हिंदी पट्टी में फुले की विरासत के वारिस चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ का रचना-संसार

सिद्धार्थ स्मरण कर रहे हैं चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ और उनके द्वारा रचित कृतियों को। उनके मुताबिक जोतीराव फुले की विरासत को भारत के हिंदी राज्यों में आगे बढ़ाने वाले जिज्ञासु जी ही थे। वे यह भी बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपना सर्वस्व जीवन दलित-पिछड़ों के जागरण को समर्पित किया था

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु (1885- 12 जनवरी, 1974) पर विशेष

आधुनिक हिंदी साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा की वैचारिकी और उसका साहित्य, द्विज मूल्यों की वैचारिकी का साहित्य रहा है, राहुल सांकृत्यायन और प्रेमचंद  जैसे एकाध अपवादों को छोड़कर। इसके द्विज चरित्र को गढ़ने में दक्षिणपंथी, उदारपंथी और वामपंथी सभी समान रूप से साझीदार रहे हैं। इसने द्विज मूल्यों, संस्कारों और विचारों को प्रश्रय देने वाली वैचारिकी, रचनाओं और रचनाकारों को श्रेष्ठ और महान बनाकर प्रस्तुत करने के साथ ही, उन विचारों, रचनाओं और रचनाकारों को पूरी तरह बहिष्कृत और उपेक्षित कर दिया, जो द्विज वैचारिकी और साहित्य को चुनौती दे रहे थे और बहुजन वैचारिकी एवं साहित्य की रचना कर रहे थे। ऐसे विचारकों में चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ भी शामिल हैं, जिन्होंने हिंदी पट्टी में बहुजन वैचारिकी का व्यापक आधार तैयार किया। तथाकथित मुख्य धारा द्वारा ‘जिज्ञासु’ जी के बहिष्कार और उपेक्षा को रेखांकित करते हुए कंवल भारती ने लिखा है कि “चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु को हिंदी साहित्य में कोई नहीं जानता। हिंदी साहित्य में जितने भी इतिहास लिखे गए हैं, उनमें किसी में भी उनका नाम दर्ज नहीं है। दरअसल, वे जिस धारा के लेखक थे, वह पूरी धारा ही हिंदी साहित्य के इतिहास में अनुपस्थित है। यह क्रांति की धारा थी- सामाजिक क्रांति और उसमें भी वर्ण-व्यवस्था के विरोध की।” (भारती कंवल, 2017, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-1, पृ.13)

पिछड़ी जाति (कलवार) में पैदा हुए चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ (1885- 12 जनवरी, 1974) आधुनिक नवजागरण के अधिकांश पुरोधाओं की तरह विचारक, लेखक,अनुवादक, संपादक, प्रकाशक और कार्यकर्ता आदि भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ कर रहे थे। 83 वर्षों के अपने जीवन-काल में उन्होंने प्रचुर साहित्य की रचना की। उन्होंने बहुजन क्रांति की अलख जगाने के  साथ ब्रिटिश शासन से भारत की मुक्ति की आजादी में भी गांधी के इस आश्वासन और अनुरोध के बाद हिस्सा लिया था कि आजादी के बाद बहुजनों को उनका पूरा हक मिलेगा। इसके बाद उन्होंने उसमें सक्रिय हिस्सेदारी की और कई बार जेल गए। इस दौरान उनकी तीन रचनाओं-’स्वदेशी’, ‘कौमी बादशाह जवाहरलाल नेहरू’ और ‘चरखा’– को खतरनाक मानकर ब्रिटिश शासन ने जब्त कर लिया। लेकिन जल्दी ही उनका आजादी के आंदोलन से मोहभंग हो गया और आजादी के बाद तो उन्हें पूरी तरह इसका अहसास हो गया कि असल में देश में लोकतंत्र की स्थापना नहीं हुई है, बल्कि ब्राह्मणशाही की स्थापना हुई है। वे लोकतंत्र को लोकशाही कहकर पुकारते थे। 1966 में उन्होंने ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ किताब लिखी। करीब 62 पृष्ठों की यह किताब 9 अध्यायों में विभाजित है। इसमें उन्होंने विस्तार से लोकशाही (लोकतंत्र) और ब्राह्मणशाही की चर्चा की है। उन्होंने आजादी के बाद स्थापित भारतीय लोकतंत्र की वास्तविकता को उजागर करते हुए लिखा – “यद्यपि कहने को भारत में लोकशाही है, लेकिन हकीकत में यहां लोकशाही पर कई शाहियां ऐसी लदी हैं कि बेचारी लोकशाही का दम घुट रहा है। सामंतशाही, पूंजीशाही, अमलाशाही, नौकरशाही, नेताशाही इत्यादि और सबकी नानी-अम्मा धमधूसर ब्राह्मणशाही है।.. इससे वे लोग निस्संदेह दुखित हैं, जिनके हृदय भारत में लोकशाही स्वतंत्रता आ जाने से खिल उठे थे।… भारत की सामाजिक दशा की जरा गहरी पड़ताल कीजिए, तो आपको दिखाई देगा देश में ब्राह्मणशाही का बोलबाला।” (वही, खंड-4, पृ.35)  

यह भी पढ़ें – बहुजन चेतना के नायक : चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु

उन्होंने इस किताब में विस्तार से चर्चा की है कि किस तरह देश में जो कोई भी ब्राह्मणशाही को चुनौती देता है, उसे ‘राक्षस’ घोषित कर दिया जाता है, चाहे वह कितना ही न्यायनिष्ठ, सचरित्र और ज्ञानी क्यों न हो। इसके शिकार खुद जिज्ञासु जी भी हुए थे। ब्राह्मणशाही का विरोध करने के चलते हिंदी पट्टी में बहुजन नवजगारण के इस आधार स्तंभ को भारतीय इतिहास से बहिष्कृत और उपेक्षित कर दिया गया।  

भारत में बाह्मणशाही का कितना आतंक है, इसका एक उदाहरण जिज्ञासु जी ने गांधी के उदाहरण से प्रस्तुत किया।जिस गांधी के अनुरोध और आश्वासन पर जिज्ञासु जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी की थी, वह भी ब्राहणशाही से किस कदर आंतकित थे। इस संदर्भ में जिज्ञासु जी लिखते हैं कि “ब्राह्मणशाही का आतंक इस देश में इतना प्रबल है कि शक्तिशाली अंग्रेजी-साम्राज्य से मोर्चा लेने वाले महात्मा गांधी भी, जिन्हें राष्ट्रपिता कहा गया, उससे बहुत डरते थे और ब्राह्मणों को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने ‘रामधुन’ का लटका निकाल रखा था।” (वही, पृ.37) लेकिन चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ ने ब्राह्मणशाही के सामने झुकने से इंकार कर दिया, जिसकी कीमत उन्हें बहिष्कार और उपेक्षा के रूप में चुकानी पड़ी। वे व्यापक समाज के लिए अज्ञात और अनजान बने रहे ।

चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’

उनकी मृत्यु के करीब 43 वर्षों बाद 2017 में पहली बार उनकी ग्रंथावली कंवल भारती के संपादन में ‘द मार्जिनालाज्ड प्रकाशन, नई दिल्ली’ से ‘चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली’ शार्षक’ से प्रकाशित हुई। 1,460 पृष्ठों की चार खंड़ों में प्रकाशित यह ग्रंथावली  जिज्ञासु जी के जीवन के विविध आयामों और उनके द्वारा रचे गए विपुल साहित्य से परिचित कराती है।

मसलन, इसके पहले खंड में ‘आदि निवासियों की सभ्यता’, ‘मोहिनी विद्या’, ‘पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट’ और  ‘ईश्वर और गुड़्डे’, दूसरे खंड में ‘संत प्रवर रैदास’, ‘रावण और उसकी लंका’, ‘श्री 108 स्वामी अछूतानन्द जी’ और तीसरे खंड ‘शिव-तत्व प्रकाश’, ‘उत्पत्ति, स्थिति, और जनसंख्या’, ‘भदन्त बोधानन्द महास्थिविर’ और ‘बाबा साहेब का जीवन संघर्ष’ और चौथे खंड में ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’, ‘हैहय-वंश की श्रेष्ठता’, ‘बाबा साहेब का उपदेश-आदेश’, ‘नारी-जीवन की कहानी’ और जिज्ञासु जी की कविताएं शामिल हैं। ग्रंथावली के संपादक कंवल भारती जी यह स्वीकार करते हैं कि उनकी कुछ कृतियां उन्हें प्राप्त नहीं हो सकीं, जिनमें ‘मानव सृष्टि का विकास’ और ‘बौद्ध धर्म ही सच्चा धर्म’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां भी शामिल हैं।

ग्रंथावली के खंड-2 में ‘संत प्रवर रैदास साहेब’ नाम से संग्रहित किताब में जिज्ञासु जी  विस्तार से रैदास के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हैं। जिसमें संत रैदास के ब्राह्मणीकरण करने की कोशिशों का पर्दाफाश किया है और उनके संदर्भ में प्रचलित असंगत और अतार्किक बातों का खंडन किया है और उन्होंने रैदास को सामाजिक क्रांति के शिक्षक के  रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक 1959 में प्रकाशित हुई थी। सबसे पहले इसी किताब में जिज्ञासु जी ने इस बहुप्रचारित झूठ का पर्दाफाश किया है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवादी रामानंद रैदास के गुरू थे।

ग्रंथावली के खंड-1 में संकलित पहली किताब ‘आदि निवासियों की सभ्यता’ है। निर्विवाद तौर पर जिज्ञासु सी अछूतानंद के आदि हिंदू आंदोलन  की उपज थे। अछूतानंद समस्त शूद्र वर्ग (शूद्र-अतिशूद्र) को भारत का मूल निवासी मानते थे और द्विजों को  विदेशी आर्यों का वंशज। अछूतानंद के आंदोलन में दलित और पिछड़े दोनों हिस्सेदार थे, जिसमें जिज्ञासु जी भी शामिल थे। वे स्वामी अछूतानंद की सभाओं में शामिल होते थे और उसमें भाषण भी देते थे। अछूतानंद और जिज्ञासु जी के बीच के इस वैचारिक रिश्ते को रेखांकित करते हुए कंवल भारती लिखते हैं कि “जिज्ञासु जी ने स्वामी से जी के कार्य को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से ‘भारत के आदि निवासी’ नामक एक वृहद ग्रंथ लिखा था।…यह पूरा ग्रंथ लगभग एक हजार पृष्ठों का था।”(भारतीय कंवल, भूमिका, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-1, पृ.15)। खंड़-1 में समाहित ‘आदि निवासियों की सभ्यता’ इसी किताब का हिस्सा है। इसकी भूमिका बोधानंद ने लिखी है। इसके पांच संस्करण प्रकाशित हुए। इसकी भूमिका में बोधानंद ने लिखा है कि “कितने दुख, परिताप और लज्जा की बात है कि भारत की पिछड़ी और दलित जातियों के पूर्व गौरव का पता देने वाले इतिहास का हिंदी में प्राय: सर्वथा ही अभाव है।…. हमारी यह हार्दिक कामना और आर्शिवाद है कि हमारे भारत के आदि मूल निवासी गण इस उपयोगी पुस्तक (आदि निवासियों की सभ्यता) के यथार्थ मर्म को समझें।” (ग्रंथावली, खंड-1, पृ.39)। 

इस किताब का प्रारंभ जिज्ञासु जी ने अपनी चंद काव्य पंक्तियों से किया है, जो इस तरह हैं-

आदि-निवासी बंधु! लिजिए, यह निज गौरव इतिहास,

आर्य-जाति ने छल-कौशल से जिसका कर दिया था सब नाश।

पढ़िए इसे मिटाकर मन की सब दुर्बलता, भ्रम, तम, त्रास,

हृदय-कमल यह खिला करेगा नवजीवन का दिव्य ‘प्रकाश’ 

                                                       (वही,43)                                

पहले खंड में ही समाहित ‘पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट और पिछड़े वर्ग के वैधानिक अधिकारों का सरकार द्वारा हनन’ इस तथ्य का सबूत है कि पिछड़े वर्ग के हितों की चिंताएं जिज्ञासु जी के सरोकार की केंद्रीय विषय रही हैं। इसका पहला संस्करण 1957 में प्रकाशित हुआ।  इस पुस्तक में जिज्ञासु जी ने 28 जून, 1953 की संविधान की धारा 340 के तहत नियुक्त पिछड़ा वर्ग कमीशन और उसकी रिपोर्ट पर अपनी विस्तृत टिप्पणी दी है। जिसकी अध्यक्षता काका कालेलकर को सौंपी गई थी। इस किताब की भूमिका में बदलूराम रसिक ने इस किताब के संदेश को इन शब्दों व्यक्त किया है “देश की आबादी में हमारी (पिछड़े वर्ग) तादाद 52 प्रतिशत है। लोकशाही शासन में बहुमत की विजय होती है और वह मताधिकार की शक्ति हमारी मुट्ठी में है। आप उठिए, हरिजनों (दलितों) और आदिवासियों को अपने साथ करके अपनी तादाद अस्सी प्रतिशत बनाइए। प्रतिज्ञा कीजिए कि जब तक शोषित, पीड़ित एवं दलित जनता के मानवी अधिकार उसे मिल नहीं जाते, तब तक हम चैन नहीं लेंगे, चाहे हमें कितनी ही कुर्बानी करनी पड़े। आपको याद रखना चाहिए अधिकार छीने जाते हैं, मांगने पर आज तक किसी को नहीं मिले।” (वही, पृ.261)

यह भी पढ़ें : बहुजन समाज को क्या पढ़ना चाहिए

डॉ. आंबेडकर के साहित्य से व्यापक तौर हिंदी समाज को परिचित करने का श्रेय भी जिज्ञासु जी को जाता है। उन्होंने ‘बाबा साहेब का जीवन संघर्ष (संपूर्ण जीवन चरित)’ नाम से उनकी जीवनी लिखी। इसके सोलह संस्करण प्रकाशित हुए। करीब 145 पृष्ठों की इस जीवनी के माध्यम से हिंदी भाषा-भाषी समाज को डॉ. आंबेडकर के जीवन संघर्षों का पता चला। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा जूठन में इस जीवनी का का जिक्र करते कहा कि पहली बार उन्हें इस जीवनी के माध्यम से बाबासाहब के जीवन,संघर्षों और विचारों से परिचय हुआ। इतना ही जिज्ञासु ने आंबेडकर के मूल साहित्य भी अनुवाद कराया। इसमें ‘जाति भेद का उच्छेद’ (1964), ‘अछूत कौन और कैसे’ (1967), ‘शूद्रो की खोज’ (1968) ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया’ (1969), ‘अछूतोें की मुक्ति और गांधी जी’ (1966), ‘भारत में जातिवाद’ (1972) जैसी महत्वपूर्ण किताबें शामिल हैं। उन्होंने 1972 में पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर शीर्षक से उन पर लिखी अंग्रेजी पुस्तक ‘ए पैन पोट्रेट. फिलॉसफी, सोशल रिफार्म एंड सोशल रिव्योल्यूशन’ का अनुवाद भी प्रकाशित कराया।

बहुजन नवजागरण के जनक फुले की तरह चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ भी शूद्रों-अतिशूद्रों (पिछड़े-दलितों) के साथ महिला मुक्ति के भी उतने ही पुरजोर समर्थक थे। इसका प्रमाण उनके द्वारा डॉ. आंबेडकर की महिलाओं के उत्थान और पतन पर लिखी किताब का अनुवाद करना और स्वयं उनके द्वारा ‘नारी जीवन की कहानी’ नाम से लिखी पुस्तिका है। उनकी किताब ‘नारी जीवन की कहानी’ का प्रारंभ ही इस तथ्य के साथ होता है कि आदिम काल में महिला-पुरूष पूरी तरह समान थे और स्त्री पुरूष की दासी नहीं थी। वे लिखते हैं कि “विकासवादी सिद्धांतों का कहना है कि आदिम काल में पुरूष और स्त्रियां दोनों स्वतंत्र थे। कोई किसी के अधीन नहीं था। केवल मैत्री हो जाती थी, किंतु नारी नर की दासी नहीं बनी थी। स्त्री-पुरूष दोनों अपना आहार स्वयं अर्जन करते थे।” (ग्रंथावली, खंड-4, पृ.147) 

आंबेडकर की तरह जिज्ञासु जी भी हिंदू महिलाओं की दासता के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था और ग्रंथों को जिम्मेदार ठहराते हैं और बौद्धकाल को स्त्रियों की स्वतंत्रता के काल के रूप में चिन्हित करते हुए लिखते हैं- “भारतीय इतिहास में केवल बौद्ध-काल और उपनिषद -काल ऐसे समय मिलते हैं,जब स्त्रियों ने राहत की सांस ली। किंतु यह समय केवल पांच सौ वर्षों तक रहा। उसके बाद फिर हिंदू व्यवस्थापकों ने अपने कठोर विधानों और  रंग-बिरंगी मोहक बातों से स्त्रियों को अपनी दासता में जकड़ लिया।” (वही, पृ.149-150)।

बुद्ध की बहुजन अवधारणा को आधुनिक काल में पल्लवित-पुष्पित और विस्तारित करने का श्रेय चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ को जाता है। उन्होंने अपने प्रकाशन का नाम ‘बहुजन कल्याण प्रकाशन’ रखा था। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु के समग्र साहित्य के अवलोकन के आधार पर कहें तो उन्होंने जोतीराव फुले-सावित्रीबाई फुले के बहुजन नवजागरण के उस रूप की हिंदी पट्टी में नींव डाली, जिसमें शूद्र, अतिशूद्र और महिलाएं (बहुजन) एक साथ मिलकर ब्राह्मणवाद से मुक्ति का संघर्ष करते हैं और एक ऐसे समाज की रचना का संकल्प लेते हैं, जिसमें सभी इंसान बराबरी का हक रखते हों। सहज स्वाभाविक है कि इसके लिए वर्ण-जाति व्यवस्था यानि ब्राह्मणवाद का विनाश जरूरी है, जिसका आह्वान चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने किया है। जिसे उन्होंने ब्राह्मणशाही नाम दिया। वे भारत में ब्राह्मणशाही की जगह सच्चे अर्थों में लोकशाही स्थापित करना चाहते थे।

संदर्भ :

1-चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-1 संपादक-कवल भारती, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, 2017

2-चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-2 संपादक-कवल भारती, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, 2017

3-चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-3 संपादक-कवल भारती, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, 2017

4-चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड-4 संपादक-कवल भारती, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, 2017

(संपादन : नवल)

About The Author

One Response

  1. Anil Rangari Reply

Reply