कोरोना को ‘कोरोनासुर’ बता किनका हित साध रही हिंदी मीडिया?

बीते 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लेख किया। ‘लक्ष्मण रेखा’ मनुवादी शब्दावली का शब्द है। यह स्त्रियों को घर की चारदीवारी के भीतर सीमित कर देता है। हिंदी मीडिया भी पीएम के द्वारा संकेतों में दिए गए आदेश का पालन करने में जुटी है। बता रहे हैं सुशील मानव

अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय हिंदी मीडिया का चरित्र पक्षपाती ही रहा है। खासकर बहुसंख्यक दलित-बहुजनों को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती है। यह वैसे ही काम करती है जैसे कि हिंदू धर्म से जुड़े ग्रंथों में किया गया है। ताजा उदाहरण यह कि कोरोना वायरस जिसने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है, उसे हिंदी मीडिया “कोरोनासुर” के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

गौरतलब है कि हिंदू धर्म ग्रंथों में द्विज वर्ग अपने आपको देव और बहुसंख्यक दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को असुर के रूप में माना जाता है। इसके लिए मनु संहिता भी है जिसके आधार पर भारतीय समाज को चार हिस्से में बांटा गया है। यह विभाजन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में है। आज देश के कई हिस्सों में मूलनिवासियों द्वारा सांस्कृतिक प्रतिवाद के रूप में आंदोलन चलाए जा रहे हैं। मूलनिवासी मानते हैं कि मनु को मानने वाले द्विज उन्हें और उनके पुरखों को असुर यानी राक्षस कहकर अपमानित करते हैं।  

आजतक के ज्योतिष शास्त्र पर आधारित कार्यक्रम “ऐस्ट्रो तक” के दौरान का स्क्रीन शाॅट

‘कोरोनासुर के दहन’ से लेकर ‘कोरोनासुर-मर्दिनी’ तक

न्यूज चैनलों पर इसे किस तरह बढ़ावा दिया जा रहा है, इसका उदाहरण बीते दिनों “आजतक” न्यूज चैनल पर सामने आया। उसने “भारत के हाथों होगा ‘कोरोनासुर’ का वध”, “जनता कर्फ्यू से होगा ‘कोरोनासुर’ पर प्रहार” जैसे हेडलाइन के जरिए खबर चलाए। इतना ही नहीं, कोरोना जिसका इलाज खोजने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिक दिन-रात लगे हैं ताकि मानव समुदाय के जानों की रक्षा हो सके, भारतीय न्यूज हाऊसों में भविष्यवाणी की जा रही है। “आज तक”  न्यूज चैनल के ज्योतिष कार्यक्रम “ऐस्ट्राे तक” में “जानिए कैसे कोरोना का संहार करेंगी माँ शीतला” कार्यक्रम पेश किया। हिंदू मान्यताओं में शीतला को दुर्गा का एक रूप बताया गया है और न्यूज चैनल द्वारा कोरोना को राक्षस के रूप में पेशकर बताया जा रहा है कि यह देवी इसका भी वैसे ही संहार करेगी जैसे “महिषासुर” का किया था। इसके लिए चैनल लोगों को कर्मकांड के लिए प्रेरित करता नजर आया।

मुंबई के वर्ली इलाके में कोरोनासुर की प्रतिमा बनाकर होलिका दहन की तर्ज पर दहन किया गया। (तस्वीर साभार : एएनआई)

बताते चलें कि इस समय देश में चैत्र नवरात्रि भी चल रहा है और यह सर्वविदित है कि दुर्गा को आगे करके धूर्त देवताओं ने असुर राजा की हत्या करवाई और उनके राज्य पर कब्जा कर लिया। दुर्गा देवी को महिषासुर मर्दिनी बताता आया मीडिया अब उसे कोरोना महामारी के संदर्भ से जोड़कर कोरोनासुर मर्दिनी बता रहा है।

इससे पहले होली के अवसर पर कोविड-19 वायरस को “‘कोरोनासुर”’ बताकर होलिका दहन की तर्ज पर “कोरोनासुर का दहन” किया गया। उसका विशालकाय मूर्ति बनाया गया। वर्ली मुंबई के अलावा काशी वाराणसी में भी कोरोनासुर को जलाया गया। मुंबई के वर्ली इलाके में बीते 9 मार्च 2020 को कोरोनासुर का विशाल पुतला बनाकर जलाया गया। मानसिकता देखिए कि पुतले को नीले रंग से रंगा गया। नीले रंग की मूर्ति बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर की बनाई जाती है। इसके अलावा देश की सबसे बड़ी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के झंडे का रंग भी नीला है।  यह सब इस वजह से भी हुआ क्योंकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन जो स्वयं चिकित्सक भी हैं, ने कोरोना वायरस को कोरोनासुर बताते हुए उसके दहन की सार्वजनिक अपील की थी।  

‘लक्ष्मण रेखा’ के बहाने प्रधानमंत्री मोदी ने मनुवादी एजेंडे को आगे बढ़ाया 

बीते 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “लक्ष्मण रेखा” का उल्लेख किया। लक्ष्मण रेखा मनुवादी शब्दावली का शब्द है। जो लैंगिक गैर-बराबरी को बढ़ावा देते हुए स्त्रियों को घर की चारदीवारी के भीतर सीमित कर देता है। प्रधानमंत्री द्वारा लक्ष्मण रेखा शब्दावली के प्रयोग के बाद ये शब्द इन दिनों मीडिया में बहुतायत से इस्तेमाल होने लगा है। कुछ उदाहरण देखें –

टेलीविजन धारावाहिक “रामायण” में लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले सुनील लहरी के हवाले से नवभारत टाइम्स ने हेडलाइन बनाया :  “सतयुग में लक्षमण रेखा पार करने से बढ़ी मुसीबत, आप मत क्रास करें कोरोना लाइन”।

आजतक न्यूज चैनल द्वारा चलाए जा रही एक खबर का स्क्रीन शॉट

इसके अलावा दैनिक भास्कर की 29 मार्च के अंक में एक खबर प्रकाशित किया गया। इसका शीर्षक था – “कोरोना राक्षस से संसार काे बचाने के लिए श्रद्धालुओं ने रखा उपवास”।

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बहरहाल, यह सब उदाहरण इस बात के हैं कि कैसे आज इक्कीसवीं सदी दूसरे के दशक के अंत में भी भारत में कर्मकांड, पाखंड और अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर तौर पर यह बेवजह नहीं है। इन प्रयासों से द्विज वर्ग पहले भी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वर्चस्व बनाए रखते थे और आज भी उनकी मंशा यही है।

(संपादन : नवल/गोल्डी)

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