झारखंड में आदिवासियों की जीत, मुख्यधारा की मीडिया हताश क्यों? 

मुख्यधारा के दो मीडिया संस्थानों हिन्दुस्तान व टाइम्स ऑफ इंडिया ने झारखंड विधानसभा चुनाव परिणाम को किस रूप में प्रस्तुत किया है और इसके निहितार्थ क्या हैं, बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

गत 23 दिसंबर, 2019 को झारखंड विधानसभा चुनाव का परिणाम सामने आए। चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन को 47 सीटें और भाजपा को 25 सीटें मिली हैं। इस प्रकार झारखंड में रघुवर दास सरकार का खात्मा हो गया। देश में सीएए-एनआरसी को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच आए इस चुनाव परिणाम पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ मीडिया संस्थानों को इस चुनाव परिणाम ने निराश किया है।

 

सुर्खियों में झलकी निराशा

मेरे सामने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान  व टाइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र है। हिन्दुस्तान ने प्रथम पृष्ठ पर पहला खबर झारखंड चुनाव परिणाम पर छापा है। शीर्षक है – झारखंड भाजपा के हाथ से निकला। बेटे को साइकिल पर बिठाकर घुमाते हेमंत सोरेन की तस्वीर को लगभग सभी अखबारों ने छापा है। खबर को देखें तो यह भान होता है कि शायद अखबार को इस बात का मलाल है कि भाजपा के हाथ से एक और प्रांत की हुकूमत चली गई। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी लगभग इसी पीड़ा के साथ खबर को प्रकाशित किया है। शीर्षक है – एनदर स्टेट स्लिप्स आउट ऑफ बीजेपीज कंट्रोल 

टाइम्स ऑफ इंडिया की कॉरपोरेट जगत के प्रति पक्षधरता को उसकी एक टिप्पणी उजागर कर रही है। प्रथम पृष्ठ पर ही बॉक्स में उसने उन कारणों का जिक्र किया जो जेएएमएम गठबंधन के हित में रहे और जिनके कारण भाजपा को नुकसान हुआ। भाजपा को हुए नुकसान के लिए इस अंग्रेजी अखबार ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को बेकसूर बताने का प्रयास करते हुए तीन कारण गिनाए हैं। इनमें से एक है रघुबर दास की कार्यशैली। दूसरा कारण सरयू राय का नाराज होना है। बताते चलें कि जमशेदपुर पूर्वी सीट से सरयू राय ने रघुबर दास को हरा दिया है। तीसरा कारण सीएनटी एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का दुरुपयोग है। टाइम्स ऑफ इंडिया  की यह टिप्पणी आदिवासियों के विरूद्ध है। अखबार का कहना है कि सरकार ने सीएनटी एक्ट में संशोधन आदिवासियों को उनके अपने जमीन पर अधिक अधिकार देने के मकसद से किया था, जिसे विपक्षी दलों ने साजिश के तहत आदिवासियों के विरोध में बताने में सफलता हासिल कर ली। 

24 दिसंबर 2019 को नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान व टाइम्स ऑफ इंडिया अंग्रेजी दैनिक के प्रथम पृष्ठ की लीड खबरें

सीएनटी एक्ट के प्रस्तावित संशोधन के संदर्भ में यह विश्लेषण ही गलत है। जबकि इस संबंध में कई तथ्य प्रकाश में आ चुके हैं कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन आदिवासियों के लिए कितना अहितकारी होता। यही कारण रहा कि रघुबर दास सरकार द्वारा इन कानूनों में संशोधन विधेयक विधानसभा में पारित कराए जाने के बावजूद राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। 


गौरतलब है कि सीएनटी एक्ट झारखंड के छोटानागपुर के इलाकों में ही लागू है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने छोटा नागपुर के इलाकों में अधिक सीटें जीती हैं। मसलन उत्तर छोटा नागपुर के इलाकों में उसे 11 सीटें मिलीं जबकि जेएमएम गठबंधन को 9 सींटे मिली हैं।वहीं दक्षिणी छोटा नागपुर के इलाके में भाजपा को 5 सीटें मिलीं। इसलिए टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा यह विश्लेषण कि सीएनटी में संशोधन के प्रयास के कारण भाजपा को नुकसान हुआ, गलत है।

आदिवासियों के विरोध को मिली 12वें पन्ने पर जगह

दरअसल, झारखंड में आदिवासियों ने भाजपा को खारिज किया। इसका प्रमाण यह कि 28 आदिवासी बहुल क्षेत्रों जहां पत्थलगड़ी आंदोलन हुए, वहां 26 सीटों पर भाजपा हारी। इस महत्वपूर्ण सूचना से संबंधित विश्लेषण को टाइम्स ऑफ इंडिया ने पृष्ठ संख्या 12 पर जगह दिया है। यह अखबार की खबर संबंधी मानदंड पर सवाल खड़ा नहीं करता?

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दिलचस्प यह है कि दैनिक हिन्दुस्तान अखबार के प्रथम पृष्ठ पर लीड खबर के ठीक नीचे एक खबर है – भाजपा अपने सरकारों के काम की समीक्षा करेगी। पहली खबर और इस दूसरी खबर के बीच ताना-बाना यह है कि भाजपा नेतृत्व यह स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है कि शीर्ष नेतृत्व की नीतियों का असर राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों पर भी पड़ रहा है। इनके मुताबिक राज्यों में भाजपा को मिल रही हार के लिए राज्य सरकारें ही जिम्मेदार हैं न कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व। वह नेतृत्व जो केंद्र में राज कर रहा है।


हिन्दुस्तान अखबार की टिप्पणी भी गौर करने लायक है। इस लंबी संपादकीय टिप्पणी में कई हिस्से हैं और सभी बेतरतीब हैं। संपादक किसी एक बात पर टिकने के बजाय सभी स्थितियों की चर्चा कर देना चाहते हैं। एक और बात जो संपादकीय टिप्पणी में  है, वह यह कि झारखंड विधानसभा चुनाव में एनआरसी का असर नहीं पड़ा। हालांकि संपादक ने सीधे तौर पर यह कबूल नहीं किया है। उनका मानना है कि असर पड़ा भी तो आंशिक तौर पर। भाजपा की हार की कई वजहें थीं और इनके लिए केंद्र की नीतियां भी जिम्मेदार थीं और खुद रघुबर सरकार भी।

मांब लिंचिंग प्रदेश के तौर पर झारखंड का सामने आना केंद्र की मोदी सरकार और रघुबर दास सरकार दोनों की नीतियों एवं बयानों का परिणाम था। तबरेज अंसारी की मॉब लिंचिंग को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। मॉब लिंचिंग करने वालों को जेल से रिहाई  पर केंद्रीय मंत्री द्वारा फूलों की माला पहनाकर स्वागत किए जाने की घटना को झारखंड की जनता शायद आजतक नहीं भूली है। झारखंड में 2017 से लेकर अब तक इस तरह की 5 घटनाएं हो चुकी हैं। गोरक्षा के नाम पर हिंसक झड़पों की संख्या राज्य सरकार ने अब तक नहीं बताया है। संभवत: यह जानकारी एनसीआरबी के लिए पेंडिंग रखी गई है।

सीएबी-एनआरसी भी नहीं टाल सकी भाजपा की हार 

असल में हुआ यह कि पहले दो चरणों के दौरान भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह समझ गया कि लाख कोशिशों के बावजूद यह जंग नहीं जीता जा सकता है। कारण यह है कि पहले दोनों चरणों में भाजपा का परफारमेंस बहुत कमजोर रहा। लिहाजा उसने एनआरसी और सीएए को लेकर आखिरी हथियार चलाया। सनद रहे कि 11 दिसंबर, 2019 को हुआ जब लोकसभा में सीएबी पेश किया गया और विरोध के बावजूद पारित किया गया। इसके अगले दिन 12 दिसंबर 2019 को झारखंड में तीसरे चरण का चुनाव हुआ और इसी दिन राज्यसभा में सीएबी पारित हुआ। इस चरहण में भाजपा को 6,जेवीएम को 1 और आजसू को 2 सीटें मिलीं। लेकिन यह वह मुख्यत: शहरी क्षेत्र है। इनमें केवल एक एसटी और एक एससी के लिए आरक्षित है और यह भाजपा का परंपरागत तौर मजबूत गढ़ है। 

सीएए-एनआरसी के मुद्दे के बाद हुए मतदान का परिणाम

चरण/ तारीखभाजपाजेएमएम+जेवीएमआजसूअन्य
III/ 12 दिसंबर8612-
IV/ 16 दिसंबर86--1
V/ 20 दिसंबर3121--
कुल1924221

 

चौथे चरण में चुनाव उन शहरी/औद्योगिक इलाकों में हुए, जहांं आदिवासी निर्णायक संख्या में नहीं हैं। इस चरण में 15 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव हुए। एनआरसी और सीएए के कारण भाजपा को उम्मीद थी कि वोटों का ध्रुवीकरण होगा और उसकी सीटों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह भी इसके बावजूद कि ये क्षेत्र हाल के दो दशकों में भाजपा के गढ़ बन गए थे। जेएमएम गठबंधन को 6 सीटें मिलीं और भाजपा केवल 8 सीटों पर सीमित रही। 

अंतिम चरण में 16 सीटों के लिए मतदान 20 दिसंबर को हुआ जब पूरे देश में सीएए और एनआरसी को लेकर प्रदर्शन हुए। इनमें 7 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित थे। इस चरण में भी एनआरसी के मुद्दे पर भाजपा की ध्रुवीकरण करने की कोशिश नाकाम रही। एनआरसी के मुद्दे ने आदिवासियों को  प्रभावित किया और इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा को केवल 3 सीटें मिलीं। वहीं जेएमएम गठबंधन को 12 सीटें मिलीं।

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इस प्रकार धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश को झारखंड की जनता ने खारिज कर दिया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धर्म के आधार पर वोटरों में ध्रुवीकरण की पूरी उम्मीद थी। इसलिए चुनावी रैलियों के दौरान अपने संबोधनों में उन्होंने एनआरसी-सीएए को ही आधार बनाया। साथ ही राम मंदिर के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी राजनीतिक इस्तेमाल किया।

लेकिन, झारखंड की जनता ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दी। भाजपा को 2014 के मुकाबले 12 सीटों का नुकसान हुआ। प्रतिशत के हिसाब से बात करें तो यह नुकसान ज्यादा बड़ा है। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को 51 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि 23 दिसंबर को घोषित चुनाव परिणाम में उसे केवल 33.5 प्रतिशत मत मिले। 

दरअसल, झारखंड की जनता के पास भाजपा के विरोध के अपने बहुत से कारण पहले से मौजूद थे। इस विरोध को एनआरसी-सीएएस और राम मंदिर के नाम पर कम करने और वोटरों का ध्रुवीकरण करने की उसकी कोशिश झारखंड में भी नाकामयाब रही।

(संपादन : गोल्डी/सिद्धार्थ)


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