पृथक धर्म कोड को लेकर जंतर-मंतर पर आदिवासियों ने किया आर-पार की लड़ाई का आह्वान

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बयानों के बीच विभिन्न आदिवासी समुदायों के लोगों ने मांग तेज कर दी है कि उनके लिए जनगणना प्रपत्र में पृथक धर्म कोड हो। इसके लिए बीते 15 मार्च को जंतर-मंतर पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बता रहे हैं सुशील मानव

हाल के दिनों में जनगणना में आदिवासियों के लिए पृथक धर्म कोड की मांग जोर पकड़ने लगी है। बीते 21 फरवरी, 2021 को झारखंड के मुख्यमंत्री हेेमंत सोरेन ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के तत्वावधान में आयोजित वर्चुअल कांन्फ्रेंस में यह कहकर मामले को सुर्खियों में ला दिया कि आदिवासी समुदाय न कभी हिंदू थे और न आज हैं। उनके बयान के बाद आरएसएस के समर्थकों में खलबली मची और आनन फानन में झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने बयान जारी किया कि आदिवासी हिंदू हैं। 

इसी बीच बीते 15 फरवरी, 2021 को एक बड़ा कार्यक्रम दिल्ली के जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय आदिवासी इन्डीजिनस धर्म समन्वय समिति के तत्वावधान में आयोजित किया गया। इस मौके पर सभी वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं और उनके लिए जनगणना प्रपत्र में अलग कोड का प्रावधान हो। साथ ही, इस अवसर पर विभिन्न आदिवासी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग भी की गई। कार्यक्रम के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ज्ञापन भेजा गया। इस अवसर पर झारखंड, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से आए आदिवासी समुदायों के अनेक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया तथा अपनी बात रखी।

1961 की जनगणना में आदिवासियों के साथ हुआ छल

कार्यक्रम के दौरान समिति के मुख्य संयोजक अरविंद उरांव ने अपने संबोधन में कहा कि ब्रिटिश काल में हुई भारत की पहली जनगणना 1871-72 में ‘ऐबरिजनल’ नाम से एक पृथक कॉलम आदिवासियों के लिए था। एक दशक बाद 1881-82 में हुई दूसरी जनगणना प्रपत्र में भी धार्मिक कोड-7 में एबोरिजिनल नाम से आदिवासियों के लिए पृथक कॉलम था। 1901-02 में हुए तीसरी जनगणना और 1911-12 में हुए चौथी जनगणना में आदिवासी समुदाय के लिए ‘एनिमिस्ट’ नाम से एक अलग धर्म कॉलम था। इसके बाद साल 1921-22 में हुए पांचवीं जनगणना और 1931-32 में छठी जनगणना में ट्राइबल रिलिजन के नाम से आदिवासी समुदाय के लिए अलग धर्म कॉलम मौजूद था। वहीं 1941-42 में हुई सातवीं जनगणना में ‘ट्राइब्स’ के नाम से पृथक धर्म कॉलम आदिवासी समुदाय के लिए दिया गया था। इसी तरह 1951-52 में हुई आठवीं जनगणना में भी शिड्यूल ट्राइब्स के नाम से पृथक धर्म कॉलम मौजूद था। लेकिन वर्ष 1961-62 की जनगणना प्रपत्र से आदिवासियों का पृथक जनगणना के धर्म कॉलम को विलोपित कर आदिवासी समुदाय की पहचान और अस्मिता पर हमला किया गया। आदिवासी समुदाय को हिंदू धर्म के कॉलम में समावेशित करके उनकी पहचान मिटाने का उपक्रम किया गया। जबकि भारत के संविधान एवं सरकारी रिपोर्ट के अनुसार आदिवासियों की परम्परा एवं संस्कृति अन्य धर्मों से भिन्न और अलग है। अतएव उन्हें विलुप्त कर देना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है। इसलिए हम मांग करते हैं कि सरकार हम आदिवासियों के लिए जनगणना प्रपत्र में पृथक धर्म कोड का प्रावधान करे।

जंतर-मंतर पर जुटे विभिन्न राज्यों के आदिवासी प्रतिनिधि

कार्यक्रम को नीतिशा खलखो, राजकुमार कुंजाम, बिगू उराँव, विकास मिंज, प्रह्लाद सिडाम, गुरु जी  रावेन इनवाते , डॉ. हीरा मीणा, नारायण मरकाम, तेज कुमार टोप्पो, धीरज भगत, मनोज गोंड़, अरविंद मरावी, राजमोहन भगत,  अनिल भगत,  भूपेन्द्र भाई चौधरी, बागी लकड़ा,  डॉ. यालेम, डॉ. महाविष्णु, एसटेलिन एनती आदि ने भी संबोधित किया।

इन कारणों से हो रहा बाबूलाल मरांडी का विरोध

अरविंद उरांव ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि हम लोगों ने बाबूलाल मरांडी के बयान का विरोध किया है और इसके लिए कार्यक्रम का आयोजन भी किया है। हम अपना आंदोलन लंबे समय से चला रहे हैं जिसके केंद्र में जनगणना प्रपत्र में आदिवासी समाज के लिए पृथक धर्म कोड की मांग है। बाबूलाल मरांडी के बयान को बेतुका करार देते हुए उन्होंने कहा कि जनजाति समाज जन्म से ही हिंदू करार देना उनकी पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता को दर्शाता है। इससे पहले जब वे भाजपा में नहीं थे तब उनके विचार कुछ और थे। पार्टी बदलने के साथ ही उनके विचार बदल गए। इससे साफ पता चलता है कि आदिवासियों के अस्तित्व, आस्था और उनके पहचान का समूल नष्ट करने की गहरी साजिश रची जा रही है। 

अरविंद उरांव ने आगे कहा कि पिछले दिनों हेमंत सोरेन सरकार की पहल पर झारखंड विधानसभा द्वारा जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों के पहचान के लिए सरना आदिवासी धर्म कोड के संबंध में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया तब मरांडी चुप बैठे थे। लेकिन आदिवासियों के अस्तित्व के लिए दो कदम आगे बढ़ते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगत मोहन रेड्डी के द्वारा भी केंद्र सरकार अनुशंसा पत्र भेजे जाने के बाद मरांडी ने केवल राजनीतिक लाभ के लिए आदिवासियों के हितों के विरुद्ध बयान दिया। 

(संपादन : नवल)


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