रेणु साहित्य : द्विज अस्मिता के विपरीत शोषितों-पीड़िताें की अस्मिता

अनंत बता रहे हैं फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में शामिल देशज अस्मिता के बारे में। उनके मुताबिक, यह देशज अस्मिता द्विजों की रची-गढ़ी अस्मिता के विपरीत थी। यही वजह रही कि रेणु के साहित्य में यथार्थ का खुरदुरापन साफ तौर पर दिखता है

[हिंदी साहित्य में दलित-बहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को प्रभु वर्गों/द्विजों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। इसके बावजूद रेणु ने बिना किसी की परवाह किए कई विषयों को व्यापक विस्तार दिया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। इस कड़ी में पढ़ें अनंत का लेख]

फणीश्वरनाथ रेणु (4 मार्च, 1921 – 11 अप्रैल, 1977) 

हिंदी साहित्य में आंचलिकता के जनक फणीश्वरनाथ रेणु देशज दुनिया में बसे देशज समाज के पैरोकारों की अग्रणी पंक्ति में रहे। इनकी रचनाओं में देशज समाज की असमानता, असंगतियां, सामाजिक-राजनीतिक चेतना, देशज माटी से जुड़े जन-सवाल, जन-संस्कृति और जन-आन्दोलन आदि जनभाषा में जीवंत हुए है। कोसी अंचल के सूक्ष्म विश्लेषण से परिपूर्ण रेणु का साहित्य लोक से गहरे जुड़ाव का जीवंत प्रमाण है। कई जनपदों में विभक्त स्थानीय माटी की सांस्कृतिक विशिष्टता से देशज जनजीवन का आत्मीय संबंध होता है। इसी देशज चेतना से जनपदीय अस्मिताएं लैस रहती हैं। 

रेणु ने भारत भूमि पर स्थित पूर्णिया अंचल की माटी से मानव जीवन के भावनात्मक संबंधों का ऐसा शब्दचित्र उकेरा कि कोसी की माटी, रेणु माटी का पर्याय बन गयी। दूसरे शब्दों में कहें तो देशज जीवन से देशज माटी और देशज संस्कृति के गहरे रागात्मक रिश्तों का गद्यात्मक शैली में लिखा गया जीवन-गीत है – “रेणु साहित्य”। 

गीतों की गोद में पले गद्यकार रेणु ने धूल-धूसरित और कीचड़-युक्त माटी में उपजे फूल और शूल की अनुभूतियों को साहित्य में पिरोकर अंचल के जीवन और उसकी संस्कृति को जीवंत किया है। रेणु के कर्म और शब्द का भावनात्मक संबंध कोसी के कछार पर बसे पूर्णिया की माटी से है। इस धरा पर बसे समाज, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, संवदेना, बोली, भाषा, मुहावरा और देशज पात्रों के अलावा प्राकृतिक विपदा (बाढ़, सुखाड़, अकाल) आदि के दंश को रेणु ने अपने साहित्य में दर्ज किया है। कोसी के दुःख-दर्द को रेणु ने भोगा और भोगे हुए सत्य से उत्पन्न संवेदना के देशज शब्दों का शिल्पगत प्रयोग कर अद्भुत रचनाएं कीं। कोसी के सरोकारों का ऐसा शब्द-शिल्प निर्मित किया, जो देशज अस्मिता का पहला दस्तावेज बन गया।

4 मार्च 1921 को पूर्णिया जिले के फारबिसंगज प्रखंड के औराही हिंगना गांव (वर्तमान में अररिया जिला) के संपन्न किसान परिवार में जन्मे रेणु ने बदलते वैश्विक फ़िज़ां के बीच साहित्य लेखन शुरू किया। पहली कहानी “बटबाबा” (1945 में विश्वामित्र साप्ताहिक अखबार में) और पहला रिपोर्ताज “विदापत नाच” (1945) से शुरू हुआ रेणु का सृजनात्मक सफर “मैला आँचल” (1954) और “परती परिकथा” (1957) तक जैसे ही पहुंचा, हिन्दी साहित्य लोकरंगों में रंग गया। लोकजीवन के गीतों से सजा अंचल हिन्दी साहित्य में पहली बार जीवंत हुआ। हिन्दी साहित्य का दामन ग्रामीण संस्कृति के गंध से दमकने लगा। स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नयी पहचान मिली। अंचल की लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय व वैश्विक पहचान मिली। रेणु की भी ग्राम्य जीवन-संघर्ष और संस्कृति के गीतों को गाते हुए लेखक के रूप में विशिष्ट पहचान बनी। 

फणीश्वरनाथ रेणु (4 मार्च, 1921 – 11 अप्रैल, 1977) व उनकी कुछ किताबों के कवर पृष्ठ

रेणु सच्चे मायने में देहाती दुनिया के गाते हुए कलमकार हैं। जैसा कि लोकगीत के बारे में रेणु ने लिखा है – “हर मौसम में मेरे मन के कोने में उस ऋतु के लोकगीत गूंजने लगते हैं।” (रेणु रचनावली, राजकमल प्रकाशन)  रेणु की इसी विशिष्टता ने हिन्दी कथा साहित्य जगत को ग्रामीण परिवेश और देशज अस्मिता की बहुरंगी छटा से परिचित कराया। 

रेणु का साहित्य और प्रेमचंद का साहित्य

हिन्दी साहित्य के लिए गांव, किसान, खेत-खलिहान का चित्रण कोई नया नहीं था। प्रेमचंद और कन्हैया लाल वर्मा सरीखे रचनाकारों की रचना के केन्द्र में भी गांव ही था। ग्राम्य जीवन की कथा लिखकर ही प्रेमचन्द कथा-सम्राट बने थे। प्रेमचंद की ग्रामीण परिकल्पना से इतर अंचल की नयी स्थापना लेकर रेणु, साहित्य जगत में आये। रेणु साहित्य में सिर्फ गांव नहीं, बल्कि संपूर्ण ग्रामीण परिदृश्य जीवंत हुआ। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो रेणु ने हिन्दी साहित्य में स्थापित प्रेमचंदीय ढांचे को विस्तारित कर अपना विशिष्ट आंचलिक धरातल तैयार किया। “मैला आँचल” को प्रेमचंद की परंपरा से अलग रखते हुए “कलाकार की कसौटी” नामक साक्षात्कार में रेणु ने कहा है “सही मायने में प्रेमचंद की परंपरा को फिर से बलचनमा नेे ही अपनाया है।” 

प्रेमचंदीय ढांचे से अलग और टटका कथा साहित्य लेकर आने की वजह से ही रेणु को विशेष पहचान मिली है। दरअसल रेणु के गांव व अंचल की अपनी विशिष्टता है। प्रेमचंद के गांव की तुलना में रेणु का गांव या ग्रामीण परिवेश व अंचल अधिक जीवंत और लोकरंगों में रंगा है। प्रेमचंद और रेणु; दोनों ग्रामीण परिवेश के ही रचनाकार हैं, पर ग्रामीण परिवेश व ग्रामीण समाज और उसके जीवन-संघर्ष तथा उसे देखने का नजरिया अलग है। दोनों का कालखंड भी अलग-अलग है और उस कालखंड में सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां भी अलग-अलग थीं, जिसका प्रभाव रेणु और प्रेमचंद के पात्रों में भी देखने को मिलता है। प्रेमचंद गांव का मुआयना कर लौट आते हैं, पर रेणु ग्रामीण जीवन में रच बस जाते हैं। प्रेमचंद की छवि ग्रामीण द्रष्टा की बनती है तो रेणु ग्रामीण चितेरा बनकर उभरते हैं। जनसंघर्ष से पैदा हुए रेणु के पास चिंतन और व्यावहारिक दोनों अनुभव हैं। प्रेमचंद के पास चिंतन तो है, पर जनसंघर्ष के अनुभव का अभाव है। दोनों श्रम संस्कृति के पैरोकार हैं, फिर भी अभिव्यक्तियों में अंतर है। प्रेमचंद शब्द श्रमिक हैं, तो रेणु खालिस “शब्दों के किसान”। 

रेणु के लेखन में ग्राम्य सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन

लेखकीय प्रतिबद्धता के बावजूद रेणु का सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन अलग नहीं था। अपनी चिट्ठियों में भी खेत-खलिहान, गांव-समाज का हाल-चाल लेने में व्यस्त दिखते हैं। पटना से गांव पहुंचते ही रेणु गांव में रच-बस जाते थे। समाज में व्याप्त गरीबी, भूख, अंधविश्वास और रूढ़ियों से साक्षात्कार करते हैं। गांव को रेणु मानवीय दृष्टिकोण से देखते हैं। आलोचनात्मक और कलावादी दृष्टि से देखकर ग्रामीण समाज की नियति पर हाय-हाय करके कलेजा पीटने वाले लेखकों से बिलकुल अलग हैं रेणु।

ग्राम्य जीवन में घुले-मिले रेणु का असर उनकी रचनाओं में प्रतिबिंबितहोता है। बिरहा, प्राती, समदौन, फगुआ, बटगमन, बारहमासा, जोगीरा, नेपाली गीत झोरे, बंगला गीत बाउल के अलावा लोरिक, बिज्जेभान, सदाब्रिज और बिदापत नाच आदि के माध्यम से ग्रामीण समाज के रीति-रिवाज, रहन-सहन, के साथ-साथ प्रवृत्ति और संस्कृति का चित्रण कर रेणु ग्रामीण परिदृश्य की बहुरंगी छटा उकेरते हैं। लोकसंस्कृति में डूबे रेणु के साहित्य में ग्रामीण अंचल सुर, ताल और लय से कदमताल करता है। ग्रामीण अंचल की जीवंतता ही पाठकों की संवेदना को जगाती है। मानव मन की जागृत संवेदना ही ग्रामीण जन-जीवन और उसके परिदृश्य से साक्षात्कार करती है। 

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रेणु के जीवंत कथा अंचल के पात्र भी कर्मठ, स्वाभिमानी और संघर्षशील हैं। गरीब, दमित और पिछड़े धरातल के पात्रों की अस्मिता की अपनी-अपनी विशिष्टताएं भी हैं। कालीचरण, बावनदास, सिरचन, गनपत, हरगोबिन, लक्ष्मी दासिन सहित कई पात्र देशज अस्मिता के जीवंत और प्रमाणिक पात्र हैं। रेणु कथा साहित्य में स्थानीय रंग का प्रभाव इतना अधिक है कि अंचल के घटाटोप में विशिष्ट पात्रों का नायकत्व भी घुल-मिल जाता है। इसलिये रेणु के उपन्यासों का नायक कोई पात्र नहीं, बल्कि परिेवेश या अंचल ही है। रेणु साहित्य व्यष्टि से समष्टि की ओर कदम बढ़ाता हुआ दिखता है।

आप देखेंगे कि अंचल प्रधान रेणु साहित्य के अंचल का फलक मेरीगंज और परानपुर तक सीमित नहीं है। रेणु के शब्दों और कर्र्मों का गहरा संबंध नेपाल से भी है। “नेपाल मेरी सॉनोआमां” रेणु की भावनात्मक अभिव्यक्ति का प्रमाण है। सच कहें तो भारत भूमि पर फणीश्वरनाथ मंडल या फनेशरा या रिनवा का जन्म हुआ था। रेणु नाम तो इनके “दोस्तबाप” नेपाल निवासी कृष्णा प्रसाद कोइराला (मित्र व नेपाल के भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला व गिरिजा प्रसाद कोइराला के पिता) ने दिया था। 

रेणु के कर्मक्षेत्र का यथार्थ

रेणु जितने भारत के हैं, उतने ही नेपाल के भी। रेणु का कर्मक्षेत्र भारत-भूमि के पूर्णिया अचंल से लेकर सरहद के उस पार तक फैला है। रेणु का देशज यथार्थवाद और उसक़ी अस्मिता महज जनपदीय नहीं बल्कि वैश्विक है। रेणु का साहित्यांचल भी पूर्णिया से लेकर नेपाली क्रांति कथा की कथा-भूमि तक फैला है। भौगोलिक दृष्टि से यह परिक्षेत्र कोसी के कछार से लेकर कोसी की उद्गम स्थली नेपाल तक फैला है। रेणु की आंचलिकता सरहद के उस पार बसे समाज की संस्कृति को भी अपने आगोश में समेटती है, जो रेणु की आंचलिकता को ग्लोबल दुनिया का सशक्त प्रतिनिधि बनाती है। 

दरअसल रेणु की देशज अस्मिता के केन्द्र में मानवीय संवेदना और वृहत्तर मानवीय विकास तथा सांस्कृतिक सद्भावना की परिकल्पना है। यह परिकल्पना भारत-नेपाल मैत्री संबंध की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। सच तो यह भी है कि रेणु का अंचल अत्यंत ही नायाब है। आंचलिक साहित्य के लिए अंचल की विशिष्टता के संदर्भ में रेणु ने लिखा है:- “आंचलिक साहित्य पैदा करने की सबसे अधिक ताकत बंगाल की बीरभूम और बिहार के पूर्णिया जिले की माटी में है।” रेणु के इस दावे पर आलोचक इससे असहमति रख सकते हैं, पर अन्तरराष्ट्रीय मैत्री संबंध में रेणु की आंचलिकता और उनके आंचलिक साहित्य की महत्ता को नकार नहीं सकते हैं।

हिंदी साहित्य में नया दौर

आंचलिकता में वैश्विकता का पुट देनेवाले रेणु ने “मैला आँचल” को “आंचलिक” घोषित क्यों किया? इस संदर्भ में भोले-भाले हीरामन की तरह रेणु ने लोठार लुत्से से कहा है:- “मैने जो शब्दों का इस्तेमाल किया, जैसी भाषा लिखी, क्या पता लोग कबूल करेंगे या नहीं करेंगे – इसलिए मैंने उसे आंचलिक उपन्यास कह दिया।”

वह दौर खड़ी बोली हिन्दी का था। हिन्दी-हिन्दुस्तान का नारा भी बुलंद हो रहा था। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे ने भी भाषाई पर्यावरण को रूढ़ बना रखा था। ऐसे दौर में रेणु ने नेपाल और वर्तमान बांगलादेश की सीमा पर बसे भारतीय अंचल के देशज समाज की देशज भाषा में साहित्य लेखन का फैसला किया। रेणु के जोखिम भरे इस फैसले में छुपी थी – स्थानीय समस्या, देशज अस्मिता और उसकी चेतना। अस्मिता विमर्श को स्वत्व के नजरिये से देखने वाले आलोचक नामवर सिंह मानते हैं कि रेणु जैसे आंचलिक लेखकों ने “आंचलिक प्रयोगों के नाम पर भाषा पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।” 28 फरवरी, 2011 को दिये उनके इस बयान पर हिन्दी समाज की चुप्पी बताती है कि रेणु का भय गैरवाजिब नहीं था। जबकि सच यह है कि रेणु की देशज भाषा और शिल्प से हिन्दी भाषा का रूप-स्वरूप आधुनिक हुआ है। 

ग्राम्य जीवन और श्रम-संस्कृति के शब्दों ने हिन्दी को प्रगतिशील बनाया है और भाषाई गत्यावरोध को दूर किया है। रेणु के शब्द और उनकी भाषा से हिन्दी लचीली हुई है। रेणु की हिन्दी जनमानस की हिन्दी है। रेणु की हिन्दी का स्वरूप खड़ी बोली हिन्दी की अपेक्षा अधिक जनवादी है। इससे हिन्दी के साम्प्रदायीकरण की प्रक्रिया पर भी अंकुश लगा है। हिन्दी भाषा को हिन्दू हिन्दुस्तान के नारों से जोड़ने के दौर में रेणु की भाषा का विशेष महत्व है। 

रेणु के विशिष्ट अंचल की भाषा भी बहुभाषिक है। रेणु अंचल के ग्रामीणों की बोली पंचमेली है। स्थानीय लोग इस देशज भाषा को “ठेंठी बोली” भी कहते हैं। इस अनगढ़ बोली में मैथिली, अंगिका, मगही, भोजपुरी, बज्जिका, नेपाली, सुरजापुरी और बांग्ला का मिश्रण है। यहां के ग्रामीण अंग्रेजी शब्दों का देशजीकरण कर प्रयोग में लाते हैं। देशज अंग्रेजी भी पंचमेली भाषा में घुल-मिल जाती है। जैसे टीसन, निसपिटर, भैंसचरमन, सुशलिंग आदि। रेणु अंचल के वायसी प्रखंड से लेकर किशनगंज तक सुरजापुरी बोली का प्रभाव है। भागलपुर से सटे इलाके में अंगिका, तो नेपाल से सटे जोगबनी के इलाके में नेपाली भाषा का प्रभाव पंचमेली बोली की खूबसूरती को बढ़ाती है। रेणु ने पंचमेली या ठेठी भाषा में व्याप्त व्याकरणिक दोष को दूर कर ध्वनियों के अनुसार नयी वर्तनी और शब्दावली तैयार की है। संवेदनाओं के धरातल पर देशज शब्दों का शिल्पगत प्रयोग कर हिन्दी लेखन की नयी शैली को विकसित किया है। 

रेणु अपनी भाषा और शैली का उतरोत्तर विकास करते हुए दिखते हैं। “मैला आँचल” की अपेक्षा “परती परिकथा” की भाषा ज्यादा समृद्ध है। रेणु की भाषाई समृद्धि में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का पुट भी देखने को मिलता है। रेणु न तो खड़ी बोली हिन्दी लिखते हैं, और न ही गंवई हिन्दी। रेणु की हिन्दी में देशज दुनिया की बोलियों का मिश्रण है, इसे देशज हिन्दी कहना श्रेयस्कर होगा। जैसा कि कैथरीन हैनसन लिखती हैं – “रेणु ने नयी साहित्यिक भाषा ईजाद की, जिसने विस्मृत बोलियों के रूपों को पुनर्जीवित किया, स्थानीय उच्चारण के अनुसार वर्तनी लिखी और ग्राम्य भाषा के लय और नाटकीयता को पुनः उभारा… इन वृहत नवोन्मेष के जरिये रेणु पाठक को गांव में खींच लाते हैं।”

रेणु की देशज हिन्दी ने खड़ी बोली हिन्दी को ही अपने में परिनिष्ठ कर लिया है। आज रेणु की हिन्दी सिर्फ राष्ट्रीय नहीं वैश्विक स्तर पर सम्मानित है। देशज हिन्दी ही रचनाकार रेणु की ताकत है और इनकी विशिष्टता की पहचान भी। ऐसे ही प्रतिभा के धनी ग्रामीण चितेरे भिखारी ठाकुर भी हैं। रेणु ने देशज हिन्दी को ख्याति दिलायी तो भिखारी ठाकुर ने “भोजपुरी” को। 

शेक्सपियर भी आंचलिक भाषा की ही उपज हैं। अंग्रेजी गुजरे जमाने में लोकभाषा थी। शेक्सपियर ने लैटिन भाषा के साम्राज्य के विपरीत यूरोप की आंचलिक भाषा अंग्रेजी में लेखन करना पसंद किया था। आंचलिक भाषा को स्थापित करने का श्रेय भिखारी ठाकुर, रेणु और शेक्सपियर को है। हिन्दी साहित्य में आंचलिकता की शुरुआत भले ही रेणु से मानी जाती हो, लेकिन इसकी प्रवृत्तियां तो पहले से विद्यमान थीं। विद्यापति, सूरदास, तुलसी, कबीर जैसे कवियों की भाषा में भी आंचलिक शब्दों एवं भाषा का समावेश है। इन कवियों में कबीर की भाषा से देशज समाज ज्यादा प्रभावित है। कबीर की तरह रेणु की भाषा भी कचराही और देशज समाज की भाषा है; जिसे रेणु ने शास्त्राीयता के साथ साहित्य में पिरोया है। 

ऐसे में रेणु पर हिन्दी भाषा पर नकारात्मक प्रभाव डालने का आरोप कितना उचित है? आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, पर रेणु की भाषा का जज्बा और जज्बात देशज जन से जुड़ा है। रेणु सच्चे मायने में जनभाषा के रचनाकार हैं। इनकी भाषा में कई अंचलों की बोलियों का समावेश है। रेणु साहित्य में वर्णित बहुभाषिकता को समझने के लिए हम मेरीगंज और परानपुर के समाज में प्रयुक्त हुई विभिन्न बोलियों पर दृष्टिपात करते हैं – 

“मैला आँचल” से उदाहरण देखिए :

भोजपुरी – “अरे! ई तो दस आदमी के काम बा।”
मैथिली – “चाह पीयै ले बजबै छथिन दाय…नींचाँ! चलो”
अंगिका – “पुरैनिया जिला में कंबल के नीचे भी घुसकर ससुरे मच्छर कटे है हो।”
मगही – “रानीगंज के तीन गो मुरती तो आज सात दिन से धरना देले हथुन।”
बंगला – “तुमि जाओ! आमार जनये भेबो ना। ओई द्याखो, भगवान आमार काछे निजय ऐसे गेछेन।”

 “परती परिकथा” में :

अंगिका – “देखबो तोहर अंडा। खूब सेबो अंडा।”
नेपाली – “पानी मा भ्गुते हेरेर कॉऊ – कॉऊ कराउॅ छ मीत।”
बंगला – “आमार चोख बुझी कॉटा?”
मैथिली – “मालकिन, दुलहा बाबू आबिगेल।”
भोजपुरी – “फिलिंग रिकार्ड हो रहल बा।”
मगही – “कत्ते तनखा मिलै हको।”

रेणु साहित्य अंचल की बोली, भाषा व संस्कृति को जीवंत रखने की जिजीविषा का प्रतीक है। रेणु ने “बात-बोलेगी” टिप्पणी में लिखा है- “सूक्ष्मता से देखना और पहचानना साहित्यकार का कर्तव्य है। परिवेश से ऐसे ही सूक्ष्म लगाव का सम्बंध साहित्य से अपेक्षित है।” दरअसल रेणु का संपूर्ण साहित्य सूक्ष्म पर्यवेक्षण से संपन्न है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि भाषाई बहुभाषिकता भी आंचलिकता का पर्याय तो नहीं है? रेणु की आंचलिकता अंचल की सीमाओं को तोड़ देशज दुनिया व देशज समाज को अपने आगोश में समेटती है। 

क्या हिन्दी आलोचना ने कभी रेणु की आंचलिकता को व्यापक नजरिये से देखा है? आलोचकों की रूढ़ आलोचकीय दृष्टि से क्षुब्ध रेणु ने जर्मन विद्वान लोठार लुत्से से बातचीत में कहा- “मैला आँचल को आंचलिक कहने का पाप मैंने ही किया है।” रेणु की यह अभिव्यक्ति हिन्दी आलोचना को कठघरे में खड़ा कर देती है। “मैला आँचल” की भूमिका में रेणु ने लिखा था – “मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास।” “मैला आंचल” में रेणु ने मेरीगंज अंचल को भारतीय ग्रामीण परिवेश का प्रतीक मानकर समकालीन यथार्थ का चित्रण किया है। “रेणु रचनावली” में प्रकाशित रेणु के साथ बातचीत में रेणु ने आंचलिक और आंचलिकता के सम्बंध में जवाब देते हुए कहा है – “जिसकी समस्याओं को सामाजिक दृष्टिकोण से रेखांकित किया जा सकता हो, हालांकि उसमें शिल्प भावना के साथ परिवर्तित युग परिस्थिति के फलस्वरूप जीवन-बोध में जो परिणाम आता है, उसका चित्रांकन किया जा सकता है।” रेणु की इस मौलिकता को हिन्दी साहित्य में नयी प्रवृत्ति मानी गयी।

संदर्भ:

रेणु, फणीश्वरनाथ. (1954). मैला आँचल. पटना: समता प्रकाशन.

रेणु, फणीश्वरनाथ. (1957). परती परिकथा. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन

रेणु, फणीश्वरनाथ. (2007). रेणु रचनावली. नई दिल्ली: राजकमल.

हैनसन, कैथरीन. (1982). द राईटिंग्स ऑफ़ फणीश्वरनाथ रेणु. जर्नल ऑफ़ साउथ एशियन लिटरेचर. वॉल्यूम 17, क्रमांक 2, पृष्ठ 1-4.

रंजन, प्रभात. (2011). क्या रेणु ने भाषा में आंचलिकता की छौंक अधिक लगा दी? जानकी पुल, 2 मार्च. 23 अप्रैल 2020 को प्राप्त हुआ https://www.jankipul.com/2011/03/blog-post-8.html

लुत्से, लोठार. (1985). फणीश्वरनाथ रेणु: डायलॉग विथ लोठार लुत्से.[अंग्रेजी] पाए जाते है लोठार लुत्से हिंदी रईटिंग्स इन पोस्ट-कोलोनिअल इंडिया. जयपुर: मनोहर 121-129, 23 अप्रैल 2020 को प्राप्त हुआ https://web.archive.org/web/20080516094010/http://www.museindia.com/showcont.asp?id=247

(संपादन : नवल/गोल्डी)

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