संपन्न बाकू : अन्नाभाऊ साठे की ‘मेरी रूस यात्रा’ (छठा अध्याय)

बाकू के खुशनुमा वातावरण में हमारी थकान पलक झपकते हवा हो चुकी थी। हम तुरंत बाहर निकल गए। बाकू शहर को छूता हुआ कैस्पियन सागर है। उसके पीछे एक ऊंची पहाड़ी। पहाड़ी के शिखर पर कामरेड किरोव की भव्य मूर्ति लगी है। समुद्र की तरफ हाथ उठाए। ठीक उसी मुद्रा में जैसे वे भाषण दिया करते थे

अन्नाभाऊ साठे की जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष

[बाकू अज़रबैजान की राजधानी है। ‘बाकू’ का अर्थ है, ‘बुरी हवाओं’ या ‘शैतानी हवाओं का देश’। यहां ठंडी-बर्फीली हवाएं चलती हैं। उसकी जमीन में कच्चा तेल का अथाह स्रोत है, इस कारण लोग उसे ‘तेल के उपर बसा देश’ भी कहते हैं। वही इसकी समृद्धि का असली कारण है। जिन दिनों साठेजी ने वहां की यात्रा की वह सोवियत संघ का हिस्सा था। उस समय भी उसकी साक्षरता दर लगभग शत प्रतिशत थी। जबकि ईरान में पुरुष लगभग 40 और स्त्रियां मात्र 20 प्रतिशत साक्षर थीं। इस अनुवाद हेतु अनुवादक ओमप्रकाश कश्यप ने डॉ. अश्विन रंजनीकर के अंग्रेजी अनुवाद, ‘माई जर्नी टू रशिया’(न्यूवोइस पब्लिकेशन, गुलमोहर अपार्टमेंट, औरंगाबाद) की मदद ली है]

संपन्न बाकू

  • अन्नाभाऊ साठे

सोवियत संघ के शहरों में बाकू चौथे नंबर पर आता है। पहला मास्को, दूसरा लेनिनग्राद, तीसरा खार्कोव और चौथा बाकू। यही उनका क्रम है। हम बाकू पहुंचे ही थे कि रात्रि नौ बजे हामिद साहब हमारे पास आ धमके। आते ही बोले—‘चलो, थोड़ा बाकू घूम आते हैं …’

बाकू के खुशनुमा वातावरण में हमारी थकान पलक झपकते हवा हो चुकी थी। हम तुरंत बाहर निकल गए। बाकू शहर को छूता हुआ कैस्पियन सागर है। उसके पीछे एक ऊंची पहाड़ी। पहाड़ी के शिखर पर कामरेड किरोव की भव्य मूर्ति लगी है। समुद्र की तरफ हाथ उठाए। ठीक उसी मुद्रा में जैसे वे भाषण दिया करते थे—

‘अजरबैज़ान वासियों! इस कैस्पियन सागर में तेलरूपी अपार संपदा छिपी है। आओ! इसे बाहर निकाल लें।’

उस मूर्ति के पैरों के निकट खड़े होकर पूरे बाकू के दर्शन किए जा सकते थे। समूचा दृश्य ऐसे दिखाई पड़ता था, मानो किसी व्यक्ति ने इंद्रधनुष को मोड़कर पृथ्वी पर बिछा दिया हो। फिर उस अद्भुत कृति को ‘बाकू’ नाम दे दिया हो। पूरा शहर इतना अप्रतिम और सुंदर था कि मन उसे देखते ही प्रफुल्लित हो जाता था।

लौटते समय हामिद साहब ने पूछा था—‘शाहिरे अजीज, बाकू कैसा लगा …?’

‘आप बहुत संपन्न हैं।’ मैंने कहा था। लेकिन मेरी बात उन्हें नागवार गुजरी थी। उन्होंने अरुचि से मुंह फेर लिया। बोले—‘धनवान होने का ठप्पा हम पर मत लगाओ। हां, हमें आजाद कह सकते हो।’

‘तुम आजाद हो, इसका मतलब है कि तुम वैभवशाली हो; यानी तुम धनवान हो।’ इस स्पष्टीकरण को सुनकर वे हंसने लगे। 

मैंने कहा—

‘किसी को देखना है तो मास्को को सांझ ढले, लेनिनग्राद को दिन के समय, स्तालिनग्राद के शौर्य को युद्ध-स्थल में; तथा बाकू के सौंदर्य को रात में, यहां से खड़े होकर निहारना चाहिए।’ 

यह सुनकर हामिद साहब की खुशी का ठिकाना न रहा। अजरबैज़ान को कवियों की भूमि कहा जाता है। हामिद साहब को मेरे शब्द इतने पसंद आए कि तत्क्षण उन्हें कविता में ढालकर, उसका पाठ करने लगे।

अगले दिन उसी कविता को मैंने रेडियो पर सुना।

मुझे बताया गया था कि ‘बाकू’ का अर्थ अग्नि होता है। मैं यह सुनकर स्तब्ध था कि आग भला इतनी खूबसूरत कैसे हो सकती है!

बाकू शहर चारों ओर से तेल के कुओं से घिरा था। तेल मायनेआग। ‘बाकू’ के नामकरण के पीछे यह कारण भी हो सकता है।1 बाकू में तेल के सैंकड़ों नहीं, हजारों कुंए थे। उनमें से कुछ सौ वर्ष पुराने थे, तो कुछ मात्र दस वर्ष पहले के। उनमें से कुछ की गहराई तो चार किलोमीटर तक थी। 

धरती की कोख से अपरिमित तेल का दोहन करने के कारण वह देश दिनोंदिन संपन्न हो रहा था। वहां के कारीगर धरती से तेल निकालने में अत्यंत निपुण थे।

खूबसूरत और संपन्न शहर बाकू

अब वे समुद्र पर सवारी गांठ रहे थे। तेल की खातिर प्रकृति से निरंतर संघर्ष कर रहे थे। कैस्पियन सागर के बीचोंबीच उन्होंने छोटा, मगर सुनियोजित नगर बसाया हुआ था। उस शहर को दुनिया से जोड़ने के लिए उन्होंने जो रास्ता बनाया है वह विस्मित कर देने वाला था। 

कैस्पियन सागर में बसे उस शहर के निवासी समुद्र तल में जाकर, वहां से तेल निकालते थे। उस तेल को पाइपलाइन के माध्यम से उचित स्थान तक पहुंचा देते थे। वह अत्यंत कठिन और श्रम-साध्य कार्य था, जिसमें उनका जीवन हर पल दाव पर लगा रहता था। इसके बावजूद वे अपने काम पर डटे रहते थे। न कभी शिथिलता, न ही पलायन। तरह-तरह के उपकरणों तथा यंत्रों की मदद से वे भीषण गर्जना करने वाले कैस्पियन सागर का मानमर्दन कर, तेल का दोहन करते थे। और इस तरह प्रकृति पर जीत प्राप्त करते हैं। उन्हीं के कारण अजरबैज़ान के नागरिकों का जीवन सुख-समृद्धि से भरपूर था। शिक्षार्जन उनकी मूल प्रवृत्ति में शामिल था।

बाकू में हमने एक मस्जिद का भ्रमण किया। वहां काजी साहब ने हमारा स्वागत किया था। लोगों की यह धारणा एकदम गलत है कि सोवियत संघ में धार्मिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध हैं। इस गलतफहमी का जवाब हमें अजरबैज़ान में मिला। वहां अनेक अजरबैज़ानी नागरिक नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में जाते थे। लौटते समय काजी साहब ने मुझसे भारतीय मुसलमानों तक अपना सलाम पहुंचाने का अनुरोध किया। उसे खुशी-खुशी स्वीकारते हुए हमने एक-दूसरे से विदा ली थी। 

उसी दिन हमारी मुलाकात अजरबैज़ान की सर्वोच्च सोवियत (परिषद) के अध्यक्ष से हुई थी। उस आलीशान भवन प्रवेश करते समय रेड आर्मी ने हमें सेल्यूट किया था। इसपर मैं मुस्करा दिया। मैं हैरान था कि कहां मैं और कहां अजरबैज़ान! 

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सर्वोच्च सोवियत के अध्यक्ष बहुत ही प्यारे, विनम्र और बुद्धिमान थे। उन्होंने तहे दिल से हमारा स्वागत-सत्कार किया था। उसके बाद हम बतियाने लगे थे।  

अपनी सोवियत यात्रा के दौरान मैंने अपनी ओर से कभी कोई प्रश्न नहीं किया था। किंतु मैं रूसी नागरिकों के एक-एक शब्द को गंभीरता से लेता था। यात्रा में हमारे साथ चल रहे लखनऊ के मिस्टर पुष्कराज ने प्रश्न किया—

‘आप अजरबैज़ान के राष्ट्रपति हैं। इस नाते आप सोवियत संघ के राष्ट्रपति को किस भाषा में पत्र लिखते हैं?’

प्रश्न  सुनकर वे हंसने लगे। फिर बोले—

‘मैं रूसी और अजरबैज़ानी दोनों भाषाएं जानता हूं। किंतु यदि हमारे राष्ट्रपति अजरबैज़ानी भाषा को नहीं जानते हो, तब अजरबैज़ानी भाषा में पत्र लिखना उनके लिए परेशानी का कारण बनेगा। जबकि हम रूसी नागरिक ऐसा कोई काम नहीं करते जो दूसरों के लिए मुश्किल खड़ी करता हो।’

अगले दिन हमने सामूहिक कृषि परियोजना का निरीक्षण किया। वह बाकू से 180 किलोमीटर दूर थी। रास्ते में हमने अनेक कस्बों के दर्शन किए। पूरा सोवियत संघ मानो किसी चमत्कार से गुजरा था। शहर और कस्बों के जीवन में लेश मात्र भी अंतर नहीं था। विकास के मामले में शहर और कस्बे का अंतर समाप्त हो चुका था। कस्बे शहर से सिर्फ क्षेत्रफल में कम थे। लोग वहां खेती करते थे—इसलिए वे कस्बे कहलाते थे।

हमारी कार नदी के किनारे-किनारे दौड़ रही थी। नदी हल्के-फुल्के जंगल और झाड़ियों के बीच से बह रही थी। उसके पानी में रेत मिला हुआ था। नदी के बीच बालू की एक टेकरी थी। मैंने देखा कि एक आदमी उसपर लेटा हुआ था। उसके वस्त्र अत्यंत मलिन थे। उसे देखकर मुझे लगा कि बेचारा कोई दरिद्र और अभावों का मारा हुआ है। 

गाड़ी रुकते ही मैं फटाफट उससे बाहर निकला। साम्यवादी देश में मुझे वह पहला गरीब और फटेहाल व्यक्ति नजर आया था। उसके बारे में हमीद साहब से पूछते हुए बाकी लोग भी झटपट गाड़ी से उतर आए। उसके बाद एक-एक कर सबने उसे पुकारना शुरू कर दिया। किंतु उसने कोई हरकत नहीं की। उसके चारों ओर पानी ही पानी था। इस कारण हम उस तक पहुंचने में असमर्थ थे। उसके बाद हमने जोर से चिल्लाना आरंभ किया। मगर वह उसी अवस्था में पड़ा रहा। मैंने मान लिया कि वह सचमुच मर चुका है।

आखिर में हमने पत्थर के टुकड़े उसपर फैंके। परंतु एक भी पत्थर उस तक नहीं पहुंच रहा था। हमारी बेचैनी से परे वह शांतिपूर्वक लेटा हुआ था।

अंततः बाकू के मेयर को कामयाबी मिली। उनका फेंका हुआ एक पत्थर सीधे उस व्यक्ति के पेट से टकराया। वह झटपट खड़ा हो गया। इसके साथ ही मेरा भ्रम कि वह मर चुका है, जाता रहा।

‘तुम इस तरह क्यों पड़े हो?’ मेयर ने पूछा। तब अपने सीधे हाथ के अंगूठे को होठों से लगाकर उसने उत्तर दिया—‘मैंने सुबह-सुबह शराब पी ली थी। इस समय में मैं यहां एकांत में धूप का सेवन (सनबाथ) कर रहा हूं।’

उसे निष्पंद लेटे हुए देखकर मैं पहले ही डरा हुआ था। जवाब सुनकर तो मैं हतप्रभ-सा हो गया। तभी मैंने महसूस किया कि उसके कपड़े गंदे नहीं, बल्कि काफी महंगे थे। 

सामूहिक कृषि परियोजनाओं को देखने के पश्चात मैंने एक दोमंजिले भवन में प्रवेश किया था। बाकी सब मेरे पीछे चल रहे थे। वह एक किसान का मकान था। उस घर में कुल 10 लोग रहते थे। उनमें से पांच खेतों में काम करते थे। बाकी पांच बच्चे स्कूल जाते थे। उस घर में मुझे दो रेडियो, एक टेलीविजन, एक टेलीफोन दिखाई पड़ा। उसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग कमरा था। प्रत्येक कमरे में पलंग, गद्दा, दर्पण आदि जरूरत का हर सामान मौजूद था। वहां का दृश्य देख मुझे पुराने नवाबों की समृद्धि याद आ गई।

पूरे रूस में मुझे यही अनुभव हुआ। वहां किसी के भी जीवन में कोई विसंगति नहीं है। सभी एक समान सुखी और समृद्ध थे। मैं उन्हें देखकर अत्यंत रोमांचित था। 

यात्रा के दौरान मैंने रूस को हवाई जहाज से, रेलगाड़ी से, कार से यहां तक कि पैदल चलकर भी देखा था। वहां के सुखी, आनंद-निमग्न, विनम्र और बुद्धिमान लोगों से भी मिला था। मैं ताशकंद से बाकू की यात्रा पर था। वह बहुत लंबी यात्रा थी। उस यात्रा के दौरान मुझे एक भी गरीब, भिखारी, फटेहाल, आलसी और निकम्मा आदमी दिखाई नहीं पड़ा था। उसका एकमात्र कारण था—समाजवाद।

कामरेड लेनिन उस समाजवादी दुनिया के वास्तुकार थे। वह एकदम नई और खूबसूरत दुनिया, मुझे स्वप्न-सृष्टि जैसी लगती थी। मैं सपनों की उसी दुनिया में भ्रमण कर रहा था। 

रूसी लोग खूब खाते और अच्छा खाते थे। अच्छा पीते और लंबा आराम फरमाते थे। इसलिए कि वे बहुत परिश्रम करते थे। उनके लिए काम ही पूजा था। लोग जैसे धर्म का पालन करते हैं, उसी शिद्दत के साथ वे अपने कर्तव्यपालन में जुटे रहते थे। यही उनकी उन्नति का असली कारण था।

जिस जोशोजुनून के साथ वे अपनी फैक्ट्रियों और कल-कारखानों को प्यार करते थे, वैसे ही जोशोजुनून के साथ वे कला को भी चाहते थे। रूसी नागरिक बड़े ही कलाप्रेमी होते हैं। इसका अनुभव मुझे प्रख्यात बोशोई थियेटर में हुआ। मैंने वहां एक ‘पत्थरों के फूल’ नामक संगीत नाटक देखा। उस समय थियेटर की एक भी कुर्सी खाली नहीं थी। पूरा हॉल दर्शकों से खचाखच भरा था। सामने मंच पर दो सौ कलाकार एक साथ लय और सुरुचिपूर्ण ढंग से अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे। दो सौ वाद्य यंत्रों से निकले हृदय-स्पर्शी और मधुर संगीत से पूरा वातावरण मानो साथ-साथ गुंजायमान था। 

मुझे लगा कि उन्होंने अपनी कला से मंच पर संगीत का अत्यंत खूबसूरत इंद्रधनुष रच दिया है। उनकी प्रत्येक स्वर, तान और भंगिमा पर दर्शक, संगीत निदेशक को बार-बार सराहकर, उसे खूब शाबाशी दे रहे थे। उससे पता चलता है कि प्रत्येक क्षेत्र में रूसी नागरिकों का जीवन सफलता के शिखर को छू चुका था। 

मुझे मास्को, लेनिनग्राद, स्तालिनग्राद तथा बाकू के जीवन में कोई अंतर नजर नहीं आया। हालांकि नगर योजना और निर्माण-शैली का खूबसूरत अंतर वहां हर जगह मौजूद था। 

बाकू में तीन दिनों के सैर-सपाटे के बाद हमने अजरबैज़ान की राजधानी, उस शानदार बाकू शहर को अलविदा कहा। उस समय (मेरे प्यारे) हमीद साहब बहुद उदास दिख रहे थे। वे मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं थे। मैं भी बहुत उदास था।

(अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)


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