लाल सितारे के नीचे : अन्नाभाऊ साठे की “मेरी रूस यात्रा” (चौथा अध्याय)

महान साहित्यकार गोर्की जो दलित साहित्य की प्रेरणा बने; जिन्हें सोवियत साहित्य का पितामह कहा जाता है—‘गोर्की पथ’ उन्हीं के नाम को धारण किए हुए है। गोर्की की तरह ‘गोर्की पथ’ भी भव्य एवं निर्मैल्य है। यह राजमार्ग आज भी मास्को शहर की शोभा को चार-चांद लगाता है

अन्नाभाऊ साठे की कालजयी कृति ‘मेरी रूस यात्रा’ के चौथे अध्याय का अनुवाद यहां प्रस्तुत हैं। रूस तथा वहां के जनजीवन को लेकर उनके मन में जो जिज्ञासाएं थीं, तथा यात्रारंभ से पहले जो शंकाएं या सवाल उनके मित्रों ने दागे थे, इस अध्याय में वे उनकी खोज करते प्रतीत होते हैं। अनुवाद के लिए अनुवादक ओमप्रकाश कश्यप ने डॉ. अश्विन रंजनीकर के अंग्रेजी अनुवाद, ‘माई जर्नी टू रशिया’ (न्यूवोइस पब्लिकेशन, गुलमोहर अपार्टमेंट, औरंगाबाद) से मदद ली है


लाल सितारे के नीचे

  • अन्नाभाऊ साठे

चौदह सितंबर की सुबह मैं मास्को शहर में टहलने निकला। साहबी पोशाक से तंग आकर, मैंने उसे अलमारी के हवाले कर दिया था। उसकी जगह ठेठ देसी ठाठ….सिल्क का कुर्ता-पाजामा, कोल्हापुर की जरीदार चप्पलें पहन, घूमता-घामता मैं ‘गोर्की पथ’ पर जा पहुंचा। ‘गोर्की पथ’ लंबा राजमार्ग है। उस समय मेरे दिमाग में दो प्रश्न थे। पहला रूस में समाजवाद कितना कामयाब हुआ है? दूसरा मास्को के नागरिक कैसे हैं?

भव्य राजमार्ग कतारबद्ध इमारतों, समान वयस्, समान ऊंचाई और एक ही किस्म के वृक्षों से आच्छादित था। मार्ग के बीचोंबीच, मुक्ता-रेख जैसा दीप्तिमान, अत्यंत भव्य फुटपाथ था। उसमें बेहद चित्ताकर्षक, मीलों लंबी सुगंधित फूलों की कतार थी। सबकुछ अतीव सौंदर्यवान, साफ-सुथरा और मनोरम था। आसमान की तरह विस्तारित सड़कें, मानो मास्को का संपूर्ण यश-वैभव उस राजमार्ग पर उतर आया था। उस मनोरम परिवेश में मेरी दृष्टि ऐसे थिरक रही थी, जैसे कोई तितली उपवन में मंडरा रही हो।

सिगरेट की राख फेंकने के लिए जगह-जगह ऐश-ट्रे मौजूद थे। उनके अलावा कदम-कदम पर लगीं शानदार कचरा-पेटियां, मास्को की खूबसूरती में चार-चांद लगा रही थीं। कहीं भी जली हुई सिगरेट, माचिस की तीली, कागज के अपशिष्ट टुकड़े, यहां तक कि धूल-कणों का भी नामोनिशां न था। मैंने इन चीजों को खोजने की कोशिश भी की थी, लेकिन पूरी तरह नाकाम रहा। इसलिए कि मास्को के लोग जली हुई तीली यहां-वहां नहीं फेंकते। जो लोग अपने देश के राजमार्गों को इतना प्यार करते हैं, वे अपने देश को कितना प्यार करते होंगे—इसका अंदाज लगाना नामुमकिन है।

महान साहित्यकार गोर्की जो [भारत में] दलित साहित्य की प्रेरणा बने; जिन्हें सोवियत साहित्य का पितामह कहा जाता है—‘गोर्की पथ’ उन्हीं के नाम को धारण किए हुए है। गोर्की की तरह ‘गोर्की पथ’ भी भव्य एवं निर्मैल्य है। यह राजमार्ग आज भी मास्को शहर की शोभा को चार-चांद लगाता है।

रूस में साहित्यकारों और कलावंतों का कितना मान-सम्मान है, वह यहां कदम-कदम पर प्रमाणित होता है। रूस की जनता ने अपने साहित्यकारों और कलाकारों को अविस्मरणीय बनाए रखा है। कितने ही मार्गों और चौराहों का नामकरण महान कलावंतों के नाम पर किया गया है। स्थान-स्थान पर उनकी भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। साहित्य और इतिहास की इस हाथ से उस हाथ तक की निर्बाध यात्रा ने टॉलस्टाय, पुश्किन, गोर्की और मायकोवस्की को अमर बना दिया है।

मास्को शहर में अन्नाभाऊ साठे व अन्य

मेरे लिए मास्को में सबसे बड़ी समस्या थी—लोगों की भीड़-भाड़, कोलाहल। दौड़ते हुए लोग। इन्हें आखिर किस बात की जल्दी है? सड़कों पर, चौराहों पर, ये सुंदर, सुशील और बुद्धिमान रूसी नागरिक लगातार भाग क्यों रहे हैं! न तो कोई उनसे वैसा करने को कह रहा था। न उनपर किसी का दबाव था। सिर्फ आंतरिक उत्साह था। मैं उनकी स्वत:स्फूर्त्त भागमभाग का कारण समझने में असमर्थ था। लड़के-लड़कियां, बूढ़े-जवान सब तेजी से आ-जा रहे थे। इसके कारण की तलाश में मैं यहां-वहां भटक रहा था।

एक चौराहे पर रूसी नागरिकों की तरह मैंने भी दौड़ लगा दी। मैं जानता था कि मास्को के नागरिक मुझपर नजर गड़ाए हैं। मगर मैं उनके जैसी त्वरा से दौड़ नहीं पाया। दरअसल मास्को में सभी वाहन सड़क के दायीं ओर चलते हैं, जबकि मुझे बायें चलने का अभ्यास था। मैं वहां फंस ही गया होता, लेकिन ‘गोर्की पथ’ पर तैनात यातायात पुलिस ने आते-जाते वाहनों को रोक, मेरे लिए रास्ता बना दिया था। बावजूद इसके कि मैं मास्को में मेहमान था, उस राजपथ पर मेरे स्वर्गवासी होने की संभावना कहीं अधिक थी।

‘तुम दौड़ क्यों रहे हो?’ कुछ चतुर मास्कोवासियों ने मुझसे पूछा। मैंने उन्हीं के अंदाज में उत्तर दिया—

‘मैं तो तुम्हारी कारों को नुकसान से बचाने के लिए दौड़ रहा हूं।’

17 सितंबर को भारतीय दूतावास ने हमारे लिए स्वागत-भोज का आयोजन किया था। ठीक वही समय मास्को में ‘विश्व युवा संगठन’ की बैठक का भी था। इस कारण अनेक देशों से पहुंचे युवा-प्रतिनिधि भी उस पार्टी में शामिल थे। हम सब भारतीय दूतावास के आयोजन; तथा मिस्टर थान द्वारा की गई आत्मीय मेहमाननबाजी से काफी संतुष्ट थे।

मास्को प्रवास के पहले ही दिन मुझे एक दोस्त मिला। उसका नाम लिओनिद था। वह एक बेहतरीन फोटोग्राफर था। छह फुट ऊंची काया, गोरा रंग, मजबूत कद-काठी, ताजगी-भरा चेहरा, झील के समान गहरी नीली आंखें, देह पर सुंदर पोशाक, उसके ऊपर पहना हुआ भूरे रंग का कोट, कंधे पर बैटरी और गले में कैमरा लटकाए लिओनिद मुझसे ऐसे मिला, जैसे बहुत पुराना मित्र हो। हम दोनों की अंग्रेजी ढीली-ढाली थी। लेकिन भाषा के कारण जब भी हमारा संवाद बाधित होता, हमारी भंगिमाएं एक के मन की बात दूसरे तक पहुंचा देती थीं। जब भी संकेत-भाषा जरूरत पड़ती, हम दोनों मूक हो जाते। फिर एकाएक हंसने लगते थे।

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मास्को में मुझे अनेक मित्र मिले। उनमें फोटोग्राफर, वाहन चालक, माली, लिफ्ट संचालक, वेटर, बूढ़ी स्त्रियां आदि शामिल थे। उनके माध्यम से मैं रूसी जनता की आत्मा के दर्शन कर सका।

सर्वप्रथम मैंने इस प्रश्न का उत्तर खोज निकाला कि मास्कोवासी इतनी भागम-भाग क्यों करते थे। इसके लिए मैंने भागदौड़ में लिप्त सभी उम्र वर्ग के अनेक लोगों से बातचीत कर, उनसे उनकी आपा-धापी का कारण पूछा था—‘आप दौड़ क्यों रहे हैं?’

इसपर उन सयाने मास्कोवासियों ने मुस्कराते हुए जो उत्तर मिला, उसका निहितार्थ था—

‘हम अपनी सप्तवर्षीय योजना को जल्दी से जल्दी पूरी कर लेना चाहते हैं।’

उनके उत्तर ने मुझे हैरान कर दिया था। मैंने महसूस किया कि वे सुंदर, विनम्र और भले इंसान अत्यंत संवेदनशील भी हैं। साम्यवादी चेतना, उसका जनतांत्रिक कलेवर उनकी चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है। प्रत्येक मनुष्य देश-कल्याण के निमित्त कार्य करता है। रूसी नागरिक अपने भविष्य के प्रति बहुत सावधान रहता है। यहां तक कि सुख और शांति के नाम पर वह अपने जीवन का एक भी पल बरबाद नहीं करता। इसलिए उनकी विनम्रता और आचरण फूलों जैसे खिले-खिले रहते हैं। सुख की सुगंध सर्वत्र महकती रहती है।

इस [रूस की] जनता ने विगत चालीस वर्षों में अंतहीन त्याग किया है। अपना खून देकर, आंसू बहाकर, कड़ी मेहनत करते हुए वे लगातार ऊपर उठे हैं। समाजवाद की प्रतिष्ठा को उन्होंने हमेशा सुरक्षित रखा है। यहां की जनता बहादुर, साहसी, युद्धकाल में महायोद्धा की तरह जूझ पड़ने वाली है। हमलावरों के परिक्षेत्र में घुसकर वह उन्हें तबाह करती आई है। लेकिन यह सब वह केवल युद्धकाल में करती है। आमतौर पर रूसी नागरिक शांतिप्रिय हैं।

लिओनिड के कंधे पर हाथ रखे मैं लाल चौक (रेड स्क्वायर) से क्रेमलिन की ओर बढ़ रहा था। सिगरेट मेरे होठों में दबी थी। मेरे पास दियासलाई नहीं थी। मैं चहलकदमी के अंदाज में आगे बढ़ रहा था। तभी सामने से एक आता हुआ एक व्यक्ति हमारे पास पहुंचा। वह एकाएक मेरे सामने रुका और मेरी सिगरेट जला दी। मेरे लिए वह एकदम अप्रत्याशित था।

‘क्या आप भारतीय हैं?’ उस भलेमानस ने पूछा।

‘हां।’ कहकर मैंने उसे धन्यवाद दिया। वह व्यक्ति तत्क्षण मेरे गले से लिपट गया। कहने लगा—

‘आपके नेहरू कैसे हैं?’

‘वे बहुत अच्छे हैं।’ मैंने उत्तर दिया, ‘आज वे संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देने वाले हैं।’

इस समाचार को सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और नेहरू को धन्यवाद देते हुए आगे बढ़ गया। सोवियत संघ के नागरिकों के हृदय में नेहरू के लिए अपार सम्मान है।

लाल चौक से ऊपर की ओर एक पुरानी चर्च है। उसे बहुत सहेज-संवारकर रखा गया है। अच्छी-खासी दिखने वाली वह चर्च लाल चौक और क्रेमलिन की शोभा को बढ़ा रही थी। अनेक श्रद्धालु वहां मौजूद थे। मैंने देखा कि कुछ लोग चर्च की ओर देखते हुए अपनी छाती पर क्रास का निशान बनाकर, प्रार्थना कर रहे हैं। वे श्रद्धालु पूरी तरह आजाद थे।

चलते-चलते मैंने लियोनिद से प्रश्न किया—

‘तुम्हारी वयस् कितनी है?’

‘इक्कीस।’ उसने उत्तर दिया।

‘काम क्या करते हो?’

‘फोटो।’ कहते हुए उसने अपना कैमरा मुझे दिखाया।

‘तुम्हारे पिता क्या काम करते हैं?’ इस प्रश्न को सुनकर वह गंभीर हो गया। उसके हृदय में हूक-सी उठी। चेहरा लटक गया। डबडबायी आंखों से उसने उत्तर दिया—

‘साठे जी, मेरे पिता अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए, युद्ध के मैदान में शहीद हो चुके हैं।’

‘पिछले महायुद्ध मैं?’ मैंने पूछा। उसने स्वीकृति-सूचक गर्दन हिलाई।

उस क्षण उसके चेहरे पर आए भावों को देखकर मेरा दिल भर आया।

‘तब तो तुम एक योद्धा की संतान हो।’ मेरे मुंह से निकला। इसपर लिओनिद हंसने लगा। जब उसके पिता शहीद हुए थे, मेरा मित्र मात्र तीन वर्ष का था। वह इस तथ्य से अनजान है कि उसका जन्मदाता कैसा था। अब वह अपने पिता को केवल फोटो के सहारे जानता है।

‘क्या तुम शादीशुदा हो?’ इस प्रश्न से उसकी उदासी एकाएक छंट गई। मेरी हसरत उसे हंसते हुए देखने की थी। इसमें मैं सफल रहा था।

‘अभी तक तो नहीं। लेकिन बहुत जल्दी मैं शादी कर लूंगा।’ उसने उत्तर दिया।

‘तुम्हारी होने वाली पत्नी कैसी हैं?’ मैंने जानबूझकर पूछा। उसका चेहरा आनंदातिरेक से दमकने लगा। उसने बताया—

‘साठे जी, मेरी भावी पत्नी बहुत सुंदर, सुशील और गुणवंती है। यह सुखद संयोग ही है कि वह मुझे मिली।’

उसके शब्दों में निर्मल गंगा बहती थी। बनावट रंचमात्र भी नहीं थी। मैं उसे समझ चुका था। वह पवित्र अंतकरण से अपनी भावी पत्नी के बारे में बता रहा था।

‘मैं उसकी खूबियां शब्दों में बयान नहीं कर सकता।’

‘काफी है, वैसे भी तुम बहुत कुछ बता चुके हो।’ मैंने परिहास किया।

कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि रूस के युवा हताश हो चुके हैं। वे लैंगिक विकृतियों से घिरे हैं। लाल चौकपर लिओनिद की ओर से मुझे उन सबका जवाब मिल रहा था।

‘सच! क्या तुम अपनी भावी पत्नी से इतना ही प्यार करते हो?’ इस प्रश्न का उत्तर देते समय वह गंभीर हो गया।  अगले ही क्षण अपना हाथ दिल पर रखकर बोला—‘हां।’

रूस के युवा प्रेम को पवित्र मानते हैं। मंगलकारी मानते हैं। अपने हाथों को छाती से लगाते हुए उसने मुझे भरोसा दिया। मनुष्य का हृदय, उसका अंतर्मन ही सबसे पवित्र होता है। इसलिए रूस में लोग अपने अंतकरण को ही ईश्वर का दर्जा देते हैं।

‘क्या फोटोग्राफी से तुम्हारे परिवार का गुजारा हो जाता है?’ इस प्रश्न पर वह हंसने लगा। फिर मानो मेरी समझ पर तरस खाकर बोला—

‘साठे जी भूल गए। यहां समाजवाद है। वह अपने नागरिकों को बेहतर जीवन-सुरक्षा प्रदान करता है।’

आखिरकार मैं निरुत्तर और निर्वाक था। वह प्रश्न पूछकर मैंने गलती की थी। मेरी अज्ञानता एक बार फिर जाहिर हो चुकी थी। मैंने उसी क्षण वैसी गलती फिर कभी न दोहराने का फैसला किया।

मास्को में मैंने अपना पहला भाषण मराठी में दिया था। दो दुभाषिये मेरे पीछे खड़े थे। वह रूसी नागरिकों के समक्ष दिया गया संबोधन था, जो मराठी से इंग्लिश और इंग्लिश से रूसी में अंतरित होकर उन तक पहुंच रहा था। श्रोताओं में मास्को की ख्यातिनाम हस्तियां मौजूद थीं। मैं मराठी में क्या कहने जा रहा हूं, वे सब यह जानने के लिए लालायित थे।

मैंने अपना भाषण इस तरह आरंभ किया था—

‘शायद मराठी में भाषण सुनने का यह आपका पहला अनुभव है। महाराष्ट्र भारत का एक राज्य है, जहां साढ़े तीन करोड़ लोग मराठी बोलते हैं। वे भी आप ही की तरह ईमानदार और साहसी हैं। आपके मिस्टर अफानासी भारत गए थे। उन्होंने अपना पहला कदम मेरे महाराष्ट्र, शिवाजी महाराज की मातृभूमि पर रखा था। मैं यहां उसी राज्य की भाषा मराठी में आपसे संबोधित हूं….।’

मैंने जैसे ही अपना भाषण समाप्त किया, फोटोग्राफरों ने अपने कैमरे तान दिए। मेरा चेहरा उनकी रोशनी से दमकने लगा। उस भीड़ में प्रोफेसर एव्गेनी चेलिशेव से मेरी मुलाकात हुई। वे धाराप्रवाह और अच्छी हिंदी बोलते थे। उन दिनों वे शिवाजी महाराज की जीवनी लिख रहे थे। वे महाराष्ट्र जा चुके थे। पुणे की अनेक सड़कें उन्हें पहचानती थीं। उनके मुंह से सदाशिव[i], शनिवार[ii], शिवाजीनगर जैसे नामों का जिक्र सुन मैं आनंद सागर में गोते खा था। उस घड़ी प्रोफेसर मुझसे ‘जिलब्या मारुति[iii] के बारे में पूछने लगते तो मैं भला क्या जवाब देता? यह सोचकर मैंने तत्काल विषयांतर कर दिया। जब उन्होंने मुझसे शिवाजी महाराज के बारे में पूछा, तो मैंने आसानी से एम. एम. पोतदार, प्रोफेसर एन. आर. पाठक और आचार्य अत्रे के नाम को आगे बढ़ाकर, अपना दामन बचा लिया।

उस समय मुझे लगा कि मास्को के नागरिक मन ही मन—मुंबई, पुणे और दिल्ली की सड़कों की सैर कर रहे हैं। उन्होंने लोकमान्य तिलक, जवाहरलाल नेहरू की जीवनियां प्रकाशित की हैं। बहुत जल्दी वे शिवाजी महाराज की जीवनी प्रकाशित करने वाले थे। रवींद्रनाथ ठाकुर का साहित्य पूरे रूस में पढ़ा जाता है। महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्य रूसी भाषा में पहले ही अनूदित हो चुके थे।

मुझे वहां बहुप्रतिभा संपन्न, गणमान्य हस्तियों का सान्निध्य मिला उससे बेहद खुशी हुई। वहां मुझे जो आनंद मिला, जिस विनोद-भाव की प्रतीति हुई, वैसे अनुभव और आनंदातिरेक के लिए व्यक्ति को मास्को जाना चाहिए और वहां लाल सितारे की छांव में, अपने अंतर्मन में छलछलाती खुशी को दोनों हाथ लुटाना चाहिए। मेरा सौभाग्य था कि मैं लाल सितारे के नीचे खड़े होने के आनंद से सराबोर हो सका।

संदर्भ :

[i] मराठा सेनापति, सदाशिव भाऊ, पानीपत की लड़ाई में शहीद महान योद्धा।

[ii] यहां ‘शनिवार’ का आशय पुणे स्थित ‘शनिवारवाड़ा’ से है। वह  मराठा साम्राज्य के दौर में पेशवाओं की गद्दी थी। इस दुर्ग का निर्माण छत्रपति साहू(साहू भोंसले) के शासनकाल के दौरान 1732 में किया गया था।

[iii] स्थान का नाम। पुणे में जब तक शहरों के स्थान को दर्शाने के लिए पिनकोड नंबर का आरंभ नहीं हुआ था, तब मंदिर ही स्थान-विशेष की पहचान को दर्शाते थे। ‘जिलब्या मारुति गणपति मंदिर’ पुणे के ‘शनिवार चौक’ पर स्थित है।

(अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)

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