अन्नाभाऊ साठे की कालजयी कृति : मेरी रूस यात्रा (दूसरा अध्याय)

‘स्तालिनग्राद’ शीर्षक से मेरा एक पोवाड़ा (शौर्यगाथा) भी रूस में बहुत चर्चित था। ऐसी ही नामवरी और खुशफहमी के साथ मैं रूस में भ्रमण करने निकला था। शुरू के दो दिनों में मैं पानी के लिए ‘ओहक’, दियासलाई के लिए ‘पिचस्की’ तथा ईमानदार के लिए ‘खराश’ जैसे रूसी शब्द सीख चुका था

अन्नाभाऊ साठे (1 अगस्त, 1920 – 18 जुलाई, 1969) जन्मशती वर्ष पर विशेष

[अन्नाभाऊ साठे मराठी के शीर्षतम साहित्यकारों में से हैं। उनकी कृति ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत कहा जाता है। उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर, आठ अध्यायों में फैले इस यात्रा-वृतांत के दूसरे अध्याय ‘रूस में भ्रमण’ का हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत है। अनुवादक के मुताबिक, रूस अन्नाभाऊ के सपनों में बसता था। रूसी क्रांति को लेकर उन्होंने “स्तालिनग्राडचा पोबाड़ा’ शीर्षक से एक ‘गाथा’ रची थी। उसके माध्यम से उनकी कीर्ति, उनकी रूस यात्रा से पहले ही वहां पहुंच चुकी थी। बावजूद इसके उनकी रूस यात्रा आसान नहीं थी। उनके लिए वह मनुष्य के किसी बड़े सपने के साकार होने जैसी थी। इस रचना की सहज-सरल भाषा और किस्सागोई शैली पाठक को लगातार अपनी ओर खींचती है। अनुवाद के लिए मूल रचना ‘माझा रशियाचा प्रवास’ के अलावा डॉ. अश्विन रंजनीकर के अंग्रेजी अनुवाद, ‘माई जर्नी टू रशिया’ (न्यूवोइस पब्लिकेशन, औरंगाबाद) से भी मदद ली गई है]

दूसरा अध्याय : रूस में भ्रमण

  • अन्नाभाऊ साठे

रूस की यात्रा से पहले ही मेरा उपन्यास ‘चित्रा’ (1945) रूसी भाषा में प्रकाशित हो चुका था। कुछ कहानियां भी रूसी में अनूदित हुई थीं। मेरी कहानी ‘सुलतान’ रूसी जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय थी। ‘सुलतान’ से मेरी भेंट अमरावती के केंद्रीय कारागार में हुई थी। मेरी कहानी के माध्यम से वह, मुझसे पहले ही रूस पहुंच चुका था! वहां के अखबारों ने मुझे “‘सुलतान’ के यशस्वी लेखक अन्नाभाऊ साठे” के रूप में मशहूर कर दिया था।

‘स्तालिनग्राद’ शीर्षक से मेरा एक पोवाड़ा (शौर्यगाथा) भी रूस में बहुत चर्चित था। ऐसी ही नामवरी और खुशफहमी के साथ मैं रूस में भ्रमण करने निकला था। शुरू के दो दिनों में मैं पानी के लिए ‘ओहक’, दियासलाई के लिए ‘पिचस्की’ तथा ईमानदार के लिए ‘खराश’ जैसे रूसी शब्द सीख चुका था। 

मास्को पहुंचते ही हमारे सामने एक नई दुविधा खड़ी हो गई। हम कुल छह जन थे। सभी अलग-अलग पेशे से। हमारे बीच दो डाक्टर थे, एक सोलिसिटर, एक विधायक, एक पियानोवादक तथा एक लेखक यानी मैं। सबकी पसंद एकदम अलग-अलग थी। हम शायद ही कभी किसी एक बात पर सहमत हो पाते थे। उस समय भी हर कोई अपना अलग राग अलाप रहा था।

दोनों डाक्टरों ने अपने हाथ उठाकर सीधे-सीधे कहा था—‘हमें, इस प्रवास के दौरान रूस के अस्पतालों में होने वाली सभी शल्य-चिकित्साओं का अध्ययन करना चाहिए। बिना इसके हमारी रूस-यात्रा की कोई सार्थकता नहीं है।’

उनमें से एक, हैदराबाद से पधारे डा. शाह बीमार थे। उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य रूस के अस्पतालों में होने वाली शल्य-चिकित्साओं का अध्ययन करना था। दूसरे, डा. दयालु मैसूर के गृहस्थ जन थे। वे हिंदी बिलकुल नहीं जानते थे।

लखनऊ से पधारे विधायक मिस्टर पुष्करराज बहुत रूपवान थे। उनकी वेशभूषा अत्यंत धवल और साफ-सुथरी, नेहरू के समान थी। उन्होंने कहा था—‘मैं रूसी जनतंत्र की स्थिति का विश्लेषण करना चाहता हूं। इसके लिए मैं यहां विधानसभा की कार्यवाही देखूंगा। किसी कुत्ते की शल्य-चिकित्सा को देखने का कोई औचित्य नहीं है।’ यह कहकर उन्होंने अपना मुंह ऐसे बनाया, मानो कहना चाहते हों—‘मैं कोई कसाई नहीं हूं।’

रूस भ्रमण के दौरान अन्नाभाऊ साठे (सफेद पोशाक में, मध्य) व शिष्टमंडल में शामिल अन्य

उनके बाद कलकत्ता के सोलिसिटर मिस्टर चटर्जी आगे आए। कलकत्ता बोलते समय वे ‘क’ का उच्चारण ‘कु’ की तरह करते थे। कलकत्ता को वे ‘कलकुत्ता’ बोलते थे। उन्होंने बताया, ‘मुझे कुत्ते का ऑपरेशन नहीं देखना। न किसी और निरर्थक काम में मेरी रुचि है। मैं वही करूंगा जो मेरा पेशा है। मैंने रूस में कानून के उल्लंघन के बारे काफी कुछ सुना है। मुझे इसी बारे में पड़ताल करनी है। इसलिए तुम मुझे यहां की अदालत में ले चलो।’

उनके बाद मद्रास से पधारे श्रीमान जॉन खड़े हुए। उनकी पलकें बहुत धीरे-धीरे झपझपा रही थीं। जब वे हंसते तो आंसू उनकी आंखों से ढुलक पड़ते थे। उन्होंने कहा था—‘मैं एक पियानोवादक, एक कलाकार ठहरा। मेरी पत्नी खुद एक डाक्टर है। इसलिए कुत्ते का ऑपरेशन देखने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। हमारे शिष्ठमंडल का गठन बहुत लापरवाही से हुआ है। मैं तो बस पियानो सुनूंगा। आप सबको जो भी करना हो, करें।’

आखिरकार मेरा नंबर आया। मैंने कहा, ‘मेरी इच्छा तो सिर्फ इस देश के गली-कूंचों में भटकने की है।’ इतना सुनते ही वे पांचों एक-दूसरे के मुंह की ओर देखने लगे।

अंततः यह फैसला हुआ कि हममें से जिसे जो पसंद हो, वही करेगा।

अगले दिन हमें भारतीय दूतावास का निमंत्रण था। हम वहां ठीक समय पर पहुंच गए। उस समय तक युवा-प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुए थे। मैं फुटपाथ से सटे दरवाजे के बीच खड़ा था। बाहर सड़क मरम्मत का काम चल रहा था। पांच कारीगर काम में जुटे थे। पांच कामगार और एक मशीन! उनके अलावा वहां और कोई नहीं था। मशीन खुदाई करने, मिट्टी भरने, तथा पुराने कोलतार को पिघलाने के काम में लगी थी। कारीगर उसके काम पर नजर रखे हुए थे। सभी साफ-सुथरी वर्दी में थे। ठीक ऐसे ही जैसे भारत में अफसर लोग अपनी वर्दी में सजे-संवरे नजर आते हैं। उनपर किसी तरह की सख्ती नहीं थी। न ही वे गुलाम जैसे थे। मशीन खुद उनके निर्देशानुसार, गुलाम की तरह लगातार काम में जुटी थी। 

सोवियत संघ के भूतपूर्व प्रधानमंत्री व विश्व प्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार लेनिन (24 अप्रैल,1870 – 21 जनवरी, 1924) व अन्नाभाऊ साठे (1 अगस्त, 1920 – 18 जुलाई, 1969) की तस्वीर

भारतीय दूतावास में प्रवेश करते ही मेरा मस्तिष्क भारतीय जीवन-पद्धति की ओर खिंचने लगा। वहां भारतीय संस्कृति फल-फूल रही थी। मन घर की मीठी-सुहानी स्मृतियों में डूबने लगा। सीढ़ियां चढ़ते समय बगल की दीवारों पर लगे महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री नेहरू के चित्रों पर हमारी नजर पड़ी। मुख्य सभागार में कदम रखते ही मुझे एहसास हुआ, जैसे मैं मास्को में न होकर, भारत के दिल्ली, मुंबई या उन्हीं की तरह सजे-धजे किसी अन्य महानगर में मौजूद हूं। दूतावास की आंतरिक सज्जा ऐसी थी कि उस स्थान से गुजरने वाला, कोई भी व्यक्ति, भारतीय संस्कृति और सभ्यता के आकर्षण से बंधकर रह जाए।

थोड़ी देर बाद ही वहां मानों चमत्कार हुआ। शराब के गिलास लिए वेटर मेहमानों की भीड़ में घूमने लगे। उसके बाद कबाब पेश किए गए। शराब के असर से हमारे सिर घूमने लगे। मैं तो लगभग बेकार हो चुका था।

उस समारोह में हमारे साथ युवा मामलों के प्रतिनिधि, मास्को के जाने-माने विद्वान तथा मास्को अकादेमी के विद्वत सदस्यगण उपस्थित थे। वह पूरा दिन बड़े आनंदोल्लास के साथ बीता। भारतीय दूतावास में मेरी भेंट अनेक भारतीय मित्रों से हुई। उन मित्रों से भी मिला जिनके संग मैंने अपने संकट के दिन बिताए थे। पूरी-सब्जी खाई थी। मास्को में उन सबसे मिलने के बाद मुझे अपार प्रसन्नता हुई। हृदय गदगद हो गया।

रात को, हर्षोल्लास से भरपूर अविस्मणीय यादों को सहेजे, मैं लेनिनग्राद के लिए रवाना हो गया।

लेनिनग्राद की एक तस्वीर

रूस में हवाईजहाज ही हमारे ठिकाने थे। रेलगाड़ी से एक बार लेनिनग्राद, पुनः अजरबेजान की राजधानी बाकू से ब्लीसी तक गया था। बाकी अवसरों पर तो मैं हवाईजहाज में सवार हो, पंछी की तरह आसमानी उड़ान भरता था। रूस में यही मेरी दिनचर्या थी।

लेनिनग्राद आने-जाने की यात्रा बहुत ही उत्तम और आरामदायक थी। रेलगाड़ी के एक कंपार्टमेंट में दो पलंग, साफ-सुथरे गद्दे, बढ़िया तकिए और चादरें, पानी की टोंटी, साबुन, कंघा, टेलकम पाउडर और रेडियो वगैरह उपलब्ध थे। उनके अलावा हमारी सुविधा के लिए एक महिला कर्मचारी भी मौजूद थी। वह ममतामयी स्त्री सभी यात्रियों की देखभाल अपने बच्चों की तरह कर रही थी।

रेलयात्रा बहुत बड़ी विलासतापूर्ण थी। ऐसी यात्रा का अभ्यस्त न होने के कारण मैं अपने भीतर हीन-भावना महसूस कर रहा था। तभी मुझे बोरीबंदर रेलवे स्टेशन की याद आ गई। वहां की भीड़, कोलाहल, लोगों की रेलमपेल, मारा-मारी, डिब्बों में ठूंस-ठूंस कर भरे यात्री, उनकी चिल्ल-पौं, ऊंची आवाज में लगने वाले उनके नारे—‘जोर से बोलो, बंबा देबी की जय!’ वे सब मेरी रग-रग में समाए हुए थे। मैं उन्हें भला कैसे भूल सकता था? रूस के रेलवे स्टेशन पर वैसा कुछ भी नहीं था।

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वहां का वातावरण पूर्णतः शांत और स्थिर था। स्टेशन पर माचिस की जली हुई तीली या सिगरेट के टुकड़ों का कोई नामोनिशान न था। ऐसे में बेचारी बीड़ी की क्या मजाल कि वहां फटक सके। स्टेशन पर पोस्टरों का जमावड़ा भी नहीं था। एक पोस्टर ‘यहां मत थूकिए’ को देखकर मैंने रूस में अत्यंत साफ-सुथरे पोस्टरों की परिकल्पना की थी, परंतु वहां पान चबाता अथवा थूकता हुआ एक भी आदमी दिखाई न पड़ा। दूसरी ओर, क्या हम घाटकोपर में बिना पीक वाले किसी एक भी पोस्टर की कल्पना कर सकते हैं? वे हमेशा के फाड़ दिए जाते थे। सिने अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के चेहरों पर मूंछें बना-मिटाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले अनाम-अज्ञात कलाकार यहां दिखाई नहीं पड़ते।

रेलगाड़ी अपनी यात्रा आरंभ कर चुकी थी। वह तेजी से लेनिनग्राद की ओर दौड़ रही थी। मैंने खिड़की से झांककर बाहर का नजारा लेना चाहा। मगर कोशिश नाकाम रही। अंधेरा होने के कारण उस ओर का कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मुझे नींद नहीं आ रही थी। इसलिए जॉन के साथ मैं कंपार्टमेंट से बाहर निकल आया। गाड़ी दौड़ रही थी। हम दोनों डिब्बे में, भारतीय टिकट कलेक्टर की भांति शान से चहल-कदमी कर रहे थे। चारों ओर गहरी निस्तब्धता थी।

कुछ यात्री निद्रा-मग्न थे। कुछ पढ़ रहे थे। जबकि कुछ यात्री ताश के पत्ते फेंट रहे थे। गहन निस्तब्धता के बीच किसी मजाक के कारण छूटने वाले ठहाके विस्फोट सरीखे लगते थे। लेकिन यात्रियों की उठा-बैठक का खेल वहां नहीं था। न कोई सीट के नीचे शरण लिए था। न ही कोई शौचालय में खुद को छिपाए हुए था। सब कुछ शानदार था। जिस गाड़ी में भीड़ न हो वहां जेबकतरा भला क्यों आएगा! इस तरह सोचते-विचारते हमने एक डिब्बा पार कर लिया। दूसरे डिब्बे में भी शांति पसरी थी। टिकट कलेक्टर नामक प्राणी के जो यात्रियों के सिर पर जाकर कहे, ‘जय सौजन्य सप्ताह’—के वहां दर्शन ही नहीं हुए। 

मगर एक प्रसंग ने मुझे स्तंभित कर दिया। एक खिड़की के बराबर अतीव सुंदर तरुणी बैठी हुई थी। उसने अपनी गर्दन खिड़की के कांच पर टिकाई हुई थी। आंखें उन्मीलित कलिकाओं की तरह मुंदी थीं। उसके ठीक सामने बर्फ जैसा सफेद पालना लटका हुआ था। उसमें एक नन्हा रूसी नागरिक विश्राम कर रहा था। वह गहरी नींद में था। मानों अपनी मां की गोद में निद्रानिमग्न हो। 

ये सब सुविधाएं उसे अपने लेनिन की ओर से प्राप्त थीं। कुल मिलाकर वह महीने-भर का होगा। जन्म के बाद से ही सोवियत संघ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाए था। इस यात्रा के लिए उसके देश ने ही उसे खूबसूरत पालना उपलब्ध कराया था। इसलिए कि उसे पूरा भरोसा है कि ‘यह नन्हा रूसी नागरिक जवान होने पर, अपनी मातृभूमि के लिए अपने सौ जीवन न्योछावर कर सकता है।’

मैं अपने कंपार्टमेंट में लौट आया। वहां दरवाजा बंद कर, पलंग पर लेट गया। उस समय मैं लेनिनग्राद के बारे में सोच रहा था। सोच रहा था कि अगली सुबह तक मैं वहां पहुंच जाऊंगा। वहां प्रोफेसर सुश्री ततियाना कातेनिना से मेरी भेंट होगी और मैं उनसे मराठी में बात कर सकूंगा। 

‘मैं उनसे कल मिलने वाला हूं।’ इस परिकल्पना के साथ मैं बेहद प्रफुल्लित था। इसलिए कि महाराष्ट्र से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी वह स्त्री मराठी के विकास तथा उसके प्रचार-प्रसार को समर्पित है। उसके लिए लगातार कठिन परिश्रम कर रही है। वह रूसी बच्चों को मराठी सिखाने का काम भी करती है। ऐसी महिला से मुलाकात की कल्पना से ही मेरा मन आनंदित था।

थोड़ी देर बाद मेरे कंपार्टमेंट के दरवाजे पर ‘टिक-टिक’ की आवाज सुनाई दी। मैंने तुरंत उठकर दरवाजा खोला। बाहर खड़े व्यक्ति ने विनम्रतापूर्वक मेरा स्वागत किया। उस व्यक्ति ने दरवाजे पर विभिन्न किस्मों की शराब की टोकरी लाकर रख दी। बोतलों पर अलग-अलग किस्म की शराब के लेबल लगे थे। सब रूसी भाषा में थे।

‘क्या आप शराब लेना पसंद करेंगे?’ उसने मुझसे पूछा। उसकी विनम्रता का सम्मान करते हुए मैंने उसे हृदय से धन्यवाद कहा।

‘इस तरह से शराब की टोकरी यदि आपको मुंबई में दिख जाए तो क्षण-भर में आपकी शामत आ जाए।’ मैंने अपने आप से कहा, ‘वहां सबसे पहले तुम्हें खूब मार पड़ेगी। उसके बाद कोट का कालर पकड़कर, पांच लाख कैदियों के बीच तुम्हें भी जेल में ठूंस दिया जाएगा…जाने दो! इस समय तुम रूस में हो।’

मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसके बाद मैं नींद की प्रतीक्षा करने लगा। तभी रेडियो घनघनाया और उससे भारतीय प्रधानमंत्री की आवाज सुनाई पड़ी। वे ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ की बैठक को संबोधित कर रहे थे। मैं यह नहीं समझ पाया कि प्रधानमंत्री का संबोधन किस रेडियो स्टेशन से प्रसारित किया गया था। किंतु उस चिर-परिचित आवाज को सुनकर मेरा मन तत्क्षण दिल्ली पहुंच गया। तब मेरी समझ में आया कि मन की गति के सामने ब्रहमांड की हर एक गति नगण्य है। 

(अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)


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