भारत के शूद्र द्विजों से कब कहेंगे, ‘अपना घुटना हमारी गर्दन से हटाओ’?

अमेरिका में अश्वेतों के आंदोलन की परिस्थितियों व इसका भारत के संदर्भ में विश्लेषण कर रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप। उनके मुताबिक, भारत में छह हजार से ऊपर जातियां और उपजातियां हैं। वे एक जगह न होकर, छोटे-छोटे समूहों में पूरे देश में यहां-वहां बिखरी हुई हैं। इसलिए बड़ी आबादी होने के बावजूद वे कोई प्रभावी और परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पातीं

अमेरिका में अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लॉयड की पुलिस कस्टडी में निर्मम हत्या पर आक्रोश ऐसा बढ़ा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस में बने बंकर में शरण लेनी पड़ी। जनाक्रोश के भय से वहां की सारी बत्तियां बुझा दी गई थीं। दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति जनशक्ति के आगे बेबस सिद्ध हुआ। यह अमेरिका के इतिहास की खास घटना थी। खास इसलिए कि एक पुलिस अधिकारी की बर्बरता के विरोध में, पूरा अमेरिका आज भी उबल रहा है। विरोध प्रदर्शन में श्वेत, अश्वेत दोनों साथ हैं। सत्ता के दमन और अत्याचार से मुक्ति के लिए उनका नारा है—‘अपना घुटना हमारी गर्दन से हटाओ।’ लेकिन भारत के संदर्भ में जब हम इसका आकलन करते हैं तो फिलहाल निराशा ही हाथ लगती है। 

क्या थी घटना?

घटना 25 मई 2020, को देर शाम करीब 8 बजे की है। मीनियापोलिस पुलिस विभाग के अधिकारी डेरिक चाउविन ने 46 वर्षीय अश्वेत जार्ज फ्लॉयड को जमीन पर गिरा दिया। फिर उसकी गर्दन को अपने घुटनों के नीचे लगभग 9 मिनट तक दबाए रखा। इतनी बुरी तरह कि फ्लॉयड की सांस घुटने लगी। चाउविन के साथ तीन पुलिस अधिकारी और भी थे। उनमें से दो फ्लॉयड को दबोचे हुए थे। उनका चौथा साथी आसपास जमा होते लोगों को दूर हटाने की कोशिश कर रहा था।1 फ्लॉयड की हालत देख कुछ लोगों ने पुलिस अधिकारी को चेताया कि उसकी हालत खराब हो चुकी है। शरीर ठंडा पड़ता जा रहा है। घुटती सांसों के बीच स्वयं जार्ज फ्लॉयड बार-बार कह रहा था, ‘मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं।’ अपनी मां को याद कर वह चिल्ला रहा था, ‘‘मम्मा! मेरा पेट दर्द कर रहा, गला दर्द कर रहा, पूरा शरीर दुख रहा है….मुझे मत मारो।’ उसकी नाक से खून आने लगा था। उसने पानी भी मांगा।’’2 परंतु चाउविन तथा उसके साथियों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। उनकी क्रूरता बनी रही। बाद में एंबुलेंस बुलाई गई। फ्लॉयड को अस्पताल ले जाया गया, किंतु तब तक वह दम तोड़ चुका था। 

अमेरिकी अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लॉयड व भारत के दलित छात्र रोहित वेमुला का पोस्टर

बताया जा रहा है कि फ्लॉयड 20 डॉलर का नकली नोट चलाते हुए पकड़ में आया था। पुलिस का आरोप था कि उसने भागने की कोशिश की थी, परंतु घटना-स्थल पर लगे कैमरे उसकी गवाही नहीं देते। गौरतलब है कि चाउविन के विरुद्ध 18 शिकायतें पहले से ही दर्ज थीं। उसे जानने वाले बताते हैं कि अश्वेतों के प्रति उसका नजरिया पहले से ही द्रोहपूर्ण था। घटना के बाद अमेरिका में विद्रोह की जो लहर उमड़ी, उसके आगे कोरोना के कारण हुई 1,00,000 से ज्यादा मौतों का क्षोभ हल्का पड़ गया। आरंभ में ट्रंप ने मामले को हल्के में लेकर विरोध को बलपूर्वक दबाने की कोशिश की। इस अदूरदर्शितापूर्ण हरकत ने माहौल को गरमा दिया। हालात उनके विपरीत होने लगे। लोग कहने लगे कि ‘भगवान हमें इस राष्ट्रपति से बचाओ।’ उनके ट्वीट, ‘जब लूट मचती है तो गोलीबारी भी होती है’ को ट्विटर ने ‘हिंसा भड़काने वाला’ कहकर हटा दिया। एक पुलिस अधिकारी ने तो ट्रंप से यहां तक कह दिया कि ‘अगर उनके पास कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं है तो उन्हें अपना मुंह बंद रखना चाहिए।’ मगर ट्रंप पर तब भी सत्ता का नशा सवार था। 

जार्ज फ्लॉयड को न्याय दिलाने के लिए प्रदर्शन करते लोग

आंदोलन को दबाने के लिए उन्होंने सेना बुलाने को कहा। इसपर अमेरिकी सेना के जनरल मार्क ए. मिले ने  2 जून, 2020 के पत्र द्वारा जवाब दिया कि ‘देश की सेना किसी व्यक्ति की इच्छाओं को साधने के लिए नहीं, अपितु देश और संविधान की रक्षा के लिए है।’ यही नहीं, घटना सामने आते ही, डेरिक चाउविन की पत्नी ने उससे तलाक लेने की घोषणा कर दी थी। 

अमेरिकी स्वाधीनता का घोषणापत्र और रंगभेद

अमेरिका में रंगभेद का इतिहास 400 वर्ष पुराना है। 4 जुलाई 1776 को अमेरिका के गणतांत्रिक राज्य बनने की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने कहा था—‘हम इन सिद्धांतों को स्वयंसिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं; तथा उन्हें अपने सृष्टा द्वारा कुछ अविच्छिन्न अधिकार प्राप्त हैं। इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज शामिल है। इन अधिकारों की प्राप्ति के लिए ही समाज में सरकारों की स्थापना हुई, जिन्होंने शासित की स्वीकृति से अपनी न्यायोचित सत्ता ग्रहण की। जब कभी कोई सरकार इन उद्देश्यों पर कुठाराघात करती है तो जनता को यह अधिकार है कि वह उसे बदल दे या उसे समाप्त कर नई सरकार स्थापित करे जो ऐसे सिद्धांतों पर आधारित हो और जिसकी शक्ति का संगठन इस प्रकार किया जाए कि जनता को विश्वास हो जाए कि उसकी सुरक्षा और सुख सर्वथा सुरक्षित हैं।’ प्रकट रूप में आदर्श दिखने वाला यह घोषणापत्र व्यावहारिक स्तर पर नस्लीय था। ‘सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं’ का समानतावादी दृष्टिकोण केवल श्वेत आबादी के लिए था। अश्वेतों और दासों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था। लंबे संघर्ष के बाद, 18 दिसंबर, 1865 को 13वें संविधान द्वारा दास प्रथा की समाप्ति की ऐलान हुआ। बावजूद इसके एक आदर्श, विकसित समाज से जैसी समरसता की अपेक्षा की जाती है, उसका अभाव बना रहा। अश्वेतों को समान नागरिक अधिकार प्राप्त होते-होते एक शताब्दी और बीत गई।

विरोध : जर्मनी के एक क्लब डॉर्टमंड के लिए खेलने वाले इंगलैंड के राष्ट्रीय फुटबॉलर जैडन सैंचो ने जर्सी पर लिखा “जस्टिस फॉर जार्ज फ्लायड”

दलित बनाम अश्वेत 

आमतौर पर हम भारतीय अमेरिकी नागरिकों को भौतिक सुख-सुविधाओं में डूबा बताकर, उनकी उपेक्षा करते आए हैं। मगर 25 मई के बाद अमेरिका से ऐसी अनेक खबरें आईं, जो वहां के नागरिकों की सामाजिक जागरूकता तथा लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। भारत में दलितों की स्थिति अमेरिकी अश्वेतों से भी बदतर है। पिछड़ी जातियां सामाजिक दृष्टि से दलितों की अपेक्षा बेहतर स्थिति का दावा कर सकती हैं। परंतु यदि शिक्षा, रोजगार और शासन-प्रशासन में भागीदारी के हिसाब से देखें तो उनकी स्थिति भी दलितों के समान, कहीं-कहीं तो उनसे भी बदतर हैं। पिछले 3000 वर्षों से वे जातीय असमानता तथा उसके कारण होने वाले शोषण को झेलते आ रहे हैं। भारतीय संविधान में छूआछूत, जातीय भेदभाव को अपराध घोषित किया गया, बावजूद इसके अखबारों में रोज ऐसे किस्से आते हैं जब किसी न किसी दलित या पिछ़ड़े वर्ग के व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित होना पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट-2018 (खंड-2, पृष्ठ-510) के अनुसार 2018 में भारत में दलितों के विरुद्ध क्रूरता और अत्याचार के कुल 42,793 मामले दर्ज किए गए थे, उनमें 821 हत्याओं से संबंधित थे। पुलिस दलितों और पिछड़ों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है। इस कारण अधिकांश घटनाएं दबी रह जाती हैं। जो किसी वजह से सुर्खियों में आ जाती हैं, दो-चार दिनों की बहसबाजी के बाद उनपर भी बर्फ जम जाती है। 

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अमेरिका में अश्वेतों को समान नागरिक अधिकार, 1965 में प्राप्त हुए। भारतीय संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद। बावजूद इसके अमेरिकी शासन-प्रशासन में अश्वेतों की भागीदारी, भारतीय शासन-प्रशासन में दलितों की उपस्थिति से बेहतर है। अमेरिका में अश्वेत वहां की कुल आबादी का 12 प्रतिशत हैं। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा 18 मार्च, 2020 को प्रकाशित खबर के अनुसार दुनिया के कुल 2059 अरबपतियों में 614 अमेरिका के थे। उनमें 5 अश्वेत समुदाय से है। देखने में यह मात्र 0.8 प्रतिशत हैं, मगर विश्व में कुल 13 (0.6  प्रतिशत) अश्वेत अरबपतियों में से 5 का अमेरिकी होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। खेल, मनोरंजन और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अश्वेतों की संतोषजनक उपस्थिति है। 2015 में अमेरिकी अखबारों में 1560 अश्वेत पत्रकार थे। 

जबकि भारत में दलित और आदिवासी कुल आबादी का 26 प्रतिशत और ओबीसी की आबादी 50 फीसदी से अधिक है। बावजूद इसके भारत में मुख्यधारा के अखबारों में बहुजनों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। इसे देखकर एक सवाल रह-रहकर दिमाग में आता है कि क्या ऐसी ही एकजुटता, ऐसा ही आक्रोश भारत में जातीय और सांप्रदायिक उत्पीड़न और अत्याचारों के विरोध में संभव है? 

निराशाजनक है भारतीय परिदृश्य  

उत्तर है, नहीं। भारत में यह असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। वजह है, नागरिक चेतना का अभाव। भारत में धर्म को नैतिकता का आधार माना जाता है। धर्म-रहित नैतिकता की यहां कोई संकल्पना नहीं है। इसलिए जो धर्म-विमुख है, उसे सहज ही अनैतिक और अनाचारी मान लिया जाता है। असुर, दैत्यादि जो ब्राह्मण धर्म को मानने से इन्कार करते हैं, शास्त्रों में उन्हें निकृष्ट, हेय और वध-योग्य बताया गया है। दूसरी ओर देवता जो धर्म में विश्वास रखते हैं, बलात्कार करते हैं, जानलेवा षड्यंत्र रचते हैं, वे धर्मसम्मत होने के कारण पूजनीय माने गए हैं। वर्णाश्रम धर्म में नैतिकता भी वर्ण के अनुसार तय होती थी। जैसे क्षत्रिय का काम था, युद्ध के नाम पर मारकाट करना। बिना सोचे-समझे कि युद्ध औचित्यपूर्ण है या नहीं? किसी भी कार्य के औचित्य-अनौचित्य को परखना ब्राह्मण का काम था। शूद्र की नैतिकता(धर्म) केवल स्वामी के प्रति सेवाभाव द्वारा तय होती है।

बुद्ध को छोड़कर शायद ही किसी और का ध्यान जीवन और समाज दोनों के लिए बेहद जरूरी सामान्य नैतिकता पर गया हो। धर्म उनके लिए भी पहले था। दूसरे शब्दों में वैदिक मनीषियों की भांति बुद्ध भी नैतिकता को धर्म पर आलंबित मानते थे। जबकि बुद्ध के समकालीन सुकरात और कन्फ्यूशियस ने नैतिकता की स्वायत्तता को स्वीकार किया था। सुकरात ने उसे ‘सद्गुण’ की संज्ञा देकर, मानव जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया था। सुकरात के बाद प्लेटो और अरस्तु ने भी सद्गुण और नैतिकता को आगे रखा। अपने विचारों के प्रसार की खातिर उन तीनों ने न कोई नया धर्म चलाया, न किसी प्रचलित धर्म का सहारा लेना जरूरी समझा। बावजूद इसके यह तिकड़ी तब से लेकर आज तक, किसी न किसी रूप में विचारकों को प्रभावित करती आई है। प्लेटो के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि जो उसके ग्रंथों में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है। पश्चिम में सामान्य नैतिकता और सद्गुणों के लिए धर्म की आवश्यकता नहीं है। जबकि भारत में नैतिकता का धर्म से परे कोई अस्तित्व नहीं है। 

स्वायत्त नैतिकता का अभाव यानी नागरिकताबोध की कमी 

साधारण दिखने वाला यह अंतर मनुष्य की पूरी जीवन शैली को प्रभावित करता है। नैतिक आचरण को उन्मुख व्यक्ति के समक्ष केवल उसका लक्ष्य होता है। समाज होता है। मनुष्यता को ध्यान में रखकर वह जो भी करता है, उसके पीछे उसका विवेक और आत्मप्रेरणा होती है। बिना किसी प्रतिफल की वांछा के वह दूसरों के हित की सोचता-करता है। इससे उसे आत्मतुष्टि प्राप्त होती है। धार्मिक व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। धार्मिक कृत्य, जिसमें दूसरों के कल्याण की इच्छा भी समाहित है, किसी तीसरी तथा अज्ञात शक्ति को प्रसन्न के लालच में किए जाते हैं। यह शक्ति क्या है? कैसी है? इसे तय करने के लिए मनुष्य अपने विवेक से काम नहीं लेता। ज्यादातर मामलों के लिए वह पुरोहित वर्ग पर निर्भर होता है। नैतिक प्रयासों के लिए स्वतःप्रेरणा और निःस्वार्थ भाव आवश्यक है। चूंकि तीसरी शक्ति को प्रसन्न रखने की चाहत के पीछे व्यक्ति का अपना स्वार्थ होता है, इस कारण धर्म के नाम पर दूसरों को सुख पहुंचाने के प्रयास नैतिकता की कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। 

जाति हिंदू धर्म को अनैतिक बनाती है 

सवाल यह है कि धर्म तो दूसरे भी हैं। अमेरिका में जहां पुलिस ने जार्ज फ्लॉयड की निर्ममता पूर्ण हत्या की है, वहां ईसाई धर्म की बहुलता है। फिर हिंदू धर्म में ऐसा क्या है? दो कारण हैं, जो उसे दुनिया के बाकी धर्मों से अलग करते हैं। पहला है—जातिप्रथा। हिंदू, खासतौर पर ब्राह्मण जाति-व्यवस्था को अपनी उपलब्धि मानते हैं। जबकि जन्म के आधार पर मनुष्यों में भेद पैदा कर देने वाली जाति, देश-समाज दोनों के लिए सदैव हानिकारक सिद्ध हुई है। यह नागरिकों के स्वतंत्र विवेक की उपेक्षा करती है। भारत में छह हजार से ऊपर जातियां और उपजातियां हैं। वे एक जगह न होकर, छोटे-छोटे समूहों में पूरे देश में यहां-वहां बिखरी हुई हैं। इसलिए बड़ी आबादी होने के बावजूद वे कोई प्रभावी और परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पातीं। उनके हित एक-दूसरे से टकराते हैं। इसलिए जब किसी एक समूह पर हमला होता है, अथवा बात किसी एक समूह के मानापमान की होती है तो बाकी समूह उसे जाति-विशेष का मामला मानकर चुप्पी साधे रहते हैं। 

दूसरे, हिंदू धर्म सांसारिक वस्तुओं को नकारात्मक दृष्टि से देखता है। लोभ, मोह, प्रेम-प्रीति, रागानुराग से भरपूर संबंध जो मानव-समाज को जोड़कर, एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी बनाते हैं—हिंदू धर्म में ‘माया’ तथा ‘भव-प्रपंच’ कहे जाते हैं। एक हिंदू धर्मावलंबी जितना ज्यादा धार्मिक होने का प्रयास करता है, उतना ही आत्मकेंद्रित होता जाता है। वह खुद को दूसरों से अलग और खास समझने लगता है। आत्मकेंद्रित कर देने की प्रवृत्ति यूं तो कमोबेश सभी धर्मों में होती है। हिंदू धर्म में वह दूसरों से अधिक है, क्योंकि यहां जातीय विशिष्टताबोध भी समानरूप से प्रभावी रहता है। भक्ति-दर्शन इस बात को जोर डालकर कहता है कि दैवीय अनुराग के समक्ष बाकी सब रागानुराग हेय हैं। भक्ति की पराकाष्ठा में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन, माता-पिता जैसे संबंधों को भी कथित ‘परम लक्ष्य’ की राह में बाधाकारी मान जाता है। इसलिए हम भारतीय धर्म-रक्षण के लिए तो एक आवाज पर इकट्ठा हो जाते हैं, लेकिन सांसारिक हितों की रक्षा, खासकर जिनका संबंध नागरिकताबोध से हो—सब अपना-अपना स्वार्थ देखने लगते हैं। लोग धर्म के बहाने भी इसलिए एकजुट हो पाते हैं, क्योंकि उससे उन लोगों के स्वार्थ जुड़े होते हैं, जो निचली जातियों का दमन करके हड़पे गए विशेषाधिकारों के बल पर—शताब्दियों से लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा हुए हैं। जब भी उनके स्वार्थ पर संकट आता है, वे धर्म संकट में है, कहकर लोगों को उकसाने लगते हैं। स्वतंत्र निर्णय लेने का अभ्यास न होने के कारण लोग भी उनकी बातों में आ जाते हैं। विभिन्न जातीय पहचानों में बंटे समाज में संघर्ष के दौरान अकेले पड़ जाने की संभावना भी लोगों को हतोत्साहित करती है। 

बहरहाल, अमेरिका में जार्ज फ्लॉयड के साथ जो हुआ, वह भारत में दलितों और पिछड़ों के साथ रोज होता है। उससे कहीं अधिक निर्मम और भयावह तरीके से होता है। बावजूद इसके छोटे-छोटे जातीय एवं नागरिक समूहों में बंटे लोग विरोध की हिम्मत नहीं उठा पाते। यह ठीक ऐसा ही है जैसे कभी भारत में, अपने स्वार्थों के लिए मामूली बात पर एक-दूसरे से टकराने, नीचा दिखाने की कोशिश करने वाले रजबाड़े हुआ करते थे। बाहर से आने वाला मामूली हमलावर उनका मानमर्दन कर गर्दन पर सवार हो जाता था। समाधान के लिए आवश्यक है कि वर्चस्वकारी ब्राह्मण संस्कृति के समानांतर, बहुजन संस्कृति को मजबूत किया जाए। लोगों को उनकी अलग-अलग जातीय पहचानों से निकालकर, यदि फिलहाल यह संभव न हो तो जातीय पहचानों को बनाए रखकर भी, वर्गीय पहचान को मजबूती दी जाए। लोगों में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, तभी बहुजन अपने अधिकारों की जंग को आगे बढ़ा पाएंगे। तभी उनकी सफलता की कामना की जा सकती है।

(संपादन : नवल)

संदर्भ :

  1. वाशिंग्टन पोस्ट, 30 मई, 2020
  2. एम्मा ऑकरमेन, वाइस न्यूज, 26 मई, 2020

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