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आंबेडकर, जिन्होंने इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ा

डॉ. आंबेडकर की इतिहास की दृष्टि विश्व समेत भारत के इतिहास की घटनाओं का समुचित आकलन करने में न सिर्फ समर्थ थी, वरन् उन्होंने इतिहास के ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बिल्कुल पलट कर रख दिया। बता रहे हैं देवेंद्र शरण

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एक इतिहासकार के लिए पैनी दृष्टि और निष्पक्षता के साथ-साथ पूर्वाग्रह से मुक्त होना आवश्यक गुण माना है। यह मानना है कि “एक कथन है– एक इतिहासकार को सटीक, ईमानदार, निष्पक्ष, दोषरहित, रुचि, भय, क्षोभ और पूर्वाग्रह से मुक्त सत्यनिष्ठ होना चाहिए, जो इतिहास का मूल है। वह उन महान घटनाओं का संरक्षक, उपेक्षा का शत्रु, अतीत का साक्षी और दूरदर्शी होना चाहिए। संक्षेप में वह मुक्त विचारों वाला हो, पर उसका दिमाग खाली न हो और प्रत्येक साक्ष्य की निरख-परख करे चाहे वह उमिश्रित भी क्यों न हो। … मैं निश्चय के साथ कह सकता हूं कि मैंने अपनी इस खोज में स्वयं को पूर्वाग्रह से मुक्त रखा।”[1]

अन्य इतिहासकारों की तरह ही उन्हें भी इतिहास के बीच की कड़ियां, जो टूटी हुई हैं, उन्हें जोड़ने में व्यवधान आया। प्राचीन भारतीय इतिहास में सिकंदर के आक्रमण से पूर्व की ऐतिहासिक तिथियां निश्चित नहीं हैं। रोमिला थापर ने इसे अंतर्निहित इतिहास कहा है। “अंतर्निहित इतिहास उसे कहते हैं, जिसके अंदर से ऐतिहासिक चेतना को चुन-छांट कर निकालना पड़ता है।” भारतीय इतिहास के बारे में बात करते हुए आंबेडकर माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन की बात रखते हैं कि “सिकंदर के आक्रमण से पूर्व भारतीय इतिहास को कोई तिथियां निश्चित नहीं हैं और इस्लामी विजय के पूर्व वास्तविक घटनाओं के बीच कोई संपर्क सूत्र नहीं है।” आगे डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि “मैं सोचता हूं कि ऐसे मामले में उसे (इतिहासकार) अपनी कल्पनाशक्ति और अंतर्दृष्टि से काम लेना चाहिए ताकि ज्ञात तथ्यों और टूटे हुए सूत्र जुड़ सके। मैं स्वीकार करता हूं कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय मैंने टूटे सूत्रों को जोड़ने के लिए यही मार्ग अपनाया।”[2]

डॉ. आंबेडकर की इतिहास की दृष्टि विश्व समेत भारत के इतिहास की घटनाओं का समुचित आकलन करने में न सिर्फ समर्थ थी, वरन् उन्होंने इतिहास के ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बिल्कुल पलट कर रख दिया। उन्होंने लिखा कि “प्राचीन भारत के इतिहास का काफी हिस्सा बिल्कुल भी इतिहास नहीं है। ऐसा नहीं कि प्राचीन भारत बिना इतिहास का है।” आगे लिखते हैं कि “प्राचीन भारत के इतिहास से पर्दा हटाया जाना चाहिए। इस उद्घाटन के बिना प्राचीन भारत इतिहासविहिन रह जायेगा। सौभाग्य से बौद्ध साहित्य की मदद से प्राचीन इतिहास को उस मलबे से खोदकर निकाला जा सकता है, जिस मलबे के नीचे ब्राह्मण लेखकों ने पागलपन में उसे दबा कर रख दिया है।”[3]

बौद्ध साहित्य से बहुत हद तक मलबा हटाने व उसके नीचे छिपे तत्व बिल्कुल स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। मसलन, बौद्ध साहित्य बतलाता है कि देव कोई देवता नहीं, मानव समुदाय से ही थे। नाग दो प्रकार के थे– अंडे से पैदा हुए नाग (सांप) और महिला की कोख से पैदा हुए मानव जो नागंवशीय थे। इसके अलावा डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि असुर भी राक्षस नहीं, जन विशेष मानव थे। असुर दैत्य परिवार नहीं, मानव परिवार के सदस्य थे।[4]

डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि बौद्ध धर्म एक क्रांति थी। यह फ़्रांस की क्रांति की जितनी ही महान थी। यह धार्मिक क्रांति से शुरू होकर सामाजिक और राजनैतिक क्रांति बन गई। यह समझने के लिए कि इस क्रांति का चरित्र कितना गूढ़ है, यह जानना जरूरी है कि क्रांति से पहले भारतीय समाज की स्थिति कैसी थी। बुद्ध के महान सुधारों को समझने के पहले प्राचीन भारतीय आर्यों की सभ्यता की विकृत स्थिति पर विचार करना डॉ. आंबेडकर ने जरूरी समझा।

उस समय आर्य समुदाय सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से सबसे निकृष्ट विलासिता में डूबा हुआ था। आर्यों के लिए जुआ खेलना ना सिर्फ मनोरंजन था, वरन् बड़े-बड़े दांव लगाए जाते थे। राजा नल सबकुछ हार कर जंगल में भिखारी के रूप में रह रहे थे। महाभारत से पता चलता है कि युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाइयों सहित अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया था।[5] शराब पीना दूसरी बुराई थी। शराब दो प्रकार की हुआ करती थी। सोम और सुरा। “महाभारत में एक प्रसंग है कि एक बार कृष्ण और अर्जुन ने अत्यधिक सोमरस पान कर लिया था।” महिलाओं में भी शराब पीने की आदत थी। शराब हर वर्ग की महिलाएं पिया करती थी। राजा विराट की पत्नी सुदेशना[6] ने अपनी सहायिका सैरंज्री को कहा कि कीचक के महल से शराब लेते आओ, क्योंकि वह शराब पीने के लिए मरी जा रही है।[7]

आर्य समाज में यौन नैतिकता अत्यंत खराब थी। वशिष्ठ ने अपनी पुत्री शतरूपा के वयस्क हो जाने पर उससे विवाह किया।[8] मनु ने अपनी पुत्री इला से विवाह किया। जह्नु ने अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया। सूर्य ने अपनी पुत्री ऊषा से विवाह किया। बहुपति प्रथा और बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी।[9] कुमारी के लिए कौमार्य का कोई नियम नहीं था। कोई कन्या बिना विवाह के संतान उत्पन्न कर सकती थी।

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आर्यों के धर्म में यज्ञ और बलि का समावेश था। पारंपरिक यज्ञों की संख्या 29 थी। यज्ञों में बलि चढ़ाई जाती थी। दक्षिणा में पुरोहितों की बड़ी संख्या में गाय, घोड़े और स्वर्ण देने होते थे। नर बलि सबसे महंगी होती थी। शर्त यह थी कि वध किए जाने वाला व्यक्ति न तो पुरोहित हो और ना ही दास हो। दूसरे स्थान पर घोड़े की बलि थी। बलि से पहले बलि चढ़ानेवाले की पत्नी को उस घोड़े के साथ मैथुन करना होता था। नर बलि की जगह बाद में ब्राह्मणों ने मिट्टी के बने नर की बलि की मंजूरी दे दी। बलि के कारण बड़ी संख्या में निर्दोष पशुओं की हत्या होने लगी।[10]

डॉ. आंबेडकर ने यह बताया है कि बुद्ध के जन्म के समय आर्य समाज अनैतिक, भोग विलास में डूबा हुआ था। बुद्ध ने ऐसे समय में अपने आचरण को एक शीलवान पुरुष, जो काम, क्रोध, लोभ, हिंसा से दूर हो और प्रकृति के प्रति पूर्ण आस्था रखे, के रूप में ढाला। ताकि वे अच्छे और विशुद्ध जीवन का आदर्श प्रस्तुत कर सकें। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि “वह, पवित्र जीवन व्यतीत करने का उदाहरण प्रस्तुत करके ही नहीं रूक गए। वह (बुद्ध) समाज के सामान्य स्त्री-पुरुषों के चरित्र को भी बनाना चाहते थे। इसके लिए पंचशील सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जो ये हैं[11]

  1. हत्या करना, 2. चोरी न करना, झूठ न बोलना, 4. कामुक ना बनना, 5. मादक पेयों का सेवन न करना।

डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म के दो गुणों की चर्चा की, एक प्रेम दूसरा विवेक। बुद्ध ने वेदों की सत्ता को अस्वीकार किया। डॉ. आंबेडकर के अनुसार “बुद्ध ने जाति प्रथा के विरुद्ध केवल प्रचार ही नहीं किया, अपितु शूद्र और अछूत जातियों के लोगों को भिक्षु का दर्जा दिलाया, जिनका बौद्ध धर्म में वही दर्जा है, जो ब्राह्मणवाद में ब्राह्मण का।” डॉ. आंबेडकर ने इसका प्रमाण देते हुए कहा कि उनके संघ के सर्वाधिक प्रख्यात सदस्य थे उपालि, जिनका उल्लेख गौतम बुद्ध के बाद प्रमुख अधिकारी के रूप में किया जाता था। वह पहले नाई का काम करते थे, जिसे घृणित पेशा माना जाता था। इस प्रकार सुनिता, जो आदिवासी थी, जिसके पदों को थेरीगाथा में संकलित करने के लिए चुना गया था। नन्दा एक चरवाहा था। कापा एक मृग आखेटक की पुत्री थी। पुन्ना और पुर्निका दास कन्याएं थीं। सुमंगलमाता श्रमिकों की पुत्री और पत्नी थी। शुभा लोहार की बेटी थी। इसी प्रकार थेरीगाथा में वर्णित साठ थेरियों की सामाजिक स्थिति का पता चलता है। इनमें से साढ़े आठ प्रतिशत निम्न जातियों में जन्मीं थीं। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, “जिस प्रकार बुद्ध ने शूद्रों और अछूत जाति के मनुष्यों को भिक्षुकों का सर्वोच्च दर्जा दिलाकर उनकी स्थिति उन्नत कर दी, उसी प्रकार उन्होंने स्त्रियों की स्थिति को भी ऊंचा उठाया।” जबकि आर्य समाज में स्त्री और शूद्रों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे।[12]

ब्राह्मणवाद के अंतर्गत आर्य समाज के नेताओं की इस धारणा के खिलाफ बुद्ध ने लड़ाई लड़ी कि शिक्षा का अधिकार शूद्रों और स्त्रियों को नहीं है। बुद्ध ने न सिर्फ इस सिद्धांत की निंदा की, वरन् बुद्ध और ब्राह्मणों के बीच संवाद से पता चलता है कि बुद्ध समस्त लोगों के लिए शिक्षा का द्वार खोलना चाहते थे।

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956)

डॉ. आंबेडकर मानते हैं कि “वैदिक काल के अवनति के दिनों में शूद्रों और स्त्रियों का स्थान बहुत नीचे हो गया था। बौद्ध धर्म के अभ्युदय ने इन दोनों की स्थिति में महान परिवर्तन ला दिया। संक्षेप में कहें तो यह कि बौद्ध काल में शूद्र सम्पत्ति, विद्या अर्जित कर सकता था और यहां तक कि राजा बन सकता था।… इस प्रकार परिवर्तन स्त्रियों के संबंध में भी मिलते हैं। बौद्ध धर्म में अधीनों को स्वतंत्र स्थान मिला। विवाह हो जाने के बाद भी उसका स्थान स्वतंत्र रहा। बौद्ध धर्म में विवाह एक संविदा था। बौद्ध धर्म के अनुसार वह संपत्ति अर्जित कर सकती थी और उसी पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकती थी, जो ब्राह्मणों को प्राप्त था। शूद्रों और स्त्रियों को ऊंचा स्थान दिलाने में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बौद्ध धर्म के विरोधी इसे शूद्र धर्म (अर्थात निम्न वर्ग का धर्म) कहने लगे।”[13]

डॉ. आंबेडकर का विचार है कि ऋग्वेद में वर्णित पुरुष सूक्त का समीक्षात्मक विश्लेषण बहुत आवश्यक है– “चातुर्वर्ण्य का सिद्धांत प्रतिपादित करने में ‘पुरुष सूक्त’ ने दोहरी चाल चली। प्रारंभ में वह भारतीय आर्य समुदाय की वर्णव्यवस्था के अस्तित्व को वास्तविक और आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है। यह धोखा है क्योंकि यह आदर्श वास्तविकता से भिन्न नहीं है। ‘पुरुष सूक्त’ द्वारा वास्तविकता को आदर्श और आदर्श को वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत करना राजनीतिक इन्द्रजाल या चाल है। मेरा अपना विश्वास है कि यह एक प्रकार का छल है। ऐसा प्रपंच विश्व के किसी अन्य धर्म ग्रंथ में नहीं हैं।”

डॉ. आंबेडकर की मान्यता है कि ‘पुरुष सुक्त’ में बताई गई असमानता अपराध वृत्ति से कम नहीं है। इस प्रकार एक बार स्थापित की गई असमानता स्थायी हो जाती है। यह नैतिकता के भी विरुद्ध है।[14]

ऋग्वेद संहिता के दसवें मंडल ‘पुरुष सुक्त’ में पहली बार उल्लेख किया गया है कि “ब्रह्मा के मुख से ही ब्राह्मण बने, उनकी भुजाओं से राजन्य, जंघाओं से वैश्य तथा पैरों से शूद्रों का जन्म हुआ।” ‘पुरुष सुक्त’ में ये चार सामाजिक वर्ग हैं और इसे पारलौकिक प्रक्रिया से जोड़ा गया, जैसा कि ब्रायन के. स्मिथ ने बतलाया कि वर्णव्यवस्था केवल सामाजिक वर्गीकरण के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर अथवा प्राकृतिक संसार के विभाजन से जोड़ दिया गया।[15]

डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि “जिन लोगों ने भारत के इतिहास को कुछ भी समझा है, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह इतिहास और कुछ नहीं है, बल्कि ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच महत्ता के लिए संघर्ष का इतिहास है।”[16]

आंबेडकर ने मौर्य साम्राज्य को एक क्रांतिकारी साम्राज्य बताया है। मौर्यों द्वारा मगध साम्राज्य का विस्तार बहुत दूर-दूर तक हुआ। अशोक के अधीन इस साम्राज्य की सीमा यहां तक बढ़ी कि उसे अशोक साम्राज्य कहा जाने लगा। अशोक ने बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया। निश्चय ही यह ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा आघात था।

इससे ब्राह्मणों को राज्य का संरक्षण मिलना बंद हो गया। अशोक ने सभी पशुओं की बलि रोक दी, जो ब्राह्मणों का मूल आधार थीं। अतः ब्राह्मणों को न केवल राज्य का संरक्षण मिलना बन्द हो गया, बल्कि उनका व्यवसाय भी छिन्न-भिन्न हो गया। यह व्यवसाय था यज्ञ कराना और उसके बदले दक्षिणा के रूप में मोटी शुल्क प्राप्त करना। इस प्रकार लगभग 140 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य रहा। ब्राह्मण दलित वर्गों की तरह रहे।

डॉ. आंबेडकर का विचार है कि उपर्युक्त कारणों से ब्राह्मणों ने पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में मौर्य साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह किये। पुष्यमित्र शुंग गोत्र का था। ये लोग सामवेदी ब्राह्मण होते थे, जो लोग पशुबलि और सोम बलि में विश्वास करते थे। अशोक द्वारा जगह-जगह शिलालेखों आदि पर पशुबलि निषिद्ध की घोषणा लिखवा दी गई थी। शुंगों को मौर्य अशोक के समय में बलि पर पाबंदी लगा देने के कारण अनेक कष्ट थे। डॉ. आंबेडकर ने साक्ष्य देते हुए बताया है कि पुष्यमित्र द्वारा राजहत्यायें किए जाना और फिर राज्यरोहण के समय अश्वमेघ यज्ञ करवाना इस बात का प्रमाण है कि पशुबलि की आकांक्षा उसमें कितनी अधिक थी। आंबेडकर विंसेंट आर्थर स्मिथ को उद्धृत करते हैं–

“बौद्ध धर्म की सबसे अधिक उल्लेखनीय विशेषता है पशुओं को अवज्ञा मानकर उनको अभय जीवन प्रदान करना। अशोक की विधि व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विशेषता थी।… ब्राह्मणों ने इस क्षेत्र में जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसकी शुरुआत पुष्यमित्र द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने से हुई। इस प्रकार यज्ञ-कर्म पांच शताब्दियों, समुद्रगुप्त और उनके उत्तराधिकारियों के समय तक जोर-शोर से प्रचलित रहे।”[17]

पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध धर्म को पूरी निर्दयता से कुचला। उसने बौद्ध भिक्षुओं के विरुद्ध घोषणा जारी की कि हर बौद्ध भिक्षुक के कटे सिर की कीमत 100 स्वर्ण मुद्राएं निर्धारित करता है।[18]

आगे डॉ. आंबेडकर मनु के बारे में लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास में मनु एक आदरसूचक संज्ञा थी। इस संहिता को गौरव प्रदान करने के लिए इसे मनु की रचना कहा गया है। लगभग चौथी शताब्दी में नारद स्मृति के लेखक को मनुस्मृति के लेखक का नाम ज्ञात था। सुमति भार्गव नामक एक व्यक्ति ने मनुस्मृति की रचना की। सुमति भार्गव अवश्य ही कोई ऐतिहासिक व्यक्ति रहा होगा। इसका कारण यह है कि मनुस्मृति के महान टीकाकार मेधातिथि का यह मत है कि मनु निश्चय ही कोई व्यक्ति था। इस प्रकार मनु नाम सुमति भार्गव का छद्म नाम था और वही मनुस्मृति के वास्तविक रचयिता थे।

विद्वानों के अनुसार सुमति भार्गव ने मनुस्मृति की रचना 170 ई.पू. से लेकर 150 ई.पू. के मध्यकाल में की और जान-बूझकर इस संहिता का नाम मनुस्मृति रखा।[19] अतः पुष्यमित्र ने जिस संहिता को लागू किया, वह ब्राह्मणवाद के अनुरूप थी और बौद्ध राज्य के विरुद्ध।[20]

मनु के पूर्व आर्य समाज में वर्ण का अर्थ रंग बतलाया गया है, जो कि डॉ. आंबेडकर के विचार से गलत है। डॉ. आंबेडकर के अनुसार यह कहना कि आर्यों में रंग के प्रति पूर्वाग्रह था, जिसके कारण इनकी पृथक सामाजिक स्थिति बनी, कोरी बकवास होगी।

आर्य आक्रमणकारियों ने शूद्रों पर विजय पाई, यह सोचना भी गलत है। प्राचीन काल में मनु के पूर्व अनेक शूद्र राजा हुए और प्राचीन आर्य समाज में शूद्रों को राजनीतिक गौरव प्राप्त था। महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है। नंदों ने जो 413 ई.पू. से ई.पू. 322 तक राज्य किया। मौर्य भी शूद्र थे जिन्होंने 322 से 183 ई.पू. तक राज्य किया।

अनुमान है कि 400 ई.पू. से छुआछूत की भावना प्रबल हुई। इस संबंध में डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि “कुछ जातियां पुश्तैनी छुआछूत की शिकार हुई। इन जातियों की इतनी अधिक संख्या है कि बिना किसी विशेष सहायता के एक सामान्य व्यक्ति के लिए पूरी सूची बना लेना आसान नहीं है।” वर्ष 1935 में तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने 429 जातियों की सूची बनाई, जो अछूत जातियां थीं। इस प्रकार हिंदुओं की अस्पृश्यता एक अजीब दस्तूर है। संसार के किसी दूसरे हिस्से में आज तक कभी इसकी मिसाल नहीं मिलती।”

डॉ. आंबेडकर ने और दो कामों पर गंभीरता से विचार किया है। पहली बात तो यह है कि अछूत गांव के बाहर क्यों रहते हैं और दूसरी बात विश्व समाज में गांव के बाहर कुछ जातियां क्यों रहती थीं?

अछूत तो ब्रह्मा के सृष्टि रचना के बाहर के प्राणी हैं। अछूत अवर्ण हैं। गांव के अंत में रहने वाले लोगों को अन्त्यज कहा गया। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, “मेरी समझ में अन्त्यज का अर्थ सृष्टि के क्रम का अंत नहीं, अपितु गांव का अंत है। यह एक नाम है जो गांव के सीमा पर रहने वाले लोगों को दिया गया है। इस अन्त्यज शब्द का ऐतिहासिक महत्व है। यह बताता है कि एक समय था जब कुछ लोग गांव में रहते थे और कुछ लोग गांव के कोने पर गांव के अंत में रहते थे। वे अन्त्यज कहलाते थे।”

प्राचीन काल के यूरोपीय समाज में भी गांव के बाहर रहने वाले समुदायों और कबीलों का जिक्र डॉ. आंबेडकर ने किया है–

“आदिम काल में आयरलैंड और वेल्स के गांवों की संरचना के इस वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि भारत के अछूत ही अकेले ऐसे नहीं हैं, जो गांव से बाहर रहते हों।”[21]

आदिम गांवों की बस्तियां दो भागों में विभाजित थीं। एक हिस्से में एक कबीले के लोग रहते थे और दूसरे हिस्से में विभिन्न कबीलों के छितरे हुए लोग रहते थे। मूल कबीलों के लोग गांव के अंदर रहते थे और छितरे हुए लोग गांव के बाहर या अंत में रहते थे। ये बाहर रहने वाले लोगों का गांव के अंदर रहने वाले लोगों से कोई संबंध नहीं था।

डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि “भारत के अछूत और आयरलैंड के फयूदहिर और वेल्स के अल्तयूर्द के उदाहरण में पूरा तालमेल है। जिस कारण से आयरलैण्ड में फयूदहिर और वेल्स में अल्त्यूर्द लोगों को गांव से बाहर रहना पड़ता था, उसी कारण से भारत के गांव के अछूत गांवों से बाहर रहते आए हैं। इससे यह बात स्पष्ट है कि अछूतों के गांव के बाहर रहने के बारे में जो कुछ कहा गया है, उसके उदाहरण अन्यत्र विद्यमान हैं।”[22]

आगे बाबासाहेब कहते हैं कि यूरोपीय आयरलैंड और वेल्स की अन्त्यजों या गांव के बाहर रहने वालों की बस्तियां लुप्त हो गई। इसका कारण है कि विकास के दौर में आदिम विश्व समाज के लोगों ने समानता और एकता के बंधन को स्वीकार किया। श्री सीभोम के अनुसार वेल्स के ग्राम पद्धति में एक वर्ग के बाह्य वर्ग की सदस्यता मिल जाने के नियम थे। जो निम्नलिखित थे–

(1) दक्षिण वेल्स के अनुश्रुति के अनुसार सिमरू (वेल्स) में रहना गैर लोगों को अंततः सिमरू (वेल्स) बना देती है। लेकिन तभी जब वह कम से कम 9 पीढ़ियों में रहे।

(2) साइमरे के अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी अंतर्विवाह होते रहने से चौथी पीढ़ी में किसी अन्य का वंशज सिमरू (वेल्स) हो जाता है।

डॉ. आंबेडकर सवाल करते हैं कि क्या ऐसा भारत में नहीं हो जाना चाहिए था? “यह हो सकता था, होना चाहिए था, क्योंकि आयरलैंड और वेल्स के समान एक नियम भारत में भी था। मनु ने इसका उल्लेख भी किया है दसवें अध्याय में 64 से 67 तक श्लोकों में। मनु का कथन है कि यदि एक शूद्र सात पीढ़ियों तक ब्राह्मण जाति से विवाह करे तो वह ब्राह्मण हो सकता है। चातुर्वर्ण्य का सामान्य नियम यह था कि शूद्र कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता। शूद्र पैदा होता था और शूद्र ही मर जाता था। लेकिन यह प्राचीन विधान इतना कठोर था कि मनु को इसे शूद्रों पर लागू करना पड़ा।”

इसका परिणाम यह है कि जहां विश्व की अन्य भागों से गांव के अंत में रहनेवाली बस्तियां विलुप्त हो गयीं, वहीं आज भी भारतीय गांव में अन्त्यजों की पृथक बस्तियां गांव का एक आवश्यक अंग बन गया है।

ऐसा क्यों हुआ? इसका उत्तर यही है कि छुआछूत के विचार से पलड़ा भारी हो गया और इससे संबंधी और उन संबंधी कबीलों और बाहरी भेद अर्थात छूत और अछूत के भेद को एक दूसरे रूप में सनातन बना दिया।

इस प्रकार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर इतिहासकार के तर्क, इतिहासकार की पैनी दृष्टि इतिहासकार के गुण के साथ यह इतिहास की खोज के बारे में अपना स्पष्ट विचार प्रकट करते हैं। इतिहासकार के रूप में उन्होंने न सिर्फ प्राचीन भारत के इतिहास से पर्दा उठाया, वरन् इतिहास की टूटी हुई कड़ियां जोड़ने के लिए ऐतिहासिक चेतना और कल्पना शक्ति का भी प्रयोग किया है। प्राचीन भारत के इतिहास को जानने, समझने और लिखने के क्रम में उन्होंने वैदिक साहित्य, बौद्ध साहित्य, पुराणों, मनुस्मृति और अनेक इतिहासकारों के पुस्तकों का सहारा लिया है। वे बौद्ध धर्म को फ्रांस की क्रांति से भी बड़ा मानते हैं, जिसने शूद्रों, अछूतों और महिलाओं के लिए धन, सम्पत्ति और शिक्षा के द्वार खोल दिए।

[1] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, संपूर्ण वांग्मय खंड 13, प्राक्कथन

[2] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 14, पृष्ठ 5

[3] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 7, पृष्ठ 15

[4] वही

[5] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 17, पृष्ठ 18

[6] महाभारत वन पर्व, अध्याय 15-10

[7] दरिवंश अध्याय 2

[8] दरिवंश अध्याय 2

[9] महाभारत वन पर्व, अध्याय 15-10

[10] वही, पृष्ठ 40

[11] वही, पृष्ठ 42

[12] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खण्ड 7, पृष्ठ 56

[13] वही, पृष्ठ 197-198

[14] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 13, पृष्ठ 5

[15] उपिंदर सिंह, प्राचीन एवं पूर्व मध्यकालीन भारत का इतिहास, पियरसन, पृष्ठ 210-11

[16] वही, पृष्ठ 12

[17] वही, पृष्ठ 149

[18] बर्नोफ, यूजिन, इन्ट्रोडक्शन टू दी हिस्ट्री ऑफ इंडियान बुद्धिज्म, दूसरा संस्करण, पृष्ठ 388

[19] वही, 151

[20] वही, 151

[21] बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, भाग 14, पृष्ठ 49

[22] वही

(संपादन : इमानुद्दीन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

देवेन्द्र शरण

लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स इन दी फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ इंडिया’ (1999), ‘भारतीय इतिहास में नारी’ (2007), ‘नारी सशक्तिकरण का इतिहास’ (2012) और ‘मेरे गीत आवारा हैं’ (काव्य संग्रह, 2009) शामिल हैं।

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