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रूपम मिश्रा की कविता को लेकर विवाद की परतें

इस मामले के दो सिरे हैं। पहला सिरा सीपीआईएमएल से जुड़ा है। सीपीआईएमएल के इलाहाबाद क्षेत्र में रामजी राय और कमल उसरी का अपना-अपना धड़ा है। जैसा कि इतिहास बताता है जो धड़ा कमज़ोर होता है उसी की बलि चढ़ती है। पढ़ें, यह रपट

कवि रूपम मिश्रा की एक कविता को लेकर इन दिनों तीन स्तरों पर विवाद छिड़ा हुआ है। विवाद के केंद्र में ये पंक्तियां हैं– “लेकिन हाय! समय की मार कि अवध में औरत को गरियाने के लिए अकेडमिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है/नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का, जिसके कारण औरतें आग मूत रहीं हैं।” 

न्यायिक प्रक्रिया के तहत इस प्रकरण में इलाहाबाद के थाना कर्नलगंज में एक मुकदमा पंजीकृत किया गया है। वहीं रूपम मिश्रा की गिरफ़्तारी के लिए धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है। अब तक की छानबीन में यह वैचारिक या साहित्यिक विवाद कम निजी दुश्मनी निभाने का मामला ज़्यादा है। इस विवाद से यह भी पता चलता है कि किस तरह वैचारिकी या डॉ. आंबेडकर जैसी महान शख़्सियतों का इस्तेमाल निजी दुश्मन को निपटाने के लिए किया जा रहा है। यह मामला कुंठित मर्द के आहत इगो का भी है, जिसने लैंगिक आधार पर पारंपरिक तौर पर कमतर समझी जाने वाली स्त्री को निपटाने के लिए आंबेडकरवाद को हथियार में ढाल लेता है। 

विवाद के पीछे की कहानी

जन संस्कृति मंच (जसम) और सीपीआईएमएल के अंदरखाने की जानकारी रखने वाले एक सदस्य नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि इस मामले में मदन सरोज का इस्तेमाल किया गया है। चूंकि मदन सरोज एडवोकेट हैं और इस तरह के कुछ केसों में उनका नाम पहले भी आया है, जिनमें वे एफआईआर कराने के बाद पैसे लेकर समझौता किए, और फिर केस वापस ले लिए। अतः उनकी भूमिका इस मामले में भी बस इतनी ही है। दरअसल यह पूरा मामला जसम और सीपीआईएमएल के दो धड़ों के बीच आपसी वर्चस्व की लड़ाई का नतीज़ा है।

इस मामले के दो सिरे हैं। पहला सिरा सीपीआईएमएल से जुड़ा है। सीपीआईएमएल के इलाहाबाद क्षेत्र में रामजी राय और कमल उसरी का अपना-अपना धड़ा है। जैसा कि इतिहास बताता है जो धड़ा कमज़ोर होता है उसी की बलि चढ़ती है। इसलिए कमल उसरी को गुटबाज़ी और वित्तीय अनियमितता के आरोप में पार्टी से बाहर कर दिया गया। चूंकि रूपम मिश्रा रामजी राय खेमे की मानी जाती हैं और फ़िलहाल जसम की पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ में संपादन सहयोगी हैं। इस पत्रिका का ऑफ़िस लंबे अरसे से रामजी राय का घर रहा है। इस वजह से भी रूपम मिश्रा कमल उसरी के निशाने पर थीं।

मामले का दूसरा सिरा सीपीआईएमएल के सांस्कृतिक संगठन जसम से जुड़ा हुआ है। पिछले साल जून, 2025 में पटना में नई धारा के राइटर्स रेजीडेंस कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित द्वारा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रा और एक युवा कवि का यौन उत्पीड़न किया गया। इसे लेकर जसम के दो सदस्यों ने सोशल मीडिया पर पीड़िता का चरित्र हनन करते हुए लिखा कि मध्यवर्गीय स्त्री ने अपने फ़ायदे के लिए पहले आरोपी कवि को अपने जाल में फंसाया और बाद में यौन उत्पीड़न का आरोप मढ़ दी। जसम की ओर से अपने दोनों सदस्यों को तुरंत पोस्ट डिलीट करने के लिए कहा गया। एक सदस्य ने तो हटा दिया लेकिन बृजेश यादव ने अपना पोस्ट नहीं हटाया, बल्कि कई और पोस्ट लिख डाले। इसे लेकर जसम में एक कमेटी गठित की गई और बृजेश यादव को सुल्तानपुर से इलाहाबाद बुलाकर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया। उस तीन सदस्यीय कमेटी में प्रोफ़ेसर प्रणय कृष्ण, प्रोफ़ेसर रामनरेश राम और रूपम मिश्रा शामिल थी। कमेटी के सामने बृजेश यादव ने वही स्त्रीविरोधी राग अलापना ज़ारी रखा। इसलिए उन्हें जसम से निष्कासित कर दिया गया। चूंकि इस मामले की पहल रूपम मिश्रा ने किया था, इसलिए वे सीधे-सीधे बृजेश यादव के निशाने पर आ गईं।

रूपम मिश्रा

एफआईआर करने वाले मदन सरोज का पक्ष

रूपम मिश्रा के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ करवाने वाले एडवोकेट मदन सरोज कहते हैं कि उनका वो शब्द, बाबासाहब, स्त्रियों और जाति विशेषकर ‘चमारों’ के ख़िलाफ़ था और बहुत ही घटिया शब्द था। एक समझदार पढ़ा लिखा व्यक्ति यह शब्द नहीं कह सकता ख़ासकर सोशल मीडिया पर। वे बताते हैं कि “केवल अभी आईटी एक्ट के ख़िलाफ़ केस दर्ज़ हुआ है, जांच होने के बाद चार्जशीट दाख़िल करते समय संबंधित धाराएं जोड़ी जाएंगीं, ऐसा इंस्पेक्टर ने आश्वासन दिया है। रूपम मिश्रा से हमने कहा है कि यदि उनको लगता है कि उन्होंने बाबासाहब और महिलाओं के पक्ष में लिखा है, बस शब्द ग़लत है तो आप आकर बात कर लीजिए अगर हम लोग संतुष्ट हो जाएंगे तो देखा जाएगा।”

मुक़दमा दायर करके पैसे लेकर समझौता करने के आरोप पर एडवोकेट मदन सरोज का कहना है कि उनके द्वारा किसी के ख़िलाफ़ दायर किया गया यह पहला मुक़दमा है। जो लोग आरोप लगा रहे हैं, वे मेरे उन मुकदमों की एफआईआर संख्या बताएं और उनलोगों को सामने लाएं, जिनसे मैंने पैसे लेकर समझौते किए हैं।

सीपीआईएमएल से निष्कासित कमल उसरी का पक्ष

एफआईआर दर्ज़ करवाने के बाद से मदन सरोज को आगे करके कवि रूपम मिश्रा को गिरफ़्तारी के लिए रोज़ाना प्रदर्शन किया जा रहा है। इस प्रोटेस्ट में सीपीआईएमएल से निष्कासित कमल उसरी बराबर हिस्सा ले रहे हैं। अपने पक्ष में कमल उसरी कहते हैं– “प्रोटेस्ट दर्ज़ कराने में मैं शामिल था और शामिल हूं। लेकिन एफआईआर में मैंने कहीं दस्तख़त नहीं किया है। गिरफ्तारी की मांग वाले ज्ञापन में मैंने हस्ताक्षर किया है।”

वे आगे बताते हैं कि “मैंने सीपीआईएमएल के जिला सचिव अखिल विकल, एसएफआई नेता विकास स्वरूप, सीपीआई के जिला सचिव नसीम अंसारी, अधिवक्ता मंच के लीडर राघवेन्द्र सिंह और प्रोफ़ेसर विक्रम हरिजन आदि लोगों से इस मुद्दे पर बात की तो इन लोगों ने कहा कि ये शब्द बिल्कुल ग़लत है। ये बातें हमने और कुछ लोगों से कही तो उन्होंने भी कहा ग़लत है। यही जानकारी मदन सरोज तक पहुंची और उन्होंने एफआईआर करा दिया।” 

लेकिन रूपम मिश्रा की गिरफ्तारी की मांग को लेकर आप मदन सरोज के साथ धरने पर बैठते हैं? इसके जवाब में वे कहते हैं कि मैं पीड़ित नहीं हूं, लेकिन पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा हूं। जिस शब्द से उनकी भावनाएं आहत हुईं हैं, यकीनन उससे मेरी भावनाएं भी आहत हुई हैं। मैं न्याय के साथ हूं, और यह कोर्ट तय करेगा। यदि अमित शाह सदन में डॉ. आंबेडकर के खिलाफ़ बोलते हैं तो हम सड़क पर उतर जाते हैं, तो हम इस मामले में भी सड़क पर हैं। हमने यूजीसी को लेकर समता आंदोलन किया, तो ये लोग प्रोफ़ेसर विक्रम के पास जाकर बोले कि कमल उसरी का साथ छोड़ दीजिए। वे आदमी ठीक नहीं हैं, उनके ऊपर कई आरोप लगा और पार्टी से निकाल दिया गया है। लेकिन जिस आरोप के आधार पर मुझे पार्टी से निकाल दिया गया। वही आरोप मनोज पांडेय पर भी लगा, गिरफ़्तारी हुई, छह महीने में बरी हो गया और उसे दो-दो बार पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। मैं इस एफआईआर का केंद्र नहीं हूं, बल्कि इसके केंद्र में दलित-आदिवासी लोग हैं। मेरी भूमिका इसमें बस उतनी ही है जितनी अन्य आंदोलन में रहती है। यह अलग बात है कि समाज में इतनी जान-पहचान है कि लोग मुझे आगे कर देते हैं। निश्चित तौर पर इन दिनों दलित-आदिवासी समाज के साथ मेरा संपर्क और लगाव बढ़ा है।” 

मुख्य भूमिका कमल उसरी भाई की है : विक्रम हरिजन

विक्रम हरिजन बताते हैं कि मुख्य भूमिका कमल उसरी की है। हम लोगों के साथ के सहयोगियों की मदद से एफआईआर की गई है। मैं इसमें प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हूं, लेकिन मैं इसका समर्थन करता हूं। गिरफ़्तारी की मांग वाले विरोध में एक बार भी शामिल नहीं हुआ हूं। सुल्तानपुर के बृजेश यादव और रूपम मिश्रा के बीच का विवाद था। बृजेश ने कमल उसरी से कहा और वे रूपम मिश्रा की कविता की पंक्तियां लेकर मेरे पास आए और मुझसे पूछा कि ये पंक्तियां सही हैं या ग़लत? तो मैंने कहा कि ये ग़लत पंक्तियां हैं, ऑब्जेक्शनेबल हैं। फिर उन्होंने पूछा कि क्या करना चाहिए तो मैंने कहा कि आप लोगों को जो समझ में आए आप कीजिए। अदम गोंडवी की कविता ‘चमारों की गली’ उस स्थिति को दर्शाती है, लेकिन रूपम मिश्रा की यह कविता ऑब्जेक्शनेबल है। रूपम मिश्रा की जगह रूपम राम होती, रूपम हरिजन होती, गौतम होतीं तो भी क्या वो ये बात लिखतीं कि “नाश हो संविधान बनाने वाले चमार का, जिसकी वजह से औरते आग मूत रही हैं?”

चमार शब्द

शोध छात्र और आइसा प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार बताते हैं कि “मनोज पांडेय और कमल उसरी दोनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। इस मामले में कमल उसरी झूठ बोल रहे हैं। पार्टी के रेलवे विंग के मोर्चे पर इन दोनों को ज़िम्मेदारी दी गयी थी। वहां पर गुटबाजी शुरू कर थी और एक्टू रेलवे फेडरेशन के बैंक अकाउंट के फंड पर क्लेम करने लगे थे। इसलिए दोनों को पार्टी से निकाल दिया गया। प्रोफ़ेसर विक्रम ने फेसबुक पर एक स्टेटमेंट लिखा है कि चमार बहुत असंवैधानिक शब्द है और इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जबकि चमार एक विधिक पहचान का शब्द है। और इस शब्द का एक सामाजिक इतिहास है। और एक लेगेसी रही है। खुद रैदास स्वयं को चमार लिखते हैं। सेना में चमार रेजिमेंट रही है। आज़ादी की लड़ाई में बहुत से लोग इसी नाम और पहचान के साथ लड़े हैं। हमारे यहां कास्ट सर्टिफिकेट इसी नाम से ज़ारी होते हैं। उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति की लिस्ट आप निकालकर देख लीजिए उसमें बाकायदा इस शब्द का उल्लेख किया गया है। यह एक उप-जाति के रूप में चिह्नित है। असल में चमार पहचान बताना अपराध नहीं है बल्कि इस पहचान के साथ अपमानित करना अपराध है।”

मनीष आगे कहते हैं कि “रूपम मिश्र लंबे अरसे से सामाजिक न्याय के हमारे आंदोलनों में, चाहे वो हमारे साथी विवेक सुल्तानवी पर प्रॉक्टर के हमले का मामला हो या फिर यूजीसी रेगुलेशन के लिए जारी हमारा आंदोलन हो, की समर्थक रही हैं और आंदोलनों के पक्ष में लिखती-पढ़ती रही हैं। इस कविता का भी इरादा बहुत साफ़ तौर पर नारी मुक्ति के प्रश्न पर बाबसाहब के महान योगदान को चिह्नित करना और उस योगदान पर मर्दवादी सामंतियों की तिलमिलाहट को दर्ज़ करना है। तभी तमाम दलित चिंतक, कवि, प्रोफ़ेसर इस कविता के पक्ष में खड़े है। कविता पर किसी तरह की सहमति-असहमति हो सकती है, लेकिन चूंकि उनका इरादा स्पष्ट है, ऐसे में उनके ऊपर एफआईआर और उसकी दो पक्तियों को संदर्भ से काट कर किया गया दुष्प्रचार साफ़ तौर मूर्खता और ख़ुन्नस का परिणाम है।”

तब मैंने नहीं सोचा था कि यह इतना भयावह रूप ले लेगा : रूपम मिश्रा

रूपम मिश्रा बताती हैं कि “पटना वाले मामले में किसी ने मुझे उनकी फेसबुक पोस्ट कॉपी करके भेजा और कहा कि जसम के लोग ऐसा लिख रहे हैं। मैंने जसम के महासचिव मनोज सिंह से कहा कि बृजेश यादव की ये पोस्ट डिलीट करवा दीजिए, अपने संगठन के हैं, जबकि जसम का स्टैंड इस मामले में बिलुकल अलग जीरो टॉलरेंस का है। पोस्ट डिलीट करने को कौन कहे उलटा वो पीड़िता को ही गाली देने लगे। इलाहाबाद में इस मसअले पर एक मीटिंग बुलायी गई। संयोग से मैं इलाहाबाद में ही थी और, उस वक़्त कोई और महिला सदस्य नहीं थीं तो मुझे ही जेंडर पर सवाल रखने के लिए कमेटी में रख लिया गया। कमेटी में भी बृजेश यादव वही बात दोहराने लगे कि लड़की ने पहले कृष्ण कल्पित जी को फंसा लिया और फिर ये वो …। बृजेश जेएनयू से पीएचडी हैं लेकिन इस तरह के मामलों में स्त्री को ही उत्पीड़क मानते हैं। ‘मी टू मूवमेंट’ को ख़ारिज करते हैं।

“कुछ महीनों बाद लखनऊ में यूपी जसम का सम्मेलन हुआ। वहां रामायण राम जी ने कहा कि आप लोग इन्हें नहीं निकालेंगे तो कल को और सवाल उठेगा कि ऐसे व्यक्ति को पद पर क्यों रखा गया है। मैंने भी उनका समर्थन किया और कहा कि रामायण जी की बात से मैं भी सहमत हूं कि कोई भी व्यक्ति जो इस तरह से स्त्रियों का चरित्र हनन करता हो उसे किसी पद पर नहीं होना चाहिए। मुझे उस वक्त अंदाज़ा ही नहीं था कि ये सब इतना भयावह रूप ले लेगा। लेकिन केवल जेंडर पर सवाल पूछने के चलते, मेरे प्रति उनके मन में द्वेष भर गया। जिसका बदला वे इस तरह से चरित्र हनन करके ले रहे हैं।”

एफआईआर कराने वाले मदन सरोज के संदर्भ में रूपम कहती हैं कि “उन लोगों को जब समझाया गया तो उनको लगा कि उनका तो इस्तेमाल हो गया है। लेकिन अब वे समझौता करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि लेखक, कवि वगैरह बहुत मालदार लोग होते हैं।”

विवाद की शुरुआत करने वाले बृजेश यादव का पक्ष

बृजेश यादव अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं– “दलित विरोधी ही नहीं, यह कविता स्त्री विरोधी भी है। किसी कला, कविता या पाठ में, मान लीजिए कि कोई शब्द वर्जित न हो, तो यह बहुत अच्छी बात है, इसी की ज़रूरत है साहित्य को, समाज को, यही होना चाहिए। इस मान्यता को आप बस इतना कीजिए कि एक दलित की दृष्टि से देखना शुरू कीजिए कि एक दलित कवि क्या डॉक्टर आंबेडकर के लिए ‘चमार’ शब्द लिख सकता है? क्या एक दलित कवयित्री कभी यह लिख सकती है कि महिलाएं आग मूत रही हैं? यही नहीं, किसी आदिवासी महिला ने कहीं लिखा है? ओबीसी महिलाएं तो अभी कविता ही नहीं कर रही हैं। आग मूतना कोई अच्छा काम नहीं है। हम कहना चाहते हैं कि यह किसी स्वतंत्र चेतना की जबान नहीं है, यह किसी संघर्ष का स्वर नहीं है। यह जबान जो कोई भी बोल रहा है, वह लंपट है। लंपट सुनकर चौंकिए मत। ये भद्रवर्गीय चेतना के लोग हैं। ये पितृसत्ता के खिलाफ़ नहीं, पितृसत्तात्मक आग मूत रही हैं। इसे आप लोकोक्ति कहिए या व्यंजना में पढ़िए। यह डॉ. आंबेडकर की राजनीति नहीं है।

वे आगे कहते हैं– “‘चमार’ शब्द का मनचाहा अर्थ आप नहीं निकाल सकते। इसे व्यंग्यात्मक कहना सही नहीं है। संविधान बनाने वाले महान आदमी / योद्धा को कविता में अपनेपन से भरी जो झिड़की दी गई है, वह इस जातिसूचक शब्द के बजाय किसी संघर्षसूचक या कर्मबोधक शब्द से दी जानी चाहिए थी। कवि को इस शब्द से यहां बचना चाहिए था, लेकिन यह शब्द अनजाने या अनचाहे आ गया है, तो इसकी वजह है। यह ज़रूरी नहीं था, इसके बेहतर विकल्प हैं, जो कहीं अधिक व्यापक अर्थ देते!”

रूपम मिश्रा की कविता पर क्या सोचते हैं दलित बुद्धिजीवी

दलित लेखक संघ की पूर्व अध्यक्ष और कवि अनीता भारती कहती हैं कि “रूपम मिश्रा ने ऐसा कुछ नहीं लिखा कि उन पर एफआईआर की जाए। किसी भी समाज की कूपमंडूकता ग़लत ही होती है।”

वरिष्ठ आलोचक कंवल भारती  लिखते हैं कि “अगर विवाद रूपम मिश्र की कविता की इन पंक्तियों पर है– ‘लेकिन हाय! समय की मार कि अवध में औरत को गरियाने के लिए अकेडमिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है/नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का, जिसके कारण औरतें आग मूत रहीं हैं।’ तो रूपम मिश्र ने कुछ ग़लत नहीं लिखा है। न यह संविधान का विरोध है और न आंबेडकर की निंदा। मैंने तो बहुत से हिंदुओं, यहां तक कि सनातनवाद का ढिंढोरा पीटने वाले धर्मगुरुओं को भी यह कहते हुए सुना है। रूपम जी जैसी स्त्रियां ही इस नफ़रत को ख़त्म कर सकती हैं। मैं उनका समर्थन करता हूं।”

युवा कवि मोहन मुक्त कहते हैं कि “अगर रूपम मिश्र को उनकी सशक्त कविता के लिए जेल होती है तो यह दलित बौद्धिक  संघर्ष और विमर्श की सबसे बड़ी हार होगी … इससे तय हो जायेगा कि हम अपने लोगों का विवेकपूर्ण शिक्षण नहीं कर पाए हैं…”

बहुजन इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा लिखते हैं कि “रूपम मिश्रा एक कविता लिखती हैं और बाबासाहब आंबेडकर को अपशब्द कहने वाली सवर्ण मानसिकता के कथनों का इस्तेमाल कर, नफ़रती मानसिकता या बोल का रूपक रचती हैं तो कुछ लोग उसी के बहाने दलितों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही किया गया था ‘भील विद्रोह’ किताब में छपे ‘भिलाला’ शब्द को लेकर। बड़वानी के एक अध्यापक ने भील विद्रोह का उदाहरण देकर, छात्रों को पढ़ाया कि भिलाला समुदाय के जन्म के बारे में सारे साक्ष्य यही कहते हैं कि भील स्त्रियों और राजपूतों के सम्मिश्रण से भिलाला का जन्म हुआ। इस पर एक भिलाला परिवार ने अध्यापक के ऊपर मुकदमा कर दिया। अध्यापक का फोन आया की सर, मैंने तो आपकी किताब में दिए उदाहरण को पढ़ाया। मैंने उन्हें नौ साक्ष्य भेजे जिनमें गजेटियर, ब्रिटिश रिकॉर्ड्स और कई पुराने शोध, अख़बार शामिल थे। तब जाकर उन्हें राहत मिली। लेकिन महीने भर वे परेशान रहे। इसी तरह कुछ दलाल और अपराधी किस्म के लोग एससी/ एसटी एक्ट का दुरुपयोग कर, सभ्य लोगों को ब्लैकमेल करने और वसूली करने का हथियार बना चुके हैं। वे किसी स्तर का झूठा आरोप लगा सकते हैं। पेशबंदी कर मुक़दमा लिखवा सकते हैं और फिर सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर धन उगाही की घृणित कोशिश तो करते ही हैं। इसका नतीज़ा यह निकल रहा है कि जो लोग दलितों को अपने संस्थानों में सबसे ज़्यादा स्थान देते थे, उनका समर्थन करते थे अब वे भी उन्हें नौकरी पर रखने से बचने लगे हैं। यह इस कहानी का एक और घृणित पक्ष है।”

रूपम की वह कविता, जो विवाद के घेरे में है

रूढ़ियों और मिरजई में बंधे एक महाकाव्य के जादू को
तार-तार करते जब मैं कविता की जमीन पर
सिर तान कर खड़ी हुई
तो वे बोली की सबसे भद्दी गाली बुदबुदाते हुए हंसे
ये गाली उन्होंने अपने पिता से सीखी थी
और पिता ने अपने पिता से
अर्थात वहां पिता जो गाली मांओं को देते
उनके बच्चे उसे भाषा के पहले शब्द की तरह सीख लेते
इस तरह बपंसी में मिलता स्त्रीडाह उनके साथ उनकी यूनिवर्सिटी भी गया
जहां उन्होंने उसे अकेडमिक्स से नहलाया-धुलाया
और अंग्रेजी का तेल-फुलेल लगाया

भाषा मेरे लिए औजार भर थी
जिसे मैंने उनके लिए सुरक्षित छोड़ दिया
और अपनी बोली-ठोली में कहा बड़कऊ हमहूं बोलब!
जल तो उनका सर्वांग गया
लेकिन मूंछों पर ही हाथ फेरते हुए उन्होंने हंसकर कहा
‘केहू रोकत कहां बा!’

और उसी घरी उन्होंने मन में
सदी भर की डाह से सनी किरिया खाई
और बोली के सबसे क्रूर पठारों पर दौड़ लगाई

उनकी दुनिया में मांएं कितनी कम होती हैं
जहां पिता के पेशाब का हलफ उठाया जाता है

लेकिन हाय समय की मार
कि अवध में औरत को गरियाने के लिए
अकेडमिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है
नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का
जिसके कारण औरतें आग मूत रहीं हैं

सोहरों से सींचे वे मस्तक बहुत नाराज़ थे मुझसे
दरअसल सारा कुसूर मेरी स्त्रीदेह का था
जिसमें सवालों से भरी आत्मा थी
और तरह तरह के ताजन झेलती
मांओं के निःसहाय किस्से
जहां उनसे इतना भी नहीं कह पायी
कि उनके मुड़कटवा उनके पिता ही होते हैं

ख़ैर सई, गंगा, गोमती नदियों के
सहने-बहने की कथा मेरी कथा थी
अवध का मर्दवादी पठार
मेरे पगचिह्नों से धूल-धूल हो रहा था 

जौनपुर मेरे खून में था
और वामिक, आलम मेरे पुरखे थे
पुरखिनों को मनुष्य द्रोहियों ने
इतिहास में दबा दिया था
और उसी घूर की खाद से मेरा जन्म हुआ था
सताये गये लोगों की आह से मैंने धुनें बनाई है
जिसकी जिढ़ उनसे काटे नहीं कट रही है
हर चईत में आग से जली फ़सलों की राख
मेरी पलकों पर आ बैठी थी
रूमान मेरे भीतर उतना ही रहा
जितना स्वस्थ मनुष्य में होना चाहिए
लेकिन याद में वही रह गये जो वसंत में भी लड़ते रहे

आजादी के किसी ब्रांड पर मुझे भरोसा नहीं हुआ
घुमंतू स्त्रियों से मैंने ‘कहीं नहीं ठहरना’ सीखा था
जिससे मैंने उनके अहंवाद को
जब तब चाहे-अनचाहे कचर दिया होगा
तब से वो अपना सारा पौरुष, ज्ञान, डिग्री
यहां तक कि अपने पर्चा लिखने का कौशल भी झोंककर
मुझे सबक सिखाने में लग गए
और मैं इतिहास की धमनियों में वो निशान ढूंढ़ने लगी
कि कैसे कमजोरों का हिस्सा भी
समय की देह में रक्त की तरह ही बहा
लेकिन कहीं दर्ज़ नहीं हुआ

कछारों और बाज़ारों की बदमली वाली उसी ज़मीन पर
पैरों के नाखून धंसा कर मैं अपना काम कर रही हूं
और वे अपना काम कर रहे हैं
एक ऐतिहासिक लड़ाई छेड़ दी गयी है
हमारी ओर से भी
उनकी ओर से भी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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