकी तबियत ठीक नहीं है और क्या वह सुनवाई को स्थगित करवाना चाहेगा। मुझे लगा कि अगर वह बीमार है तो उसके कारण उसे कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। मेरे यह कहने के बाद गांव का लेखाधिकारी सामने आया और उसने बताया कि मुखिया अपना दावा इसलिए छोड़ रहा है क्योकि पिछली बार मेरे गांव से वापिस जाने के बाद, गांव वालों ने उसका खूब मखौल बनाया। उसका उपहास उड़ाते हुए गांव वालों ने उससे कहा कि वह असहाय और गरीब लोगों से जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा छीनने के लिए मेरे सामने झूठ पर झूठ बोल रहा था। मेरी जांच और स्थल निरीक्षण से यह साफ हो गया था कि जमीन का वह टुकड़ा उप्पारा बंधुओं का है। वह उनकी पुश्तैनी जमीन थी, जिस पर लंबे समय से उनका कब्जा था और वे उस पर खेती भी कर रहे थे। ऐसा माना जा रहा था कि उनकी जमीन पड़ोसी गांव का हिस्सा थी, जो रैयतवारी गांव था। परंतु कोटिप्पी, जो कि एक इनाम गांव था, के सर्वेक्षण में यह सामने आया कि जमीन का वह टुकड़ा कोटिप्पी का हिस्सा था, पड़ोसी रैयतवारी गांव का नहीं। कोटिप्पी के किसान, उप्पारा बंधुओं को पहचानते नहीं थे। इसका फायदा उठाकर गांव के प्रभावशाली मुखिया ने सर्वेक्षण व सेटिलमेंट कर्मचारियांे के साथ मिलीभगत कर अपना नाम जमीन के इस टुकड़े के कब्जेदार के रूप में चढ़वा लिया था। वह भूमि निःसंदेह उप्पारा बंधुओं की थी और उन्हें दे दी गई।

एक अन्य घटना कुरनूल जिले के अलूर तालुक के एक गांव की है, जहां के बड़े भूस्वामी, ब्राम्हण जाति के एक परिवार के सदस्य थे और गांव के करनम का पद इसी परिवार को उत्तराधिकार में प्राप्त होता था। मुझे वहां के करनम का नाम अभी भी याद है। उनका नाम श्री बालकृष्ण राव था। मैं अपनी कार्यपद्धति के अनुरूप, गांव के मध्य में खुले में बैठा हुआ था। मेरे सामने गांव का विस्तृत नक्शा था। एक-एक कर गांव की सभी जमीनों के कब्जेधारियों के नाम मैं गिनवाता जा रहा था। फिर, पन्द्रह एकड़ के जमीन के एक टुकड़े की बारी आई। मैंने जमीन का विवरण दिया और फिर उसके कब्जेधारी का नाम बताया। जब मैंने बालकृष्ण राव का नाम लिया तब भीड़ में से किसी ने भी हां नहीं कहा। मैंने पहले ही वहां उपस्थित सभी लोगों को यह कह दिया था कि जब भी मैं किसी विशिष्ट सर्वे नंबर/उसके भाग की भूमि के संबंध में प्रविष्ठियों को जोर से बोलूं, तब अगर वे सही हों तो सभी लोग जोर से हां कहें और यदि गलत हो तो आपत्ति उठाएं। सब लोगों को चुप देख मैंने उनसे पूछा कि वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं। क्या अभिलेखों में कुछ गलती है? परंतु किसी ने अपना मुंह नहीं खोला। मैंने अपना प्रश्न फिर दुहराया। इस पर डूडीकुला मुस्लिम नामक एक व्यक्ति उठा और उसने हिम्मत कर साफ-साफ शब्दों में कहा कि वह जमीन मडिगाओं की है। मडिगा, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की आबादी की दृष्टि से सबसे बड़ी अनुसूचित जाति है। तमिलनाडु और केरल में इस जाति के लोगों को अलग नाम से संबोधित किया जाता है परंतु वहां भी वह सबसे बड़ी अनुसूचित जातियों में से एक है। इस व्यक्ति ने बताया कि जमीन का वह टुकड़ा, गांव के मडिगाओं को वहां के भूस्वामियों द्वारा दिया गया था। इस जमीन के बदले उन्हें इनाम संपत्ति के मालिकों के परिवार के लिए काम करना था। उसने कहा कि उस जमीन पर कई पीढ़ियों से मडिगा खेती करते आ रहे थे और जमीन को मेड़ें बनाकर कई टुकड़ों में बांटा गया था, ताकि हर मडिगा परिवार की जमीन को पहचाना जा सके। जाहिर है कि अगर पूरी जमीन किसी एक व्यक्ति या परिवार की होती, तो उसके बीच में मेड़ें नहीं होतीं। साहसी डूडीकुला मुस्लिम ने सच उजागर कर दिया। सदियों की प्रताड़ना, अपमान और दमन के कारण, मडिगा इतने दब्बू हो गए थे कि वे अपनी बात कह भी नहीं पा रहे थे। परंतु डूडीकुला मुस्लिम द्वारा हिम्मत दिखाने के बाद वे सब एक साथ खड़े हो गए और उन्होंने जमीन पर अपना दावा जताया। मेरे सामने उपस्थित विभिन्न जातियों और समुदायों के सभी लोगों ने डूडीकुला मुस्लिम और मडिगाओं की बात का समर्थन किया।

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अभिलेखों में जमीन के मालिक के तौर पर गांव के करनम बालकृष्ण राव का नाम दर्ज था। यह जानते हुए भी मैंने अनजान बनते हुए पूछा कि ये बालकृष्ण राव कौन है। लोगों ने तुरंत मेरे पीछे खड़े गांव क लेखाधिकारी की ओर इशारा किया। सार्वजनिक रूप से उसकी पोल खुल जाने के कारण, करनम बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा था। उसने तुरंत यह स्वीकार कर लिया कि जमीन दरअसल उसकी नहीं है बल्कि मडिगाओं को मिली इनाम भूमि है। अधिनियम के अंतर्गत, इनाम में दी गई भूमि के बदले सेवाएं उपलब्ध करवाने के सभी अनुबंध रद्द किए जाने थे और इनाम भूमि पर काबिज लोगों को रैयत अर्थात जमीन के वैध कब्जाधारी, घोषित किया जाना था। यह कर दिया गया। मैं देख सकता था कि हेराफेरी कर तैयार किए गए आधिकारिक अभिलेखों में से सच खोद निकालने और उसके आधार पर कमजोर और असहाय लोगों के साथ न्याय करने में जितनी खुशी मुझे हासिल हुई थी, उतनी ही पूरे गांव को भी थी। यहां तक कि जो लोग जमीन पर अपना अवैध कब्जा बनाए रखना चाहते थे वे भी यह नहीं कह सकते थे कि उनके साथ कोई अन्याय हुआ है। वे सहजता से इस बात के लिए राजी हो गए कि जमीन के उस टुकड़े के कब्जेधारी के रूप में मडिगाओं का नाम दर्ज कर दिया जाए।

इसी तरह के अन्य अनेक उदाहरणों में से एक अनंतपुर जिले के पेनुकोंडा तालुक के इरगमपल्ले गांव का है। मुझे याद है कि वह एक अत्यंत सुंदर गांव था। इस गांव के अधिकांश कृषक इलाके की वर्चस्वशाली जाति से नीची जातियों के थे और लगभग सभी छोटी जोतों के मालिक थे। एक अजीब बात यह थी कि इस गांव का एक भूस्वामी अनुसूचित जाति का भी था। मुझे याद है कि उसका नाम माला नरसैया था (माला, आंध्रप्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति है, जिसकी आबादी राज्य के विभाजन के पहले तक मडिगाओं के लगभग बराबर थी)। माला नरसैया गांव का सम्मानित रहवासी था और गांव के सामूहिक निर्णयों और विचार-विमर्श में उसकी भूमिका होती थी। एक ऐसे क्षेत्र में, जहां अछूत प्रथा आम थी और आज भी है, माला नरसैया को ऊँची जातियों के हिन्दुओं के घरों के ‘प्याल‘ पर बैठने की इजाजत थी, यद्यपि अन्य ऊँची जातियों के हिन्दुओं की तरह, वह घर के अंदर नहीं जा सकता था। माला नरसैया के सामाजिक स्तर में इस इजाफे का एकमात्र कारण यह था कि वह भूस्वामी था। इससे यह पता चलता है कि ग्रामीण समाज में अनुसूचित जातियों का सामाजिक दर्जा, किस हद तक जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा होता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि हर ग्रामीण एससी परिवार को भूस्वामी बनाना न केवल उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है बल्कि अछूत प्रथा को समाप्त करने का इससे बेहतर कोई हथियार नहीं है। इस गांव में जिस जमीन का इस्तेमाल किसान मक्के की अपनी फसल की थ्रेशिंग करने के लिए किया करते थे वह गांव के करनम वेंकटेश वरलू के नाम दर्ज थी, मानो वह ऐसी खेती योग्य भूमि हो, जिस पर खेती की जा रही हो। प्रशासनिक परंपरा यही रही है, जो कि विधिसम्मत भी है, कि वह भूमि, जिसे किसी सार्वजनिक उपयोग – जैसे थ्रेशिंग – के लिए प्रयुक्त किया जाता है, उसे किसी व्यक्ति के नाम पर दर्ज नही किया जाना चाहिए। उसे पोरंमबोक (उत्तर भारत में गैर मजरूआ खास) भूमि के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, जिस तक सभी लोगों की पहुंच हो और जिसका सभी उपयोग कर सकें। लोगों की मौजूदगी में मेरे द्वारा किए गए निरीक्षण से यह सामने आया कि जमीन का वह टुकड़ा पारंपरिक रूप से थ्रेशिंग के काम ही आता था और उसे करनम के नाम पर दर्ज करना गलत था। सार्वजनिक रूप से अपनी पोल खुलते ही गांव का लेखाधिकारी बेहोश हो गया या कम से कम उसने बेहोश होने का नाटक किया। कुछ समय बाद वह उठा और वहां से भाग गया। इसके तुरंत बाद सेटिलमेंट अभिलेखों में उपयुक्त सुधार किया गया।

एक अन्य गांव जिसकी मैं चर्चा करना चाहूंगा, वह था पेनुकोंडा तालुका का मन्नेसमूद्रम। वहां जिन किसानों को पट्टे दिए जाने के आदेश मैंने जारी किए, वे बटाईदार थे जो गांव की जमीन को जोतते थे। तेलुगू में बटाईदारों को ‘पालू‘ कहा जाता है। जमीन के मालिकों को यह जानकर बहुत धक्का लगा कि बटाईदारों को पट्टे दिए जाने के आदेश जारी किए गए हैं। उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा हो सकता है। उनमें से कुछ ने मुझसे पूछा, ‘क्या आप सचमुच पालू किसानों को भी पट्टा देने वाले हैं?‘ मेरी दृष्टि में अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, जिसके चलते बटाईदारों को जमीनों के पट्टे नहीं दिए जा सकते थे। उल्टे, सच तो यह है कि स्वाधीनता के समय दिए गए नारे और ‘जमीन, जोतने वाले की‘ के सिद्धांत के अनुरूप बटाईदारों को पट्टे मिलने ही चाहिए थे। यह अलग बात है कि इस सिद्धांत को देश के अधिकांश भागों में लागू नहीं किया गया है, सिवाय पश्चिम बंगाल के, जहां 1970 के दशक में ऐसा किया गया और उन छिटपुट मामलों में, जिनमें मैने ऐसा किया।

आंध्रप्रदेश सहित पूरे देश में बटाईदार, किराए पर खेती करने वाले वर्ग का सबसे निचला और आर्थिक दृश्टि से सबसे असुरक्षित तबका है। बंगाल में उन्हें बरगादर कहा जाता है। बिहार में वे बटाईदार कहलाते हैं। सामान्यतः उनके नाम तक वार्षिक राजस्व लेखों में दर्ज नहीं किए जाते। इन लेखों को आंध्र व तमिलनाडु में ‘अडंगल‘ और पुराने बंबई प्रेसिडेंसी और हैदराबाद राज्यों, जिनमें आंध्रप्रदेश का तेलंगाना क्षेत्र शामिल है (जो अब तेलंगाना राज्य बन गया है), में उन्हें ‘पहानी पत्रक‘ कहा जाता है। बटाईदार कितने समय तक जमीन पर खेती कर सकते हैं यह तय नहीं होता। भूस्वामी उन्हेें कभी भी बेदखल कर सकता है। दूसरे शब्दों में, उनकी जिंदगियां पूरी तरह से जमीन के मालिकों की मर्जी पर निर्भर करती हैं। देश के कई हिस्सों में इस मांग को लेकर आंदोलन किए जा चुके हैं कि बटाईदारों के खेती करने के अधिकार की अवधि निश्चित की जाए और उगाई गई फसल में उनका हिस्सा बढ़ाया जाए। 19वीं सदी में बंगाल राज्य के पूर्वी हिस्से – जो अब बांग्लादेश है – में हुए पबना दंगे, जमींदारों के अधीन खेती करने वाले बरगादारों और अन्य बटाईदारों के उनके साथ हो रहे अन्याय का प्रतिरोध करने का नतीजा थे। स्वतंत्रता के कुछ वर्षों पूर्व, बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलाए गए तेभागा आंदोलन की मूल मांग यही थी कि उपज में भूस्वामी का हिस्सा आधे से घटाकर एक-तिहाई किया जाए। बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने सन् 1970 के दशक में जो भूमि सुधार कानून लागू किए, उनमें से एक महत्वपूर्ण कानून वह था जिसके अंतर्गत बरगादारों को स्थायी रूप से खेती करने का अधिकार दे दिया गया था। परंतु अन्य भूमि सुधार कानूनों की तरह, इसे भी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। इस नए कानून का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि बरगादारों (किसानों) के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किए जाएं ना कि जमीनों के मालिकों के जो उस पर खेती नहीं करते थे। आपरेशन बरगा के अंतर्गत पूरे गांव के रहवासियों के सामने, बरगादारों से उनके द्वारा जोती जा रही जमीन की पहचान करवाई जाती थी ताकि असली किसानों के नाम अभिलेखित किए जा सकें। इस तरह के बरगादारों को स्थायी रूप से उस जमीन पर खेती करने का हक प्रदान कर दिया जाता था, जिसे वे बटाई पर जोतते थे।

यद्यपि इस तरह के मूलभूत और व्यापक भूमि सुधारों को लागू करने का श्रेय सत्ताधारी दल/गठबंधन को जाता है परंतु पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक स्तर पर इसे लागू करने का काम पश्चिम बंगाल के एक ऐसे आईएएस अधिकारी को है, जिसके गंभीर सामाजिक सरोकार भी थे। वे थे श्री देवब्रत बंदोपाध्याय जो 1955 – अर्थात मुझसे एक साल पूर्व – बैच के आईएएस अधिकारी थे। उन्हें हम ‘देबू‘ कहकर पुकारते थे। सन् 1793 में गर्वनर जनरल कार्नवालिस द्वारा बंगाल पर थोपी गए स्थायी बंदोबस्त और जमींदारी प्रथा से पीड़ित इस राज्य में आपरेशन बरगा सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। यह एक तरह से 19वीं सदी के पबना दंगों और स्वतंत्रता पूर्व के तेभागा आंदोलन को आगे ले जाना था। स्वाधीनता के बाद के भारत में यह बटाई पर खेती करने की प्रथा में सुधार लाने का पहला छोटा-सा प्रयास था।

बरगा सुधारों ने बटाईदारों को यह हक तो दे दिया कि वे बटाई पर दी गई जमीनों पर स्थायी रूप से खेती कर सकते हैं परंतु उन्हें उन जमीनों का मालिकाना हक प्राप्त नहीं हुआ। सन् 1987 से 1989 तक मैं भारत सरकार में विशेष आयुक्त, अनुसूचित जाति था। इसी बीच कुछ समय के लिए मैं विशेष आयुक्त, अनुसूचित जनजाति भी था। इस दौरान मैं अनुसूचित जातियों व जनजातियों से संबंधित समस्याओं के सुलझाव के सिलसिले में पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों के दौरे पर गया। मैंने राज्य के तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री श्री दकुआ से पूछा कि बरगादारों (जिनमें से अनुमानतः 46 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के और 6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के थे। यह देश के अन्य हिस्सों से कुछ अलग था, जहां अधिकांश बटाईदार सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में शामिल नीची जातियों के लोग होते हैं) की भलाई के लिए क्या केवल यही काफी है कि उन्हें स्थायी रूप से खेती करने का हक दे दिया जाए। क्या उनके साथ न्याय करने के लिए और कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए यह बेहतर नहीं होगा कि उन्हें उन जमीनों का मालिकाना हक दे दिया जाए जिसे वे जोतते हैं। श्री दकुआ को मेरी बात सही लगी और उन्होंने कुछ ही समय बाद इस दिषा में कदम उठाए।     

ऑपरेशन बरगा को उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले में सन 1946 में राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्री गोबिंद वल्लभ पन्त के नेतृत्व में चलाये गए ‘निजी बोल’ आन्दोलन से भी जोड़ा जा सकता है। इस आन्दोलन को अब लगभग भुला दिया गया है। इस आन्दोलन का वर्णन प्रो. राजेंद्र सिंह (“पेझेंट मूवमेंट इन उत्तर प्रदेशः ए स्टडी इन द पॉलिटिक्स ऑफ लैंड एंड लैंड कण्ट्रोल इन बस्ती डिस्ट्रिक्ट, 1801-1970”, “सोशल मूवमेंट्स इन इंडिया, खंड 1  पेझेंट एंड बैकवर्ड क्लास मूवमेंट्स, नयी दिल्ली, मनोहर पब्लिकेशन्ज, 1979 एमएसए राव (सम्पादित) में प्रकाशित) ने किया है। बस्ती में चले इस भूसुधार आन्दोलन का मेरा वर्णन, प्रो. राजेंद्र सिंह के शोधपत्र पर आधारित है।

बस्ती उस क्षेत्र में स्थित था जिसे सन 1801 में अवध के नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। इस इलाके के जिलों को “सीडिड डिस्ट्रिक्स” (सुपुर्द कर दिए गए जिले) कहा जाता था। वर्तमान आंध्र प्रदेश में भी कई “सीडिड डिस्ट्रिक्स” हैं। ये उस क्षेत्र में स्थित हैं, जिसे लगभग उसी समय हैदराबाद के निजाम ने गवर्नर जनरल वेल्स्ली के राज में लुटेरी ईस्ट इंडिया कंपनी को इसलिए सौपना पड़ा था क्योंकि वो कंपनी तो वार्षिक नजराना नहीं चुका पा रहे थे। स्वतंत्रता-पूर्व के औपनिवेशिक काल में, बस्ती में जमीनों पर मालिकों या जागीरदारों का कब्जा था, जो मुख्यतः राजपूत राजा या ठाकुर जमींदार थे या फिर “बिर्ता” भूस्वामी (जागीरदार) थे, जो ब्राह्मण थे और जिन्हें सन 1942 के पांचवें भूमि बंदोबस्त अधिनियम के अंतर्गत मूल राजपूत-ठाकुर मालिकों के समकक्ष घोषित कर दिया गया था. इस प्रकार 20वीं सदी की शुरुआत में, यह दोनों जातियां, जो जिले की कुल आबादी का 14.4  प्रतिशत थीं (राजपूत 3.12 प्रतिशत और ब्राह्मण 11.31 प्रतिशत), वहां की 64 प्रतिशत खेती-योग्य भूमि की मालिक थीं। शेष 36 प्रतिशत भूमि 62अन्य हिन्दू जातियों और मुसलमानों की थीं, जो की आबादी का 85.6 प्रतिशत थीं। इन्हें भी यह भूमि मूलतः अंग्रेजों की कृषि नीति के कारण मिल सकी थी।

इस प्रकार, जिले के अधिकांश रहवासी ‘‘प्रजा‘‘ थे। जमीनों को बेचने, खरीदने और गिरवी रखने का अधिकार केवल मालिकों को था। जिन 62 हिन्दू जातियों को ब्रिटिश शासन में बटाई पर खेती करने का अधिकार था, वे सभी अब सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में शामिल हैं और इनमें सबसे बड़ी संख्या अहीर या यादव और कुर्मियों की थी, जो आबादी का क्रमशः 11.8 व 8.7 प्रतिशत थे। सबसे निचले पायदान पर थीं ‘‘अछूत जातियां”, जो हिन्दुओं की कुल आबादी का 17 प्रतिशत थीं। इनमें से सबसे बड़ी जाति चमार थी जिसके सदस्यों की संख्या ब्राह्मणों और राजपूतों से कहीं ज्यादा थी। परन्तु पिछली सदी के शुरुआत में, वे जिले में कुल 29 एकड़ भूमि के मालिक थे। ‘अछूत’, जो अब एससी कहलाते हैं, लगभग गुलाम थे।

स्वाधीनता आन्दोलन के साथ शुरू हुआ, कृषकों का राजनीतिकरण, जिसके प्रतीक थे गोरखपुर के निकट चौरी-चौरा में सन 1920 में हुआ विद्रोह और सन 1930 में कांग्रेस द्वारा चलाया गया आन्दोलन, जिसमें जनता से भू-राजस्व और करों का भुगतान न करने का आह्वान किया गया। कांग्रेस, जो गाँधीजी के नेतृत्व में जन संगठन बन गयी थी, ने उत्तरप्रदेश के जमींदारों और तालुकादारों के विरुद्ध किसानों के आक्रोश और उनकी शिकायतों का मुद्दा उठाया। इस सिलसिले में पंडित गोबिंद बल्लभ पन्त की अध्यक्षता में सन 1931 में गठित स्पेशल अग्रेरियन इन्क्वारी कमेटी, जिसे पंडित कमेटी के नाम से भी जाना जाता है, की रपट महत्वपूर्ण है। प्रोफेसर राजेंद्र सिंह सन 1930 और 1940 के दशक में बस्ती जिले में हुए 30 किसान विद्रोह गिनाते हैं, जिनमें से 11 बड़े थे। ये सभी दमनकारी कृषि व्यवस्था के खिलाफ किसानों के आक्रोश से उपजे थे। इस व्यवस्था में शामिल थी बेगार, मालिकाना (मालिकों द्वारा जबरिया वसूली) और किसानों के परिवारों की महिलाओं का रखैल प्रथा इत्यादि के जरिये यौन शोषण। ये सब लम्बे समय से चल रहा था परन्तु अब वह विद्रोह की चिंगारी बन गयी। इन विद्रोहों और आक्रोश की परिणिति था सन 1946 का ‘‘निजई बोल” (घोषणा करो कि यह जमीन तुम्हारी है) आन्दोलन। उस समय पंडित गोबिंद बल्लभ पन्त उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने किसानों की समस्याओं को समझा और उत्तरप्रदेश के बस्ती और अन्य जिलों में खेती करने वालों के अभिलेख तैयार करने का अभियान शुरू किया। यह एक तरह से अभिलेखों को सुधारने का अभियान था ताकि जमीनों के ‘‘मालिकों” के जगह उन पर खेती करने वालों के नाम अभिलेख पर लाये जा सकें।  सरकार की ओर से जिला कलेक्टर स्तर के एक अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी गयी कि वह हर गाँव में जाकर जमीन के हर टुकड़े पर खेती करने वाले का नाम, किसानों की उपस्थिति में पता लगाये और उसका नाम जमीन के मालिक के तौर पर दर्ज करे। ‘‘मालिकों” के दावे, किसानों, जिनके संख्या बहुत बड़ी थी, के सामने ठहर न सके। इस अभियान में बड़ी संख्या में हिन्दू और मुसलमान प्रजा ने हिस्सेदारी की। यह आन्दोलन सन 1948 तक चला। एससी प्रजा ने बीसी प्रजा का साथ दिया। कांग्रेस के समर्थन से किसानों और मजदूरों ने हर गाँव में सभाएं आयोजित कीं। निजई बोल आन्दोलन का ग्रामीण क्षेत्रों में गहरा प्रभाव पड़ा। बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियों के कृषक, जमीनों के मालिक बन गए और इसने आगे चलकर समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति के क्षेत्रों में उनके आगे बढ़ने की राह प्रशस्त की। इस अभियान के सबसे बड़े लाभार्थी थे यादव या अहीर और कुर्मी। यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि वास्तविक किसानों को इकठ्ठा कर, सार्वजनिक रूप से सच का पता लगाया गया। यह प्रक्रिया, पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन बरगा के दौरान देबू द्वारा अपनाई गयी कार्यपद्धति और आंध्रप्रदेश में सन 1950 के दशक के उत्तरार्ध और 1960 के पूर्वार्ध में मेरे द्वारा अपनाये गए तरीके जैसी ही थी।

परन्तु, जैसा कि प्रो. राजेंद्र सिंह बताते हैं, यह आन्दोलन अछूत प्रथा और साम्प्रदायिकता की दीवारों को लांघ नहीं पाया। यद्यपि एससी और मुसलमानों ने बीसी किसानों का पूरा साथ दिया परन्तु बीसी किसानों ने उनका साथ नहीं दिया। ‘अछूतों’ को उनके द्वारा जोती जा रही जमीनों का मालिकाना हक हासिल करने से  हतोत्साहित किया गया।

मुसलमानों के उनकी खेती की जमीन के मालिक बनने की राह में विभाजन के तुरंत बाद देश में व्याप्त वातावरण का लाभ उठाते हुए, अनेक रोड़े अटकाए गए। कांग्रेस, जिसने सन 1920 के दशक से लेकर सन 1950 के दशक की शुरुआत तक, इस मामले में जो विद्रोही तेवर दिखाये थे, वे धीरे-धीरे ठन्डे पड़ गए। कांग्रेस स्वतंत्रता-पूर्व के अपने नारे ‘‘खेत जोतने वाले का” को जमीन पर उतारने के लिए जरूरी प्रयास करने की इच्छाशक्ति खो बैठी। इस नारे का असली अर्थ यही है कि जमीन का मालिक उसे होना चाहिए जो उस पर खेती करता है और इनमें खेतिहर मजदूर शामिल हैं और यह भी, कि जो खेती नहीं करता, वह जमीन का मालिक नहीं हो सकता। ‘‘निजई बोल” आन्दोलन के बस्ती और उत्तरप्रदेश के अन्य इलाकों में कमजोर पड़ जाने और देश के अन्य राज्यों में भी ऐसे अभियानों और आंदोलनों के ठंडा पड़ जाने का नतीजा आज भी हमारा समाज और हमारी अर्थव्यवस्था भुगत रही है। इस कारण देश की आबादी के एक बड़े हिस्से में असंतोष व्याप्त है, जिसके चलते देश की अर्थव्यवस्था उन ऊंचाईयों को नहीं छू पा रही है, जिन्हें वह छू सकती थी।  

बिहार में अब भी बटाईदरी व्यवस्था कायम है। बटाईदार, जिनमें से अधिकांश सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सबसे पिछड़ी जातियों में से हैं, की ओर से यह मांग उठती रही है कि व्यवस्था में सुधार कर उन्हें जमीनों पर मालिकाना हक दिया जाये। मुख्यमंत्री बतौर अपने पहले कार्यकाल में, नीतीश कुमार ने श्री डी. बंदोपाध्याय बटाईदारी प्रथा में सुधार के सम्बन्ध में सुझाव देने का काम सौंपा था। उनकी रपट अब भी धूल खा रही है।

निजई बोल आन्दोलन, ऑपरेशन बरगा और मन्नेसमुद्रम में असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में मेरे विनम्र योगदान – इन सब भूसुधार प्रयासों में कुछ समानताएं थीं। इस तरह के भूमि सुधार व एक अन्य श्रेणी के भूमि सुधार, जिनके अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण भूमिहीन एससी परिवार को उसके जीवनयापन के लिए पर्याप्त भूमि (जो उनकी सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है) उपलब्ध करवाने का काम अब तक अखिल भारतीय स्तर पर नहीं किया जा सका है। और ना ही एसटी व अन्य वर्गों (जिनमें से अधिकांश मध्यम व निम्न ओबीसी जातियां हैं) के भूमिहीन खेतिहर श्रमिक परिवारों को जमीन उपलब्ध करवाई जा सकी है। इस महत्वपूर्ण कार्य को न करने या उसमें देरी, भारत की बहुसंख्य आबादी के सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमजोर बने रहने का महत्वपूर्ण कारण है और इसी के चलते भारत समग्र रूप से प्रगति नहीं कर पा रहा है।

जमीनों पर कब्जे और उन पर खेती करने वालों से सम्बंधित अभिलेखों में सुधार और उनमें सही नामों की प्रविष्टि का जो कार्य आंध्रप्रदेश में मेरे क्षेत्राधिकार के गांवों में हुआ, वह मेरे द्वारा निर्धारित कार्यपद्धति के प्रयोग के बिना नहीं हो पाता। हर जानकारी लोगों को उपलब्ध करवाना, भूअभिलेखों में सुधार के प्रक्रिया से लोगों को जोड़ना और किसी भी संदेह या विवाद की स्थिति में लोगों की मौजूदगी में स्थल निरीक्षण करना, इस कार्यपद्धति का भाग था। असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर अक्सर यह शिकायत करते थे कि आम लोग सामने आकर इस प्रक्रिया में रूचि नहीं लेते परन्तु मेरा अनुभव एकदम अलग था। मैं हर गाँव में जमीन के प्रत्येक ऐसे टुकड़े, जो किसी के नाम पर दर्ज नहीं होता था अर्थात जिसे खाली दिखाया जाता था, के बारे में यह पता लगाता था कि क्या उस पर कोई दलित या अन्य भूमिहीन कृषक परिवार खेती करता है और अगर ऐसा होता था, तो मैं उसका पट्टा संबंधित व्यक्ति को दे देता था। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो ऐसी जमीनों को राजस्व अभिलेखों में ‘‘अस्सेसड वेस्ट” के रूप में दिखाया जाता और उसके कब्जेदारों को खेती करते रहने की अनुमति के लिए रिश्वत देनी होती और पट्टा प्राप्त के लिए एक लम्बी और कष्टपूर्ण प्रक्रिया से गुजरना होता। इस समस्या से निजात पाने का सबसे प्रभावी तरीका था, बंदोबस्ती अभियान के भाग के रूप ऐसी जमीनों का पट्टा स्थल पर ही जारी करना। मैंने मुझे प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसा ही किया।

ऐसे ही एक मामले में मेरी सेटलमेंट ऑफिसर श्री परसा वेंकटेश्वर राव, जो मेरे ठीक ऊपर के अधिकारी थे, और विभागाध्यक्ष श्री एम. आर. पई से भी, मेरी भिडंत हो गयी।  श्री परसा वेंकटेश्वर राव की छवि एक अत्यंत ईमानदार और स्पष्टवादी व्यक्ति की थी परन्तु अनंतपुर जिले के उरावाकोंदा उप-तालुक के राल्लाबंडा नामक गांव में भूअभिलेखों में पकड़ी गयी ऐसी त्रुटि, जिससे लोगों को नुकसान हो रहा था, को ठीक करने के तरीके के बारे में मेरी और उनकी सोच अलग-अलग थी। मुझे यह शिकायत मिली कि इस गाँव में जमीन के एक टुकड़े, जिस पर दलितों की झोपड़ियाँ बनी थीं, का पट्टा एक प्रभावशाली जमींदार को दे दिया गया है। मैं जब वहां पहुंचा, तो मैंने पाया की वह भूमि एक बड़ी काली चट्टान पर थी (जिसे स्थानीय भाषा में ‘कटवा’ कहा जाता है) और उस पर दलितों ने अपनी झोपड़ियाँ और कच्चे मकान बनाये हुए थे। इस तरह की चट्टानी भूमि  पर खेती नहीं की जा सकती। अधिनियम के तहत, केवल खेती-योग्य भूमि को ही रैय्यत भूमि के रूप में दर्ज किया जा सकता था और केवल रैय्यत भूमि के ही पट्टे दिए जा सकते थे। परन्तु गाँव के एक प्रभावशाली जमींदार को न केवल पट्टा दे दिया गया था वरन मेरे पूर्ववर्ती ने इसकी पुष्टि भी कर दी थी। मुझे अपनी पूर्ववर्ती की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा पर कोई संदेह नहीं था परन्तु काम के दबाव और विभागाध्यक्ष, अर्थात संचालक, सर्वेक्षण, बंदोबस्ती और भूअभिलेख के द्वारा निर्धारित मात्रात्मक लक्ष्यों को हासिल करने की जल्दी में अक्सर सर्वेक्षण और बंदोबस्ती कर्मचारियों द्वारा तैयार किये गए भूअभिलेखों के आधार पर बिना कोई खास जांच-पड़ताल के आदेश जारी कर दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में जो एकमात्र रास्ता बचता है वह है सेटलमेंट अधिकारी द्वारा अधिनियम के अंतर्गत उसे दिए पुनरीक्षण के अधिकार का इस्तेमाल। मैंने सेटलमेंट अधिकारी को मामले के तथ्यों से अवगत कराते हुए उनसे यह अनुरोध किया कि वे एएसओ अर्थात मेरे पूर्ववर्ती के आदेश को पुनरीक्षित करें ताकि दलितों को गैर-कानूनी ढंग से उनके घरों से न निकला जा सके और ना ही कर्मचारियों को वहां रहने देने के बदले उनसे रिश्वत वसूल करने का अवसर मिले। सेटलमेंट अधिकारी ने पुनरीक्षण के अपने अधिकार का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। मैंने पुनः उन्हें जोर देकर लिखा कि उन्हें अपने इस अधिकार का प्रयोग करना चाहिए। मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरा यह दृढ विश्वास है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे सभी व्यक्तियों, जिनमें अधिकारी भी शामिल हैं, का यह परम कर्तव्य है कि वे सभी लोगों, विशेषकर कमजोरों, असहायों और गरीबों, के साथ न्याय करने के लिए अपने अधिकारों का भरपूर इस्तेमाल करें। यह मेरी आस्था है और मैंने हमेशा इसके अनुरूप काम किया है।

कुछ समय बाद, संचालक, सर्वेक्षण, बंदोबस्त और भूअभिलेख श्री एम. आर. पई, जो प्रतिभाशाली और व्यक्तिगत रूप से अत्यंत ईमानदार अधिकारी थे, दौरे पर मेरे मुख्यालय आये। तब तक मेरा मुख्यालय कुरनूल हो गया था क्योंकि अनंतपुर जिले का अधिकांश काम निपट चुका था और अब मुख्यतः तत्कालीन कुरनूल जिले में मैदानी कार्य किया जाना था। कुरनूल जिले को बाद में दो भागों में विभाजित कर, नंदयाल जिले का निर्माण किया गया और इसका एक हिस्सा ओंगोल जिले, जिसका नामकरण आगे चलकर प्रकाशम कर दिया गया, में मिला दिया गया। उस समय वह देश के सबसे बड़े जिलों में से एक था और उसका क्षेत्रफल केरल राज्य का लगभग दो गुना था। हमारी बातचीत के दौरान श्री पई में मुझसे पूछा कि मैं अपने वरिष्ठ अधिकारी पर पुनरीक्षण के अधिकार का प्रयोग करने के लिए ‘‘जबरदस्ती” क्यों कर रहा हूँ। मैं अपनी बात पर कायम रहा और मैंने दलितों और अन्य कमजोर वर्गों के साथ न्याय किये जाने की जरुरत पर जोर दिया। मेरे और उनके बीच तनातनी के दो और कारण भी थे। पहला था, कार्य के मात्रात्मक लक्ष्य निर्धारित किये जाने से मेरी असहमति। मैंने पाया कि इन लक्ष्यों को हासिल करना मेरे लिए असंभव था। मैं चाहता था कि मैं किसी गाँव से आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करूं कि वहां के प्रत्येक किसान का नाम अभिलेखों में दर्ज हो गया है। प्रत्येक एएसओ को, बंदोबस्त अधिकारी और संचालक को मासिक रपटें भेजनी होतीं थीं। एक बार संचालक ने यह टिपण्णी की कि मेरी काम की गति कम है और मैं लक्ष्य से बहुत पीछे हूँ। मैंने जवाब में लिखा कि इस काम से दलितों और अन्य गरीबों के अधिकारों का मसला जुड़ा हुआ है और मुझे यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी गलत या शरारतपूर्ण प्रविष्टि से उनके अधिकारों पर विपरीत प्रभाव न पड़े। जब तक मैं प्रत्येक प्रविष्टि, विशेषकर वे जिनके सम्बन्ध में कोई शिकायत या अभ्यावेदन प्राप्त हुआ हो, की पुष्टि न कर लूं, तब तक मैं किसी गाँव से आगे नहीं बढूंगा। मैंने कहा कि लक्ष्य पूरा करने के बनिस्बत यह अधिक महत्वपूर्ण है कि किसी के साथ अन्याय न हो। शायद मैं एकमात्र ऐसा एएसओ था जिसने संचालक को इस तरह का जवाब दिया। जाहिर है कि इससे वे प्रसन्न तो नहीं हुए होंगे। वे प्रतिभाशाली और ईमानदार तो थे परन्तु उनका अहं बहुत बड़ा था और वे यह मानते थे कि वे कोई गलती कर ही नहीं सकते।  

सामान्यतः मैं कच्चे पट्टों पर आपत्ति करने में देरी को माफ कर देता था और उन आपत्तियों पर भी विचार करता था जो इसके लिए निर्धारित एक माह की अवधि के बाद प्राप्त होती थीं। अधिनियम में यह प्रावधान था कि एएसओ, उपयुक्त मामलों में देरी को माफ कर सकेगा। मैं यह मानता था कि लोगों में जागरूकता और ज्ञान की कमी और सर्वेक्षण व बंदोबस्त कर्मचारियों द्वारा उन तक आवश्यक सूचनाएं पहुँचाने में विलंब के चलते, आपत्तियां प्रस्तुत करने में देरी को माफ किया जाना चाहिए। मेरे द्वारा देरी को माफ किये जाने को भी संचालक उचित नहीं मानते थे। शायद वे मानते थे कि लोगों के साथ न्याय से लक्ष्यों की प्राप्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है।

आंध्र प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डी. संजीवअय्या

सीएम होने के बावजूद डी. संजीवअय्या को मिलती थी गालियां

सत्ताधारी दल में गुटबंदी के कारण प्रदेश में व्याप्त राजनैतिक अफरातफरी के मुद्दे पर हमारी चर्चा भी हमारे बीच तनाव का एक कारण बनी। यह सन 1960 की बात है। उस वर्ष, प्रदेश के अत्यंत शक्तिशाली मुख्यमंत्री श्री एन. संजीवा रेड्डी को चुनिन्दा बस मार्गों का राष्ट्रीयकरण किये जाने से सम्बंधित एक मामले में उच्च न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ की गई निन्दात्मक टिप्पणियों के चलते अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उनका उत्तराधिकारी कौन हो, इसे लेकर सत्ताधारी दल के विभिन्न गुटों के बीच घमासान मच गया। श्री संजीवा रेड्डी ने एक के बाद कई नाम प्रस्तावित किये परन्तु उनमें से किसी पर भी आम सहमति नहीं बन सकी। संजीवा रेड्डी ने जितने नाम प्रस्तावित किये, वे सभी उनकी जाति रेड्डी के थे। अल्लूरी सत्यनारायण राजू नामक एक नेता, जो कम्मा जैसी गैर-रेड्डी जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, ने रेड्डी से साफ-साफ शब्दों में पूछा कि क्या उनके पास रेड्डीयों के अलावा और कोई नाम नहीं है। इस पर श्री संजीवा रेड्डी चिढ़ गए और उन्होंने कहा कि ‘‘तो फिर आप लोग दामोदरन संजीवअय्या को मुख्यमंत्री बना लें”। श्री डी. संजीवअय्या उन दिनों राज्य के अग्रणी एससी नेता थे। वे एक गुणी व्यक्ति थे परन्तु उनकी जाति के कारण उन्हें कभी उपयुक्त पद नहीं मिल सका था। श्री संजीवा रेड्डी ने श्री संजीवअय्या के नाम का प्रस्ताव उनकी योग्यता के कारण नहीं किया था वरन इसलिए किया था क्योंकि वे उन लोगों को सजा देना चाहते थे, जिन्होंने उन पर यह आरोप लगाया था कि वे अपनी जाति से आगे देखना ही नहीं चाहते।  

मुख्यमंत्री बतौर श्री संजीवअय्या का कार्यकाल काफी उथलपुथल भरा रहा। उच्च जातियों और विशेषकर उस वर्चस्वशाली  जाति, जो हाल तक सत्ता पर काबिज थी, के मंत्रियों ने कभी उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जो मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें मिलना चाहिए था। मुख्यमंत्री के आदेश के लिए जो नस्तियां मंत्रियों द्वारा भेजी जाती थीं, उन्हें ‘‘एमएम” (मुख्यमंत्री) मार्क किया जाता था। एक मंत्री, जो व्यक्तिगत व्यवहार में शालीन और ईमानदार परन्तु जातिगत द्वेष से ग्रस्त थे, ने ‘‘एमएम” की एक दूसरी व्याख्या प्रस्तुत की। उनके अनुसार, पहले ‘‘एम” का अर्थ था ‘‘माला” और दूसरे का एक शब्द जो तेलुगू में एक अश्लील गाली है और जिसे मैं यहाँ दोहराना नहीं चाहता।

इस राजनैतिक अराजकता और उथल-पुथल पर खुशी व्यक्त करने हुए, श्री एम. आर. पई ने कहा कि इससे नौकरशाही, और विशेषकर आईएएस अधिकारी, फ्रांसीसी नौकरशाही की तरह शक्तिशाली हो जायेगें। मैंने उनके सामने एक दूसरी संभावना प्रस्तुत की। उस समय सद्य स्वतंत्र कांगो (पहले बेल्जियन कांगो) में अशांति और संघर्ष का बोलबाला था। कांगो के चुने हुए प्रधानमंत्री, पेट्रिस लुमुम्बा, बटाटेला नामक एक छोटे कबीले के सदस्य थे। बकांगो जैसे बड़े कबीलों के नेता, जिनमें तत्कालीन राष्ट्रपति जोसफ कसवुबू शामिल थे, उनका अपमान करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। कटंगा नामक एक प्रान्त में, एक नेता मोइसे त्शोम्बे ने लुमुम्बा के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। एक मुलाकात में विवाद के दौरान उन्होंने, लुमुम्बा की एक ऊंगली चबा ली। सेना प्रमुख जोसेफ मोबुटू (जो आगे चलकर राष्ट्रपति बने) भी अत्यंत अड़ियल किस्म के आदमी थे। मैंने श्री पई से कहा कि इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में भी कांगो जैसे हालात हो जायें। अपनी आशंका के समर्थन में मैंने कहा कि जिस तरह, कांगो में बलुबा, लुलुआ और बकांगो जैसे कबीलों में परस्पर द्वेष भाव है, वैसा ही भारत में विभिन्न जातियों की बीच भी है और इससे नौकरशाही भी मुक्त नहीं है। कांगो में प्रगतिशील पेट्रिस लुमुम्बा की आवाज नक्कारखाने में तूती बन कर रह गयी थी। वे अकेले ऐसे नेता थे जो विभिन्न कबीलों के बीच एकता की बात करते थे। उनकी स्थिति सचमुच त्रासद थी।  लुमुम्बा, मेट्रिक तक शिक्षा प्राप्त उन चंद लोगों में से एक थे, जिन्हें कांगो के बेल्जियन शासक लियोपोल्ड द्वितीय, जो देश को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति मानते थे, देश की स्वतंत्रता के बाद अपने पीछे छोड़ गए थे। लुमुम्बा के एंटोनी गिजेंगा जैसे सिद्धांतवादी, वफादार समर्थकों की संख्या ऊंगलियों पर गिनी जा सकती थी। सच यह था कि मैं भी यह नहीं मानता था कि भारत की स्थिति कांगो जैसी हो सकती थी परन्तु मैंने श्री पई से कांगो की चर्चा दो या तीन कारणों से की। पहला यह कि जिस ढंग से उन्होंने राजनैतिक दलों में यादवी संघर्ष और आपसी विवादों पर संतोष जाहिर किया, वह मुझे अच्छा नहीं लगा। सत्ताधारी दल में विभाजन, जातिगत आधारों पर था और नौकरशाही भी जाति की आधार पर बंटी हुई थी। उसके सदस्य (सभी मामलों में नहीं), अवचेतन और चेतन दोनों में अपनी मूल जाति के प्रति वफादार थे। अगर राजनैतिक शासन व्यवस्था चौपट हो जाए तो नौकरशाही उसका विकल्प नहीं हो सकती और यह सोचना बेकार है कि वह हालात में कोई सुधार ला सकती है। मैंने कांगो का उदाहरण इसलिए दिया क्योंकि वह उस समय चर्चा में था और मैं वहां के लोगों की बदहाली, वहां की स्थिति का लाभ लेने की शक्तिशाली देशों की कोशिशों और लुमुम्बा की त्रासदी के बारे में सोच-सोच कर परेशान था। उनकी ऊंगली चबा डालने की बात सुनकर मैं काफी दुखी हुआ था। भारत की स्थिति कांगो से बहुत बेहतर थी और जब वह विदेशी शासन से मुक्त हुआ, तब वह कांगो से कहीं अधिक सक्षम था। नौकरशाही में वरिष्ठ अधिकारी यह पसंद नहीं करते कि उनके मातहत उनकी बात काटें फिर चाहे कनिष्ठों के तर्क कितने ही मजबूत क्यों न हों।      

हैदराबाद के अधिकारी मुझे कहते थे ‘अहंकारी’

श्री पई (जैसा कि मेरे कुछ मित्रवत साथियों ने बताया), हैदराबाद के अधिकारी हलकों में मुझे अहंकारी बताया करते थे, ठीक श्री अनंतरमन की तरह। दूसरी ओर, श्री एम. ए. हलीम, जो मेरे कलेक्टर थे, ने सन् 1960 में हैदराबाद स्थित आंध्रप्रदेश सचिवालय में अपनी पदस्थापना के दौरान किसी से व्यक्तिगत चर्चा में मेरी तुलना ‘‘24 कैरट के सोने” से की। आईएएस में मेरे शुरूआती करियर के दौरान, अफसरशाही में श्री हलीम का साथ मिलना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात थी। जिन अधिकारियों की अधीन मैंने काम किया, उनमें वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो एससी व अन्य दमित वर्गों के प्रति मेरी चिंता और सरोकारों के प्रशंसक थे और उससे सहानुभूति रखते थे। वे हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के पीड़ितों की प्रति मेरे दृष्टिकोण और व्यवहार का सम्मान करते थे और उसके मुरीद थे। मेरे अनुविभाग के चिमाकुर्ती नामक गांव की एससी बस्ती में लगी एक बड़ी आग के सिलसिले में उन्होंने मुझे एक दिलचस्प पत्र लिखा। उन्होंने मुझसे, अर्थात सब कलेक्टर से, यह अनुरोध किया कि मैं उस गांव में जांऊ और अग्निकांड पीड़ितों को ‘सांत्वना‘ दूं। ‘सांत्वना‘ शब्द का प्रयोग सामान्यतः नौकरशाह नहीं करते। यह शब्द केवल हलीम जैसे अच्छे इंसान की कलम से ही निकल सकता था और वे यह काम करने का अनुरोध केवल पी. एस. कृष्णन जैसे व्यक्ति से कर सकते थे, जो सामाजिक मुद्दों पर संवेदनषील था। श्री पुरूषोत्तम नायडू ने यह पत्र देखा और मुझे इस बात के लिए बधाई दी कि मैं अपना दृष्टिकोण कलेक्टर को समझा सका हूं। एक या दो अन्य ऐसी घटनाएं हुईं, जो यह बताती हैं कि नौकरशाही में अलग-अलग पायदानों पर खड़े दो अधिकारियों के परस्पर रिश्ते कितने स्वस्थ और सकारात्मक हो सकते हैं। एक उदाहरण डुड्डूकुरू नामक एक गांव का है। वहां प्रशासन ने एससी को उनके मकान बनाने के लिए प्लॉट उपलब्ध करवाने हेतु भूमि का अधिग्रहण किया था। जिला समाज कल्याण अधिकारी ने कलेक्टर को रपट भेजी कि भूस्वामी जमीन को एससी को दिए जाने पर आपत्ति उठा रहे हैं और एससी स्वयं भी यह जमीन लेना नहीं चाहते हैं और इसलिए भूमि के अधिग्रहण को रद्द कर जमीन उसके मूल मालिकों को सौंप दी जानी चाहिए। सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में बात यहीं समाप्त हो जाती। परंतु श्री हलीम ने बुद्धिमत्तापूर्वक यह प्रकरण मुझे सौंप दिया और रिपोर्ट देने को कहा। उन्हें यह विश्वास था कि मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि एससी के साथ कोई अन्याय न हो। मैं उस गांव में पहुंचा और भूस्वामियों और एसएसी हितग्राहियों के साथ जमीन के उस टुकड़े को देखा। मेरे पूछने पर एससी ने कहा कि उन्होंने कभी अपना मकान बनाने के लिए वह जमीन लेने से इंकार नहीं किया था और अब भी वे उस जमीन को पाने में रूचि रखते थे। भूस्वामी, मुसलमान थे। मैंने उनसे पूछा कि वे भूमि अधिग्रहण का विरोध क्यों कर रहे हैं। उन्हाेंने कहा कि एससी की प्रस्तावित आवासीय कालोनी का रास्ता, उनकी बची हुई भूमि के बीच से गुजरेगा और उनकी भूमि को दो हिस्सों में बांट देगा। मैंने उन्हें याद दिलाया कि एससी किस बदहाली में जी रहे हैं। मैंने उनसे यह भी कहा कि कुरान सभी मनुष्यों के बीच भाईचारे की बात कहती है और कुरान की इस शिक्षा के प्रकाश में वे अपने बंधुओं की एक मूल आवश्यकता पूरी होने की राह में रोड़ा न बनें और उनके मकानों के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध न करें। जब मैंने कुरान की चर्चा की तो इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। भूस्वामियों ने आपत्ति उठाने के लिए माफी मांगी और अपनी आपत्ति वापस ले ली। उसके बाद मैंने यह प्रस्ताव किया कि सड़क से एससी की प्रस्तावित आवासीय कालोनी को जाने वाला रास्ता इस तरह से बनाया जाए कि वह भूस्वामियों की बची हुई जमीन के बीच में से न जाए बल्कि उसके किनारे-किनारे जाए। एससी इस प्रस्ताव से सहमत हो गए जिसके बाद भूस्वामियों ने प्रसन्न्ता से इस परियोजना को अपनी स्वीकृति दे दी।

जब मैंने आगे पड़ताल की तो यह सामने आया कि उस गांव में दो एससी समुदाय थे – माला और मडिगा। और उन दोनों की बस्तियां गांव के विपरीत छोरों पर थीं। भूमि अधिग्रहण इनमें से एक – मडिगा – को मकान बनवाने के लिए प्लाॅट उपलब्ध करवाने हेतु किया गया था। यह जमीन उनके वर्तमान रहवासी क्षेत्र से लगी हुई थी। दूसरे एससी समुदाय – माला – को इस भूमि और उसके अधिग्रहण से कोई लेनादेना नहीं था। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे इस भूमि पर अपने मकान बनाना चाहेंगे तो स्वाभाविकतः उन्हाेंने मना कर दिया। इस उत्तर को इस रूप में प्रस्तुत किया गया मानों गांव का कोई एससी इस जमीन पर रहना नहीं चाहता। यह भी सामने आया कि यह शरारत और गलतबयानी गांव के करनम ने की थी। कलेक्टर ने मेरी रपट  स्वीकार कर ली और जमीन उस एससी समुदाय को सौंप दी गई, जिसके लिए उसका अधिग्रहण किया गया था।

एक अन्य प्रकरण जिसमें मुझसे रपट देने के लिए कहा गया, वह था करमचेदू नामक गांव में खेती की सरकारी जमीन पर राज्य, जिले और गांव के सबसे धनी भूस्वामी जागरलामुड़ी परिवार द्वारा किया गया अतिक्रमण। सरकार की नीति और शासकीय आदेश एम. एस. क्रमांक 1142, 1952 के अनुसार, ऐसी सरकारी भूमि, जिसे ‘‘असेस्ड वेस्टलैंड‘‘ के रूप में वर्गीकृत किया गया हो, को केवल एससी, एसटी व अन्य भूमिहीन गरीबों को खेती करने के लिए आवंटित किया जा सकता है। तदानुसार, जमींदार को बेदखली का नोटिस जारी किया गया। उसने सरकार को लिखा कि अतिक्रमित भूमि उसकी निजी भूमि से लगी हुई है और यह तर्क दिया कि ‘सुविधा‘ के लिए उसका पट्टा उसे दे दिया जाना चाहिए। उसने अतिक्रमण को इस आधार पर भी औचित्यपूर्ण ठहराया कि जमीन पर खेती कर वह सरकार के ‘‘ग्रो मोर फूड‘‘ अभियान को सफल बनाने में योगदान दे सकेगा। स्थानीय स्तर पर पड़ताल और लोगों से बातचीत करने के बाद मैंने सरकार को लिखा कि जहां जमींदार ‘‘सुविधा‘‘ के नाम पर जमीन पर अपना दावा जता रहा है वहीं एससी को जिंदा रहने के लिए उस जमीन की जरूरत है। मैंने यह भी लिखा कि अगर एससी व अन्य भूमिहीन गरीबों को ऐसी जमीनों का पट्टा दे दिया जाएगा, तो वे उन जमींदारों की तुलना में, जो स्वयं हल नहीं चलाते, सरकार के ‘‘ग्रो मोर फूड‘‘ अभियान में बेहतर योगदान दे सकेंगे। वे स्वयं समर्पित भाव से जमीन पर खेती करेंगे और इससे उत्पादन में जो वृद्धि होगी, वह जमींदार द्वारा खेती करने से होने वाली वृद्धि से कहीं ज्यादा होगी। मेरी रपट को कलेक्टर द्वारा अनुमोदित कर दिया गया, जिसके बाद वह सरकार को अग्रेषित कर दी गई। श्री हलीम ने बाद में मुझे बताया कि सचिवालय के राजस्व विभाग में ऐसे प्रकरणों पर विचार करने वाले अधिकारी श्री के. सुब्बाराव ने मेरी रपट की काफी प्रशंसा की थी।

जब मैंने स्वीकारी अपनी गलती

एक अन्य उदाहरण ओंगोल अनुविभाग से मेरी विदाई के समय का है। अपना कार्यभार सौंपने के बाद मैं कलेक्टर श्री हलीम से विदा लेने 73 मील दूर स्थित गुंटूर गया। श्री पुरूषोत्तम नायडू भी मेरे साथ थे। ओंगोल लौटने के बाद मुझे पता लगा कि मैंने एक मामले में श्री हलीम को सुबह जो जानकारी दी थी, वह गलत थी। यह एक बहुत नाजुक मसला था और उस बारे में टेलीफोन पर कलेक्टर से बात करना उचित नहीं था। इसलिए मैं एक बार फिर 73 मील की दूरी तय कर श्री हलीम के पास गया और जो जानकारी मैंने उन्हें सुुबह दी थी उसे संशोधित किया। वे इससे बहुत प्रभावित हुए। ‘‘आप दूसरी बार इतनी दूर केवल मुझे यह बताने के लिए आए हैं?‘‘ उन्होंने कहा। श्री हलीम स्वभाव से एक गंभीर व्यक्ति थे और सामान्यतः अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करते थे। परंतु जब वे मुझसे यह कह रहे थे तब उनकी आंखों में आंसू भर आए। उन्होंने सत्य और न्याय के प्रति मेरी निष्ठा की भरपूर प्रशंसा की और यह विश्वास व्यक्त किया कि जैसे-जैसे मेरा अनुभव बढ़ता जाएगा, मैं अपन कार्य और बेहतर ढंग से कर सकूंगा।  

ऐसा नहीं था कि मेरे व श्री हलीम के बीच कोई मतभेद थे ही नहीं। मतभेद का एक मुद्दा था बाजार में चावल की बढ़ती कीमतों के कारण गरीबों को होने वाली कठिनाई। जब मैंने इसकी चर्चा उनसे की तब श्री हलीम ने कहा कि ‘‘हम कर भी क्या सकते हैं‘‘। उनका आशय यह था कि सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए कुछ नहीं कर सकती। मैंने जोर देकर कहा कि सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि गरीब लोगों को ऐसी कीमत पर चावल उपलब्ध हो सके जो उनकी पहुंच में हो। श्री हलीम ने मेरी ओर अविश्वासपूर्ण निगाहों से देखा मानों मैं पागल हो गया हूं। उन्होंने सरकार की तत्कालीन नीतियों के प्रकाश में मेरे सुझाव को अव्यावहारिक बताया। मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। इस मतभेद के बावजूद श्री हलीम न तो गुस्सा हुए और ना ही मेरे प्रति उनके दृष्टिकोण में कोई बदलाव आया। अहं उन्हें छू तक न पाया था। वे स्वभाव से अत्यंत संकोची और विनम्र थे परंतु उनकी कार्यकुशलता में कोई संदेह नहीं था। कुछ सालों बाद, प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था की मजबूरियों के चलते, केन्द्र और राज्य सरकारों को धनी भूस्वामियों से धान और मिलों से चावल खरीदकर उसका भंडारण करने और सस्ती दर पर उसे गरीबों को उपलब्ध करवाने की नीति बनानी पड़ी। आंध्रप्रदेश में सन् 1960 के दशक में यह नीति लागू की गई। परंतु जिस समय मैंने यह विचार व्यक्त किया था, उस समय न तो ऐसा सोचा गया था और ना ही सोचा जा सकता था।

एक बार फिर सीएम डी. संजीवअय्या की याद

अब मैं एक बार फिर श्री संजीवैय्या के उथलपुथल भरे कार्यकाल पर वापस आता हूं, जिसकी चर्चा मैंने पहले भी की है। एक वर्चस्वशाली ऊँची जाति के मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री को भेजी जाने वाली नस्तियों पर लिखे जाने वाले ‘एमएम‘ शब्द की अश्लील व्याख्या प्रस्तुत करने की घटना ने मुझे इसी तरह की एक अन्य घटना की याद दिला दी, जिसका वर्णन श्री पुरूषोत्तम नायडू ने मुझसे किया था। प्रशासनिक सेवा में आने के पूर्व श्री नायडू, कुरनूल के एक कालेेज में व्याख्याता थे। उस समय तेलुगू के सबसे नामी आधुनिक लेखकों में से एक श्री विश्वनाथ सत्यनारायण उनके कालेज आए। सत्यनारायण के प्रसिद्ध उपन्यासों में से एक है ‘वेई पदागलु‘‘ (हजार फन) जिसका हिन्दी अनुवाद पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिंहम्हाराव ने किया है। उस समय तेलुगू साहित्य में एक नई परिघटना घट रही थी और उसी का एक हिस्सा था श्री गुरर्म जशूवा नामक एक नए लेखक का उदय। उन्होंनेे कई लंबी कविताएं और छोटे महाकाव्य लिखे। इनमें से कुछ हैं – ‘गब्बीलम‘‘ (अर्थात चमगादड़), ‘‘ना कथा‘‘ (मेरी कहानी) इत्यादि। गब्बीलम, संस्कृत की ‘‘संदेशकाव्य‘‘ परंपरा मेें लिखी गई कविता है। संदेशकाव्य में किसी एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को दूत के जरिए संदेष पहुंचाने का विवरण होता है। इस शैली के काव्य का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है कालिदास का ‘‘मेघदूतम्‘‘, जिसमें अपनी किसी भूल के कारण धरती पर कुछ अवधि तक रहने के लिए अभिशप्त यक्ष, अपनी पत्नी को एक बादल के जरिए संदेश पहुंचाता है। गब्बीलम में संदेशवाहक, आकाश में उड़ने वाला बादल नहीं बल्कि चमगादड़ जैसा सामान्य सा जंतु है। एक अरूनधतिया, चमगादड़ से अनुरोध करता है कि वह ऐसा मौका देखकर जब पुरोहित आसपास न हो, भगवान शिव के कानों में यह संदेश दे कि अरूनधतिया कितनी बुरी स्थिति मे जी रहे हैं (अरूनधतिया आंध्रप्रदेश की एससी मडिगा जाति का पर्यायवाची शब्द है और जशूवा इसी जाति के थे)। इस कृति ने जशूवा को रातों-रात प्रसिद्ध बना दिया। जशूवा मुझे मलयालम कवि महाकवि कुमारन आसन की याद दिलाते हैं, जो ‘‘अछूत‘‘ इडिवा समुदाय के थे और आधुनिक मलयालम कवियों की प्रसिद्ध त्रयी में से एक थे। श्री कुमारन आसन के अतिरिक्त इस त्रयी में श्री ऊलूर परमेश्वर अय्यर और महाकवि वल्लाखोल शामिल थे।

कुमारन आसन ने भी कई प्रसिद्ध लंबी कविताएं लिखी हैं, जिनमें ‘‘दुरावस्था‘‘ और ‘‘चांडाल भिक्षुकी‘‘ शामिल हैं। ये सभी जाति और अछूत प्रथा और उनसे लोगों और समाज को होने वाली हानि पर केन्द्रित हैं। मैंने इन दोनों सबाल्टर्न कवियों की कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए एक शोध प्रबंध लिखा था और इसे विद्ववतजनों की एक महफिल में पढ़ा भी था। मैंने इस शोध प्रबंध को प्रकाशन के लिए एक जाने-माने समाचारपत्र को भेजा परंतु उसने इसे प्रकाशित करने से इंकार कर दिया। यह शोध प्रबंध अब भी मेरे पास है।

साहित्यकार जशूवा : जिन्हें झेलना पड़ा ‘अछूत’ होने का कोप

जशूवा की प्रसिद्धी पारंपरिक समाज को रास नहीं आई। श्री पुरूषोत्तम नायडू ने मुझे बताया कि उन्होंने श्री विश्वनाथ सत्यनारायण को अपने एक भाषण में यह कहते हुए सुना था कि ‘‘काकी कुगीते कोकिलम् अगुना, काकी माला काकी‘‘ अर्थात ‘‘अगर कोई कौआ गाएगा तो क्या वह कोयल बन जाएगा, कौआ एक माला कौआ है‘‘।

यहां यह स्पश्ट करना आवश्यक है कि ‘माला’ शब्द अनुसूचित जातियों या दलितों के लिए इस्तेमाल किया जाता था क्योंकि तटीय आंध्र, जहां के श्री सत्यनारायण थे,  में बहुसंख्यक एससी, माला समुदाय से थे और गैर-दलित, एससी की बजाए माला शब्द से अधिक परिचित थे और उसी का प्रयोग करते थे। श्री जशूवा माला समुदाय से नहीं थे बल्कि वे एक मडिगा थे।

श्री सत्यनारायण या श्री जशूवा की प्रतिभा और योग्यता संदेह से परे थी और मुझे यह पता है कि व्यक्तिगत रूप से उनके आपसी रिश्ते बहुत अच्छे थे परंतु इतने प्रसिद्ध और ज्ञानी व्यक्ति भी जाति के फेर से मुक्त नहीं रह सके।

जब मैं एएसओ के रूप में पदस्थ था तब मुझे मुख्य सचिव श्री एम. पी. पई का एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें मुझसे कहा गया कि जब मैं अगली बार हैदराबाद आऊं, तो उनसे मिलूं। मैंने ऐसा ही किया। उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘जब हमने आपको ओंगोल से हटाया था, तब हमने सोचा था कि अब हमें आपके बारे में कुछ सुनने को नहीं मिलेगा। परंतु आपको एएसओ नियुक्त करने के बाद भी हमें आपके बारे में वैसी ही रपटें मिल रही हैं।‘‘ उनका आशय उनकी व कुछ अन्य अधिकारियों की दृष्टि में, दलितों और अन्य कमजोर वर्गों के प्रति मेरे ‘‘झुकाव‘‘ से था। मैं यह मानता था कि यह ‘‘झुकाव‘‘, वंचित वर्गों के साथ न्याय करने की दिशा में पहला कदम है। उन्होंने मुझे बताया कि मेरी गोपनीय चरित्रावली में एक प्रतिकूल टिप्पणी की गई है। उसमें लिखा गया था कि ‘‘मैं दमित वर्गों के प्रति अवांछित झुकाव रखता हूं, अंतर्जातीय विवाहों की जरूरत से ज्यादा वकालत करता हूं, संस्कृत के अपने ज्ञान का प्रयोग धर्म को खोखला सिद्ध करने के लिए करता हूं और ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी अधिकारियों की बजाए, गांव के निवासियों की बातों पर विश्वास करता हूं जिससे ‘‘विध्वंसकारी तत्वो‘‘ की मदद होती है।‘‘

मैंने पूछा – दलित बस्तियों में जाने या रूकने कोई प्रतिबंध है?

उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं दलित बस्तियों में क्यों रूकता हूं। जवाब में मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या दलित बस्तियों में जाने या रूकने पर कोई प्रतिबंध है। वे समझ गए कि मेरा प्रश्न एक जाल है और उन्होंने तुरंत कहा कि ‘‘नहीं नहीं ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।’’ इसके बाद हम दोनों ने एक दूसरे से विदा ली। मुख्य सचिव ने मेरी गोपनीय चरित्रावली में की गई प्रतिकूल टिप्पणी से मुझे अवगत कराकर अपना कर्तव्यपालन कर लिया था और एक तरह से मुझे चेता भी दिया था।

शासकीय नियमों में यह प्रावधान है कि कोई अधिकारी, अपनी गोपनीय चरित्रावली में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को विलोपित करने के लिए अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकता है। मैंने ऐसा कोई अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं समझी। मेरे विरूद्ध जो टिप्पणी की गई थी वह ऐसी सामान्य टिप्पणियों से भिन्न थी। उसमें यह कहा गया था कि मेरे समाज, प्रशासन की भूमिका और ‘‘दमित‘‘ वर्गों के प्रति अधिकारियों के कर्तव्यों के संबंध में अलग विचार थे। तत्कालीन ओल्ड मद्रास प्रेसिडेंसी और आंध्र में अनुसूचित जातियों और कुछ अति पिछड़ी जातियों के लिए ‘डिप्रेस्ड क्लासिस’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। सरकार, प्रशासनिक सेवाओं और अधिकारियों के डिप्रेस्ड क्लासिस से जुड़े मुद्दों पर मेरे विचार अलग थे। मेरे विचार सामाजिक यथार्थ, मानवीय और प्रजातांत्रिक मूल्यों, मूल अधिकारों, संवैधानिक जिम्मेदारियों, विभिन्न कानूनों और घोषित राष्ट्रीय नीतियों के अंतर्गत अधिकारियों को सौंपे गए उत्तरदायित्वों पर आधारित थे। मेरे विचार सरकार में बड़े पदों पर बैठे व्यक्तियों के दिमागों में भरे पूर्वाग्रह से एकदम अलग थे। इन पूर्वाग्रहों को वे लोग सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में भी सकुचाते नहीं थे। सन् 1969 में तमिलनाडु के किलावेनमनी के बाद कृष्णा जिले के कंचीकचरेला में एक दलित युवक श्री कोटेशु की बैलगाड़ी के पहिये से बांधकर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस पर एक तत्कालीन वरिष्ठ मंत्री श्री पेड्डीरेड्डी थिम्मा रेड्डी की ह्दयहीन टिप्पणी थी कि ‘‘गांववाले चोरों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं‘‘। उनका इशारा इस आरोप की ओर था कि उक्त दलित युवक ने चोरी की थी। इतने वरिष्ठ मंत्री को शायद यह भी समझ नहीं थी कि देश में ऐसे कानून हैं जिनके अंतर्गत गांववालों – जिससे उनका आशय वर्चस्वशाली भूस्वामियों से था – को यह अधिकार नहीं है कि किसी व्यक्ति की जान ले लें या उसे चोट पहुंचाएं, फिर चाहे वह चोर या हत्यारा क्यों न हो। संविधान, कानून और राज्य की नीतियां, सत्ताधारी राजनीतिज्ञों और अधिकारियों से यह अपेक्षा करती हैं कि वे दमित वर्गों की हर संभव मदद करें ताकि वे समाज के स्वतंत्र और समान नागरिक बन सकें। परंतु ऊँची जातियों के वर्चस्वशाली भूस्वामी और कुछ वरिष्ठतम अधिकारी, दमित वर्गों के साथ न्याय करने के लिए किसी अधिकारी द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने को ‘‘विध्वंसकारी‘‘ गतिविधि मानते थे। सच तो यह है कि दरअसल उनका दृष्टिकोण और उनके कार्य विध्वंसकारी थे। वे मानव मूल्यों, संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और राज्य की घोषित नीति का विध्वंस कर रहे थे।

मेरा यह विश्वास है कि जाति व्यवस्था, भारतीय समाज और भारतीय राष्ट्र की कमजोरी और बुराईयों की जड़ है और इस व्यवस्था को समाप्त करना आवश्यक है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जाति व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करना होगा। ऐसी ही एक जड़ है विवाह संबंधी नियम जिनमें जाति से बाहर विवाह करने पर प्रतिबंध हैं। मैं ‘‘अंतर्जातीय‘‘ विवाहों की वकालत नहीं करता था बल्कि में ‘‘जाति-विरोधी‘‘ विवाहों की वकालत करता था। मेरा यह मत था कि – जिसे मैंने सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी किया – कि एक ही जाति में विवाह  प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। मैंने जैविक व्यभिचार के अतिरिक्त ‘‘सामाजिक व्यभिचार‘‘ की संकल्पना प्रतिपादित की। जिन व्यक्तियों के एक-दूसरे से नजदीकी खून के रिश्ते हैं, उनके बीच विवाह पर पारंपरिक प्रतिबंध होता है। परंतु इस प्रतिबंध को जैविक व्यभिचार की अवधारणा के अनुरूप पूरी तरह लागू नहीं किया जाता। जैविक व्यभिचार को इसलिए हतोत्साहित किया जाता है क्योंकि नजदीकी रिश्तेदारों के बीच विवाह से जन्म लेने वाली संतानों में अनुवांशिक दोष होने की संभावना होती है। मैं नजदीकी रिश्तेदारों केे बीच विवाह पर प्रतिबंध को विस्तार देकर उसे जाति के भीतर विवाह पर प्रतिबंध में परिवर्तित करने का हामी था क्योंकि मेेरा यह मानना था कि जाति के भीतर विवाह, एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक समाज – एक ऐसे समाज जिसमें विभाजन की कोई दीवारें न हों – के विकास में बाधक है। परंतु मेरी इस सोच को राजनैतिक और प्रशासनिक पदों पर बैठे पारंपरिक सोच वाले व्यक्तियों द्वारा नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता था। मेरी गोपनीय चरित्रावली में संस्कृत के मेरे ज्ञान के संबध में जो टिप्पणी की गई थी, उसके मूल में मेरे विरूद्ध जांच के दौरान श्री अनंतरमन के समक्ष की गई मेरी वह टिप्पणी थी जिसमें मैंने मनुस्मृति में सामाजिक भेदभाव को उचित ठहराए जाने की चर्चा की थी। मनुस्मृति और अन्य स्मृतियां धर्म नहीं हैं (मनुस्मृति केवल एक सामाजिक संहिता है और मैं तो उसे समाज-विरोधी संहिता मानता हूं)। संस्कृत में लिखा हर ग्रंथ हिन्दू धर्म का भाग नहीं है जिस तरह लैटिन में लिखी हर चीज ईसाई धर्म का हिस्सा नहीं है। परंतु मेरे द्वारा संस्कृत के मेरे ज्ञान का प्रयोग कर मनुस्मृति के संबंध में कुछ तथ्य प्रस्तुत किए जाने को मेरे वरिष्ठ अधिकारियों ने गलत ढंग से ले लिया। वे न तो संस्कृत समझते थे और ना ही धर्म को। उनके लिए रीति-रिवाजों और खोखली परंपराओं का विरोध, धर्म का विरोध था। जहां तक गांव में पदस्थ सरकारी अधिकारियों की तुलना में गांववालों की बात को अधिक महत्व देने का प्रश्न है, मेरे मैदानी दौरों के अनुभव से मैं यह जान गया था कि ग्रामीण क्षेत्राें में पदस्थ अधिकारी अक्सर अभिलेखों में हेराफेरी करते हैं और तथ्यों को तोड़मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं और इससे मूलतः गरीब और कमजोर वर्गों और व्यक्तियों का नुकसान होता है।  मैं अपने अनुभव और प्रजातांत्रिक सहज ज्ञान से इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि जमीनोें, उन पर कब्जे, लोगों की जाति इत्यादि के बारे में सच का पता तभी लगाया जा सकता है जब जांच सार्वजनिक रूप से सभी ग्रामवासियों के सामने हो। मैंने इसके कुछ उदाहरण दिए परंतु अधिकांश वरिष्ठ प्रशासक पुराने तरीकों से ही चिपके रहना चाहते थे। उनके लिए सरकारी तंत्र के सदस्यों की बात सर्वोपरि थी और ग्राम स्तर के अधिकारी इस तंत्र का भाग थे।

मेरे एक मित्र, जिन्हें सन् 1978 में, मेरी गोपनीय चरित्रावली देखने का अवसर मिला, उन्होंने मुझे बताया कि बाद के वर्षों में भी मेरे संबंध में वैसी ही टिप्पणियां की गईं थीं। इन प्रतिकूल टिप्पणियों की जानकारी मुझे इसलिए नहीं दी गई क्योंकि संभवतः केवल ऐसी कमियों या गलतियों की जानकारी देना अनिवार्य था, जिन्हें सुधारा जा सके। शायद सरकार का यह ख्याल था कि मेरी कमियां और कमजोरियां लाइलाज हैं।

एक और स्थानांतरण की दास्तां

सन् 1961 में मेरा बैच, जिला कलेक्टर या संयुक्त कलेक्टर या उसके समकक्ष पद पर नियुक्ति के लिए पात्र हो गया। मेरे बैच के अन्य साथी संयुक्त कलेक्टर के रूप में पदस्थ थे। मैं वारंगल में सब-कलेक्टर ग्रेड-1 था और मेरा वेतनमान संयुक्त कलेक्टर के समकक्ष था। महालेखाकार ने तकनीकी आधार पर इस पर आपत्ति उठाई। इसके बाद सरकार ने मुझे अतिरिक्त संचालक, नेशनल एम्पलायमेंट सर्विसेस के पद पर पदस्थ कर दिया। यहां मैं रोजागर कार्यालयों और रोजगार संबंधी प्रशिक्षण का प्रभारी था। यह एक सामान्य सा पद माना जाता था जिस पर पदस्थ व्यक्ति कुछ खास करने की स्थिति में नहीं होता था। शायद सत्ता में बैठे लोग मुझे कलेक्टर या संयुक्त कलेक्टर के रूप में पदस्थ करने से घबरा रहे थे।

इस पद पर पदस्थ रहने के दौरान मैंने देखा कि वहां ‘स्पाॅट सिलेक्शन‘ (स्थल पर चयन) करने की प्रथा थी। अगर कोई संस्था, रोजगार कार्यालय को यह सूचित करती थी कि उसे किसी विशिष्ट योग्यता वाले कर्मचारियों की तुरंत जरूरत है तो रोजगार कार्यालय उन उम्मीदवारों के नाम अग्रेषित कर देता था जो उस समय कार्यालय के परिसर में मौजूद रहते थे। मैंने पाया कि यह व्यवस्था कई प्रकार की अनियमितताओं का स्त्रोत थी और इसके कारण एससी, एसटी व सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता था। मैंने एक आदेश जारी कर यह कहा कि स्थल चयन में भी आरक्षण संबंधी नियमों का पालन अनिवार्य होगा। यह आरक्षण की व्यवस्था में कमी का एक उदाहरण था।

सन् 1986-87 में प्रदेश के गैर-राजपत्रित अधिकारियों ने हड़ताल कर दी। सरकार ने निर्णय लिया कि उनका काम करने के लिए अस्थायी तौर पर कर्मचारियों की व्यवस्था की जाए। उस समय मैं प्रमुख सचिव था। मैंने यह आदेश जारी किया कि अस्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति में भी आरक्षण नियमों का पालन किया जाना चाहिए ताकि अगर आगे चलकर कभी इन कर्मचारियों को नियमित कर दिया जाता है, तब भी सरकार में आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों का अनुपात वही बना रहे, जो नियमानुसार होना चाहिए। हाल में संविदा नियुक्तियों के नाम पर आरक्षण नियमों की अवहेलना करने का एक नया तरीका खोज लिया गया है। अब सरकारों में अनेक काम संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों से करवाए जाते हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे जो काम करते हैं, वह स्थायी प्रकृति का होता है। इसके पहले तक यही काम नियमित कर्मचारियों द्वारा किया जाता था और उनकी नियुक्ति में आरक्षण नियमों का पालन होता था। संविदा कर्मियों के मामले में ठेकेदार, कर्मचारियों की भर्ती में आरक्षण नियमों का पालन नहीं करते। इस कमी को अब तक दूर नहीं किया जा सका है।

मैं अतिरिक्त संचालक, नेशनल एम्पलायमेंट सर्विसेस के पद पर केवल दो या तीन माह तक पदस्थ रहा। इस दौरान मुझे एक दिलचस्प अनुभव हुआ। एक दिन मेरे पास उस समय के एक शक्तिशाली मंत्री श्री के. चन्द्रमौली का फोन आया। वे चाहते थे कि मेरे विभाग में रिक्त पदों, जिन पर नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, पर उनकी पसंद के एक व्यक्ति को नियुक्त किया जाए। मैं चयन समिति का सदस्य था। बातचीत के अंत में मंत्रीजी ने मुझसे पूछा कि मैंने उनसे अब तक उस उम्मीदवार का नाम क्यों नहीं पूछा है। मैं उस उम्मीदवार का नाम जानना नहीं चाहता था क्योंकि मुझे मालूम था कि यदि मुझे वह नाम याद रहा तो चयन के समय यह बात उस उम्मीदवार के विरूद्ध जाएगी। परंतु मंत्रीजी ने मुझे उम्मीदवार का नाम बता ही दिया। उस पद पर नियुक्ति के लिए एक साक्षात्कार समिति का गठन किया गया। गृह सचिव श्री व्ही. राजेश्वर राव समिति के अध्यक्ष थे और श्रमायुक्त श्री ई. व्ही. रामरेड्डी और मैं उसके सदस्य थे। उम्मीदवारों के चयन के संबंध में चर्चा करते समय गृह सचिव ने कहा कि संबंधित मंत्री ने उनसे भी उस उम्मीदवार की सिफारिश की थी। मंत्रीजी ने कोई कसर न छोड़ते हुए श्री रामरेड्डी को भी फोन कर कहा था कि उनके व्यक्ति का चयन होना चाहिए। श्री रामरेड्डी इस तरह की सिफारिशें सुनने में यकीन नहीं रखते थे। हम तीनों ने यह निर्णय किया कि मंत्रीजी के उम्मीदवार को अपात्र घोषित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि पदों पर नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार की सिफारिश करवाना प्रतिबंधित था। हमने ऐसा ही किया। गृह सचिव, जो मजाकिया स्वभाव के थे, ने कार्यवाही के अंत में मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘मतलब, मंत्रीजी का उम्मीदवार बाहर हो गया है’’।

आंध्र प्रदेश हुकूमत ने मुझे केंद्रीय सेवा में भेजने की सिफारिश की

जल्दी ही मुझे यह सूचना मिली कि मेरा चयन भारत सरकार में अवर सचिव के पद पर नियुक्ति के लिए हो गया है। दरअसल, आंध्रप्रदेश सरकार मुझे प्रदेश से बाहर भेजना चाहती थी क्योंकि उसे यह आशंका थी कि अगर मैं राज्य में पदस्थ रहा तो एससी-एसटी व पिछड़ी जातियों के साथ न्याय करने के मेरे ‘रोग‘ से युवा अधिकारी भी ‘पीड़ित‘ हो जाएंगे। मेरा चयन कोयला, खान एवं ईंधन मंत्रालय में हुआ था। इस विभाग के सचिव एक मुंडा सिक्ख श्री एस. एस. खेरा थे, जो शायद धर्मपरिवर्तित ईसाई थे। वे अत्यंत उदारमना व्यक्ति थे और उनमें जातिगत व अन्य किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह नहीं थे। जिस संयुक्त सचिव के अधीन मुझे काम करना था, उनका नाम श्री छेदी लाल था, जो आगे चलकर पांडिचेरी (अब पुडुचेरी) के उपराज्यपाल बने। स्थापना के प्रभारी संयुक्त सचिव श्री एन. एन. कश्यप थे। इन तीनों में से केवल श्री छेदी लाल एससी थे। जब मैं श्री कश्यप से मिला तो उन्होंने कहा कि उन्होंने मेरी गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल टिप्पणियों के कारण ही मेरा चयन किया था। उन्होंने और श्री छेदी लाल ने मुझसे कहा कि वे इन टिप्पणियों के पीछे का सच देख सकते थे और राज्य सरकार में मेरी जो ‘प्रताड़ना‘ हो रही थी, उससे मुझे कुछ समय के लिए मुक्ति दिलाना चाहते थे। मुझे यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि आईएएस में ऐसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो वंचित वर्गों को न्याय दिलाने के मेरे मिशन को सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। आंध्रप्रदेश में भी मैं मेरे वरिष्ठों में से श्री एम. ए. हलीम व श्री पी. व्ही. रत्नम की प्रशंसा का पात्र था। मेरे समकक्षों में से श्री पुरूषोत्तम नायडू व श्री एस. आर. शंकरन भी मेरे इस दृष्टिकोण के प्रशंसक थे। मेेरे बाद के बैचों के कुछ युवा अधिकारी भी मेरे उदाहरण से प्रेरणा ग्रहण करते थे। इसी ‘प्रदूषण‘ और ‘संक्रमण‘ को फैलने से रोकने के लिए राज्य के प्रशासनिक नेतृत्व ने यह निर्णय लिया कि मुझे दिल्ली भेज दिया जाना चाहिए।

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

(आलेख परिवर्द्धित : 31 जनवरी 2019, 2:36 PM)


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