‘जब कभी लोग मेरा अपमान करते हैं, बाबा साहेब को याद कर लेता हूं’

करीब ढाई दशकों से विधायक व वर्तमान में बिहार सरकार में वरिष्ठ मंत्री श्याम रजक बता रहे हैं कि डॉ. आंबेडकर के संघर्षों व विचारों ने उन्हें किस प्रकार संबल दिया है। उनके मुताबिक आज भी लोग जातिसूचक शब्द का उपयोग कर उनका अपमान करते हैं

डॉ. आंबेडकर से मेरा संबंध गर्भनाल जैसा रहा है। मेरी मां रामरती देवी और पिता रीतनारायण लाल रजक  पटना के सब्जीबाग मुहल्ले में रहते थे। वे लोगों के कपड़े धोते और इस्त्री कर घर-घर पहुंचाते। वे बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से प्रभावित थे। वे शिक्षा का महत्व समझते थे। उन्होंने मुझे हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

भारतीय समाज में जड़ता व वर्चस्ववाद को खत्म करने के लिए बाबा साहेब के विचार व उनके द्वारा दिखाया गया रास्ता कितना महत्वपूर्ण हैं, इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मैं सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हुआ। राजनीति के क्षेत्र में मैं भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का सहयोगी रहा। वे हमेशा कहते थे कि बाबा साहेब के विचारों को अपनाकर ही समाज के विभिन्न वर्गों के बीच  विषमता की खाई को खत्म किया जा सकता है। 

चुनावी राजनीति में मेरा प्रवेश 1990 में हुआ। तब लालू प्रसाद जी ने जनता दल के टिकट पर मुझे पटना के फुलवारी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। यह क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। उस समय मैं कांग्रेस उम्मीदवार संजीव प्रसाद टोनी से पराजित हो गया। लेकिन इस पराजय ने मेरे लिए नयी राह प्रशस्त की।

श्याम रजक, उद्योग मंत्री, बिहार सरकार

जब मैं अधिक लोगों के संपर्क में आया तब मैंने देखा कि समाज में किस तरह जातिगत भेदभाव व्याप्त है। सामाजिक स्तर पर इस भेदभाव के अलावा रोजी-रोटी के सवाल भी थे। उन दिनों मैं बाबा साहेब के विचारों को लोगों के बीच ले जाता था और प्रयास करता था कि उनकी समस्याओं को सुनूं व यदि कोई निदान मेरे स्तर से संभव हो तो जरूर करूं। मैं दलित बस्तियों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था। उन दिनों ही लोहानीपुर (पटना का एक इलाका, यहां मेरा पैतृक घर भी है) चौराहे पर मैंने बाबा साहेब की एक प्रतिमा स्थापित करवायी। इसमें वित्तीय सहयोग सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक ने किया। उन दिनों ही तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद मेरे घर भी आए और उन्होंने मेरे अनुरोध पर छह सौ दलित परिवारों के लिए पक्का घर बनवाने का निर्देश जिला प्रशासन को दिया।

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मुझे यह भी स्मरण है कि उन दिनों मैं एक बार बाबा साहेब की जन्मस्थली मध्य प्रदेश के महू भी गया। वहां मैंने वह झोपड़ीनुमा घर देखा, जहां उनका जन्म हुआ था। जब मैं वहां था, मेरे आंखों में आंसू थे। यह संभवत: इसलिए क्योंकि मैं उस स्थान पर था जहां आधुनिक भारत के महान समाज सुधारक ने जन्म लिया था। मेरे लिए यह अहसास ही महत्वपूर्ण था। 

वर्ष 1995 में मैं एक बार फिर चुनाव में खड़ा हुआ और इस बार मुझे जीत मिली। मैं विधायक बन गया। यह मेरे लिए चुनौतियों को अवसर में बदलने का मौका था। मैं हमेशा प्रयास करता कि बाबा साहेब के विचारों को अपनाते हुए जनता के काम आऊं। आज भी मैं यही कर रहा हूं। करीब 25 वर्षों से एक जनप्रतिनिधि के रूप में मैंने विधानसभा में तमाम वंचितों के सवाल उठाए। इसी क्रम में कई दलित बस्तियों में बाबा साहेब की प्रतिमाओं की स्थापना करवायी। हालांकि कुछ जगहों पर विवाद भी हुए। लेकिन मेरा फोकस हमेशा लोगों के बीच यह संदेश देना रहा कि शिक्षा के जरिए ही हम सैंकड़ों वर्षों की कैद से खुद को मुक्त कर सकते हैं। 

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज भी लोग मेरी जाति को लेकर मेरा उपहास करते हैं। वे मुझे “धोबिया” कहते हैं। लेकिन मैं इस अपमान से आहत नहीं होता। जब कभी ऐसा होता है तो मैं बाबा साहेब के द्वारा झेली गई पीड़ा व अपमानों को याद करता हूं और यह भी कि अपमानों के असंख्य घूंट पीकर उन्होंने हमारे लिए संविधान में अधिकार सुनिश्चित किये।

(संपादन : नवल/अमरीश)

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