दास्तां दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के हितैषी चार आईएएस दोस्तों की

पी. एस. कृष्णन, एस.आर. शंकरन, डॉ. बी.डी. शर्मा और डॉ. भूपिंदर सिंह की यह कहानी बता रहे हैं स्वयं पी.एस. कृष्णन। उनके मुताबिक, आईएएस अधिकारियों को प्रताड़ना के खतरे से डरे बगैर, निर्भीकता से पददलितों के लिए काम करना चाहिए। अगर उन्हें वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए निष्ठापूर्वक और बिना कोई समझौता किए काम करने के लिए प्रताड़ित किया जाता है तो इसे उन्हें अपने सम्मान और अपनी सेवाओं की मान्यता के रूप में देखना चाहिए

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 7

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन  भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं – संपादक )

  • वासंती देवी

वासंती देवी : आपने एक अन्य महान नौकरशाह, सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता श्री एस. आर. शंकरन के साथ काफी लंबे समय तक काम किया है। शायद वे ही एक ऐसे अधिकारी हैं जिनसे आपकी तुलना की जा सकती है। क्या आप उनके साथ आपकी मित्रता/भागीदारी के संबंध में कुछ बताएंगे? क्या ऐसा कोई अन्य अधिकारी है जिसके साथ आपने काम किया हो और जो आपकी सोच से इत्तिफाक रखता हो?

पी.एस. कृष्णन : जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि आईएएस ट्रेनिंग स्कूल में हम दोनों के सहायक रहे श्री मोहम्मद अली ने सबसे पहले मुझे श्री शंकरन के बारे में बताया था। तब तक मैं उनसे मिला नहीं था। वे मेरे अगले बैच अर्थात 1957 बैच के अधिकारी थे और वे ट्रेनिंग स्कूल में उसी कक्ष क्रमांक 22 में 1957 से 1958 तक रहे थे जिसमें मैं सन् 1956 से 1957 तक रहा था। हमारी मुलाकात सन् 1959 में दिलचस्प परिस्थितियों में हुई। उस समय ओंगोल के सब-कलेक्टर के रूप में मेरी पदस्थापना की अवधि समाप्त हो रही थी और श्री शंकरन, पड़ोसी कृष्णा जिले में जिला स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। चूंकि कृष्णा जिले में जंगल कम थे इसलिए उन्हें उनके वन प्रशिक्षण के लिए गुंटूर भेजा गया। वन प्रशिक्षण, सीधी भर्ती वाले आईएएस अधिकारियों के जिला स्तर के प्रशिक्षण का हिस्सा होता है। मैं ओंगोल से गुंटूर होते हुए थिमासमुद्रम नामक गांव जा रहा था, जहां के दलितों ने मुझे एक अभ्यावेदन सौंपा था। जैसी कि मेरी आदत थी, मैं गुंटूर जिले के प्रशिक्षणार्थी असिस्टेंट कलेक्टर श्री रमेश ग्रोवर के घर कुछ देर के लिए गया। वहां मैंने पूछा कि श्री ग्रोवर कहां हैं? इस पर बैठक में मौजूद छोटे कद के एक व्यक्ति मेरे पास आए और मुझसे कहा कि श्री ग्रोवर कहीं गए हुए हैं। उन्होंने कहा, ‘‘शायद आप श्री पी. एस. कृष्णन हैं’’। इसने मुझे परेशानहाल डेविड लिनविंगस्टोन से स्टेनली की मुलाकात की याद दिला दी, जब स्टेनली, डेविड लिनविंगस्टोन की तलाश में अफ्रीका पहुंचे थे। लिनविंगस्टोन कांगो नदी के उद्गम की तलाश में निकले थे और उनका बाहर की दुनिया से सारा संपर्क टूट गया था। उन सज्जन ने अपना परिचय एस. आर. शंकरन के रूप में दिया। यद्यपि हम तब पहली बार मिले थे परंतु चूंकि हम एक-दूसरे के बारे में पहले से जानते थे, इसलिए हमारी बहुत दोस्ताना अंदाज में बातें हुईं।

एस. आर. शंकरन (22 अक्टूबर 1934 -7 अक्टूबर 2010)

मैंने श्री शंकरन को बताया कि मैं एक मिशन पर थिमासमुद्रम जा रहा हूं और उनसे पूछा कि क्या वे मेरे साथ चलना चाहेंगे। श्री शंकरन ने तुरंत मेरा आमंत्रण स्वीकार कर लिया और मेरी जर्जर जीप पर सवार हो गए। बाद में श्री शंकरन ने लिखा कि उस दिन उन्होंने पहली बार यह देखा कि एक उच्चाधिकारी, अपनी गाड़ी को चलाते हुए सीधे एक दलित बस्ती में पहुंच गया। थिमासमुद्रम में अपना काम समाप्त करने के बाद हम ओंगोल जाते हुए गुंटूर पहुंचे। रास्ते भर हमने मेरे काम और एससी व अन्य वंचित वर्गों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के बारे में ढेर सारी बातें कीं। श्री शंकरन मेरे दृष्टिकोण से बहुत प्रभावित हुए और मेरे इस तर्क से भी कि हम अधिकारियों को अपना काम करते समय दलितों और अन्य कमजोर वर्गों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह हमारी लंबी दोस्ती और दलितों के हितार्थ मिलकर काम करने की यात्रा की शुरूआत थी, जो 7 अक्टूबर 2010 को उनकी मृत्यु तक जारी रही। हमारी इस मुलाकात, थिमासमुद्रम की हमारी यात्रा और दलित हितों को प्राथमिकता देने की मेरी श्री शंकरन को नसीहत के बारे में मैंने अपने एक लेख में लिखा है। यह लेख फ्रंटलाईन पत्रिका के नवंबर 6-19, 2010 के अंक में श्री शंकरन की मृत्यु के बाद ‘रोड लेस ट्रेवल्ड‘ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

पी. एस. कृष्णन, भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह

इसके कुछ समय बाद, जैसा कि मैंने पहले बताया, मुझे ओंगोल से स्थानांतरित कर एएसओ के पद पर पदस्थापित कर दिया गया। इस बीच श्री शंकरन का प्रशिक्षण समाप्त हो गया और उन्हें नंदयाल – जो उस समय विशाल कुरनूल जिले का भाग था और अब एक अलग जिला है – में सब-कलेक्टर के पद पर नियुक्त कर दिया गया। ओंगोल से अनंतपुर जाते हुए मैं एक दिन के लिए श्री शंकरन के निवास पर रूका। कलेक्टरों, सब-कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों आदि के आधिकारिक निवासों को अक्सर ‘बंगला‘ कहा जाता है। मैं इस शब्द का इस्तेमाल करने से बचता हूं क्योंकि इससे उपनिवेशवाद की बू आती है। कलेक्टरों, सब-कलेक्टरों इत्यादि के मकानों की तरह, यह भी एक बहुत बड़ा मकान था और उसके आसपास काफी खुला क्षेत्र था। मैं वहां देर शाम पहुंचा और श्री शंकरन ने मुझे सूचना दी कि उनके कलेक्टर श्री भूतराजा राव नंदयाल में हैं और उनके घर के गेस्ट स्वीट में ठहरे हुए हैं। जहां तक मेरी जानकारी थी, श्री भूतराजा राव आंध्र प्रदेश के पहले ऐसे एससी डिप्टी कलेक्टर थे, जिन्हें आईएएस में पदोन्नत किया गया था। जब सन् 1957-58 में मैं अनंतपुर जिले में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था उस समय नौकरशाहों में इस बात की बहुत चर्चा थी कि आंध्र प्रदेश लोकसेवा आयोग ने दलित समुदाय के श्री कट्ठी चंदरैया, श्री लेगुरू सुबैय्या और श्री के. सूर्याराव को सीधे डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्ति के लिए चुना है। श्री कट्ठी चंदरैया व श्री सुबैय्या ने अपने करियर में फूंक-फूंककर कदम रखा जो कि उस समय दलित अधिकारियों के प्रति नौकरशाही में व्याप्त द्वेष और बैर भाव के चलते स्वाभाविक था। दलित अधिकारियों का सामान्यतः स्वागत नहीं किया जाता था। शनैः-शनैः उन लोगों ने नौकरशाही का विश्वास अर्जित किया और अंततः आईएएस में पदोन्नत होकर सेवानिवृत्त हुए। इसके विपरीत, श्री के. सूर्यराव कई विवादों में फंस गए जिनमें उनके यात्रा बिल और निजी जीवन से जुड़े कुछ प्रसंग शामिल थे। वे अत्यंत मेधावी अधिकारी थे परंतु वे उस स्तर तक नहीं पहुंच सके जिस तक उन्हें पहुंचना चाहिए था। और उसका कारण बने ये विवाद और उनका अपने मूल लक्ष्य से भटक जाना।

श्री शंकरन ने मुझे बताया कि श्री भूतराजा राव मुझसे मिलना चाहते हैं। मैं श्री शंकरन के साथ, उनके घर के गेस्ट स्वीट में श्री भूतराजा से मिला। उन्होंने ओंगोल में मेरे काम के बारे में सुन रखा था और वे चाहते थे कि वे वहां मेरे कार्यकाल के दौरान हुई घटनाओं का विवरण स्वयं मुझसे सुनें। उन्होंने मेरे प्रति सहानुभूति व्यक्त की और मेरी ‘प्रताड़ना’ को निंदनीय बताते हुए कहा कि ओंगोल के दलित मुझे ‘भगवान’ मानते हैं। फिर श्री शंकरन की ओर मुड़कर उन्होंने कहा, ‘‘हमें भी कृष्णन गारू की तरह काम करना चाहिए’’। श्री शंकरन ने इस पर तुरंत अपनी पूर्ण सहमति व्यक्त की।

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सब-कलेक्टर के रूप में श्री शंकरन ने नंदयाल में अपनी पदस्थापना के दौरान, दलितों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया। एएसओ, अनंतपुर के रूप में कार्य करने के बाद, जिस समय मेरी पदस्थापना एएसओ, कुरनूल (मेरा कार्यक्षेत्र वही था केवल मुख्यालय बदल गया था) के रूप में थी, उस दौरान जब भी श्री शंकरन कलेक्टर या संयुक्त कलेक्टर द्वारा बुलाई गई बैठकों में भाग लेने कुरनूल आते थे, तब वे मेरे आधिकारिक निवास पर रूकते थे। इसी तरह, जब मैं कुरनूल के पूर्वी तालुकों अर्थात गिदलार व मरकापुर जाता था या जब मैं कड़प्पा जिले के दौरे पर निकलता था तब रास्ते में नंदयाल पड़ता था और मैं एक रात श्री शंकरन के घर में गुजारता था। उनकी मां, जो अब नहीं हैं, हम दोनों को राम-लक्ष्मण की जोड़ी बतातीं थीं। यह, हम दोनों की निकटता और समाज, दलितों व अन्य गरीबों के प्रति हमारे दृष्टिकोण की समानता को रेखांकित करने का उनका तरीका था।

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जैसा कि मैंने पहले बताया है, सन् 1961 में मुझे केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया। उसके कुछ ही समय बाद श्री शंकरन भी भारत सरकार के वित्त मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर पदस्थ हो गए। जब तक उनके माता-पिता और उनके परिवार के अन्य सदस्य दिल्ली नहीं आए, तब तक वे मेरे किराए के फ्लैट में मेरे साथ रहे। उसी दौरान श्री अनंतरमन दिल्ली की यात्रा पर आए। अन्य अधिकारियों की तरह, वे भी आंध्र प्रदेश भवन में रूके। हम दोनों उनसे शिष्टाचार भेंट करने आंध्र प्रदेश भवन पहुंचे। इधर-उधर की बातों  के बाद उन्होंने शंकरन से पूछा कि वे कहां रह रहे हैं। इस पर श्री शंकरन ने कहा कि ‘‘मैं कृष्णन के साथ रह रहा हूं’’। उन्होंने मेरे नाम पर अतिरिक्त जोर दिया मानों वे श्री अनंतरमन को यह बताना चाहते हों कि हम दोनों के आदर्शों और दृष्टिकोणों में कितनी समानता है।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

श्री शंकरन के माता-पिता के दिल्ली आ जाने के बाद, उन्होंने मेरे फ्लैट के नजदीक ही एक फ्लैट किराए पर ले लिया। हमारी दोस्ती बनी रही और सचिवालय में अपना काम निपटाने के बाद हम दोनों हमारे रहवास के क्षेत्र में पैदल लंबी सैर पर निकल जाते थे। हम दोनों की विभिन्न पदस्थापनाओं के दौरान हमारे संबंध उतने ही नजदीकी बने रहे। हम दोनों एक ही समय में भारत सरकार में सचिव थे। मैं कल्याण मंत्रालय में सचिव था और मेरे पास एससी, एसटी, एसएडबीसी और अल्पसंख्यक कल्याण का प्रभार था। श्री शंकरन सचिव, ग्रामीण विकास थे। यह विभाग, ग्रामीण निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों को लागू करने का काम करता था।

डॉ. भूपिंदर सिंह, पूर्व आईएएस अधिकारी

इसी दौरान मेरे एक अन्य साथी डाॅ. भूपिंदर सिंह, जो उड़ीसा कैडर के अधिकारी थे, भारत सरकार में प्रतिनियुक्ति पर वित्त मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर पदस्थ हुए। जिस समय हम सब और हमारे अन्य निकट मित्र दिल्ली में थे, उसी दौरान डाॅ. भूपिंदर सिंह का विवाह सन् 1962 में हुआ और मैंने सन् 1963 की 7 मार्च को शांताजी से विवाह किया। इसके बाद श्री शंकरन की मां ने राम-लक्ष्मण की जोड़ी के साथ सीता का नाम भी जोड़ दिया।

डॉ. बी.डी. शर्मा, भूतपूर्व आईएएस अधिकारी

हमारे समय के आईएएस अधिकारियों में से हम चार सामाजिक न्याय के आदर्श के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे। मेरे अलावा, इनमें सन् 1956 बैच के डाॅ. बी.डी. शर्मा और डॉ. भूपिंदर सिंह और सन् 1957 बैच के श्री एस.आर. शंकरन शामिल थे। आंध्र प्रदेश काडर के अगले बैचों के कुछ अधिकारियों ने भी मेरे और श्री एस.आर. शंकरन के उदाहरण से प्रेरणा ग्रहण की और हमारी राह पर चले क्योंकि उन्होंने देखा कि दलितों व अन्य कमजोर वर्गों के प्रति हमारे तथाकथित झुकाव के कारण हमें जो प्रताड़ना दी गई, उसके बाद भी हम सेवा में बने रहे और अपना काम करते रहे। कुछ अन्य राज्यों में भी इसी तरह का दृष्टिकोण रखने वाले अधिकारी थे, यद्यपि, उनकी संख्या, आंध्र प्रदेश काडर के ऐसे अधिकारियों से कहीं कम थी। प्रशासनिक सेवाओं का यह दर्शन था कि उसके अधिकारियों को किसी विशिष्ट विचारधारा में आस्था रखे बगैर और कोई विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाए बिना, केवल सरकार की नीतियों का क्रियान्वयन करना चाहिए। उन दिनों प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह अकल्पनीय था कि वे दलितों व अन्य कमजोर वर्गों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपनी ओर से कोई पहल करें। यही कारण है कि जब मैंने यह राह चुनी, तब अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों और राजनैतिक नेताओं ने न केवल इससे असहमति व्यक्त की वरन् उन्हें मेरे काम करने के तरीके को देखकर बहुत धक्का लगा। उनके लिए यह विश्वास करना कठिन था कि कोई अधिकारी इस तरह से काम कर सकता है। चूंकि प्रशासनिक अधिकरियों से एक तरह की ‘अनैतिक’ र्निलिप्तता की अपेक्षा की जाती थी, इसलिए दलितों, आदिवासियों व सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर वर्गों से जुड़े मुद्दों में रूचि लेने वाले अधिकारियों की संख्या बहुत कम थी। विभिन्न सत्ताधारी पार्टियों के नेताओं की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के चलते, जो अधिकारी वंचित वर्गों के प्रति अपने संवैधानिक व मानवीय कर्तव्यों का पालन करते थे, उन्हें जोखिम उठाकर ऐसा करना होता था। भारतीय नौकरशाही में मैं पहला ऐसा अधिकारी था, जिसने यह दृष्टिकोण अपनाया। इसके नतीजे में मुझे जो प्रताड़ना भुगतनी पड़ी, वह ऐसे अधिकारियों के लिए चेतावनी थी जो दलितों और आदिवासियों के हितों के प्रति सहानुभूति रखते थे। मैंने मेरी प्रताड़ना को सहज ढंग से लिया और मेरी प्रत्येक पदस्थापना में यह प्रयास किया कि मैं दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों और अन्य वंचित तबकों की आवश्यकताएं पूरी करने और उन्हें उनके अधिकार दिलवाने के लिए हर संभव प्रयास करूं।

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श्री एस.आर. शंकरन ने आगे चलकर विभिन्न पदों पर कार्य किया। वे अधिकांशतः आंध्र प्रदेश सरकार में पदस्थ रहे। उन्होंने राज्य के दलितों और आदिवासियों की भलाई के लिए सतत काम किया और इससे उनके यश और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। सन् 1970 के दशक के अंत और सन् 1980 के दशक की शुरूआत में विकास आयुक्त और उसके बाद प्रतिनियुक्ति पर त्रिपुरा के मुख्य सचिव के रूप में उन्होंने वहां के आदिवासियों की भलाई के लिए अविस्मरणीय कार्य किए। हम दोनों सन् 2010 में उनकी मृत्यु तक इस दिशा में काम करते रहे। स्वर्गीय डाॅ. बी.डी. शर्मा एवं डाॅ. भूपिंदर सिंह ने भी पहले अपने कैडर के राज्यों क्रमश: मध्य प्रदेश (जिसमें तत्समय छत्तीसगढ़ भी शामिल था) और उड़ीसा में और बाद में केन्द्र सरकार में पदस्थापना के दौरान जीवन भर आदिवासियों के कल्याण के लिए कार्य किया। वे आदिवासी उपयोजना के जन्मदाता थे और मैं अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना का। डाॅ. बी.डी. शर्मा की सन् 2015 में मृत्यु तक हम दोनों संपर्क में रहे और मिलकर काम करते रहे। डाॅ. भूपिंदर सिंह से मेरे संपर्क-संबंध आज भी बने हुए है।

मेरी यह मान्यता है कि आईएएस अधिकारियों को प्रताड़ना के खतरे से डरे बगैर, निर्भीकता से पददलितों के लिए काम करना चाहिए। अगर उन्हें वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए निष्ठापूर्वक और बिना कोई समझौता किए काम करने के लिए प्रताड़ित किया जाता है तो इसे उन्हें अपने सम्मान और अपनी सेवाओं की मान्यता के रूप में देखना चाहिए। उन्हें तब तक कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता, जब तक कि वे व्यक्तिगत रूप से पूरी तरह से ईमानदार रहें और उनका व्यक्तिगत जीवन साफ-सुथरा हो।

अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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