क्या जन्मजात ‘जर्म प्रूफ’ होते हैं सफाई कर्मी और इस कारण कोरोना के मुंह में धकेले जा रहे?

सफाईकर्मी स्वास्थ्यकर्मियों की तरह भले ही संक्रमित मरीजों के संपर्क में सीधे न आते हों, लेकिन वे उनके अपशिष्टों के संपर्क में तो आते ही हैं। उनके भी संक्रमित होने का उतना ही जोखिम रहता है जितना कि किसी स्वास्थ्यकर्मी के। लेकिन भारत में सफाईकर्मी हाशिए पर हैं। उनकी जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। सुशील मानव की रिपोर्ट

क्या भारत के दलित-बहुजन जन्मजात “जर्म प्रूफ” होते हैं कि उन्हें कोरोना जैसी भयंकर महामारी से कोई खतरा नहीं है। वैज्ञानिक और चिकित्सक चाहे भले ही अलग राय रखते हों लेकिन सरकारी तंत्र यही मानकर चल रहा है। यही वजह है कि सफाईकर्मियों को कोरोना के मुंह में धकेला जा रहा है। मसलन उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर निगम में कार्यरत सफाईकर्मी प्रदीप कुमार यादव बताते हैं कि “सफाई के इस काम में कथित सवर्ण जातियों के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हैं। अतः सफाई के इस काम को हीन और घृणा के भाव से देखा जाता है। हमें उन अस्पतालों और इमारतों के कूड़े-कचरे का भी निपटारा करना होता है, जहां संक्रमित मरीज और क्वारेंटाइन और आइसोलेट करके लोगों को रखा गया है।लेकिन हमारी अपनी सुरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।” 

दरअसल प्रदीप यादव के सवाल बेमानी नहीं हैं। बीते 2 अप्रैल को ही मुंबई वृहतर नगरपालिका में काम करने वाले 52 वर्षीय सफाईकर्मी को कोविड-19 संक्रमित पाया गया है। वो वर्ली के निवासी हैं और उनकी पोस्टिंग धारावी में थी। उनके कोविड-19 पोजिटिव होने की पुष्टि के बाद उनके परिवार के और सहकर्मियों समेत 23 लोगो को क्वारंटाइन किया गया है। मुंबई के धारावी में ही बीते बुधवार को एक व्यक्ति की कोविड-19 से मौत हो गई थी। वहीं उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिला के हथगाम ब्लॉक के आलीमऊ गांव का रहने वाले संदीप वाल्मिकी कौशाम्बी जिले के सिराथू नगर पंचायत में ठेकेदारी में सफाई मजदूर के रूप में काम कार्यरत था। बीते 23 मार्च को कोरोना वायरस जैसी महामारी से आम लोगों को बचाने के लिए ग्लब्स और मास्क जैसे जरूरी संसाधनों के अभाव में भी कीटनाशक दवा के घोल का छिड़काव करते वक्त उनकी मौत हो गई।

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संदीप वाल्मिकी की मौत के बाद जागा सरकारी तंत्र। पार्थिव शरीर को दी गयी सलामी

 मृतक संदीप के साथ काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि छिड़काव के वक्त जहरीली दवा सांस के जरिए उसके शरीर में प्रवेश कर गई और वह छिड़काव करते-करते बेहोश होकर गिर पड़े। साथियों ने संदीप को हॉस्पिटल में एडमिट कराया लेकिन वहां उनकी मौत हो गई। संदीप के परिवार में उनकी पत्नी और दो बच्चे हैं। सरकारी तंत्र सफाईकर्मियों के प्रति किस कदर लापरवाह है, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकात है कि संदीप की मौत के बाद जब स्थानीय पत्रकारों ने सिराथू के एसडीएम राजेश श्रीवास्तव से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि वे कोरोना में बिजी है, फालतू बातों के लिए टाइम नहीं है।

क्या कोरोना महामारी जैसे खतरे के समय आप लोगों को साफ-सफाई के समय बरती जाने वाली एहतियात को लेकर कोई विशेष ट्रेनिंग दी गई? पूछने पर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर निगम में कार्यरत सफाईकर्मी प्रदीप बताते हैं कि- “नहीं, इस तरह की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई है हमें। हम लोगों को आदेश दिया गया है कि लॉकडाउन तक छुट्टी नहीं करना है। रोज सामान्य समय से एकाध घंटा ज़्यादा काम करना पड़ता है। लेकिन इसके एवज में अतिरिक्त भुगतान भी नहीं किया जाता है।”

सफाईकर्मियों के लिए क्या ज़रूरी नहीं है ‘प्रोफाइलेक्सिस’?

सफाईकर्मी स्वास्थ्यकर्मियों की तरह भले ही संक्रमित मरीजों के संपर्क में सीधे न आते हों, लेकिन वे उनके अपशिष्टों के संपर्क में तो आते ही हैं। उनके भी संक्रमित होने का उतना ही जोखिम रहता है जितना कि किसी स्वास्थ्यकर्मी के। लेकिन भारत में स्वास्थ्यकर्मियों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है जबकि सफाईकर्मियों के लिए ऐसी कोई सलाह या उपाय नहीं किया गया है। इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से अस्पतालों के लिए 23 मार्च को एक एडवाइजरी जारी करके कहा गया था कि – “हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन दवाई का प्रयोग प्रोफाइलेक्सिस के तौर पर किया जा सकता है।”

कोरोना का खौफ और हाशिए पर सफाईकर्मी

बता दें कि किसी बीमारी से बचाव के लिए जो दवा इस्तेमाल की जाती है उसे ‘प्रोफाइलेक्सिस’ कहा जाता है। बता दें कि कुछ लैब में कोरोनावायरस को लेकर हुए परीक्षणों के बाद हाईड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन को कोविड-19 की रोकथाम के लिए मददगार पाया गया है। 

दिल्ली में भी हाशिए पर सफाईकर्मी

क्या इस महामारी के दौरान सफाईकर्मियों का चेकअप किया गया है पूछने पर नई दिल्ली नगर पालिका में कार्यरत सफाईकर्मी सीमा बताती हैं कि कोई चेकअप नहीं हुआ है। वहीं दिल्ली सफाई कर्मचारी एसोसिएशन अध्यक्ष संजय गहलोत के मुताबिक दिल्ली में 50,000 से ज़्यादा सफाईकर्मी हैं, ऐसे में उन्हें कोविड-19 इन्फेक्शन का सबसे ज़्यादा ख़तरा है। लेकिन दिल्ली नगर निगम उन्हें किसी तरह की सहूलियत नहीं दे रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आधे मार्च तक न हमें मास्क दिया गया था न दस्ताने। कर्मचारियों ने खुले हाथों से कूड़े उठाए हैं। 

ज़रूरत के सामानों को लेकर आंदोलन 

लेकिन सफाई कर्मियों की सुविधाओं को लेकर सरकारें गंभीरता नहीं दिखा रही हैं। एक उदाहरण हरियाणा का है। फरीदाबाद के 3200 सपाईकर्मियों और 294 सीवरमेन (गंदे नालों में उतरकर सफाई करने वालों) ने सैनेटाइजर, हाथ धोने का साबुन, दस्ताने और मास्क आदि की मांग को लेकर 18 मार्च को आंदोलन करने की धमकी दी थी। इस संबंध में सफाई कर्मियों के संगठन के राज्य प्रधान नरेश कुमार शास्त्री का कहना है कि सरकार द्वारा दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। जबकि नगरपालिका कर्मचारी संघ द्वारा 6 मार्च को सरकार व सभी निगम आयुक्तों, कार्यकारी अधिकारियों व पालिका सचिवों को पत्र लिखकर प्रदेश के सभी सफाई कर्मचारियों व सीवर में उतरकर काम करने वालों को कोरोना वायरस से बचाव के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध करवाने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने अभी तक उपलब्ध नहीं करवाए हैं। सरकार की अनदेखी के चलते प्रदेश के सफाई कर्मचारियों में दहशत का माहौल बना हुआ है। 

(संपादन : नवल/अनिल)

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