अन्नाभाऊ साठे की कालजयी कृति : मेरी रूस यात्रा (सातवां अध्याय)

अन्नाभाऊ साठे के मुताबिक, भारत की तरह मास्को में भी, जहां जाओ वहां वजन मापने जैसी मशीनें लगी हुई थीं। अंतर बस इतना था कि भारत में ये मशीनें वजन के साथ भाग्य बताती हैं तो मास्को में ये मशीनें दो रूबल डालने पर, वजन बताने के साथ-साथ प्याला भर ठंडा शरबत भी देती थीं। वे दर्शाती थीं कि रूस में मशीनें भी अतिथियों का सम्मान करती हैं

अन्नाभाऊ साठे की जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष

अन्नाभाऊ साठे मराठी के शीर्षतम साहित्यकारों में से हैं। उनकी कृति ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत कहा जाता है। उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर, आठ अध्यायों में फैले इस यात्रा-वृतांत के सातवें अध्याय ‘कला निकेतन’ का हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत है। इस अध्याय में अन्नाभाऊ साठे बता रहे हैं ताशकंद और मास्को के अनुभव। अन्नाभाऊ की सहज-सरल भाषा और किस्सागोई शैली पाठक को लगातार अपनी ओर खींचती है। अनुवाद के लिए मूल रचना ‘माझा रशियाचा प्रवास’ के अलावा डॉ. अश्विन रंजनीकर के अंग्रेजी अनुवाद, ‘माई जर्नी टू रशिया’ (न्यूवोइस पब्लिकेशन, औरंगाबाद) से भी मदद ली गई है

कला निकेतन

  • अन्नाभाऊ साठे

ठीक सात बजे हमारा विमान ताशकंद हवाई अड्डे पर उतरा। सूरज अस्ताचलगामी था, किंतु हमारे ताशकंदवासी मित्रगण हवाई अड्डे पर जमा थे। अनेक उत्साहित युवक-युवतियां फूलमालाओं के साथ वहां हमारे स्वागत हेतु मौजूद थे।

उस भीड़ में कामरेड नबी मोहम्मद सबसे आगे थे। वे दिखने में सिने-अभिनेता जैसे थे। बहुपुरस्कृत साहित्यकार होने के साथ-साथ वे हिंदी, उर्दू, अरबी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी जैसी कई भाषाओं में निष्णात थे। उन्होंने हाल ही में भारतीय उर्दू कवि सरदार जाफरी की कविताओं का उजबेकी भाषा में अनुवाद किया था। वे भारतीय-रूसी मैत्री क्लब के सचिव भी थे। उन्होंने आगे बढ़कर हमारा स्वागत किया। हम उसी क्षण एक-दूसरे के मित्र बन गए। 

वर्षों पहले उजबेकिस्तान को बंजर रेगिस्तान के रूप में जाना जाता था। रूस की महान समाजवादी क्रांति की सफलता के सात वर्षों के बाद, वह सोवियत संघ का सदस्य बना था। उसके बाद उसने तरक्की की ऐसी रफ्तार पकड़ी कि आज वह प्रगति की सभी सीमाओं को पार कर चुका है। सूखे रेगिस्तान में वह नंदन कानन जैसा प्रतीत होता था। वहां के श्रम-जीवी नागरिकों ने अपने कौशल से बंजर भूमि को भी उपजाऊ बना दिया था।

सोवियत संघ के घटक राज्य के रूप में उजबेकिस्तान की उन्नति देख कोई भी दांतों तले उंगली दबा लेगा। आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। कुछ समय पहले तक वहां बहुत भयंकर बुर्का प्रथा थी। स्त्रियों का बुर्के में रहना अनिवार्य था। आज वहां एक भी स्त्री बुर्के में नहीं दिखती। आज वे सभी महत्वपूर्ण पदों पर मौजूद हैं। उजबेकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष के पद पर एक स्त्री का आसीन होना इसका सर्वोत्तम उदाहरण था। वहां शत-प्रतिशत साक्षरता थी। मैं जहां-जहां भी गया, वहां मैंने सोवियत संघ की प्रगति के दर्शन किए थे। इसके साथ-साथ मैंने वहां कला और संस्कृति को भी खूब फलते-फूलते देखा। सोवियत नागरिक कला के दीवाने थे। 

1950 के दशक में रूस की राजधानी मास्को शहर की तस्वीर और इनसेट में अन्नाभाऊ साठे की तस्वीर

भारत की तरह मास्को में भी, जहां जाओ वहां वजन मापने जैसी मशीनें लगी हुई थीं। अंतर बस इतना था कि भारत में ये मशीनें वजन के साथ भाग्य बताती हैं तो मास्को में ये मशीनें दो रूबल डालने पर, वजन बताने के साथ-साथ प्याला भर ठंडा शरबत भी देती थीं। वे दर्शाती थीं कि रूस में मशीनें भी लोगों का अतिथि की तरह सम्मान करती हैं। 

ठंडा शरबत देने वाली मशीन से लेकर दिग-दिगंत की यात्रा करने वाले रॉकेट तक, प्रत्येक क्षेत्र में रूस की प्रगति सर्वख्यात थी। मैंने उनके द्वारा छोड़े गए रॉकेटों को तो नहीं, उन्हें अंतरिक्ष से लौटते हुए अवश्य देखा था। मगर उन सभी उपलब्धियों को बिसराकर मैं सोवियत संघ की विस्मयकारी कला-संस्कृति का आनंद ले रहा था। 

मास्को के बोल्शेवियन थियेटर में मैंने ‘चट्टानों का फूल’ शीर्षक बैले (नृत्य नाटिका) को देखा था। प्रथम दृष्टि में ही उस नाट्यगृह ने मुझे अपने सम्मोहन में बांध लिया था। उसकी भव्य रचना, स्वर्णाभा से दीप्त उसकी वीथियां, विशालकाय रंगमंच, लाल मखमली गद्देदार कुर्सियां आदि वहां सभी कुछ अनूठा और अप्रतिम था। वहां मौजूद प्रत्येक वस्तु नाट्यशाला के सौंदर्य तथा प्रतिष्ठा को चार-चांद लगा रही थी।

संगीत नाटिका में सैकड़ों कलाकार अलग-अलग वाद्यों से इंद्रधनुषी संगीत की सर्जना कर रहे थे। उनकी लय पर सैंकड़ों कलाकार अपनी खूबसूरत कला के प्रदर्शन में लीन थे। सभी लयबद्ध थे। एक भी कलाकार लयविहीन नहीं था। एक युवती अपने पैर के अंगूठे पर लट्टू की भांति तेज-तेज घूम रही थी। रूसी लोग अपने कलावंतों से कितना लाड़-प्यार करते हैं—उसे मैं देख ही चुका था। नाटिका के समापन पर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उसके बाद सभी कलाकार मंच पर पधारे। उनके आते ही हॉल एक बार पुनः तालियों से गूंजने लगा। उन तालियों में हर्ष, प्रोत्साहन तथा अपने कलावंतों के प्रति मान-सम्मान आदि सभी कुछ शामिल था।

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मास्को में मैंने एक और नाटक भी देखा था। उसे बच्चों द्वारा, बच्चों के लिए प्रस्तुत किया गया था। असल में वह नाट्यशाला ही नन्हे दर्शकों के लिए थी। वहां उनके लिए नियमित कार्यक्रम होते रहते थे। हैरानी की बात यह थी कि उस नाट्यशाला में नन्हे दर्शकों की भीड़ लगी रहती थी। टिकट खरीदने के लिए उन सभी को कतारबद्ध होना पड़ता था।

मैं उनके रंग-बिरंगे वस्त्रों, अलग-अलग छवियों तथा भिन्न कद-काठियों को देखकर विस्मित था। उनका नटखटपन बेहद लुभावना था। 

रूसी नाट्यशालाओं में, नाटकों की शुरुआत से पहले घंटी की कर्कश ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती। प्रेक्षागृह में दर्शकों के सीट ग्रहण कर लेने पर तथा नाटक के बीच में, लाइटें आवश्यकतानुसार बार-बार जलती-बुझती रहती थीं।

लेनिनग्राड में मैंने एक फिल्म देखी थी। विलंब से पहुंचने के कारण मुझे पहली कतार में सीट मिल पाई थी। जैसे ही फिल्म आरंभ हुई, मुझे लगा कि पूरा सिनेमाघर पहियों पर दौड़ रहा है। मैं सबसे आगे की सीट पर बैठा हुआ, विस्मय से इधर-उधर नजरें दौड़ा रहा था। सहसा मुझे लगा कि मैं एक बड़े झरने के सामने हूं। निरंतर करीब आती उसकी बौछारें अगले ही क्षण मुझे भिगो देंगी। मैंने घबराकर अपनी गर्दन झुका ली। उसे देख मेरे आसपास के दर्शक हंसने लगे। मैं अपनी हरकत पर शर्मिंदा था।

उसके बाद एक कामरेड लेनिन की विशालकाय मूर्ति प्रकट हुई। तत्क्षण उसने भाषण देना आरंभ कर दिया। भाषण के दौरान मूर्ति ने अपना हाथ, ठीक उसी ऐतिहासिक मुद्रा में ऊपर उठाया, जैसे अक्टूबर क्रांति के दौरान कामरेड लेनिन उठाया करते थे। अगले ही क्षण पहले दरवाजे को तोड़कर क्रांतिकारी भीतर घुस आए। फिल्म निर्माण में प्रयुक्त तकनीक असाधारण थी। वह अपने दर्शकों को पूरे रूस के दर्शन करा रही थी। कभी रेलगाड़ी के माध्यम से तो कभी हवाई जहाज की उड़ान के जरिए। 

हम ताशकंद हवाई अड्डे पर उतरे। उसी दिन हम ‘दिलाराम’ नाटक देखने निकल पड़े। नाटक बड़ा ही शानदार था। हम थियेटर देर से पहुंचे थे। नाटक आरंभ हो चुका था। एक भी टिकट उपलब्ध नहीं था। हम किंकर्तव्यविमूढ अवस्था में इधर-उधर देख रहे थे। इस बीच हमारे पहुंचने का समाचार, किसी तरह थियेटर में मौजूद दर्शकों तक पहुंच गया। बस फिर क्या था, आठ दर्शक थियेटर छोड़कर बाहर आ गए। अपने टिकट हमें सौंप वे अपने रास्ते चल दिए। उसके बाद हम उनकी सीटों पर जाकर बैठ गए। उन लोगों की संवेदना तथा अतिथियों का मान-सम्मान करने के पीछे निहित उदात्त भावना, हमारे लिए अनुकरणीय थी।

कामरेड नबी ने मुझे बताया था कि इस तरह के नाटकों के प्रदर्शन हेतु उनकी सरकार करोड़ों रूबल खर्च करती है। मेरे लिए वह बिलकुल नई सूचना थी। जिस नाटक के मंचन पर रूसी सरकार करोड़ों रूबल खर्च करती है, वह देखने में कैसा होगा? इस भावबोध के साथ मैं उस नाटक को ध्यानपूर्वक देख रहा था। 

नाटक के पहले दृश्य से ही मुझे अनुभव हुआ कि साम्यवादी रूस में रंगमंच अपने चरम वैभव को छू चुका था।  

मंच पर अनेक कलाकार अपने-अपने प्रदर्शन में लीन थे। कभी वे पुराने समय के बड़े बाजारों को दर्शाने लगते। कभी पुष्पमालाओं की तरह मंच पर छा जाते। भव्य राजमार्गों, उच्च अट्टालिकाओं, आलीशान प्रासादों, उजाड़ जेलों, मोटी और भारी-भरकम हथकड़ियों तथा हट्टे-कट्टे सैनिकों को देखते हुए मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा था।

नाटक का कथानक बहुत साधारण था। एक गरीब लड़की चित्रकार से प्रेम करती थी। एक बार एक बेहराम (फारसी नाम, ऐसे क्रूर योद्धा का प्रतीक जो अनेक युद्धों में जीत हासिल कर चुका हो) के हाथों पड़ गई। बेरहाम ने उसे बलात् अपनी रानी बना लिया। एक बार वह रानी पालकी में सवार होकर बाजार पहुंची। वहां एकाएक उसकी मुलाकात चित्रकार से हुई। एक-दूसरे को देखकर दोनों के मुरझाए मन फिर खिल उठे। समाचार राजा तक पहुंचा तो उसने चित्रकार को पकड़वाकर जेल में डाल दिया। कुछ अंतराल के बाद रानी अपने चित्रकार प्रेमी के साथ भाग निकलती है। भागते-भागते भीषण तूफान में घिरकर दोनों अपने प्राण गंवा देते हैं। 

इस सीधे-सरल कथानक इतने कलात्मक ढंग से नाटक में ढाला गया था कि वह दर्शकों को आसानी से सम्मोहित कर लेता था। नाटक कला के साथ-साथ तकनीक के स्तर पर भी समृद्ध था। रेगिस्तानी तूफान की आभासी प्रस्तुति के लिए बिजली की मदद ली गई थी। भयानुभूति के बावजूद मैं पूरी तन्मयता के साथ उस नाटक को देख रहा था। 

एक दृश्य पर अचानक मेरी हंसी छूट गई। इसपर मेरी कतार में बैठे एक दर्शक ने पूछा—

‘क्या आपको रूसी भाषा आती है?’ (मैं चुप रहा)

‘फिर आप हंसे क्यों थे?’

‘सच्ची कला सीधे दिल से संवाद करती है। उसे सुनने के लिए कानों की जरूरत नहीं पड़ती।’ दूसरा प्रश्न सुनने के बाद मैंने उसे उत्तर दिया। 

नाटक एक गुलाम युवती द्वारा, निर्दयी राजा के अत्याचारों के विरुद्ध सच्चे प्रेम की खातिर किया गया आत्मबलिदान था। वह हर पहलु से सच्चे और समर्पित प्रेम की अनूठी दास्तान थी, जो प्राचीन राजा-महाराजाओं के दरबारों तथा राजमहलों में होने वाले अन्याय तथा क्रूरता को बयान करती थी। बताती थी कि उन दिनों के राजा-महाराजा कितने निर्मम-निर्दयी हुआ करते थे। कर-संग्रह का पुराना दमनकारी तरीका, कैदियों का जीवन, राजदरबार में होने वाले छल-प्रपंच और धोखादड़ी को नाटक के कथानक में बड़ी खूबसूरती से पिरोया हुआ था।

हर कलाकार ने अपने पात्र में जान डाल देने वाला अभिनय किया था। दिलाराम का अभिनय कर रही स्त्री तो मानो कला का साक्षात अवतरण थी। दिलाराम की भूमिका में उस स्त्री द्वारा चित्रकार को अपने हृदय का आवेगमय समर्पण, उसकी एक-एक भंगिमा दर्शकों के लिए स्तब्धकारी थी। ऐसे ही बेहराम द्वारा उसे बलात् रानी बनाने वाला दृश्य, हृदयों को तार-तार देने वाला था। उस समय, उसकी एक-एक मुद्रा, अभिनय का लघुत्तम बिंदु, एक-एक पल यह दर्शाता था कि प्यार को बलपूर्वक हासिल कर पाना असंभव है। बिना किसी शब्द के, उसने भरोसा दिलाया था कि प्यार शाश्वत है। वह कभी नहीं मरता।

नाटक देखने के बाद हम बाहर निकले तो कामरेड नबी ने पूछा—‘नाटक कैसा लगा?’

‘यह नाटक सच्चे प्यार का अप्रतिम स्मारक है, जिसे सोवियत सरकार ने करोड़ों रूबल खर्च करके बनवाया है।’ मैंने कहा था—

‘सही मायने में तो यह पूरा देश ही भव्य कला-निकेतन है।’

(अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)


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