हैदराबाद के तेल्लापुर में स्थित फुले-आंबेडकर सेंटर फॉर फिलोसफी एंड इंग्लिश ट्रेनिंग (पैकपेट) 209वें भारतीय अंग्रेजी दिवस को सावित्रीबाई फुले को भारत में ‘अंग्रेजी शिक्षा की जननी’ घोषित करने जा रहा है। भारतीय अंग्रेजी दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन सेंटर के कैंपस में आगामी 4 अक्टूबर, 2026 को किया जाएगा। वैसे तो भारतीय अंग्रेजी दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है, मगर हम यह आयोजन 4 अक्टूबर को इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उस दिन इतवार है और इस कारण कार्यक्रम में अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।
इस कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली की गद्दी पर काबिज़ हमारे पाखंडी शासकों को यह याद दिलाने के लिए किया जा रहा है कि वे अनिश्चितकाल तक भारत में ऐसी दोहरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था नहीं चला सकते, जिसमें समृद्ध परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में अंग्रेजी में शिक्षा हासिल करने का मौका मिले और गरीबों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई करनी पड़े। पिछले बारह सालों के अपने राज में भाजपा-आरएसएस सरकार ने निजी और सरकारी शिक्षा व्यवस्थाओं की बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। जहां सरकारी शैक्षणिक संस्थानों पर खर्च होने वाले राशि लगातार घटाई जा रही हैं, वहीं बड़े उद्योग समूहों और विदेशी शिक्षण संस्थानों को निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित करने की खुली छूट दे दी गई है। इन निजी संस्थानों में भारी-भरकम फीस के बदले अंग्रेजी में शिक्षा उपलब्ध करवाई जाती है।
भाजपा-शासित राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार लगातार शासकीय स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से अंग्रेजी को बाहर करने की जुगत में लगी रहती हैं।
राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों में सरकारी संस्थाओं में पढ़ रहे विद्यार्थी यह शिकायत करते आ रहे हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई करने के कारण रोज़गार के बाज़ार में उनके लिए न के बराबर मौके उपलब्ध हैं। सरकारी संस्थानों में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है क्योंकि सरकारें न तो आवश्यक संख्या में शिक्षकों की भर्ती कर रही हैं और न ही इन संस्थाओं के आधारभूत संरचनात्मक विकास पर पर्याप्त ध्यान दे रही हैं।
यह आरएसएस-भाजपा का एक सोचा-समझा षड्यंत्र है। वे चाहते हैं कि सरकारी शैक्षणिक संस्थान पूरी तरह से बर्बाद हो जाएं ताकि पूरी शिक्षा व्यवस्था को निजी क्षेत्र को सौंपा जा सके। इससे आम लोग – जो निजी शिक्षा संस्थाओं की फीस का बोझ नहीं उठा सकते – अपने आप शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे।
सावित्रीबाई क्यों हैं भारत में अंग्रेजी शिक्षा की जननी?
सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला थीं, जिन्होंने पूरी हिम्मत और दिल से तीन कविताएं लिखीं, जिनमें यह बताया गया कि क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा की तुलना में, अंग्रेजी में शिक्षा निम्न जातियों के दमित पुरुषों और महिलाओं को उनकी दासता से मुक्ति दिलवाने में क्यों कहीं अधिक कारगर होगी। फुले दंपत्ति के काल से कुछ ही समय पहले 1818 में अंग्रेजों ने महाराष्ट्र में पेशवाओं के बर्बर और क्रूर ब्राह्मणवादी शासन का अंत किया था।

अंग्रेजी माई
सन् 1854 में सावित्रीबाई ने कवितओं के अपने संग्रह ‘काव्य फुले’ का प्रकाशन किया, जिसमें अंग्रेजी की महत्ता को बताने वाली तीन कविताएं शामिल थीं। इनमें दो कविताओं का शीर्षक ‘अंग्रेजी माई’ और और एक कविता का शीर्षक ‘अंग्रेजी सीखो’ था। ये कविताएं, संकलन की अन्य कविताओं से एकदम अलग थीं। इनके ज़रिए आज से 172 साल पहले सावित्रीबाई ने अंग्रेजी भाषा का भारतीयकरण किया। वे अंग्रेजी जानने वाली भारत की पहली महिला थीं जो अंग्रेजी में लेखन करने की इच्छुक थीं और वह भी इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी। मुझे नहीं लगता कि सावित्रीबाई के काल में किसी ब्राह्मण/बनिया महिला को अंग्रेजी पढ़ने-लिखने और सीखने की इजाजत दी गई होगी।
ये कविताएं मराठी में लिखी गई थीं। कविताएं इस प्रकार हैं–
अंग्रेजी माई – 1
पेशवाओं का राज गया।
बड़ी किस्मत से, देखो अंग्रेजी माई आई।।
निराशा का गर्द अंधेरा।
स्वर्ग-नर्क के भय ने मारा।।
हीन भावना से था हर जन हारा।
ऐसे अंधेरे समय में, देखो अंग्रेजी माई आई।।
रूढ़ियों को उखाड़ फेंको।
परंपराओं को तोड़ के देखो।।
आओ लिखना-पढ़ना सीखो।
आये अच्छे दिन, देखो अंग्रेजी माई आई।।
छल-कपट युक्त ब्राह्मण धर्म है भीषण।
अज्ञानी शूद्रों का करता है शोषण।।
निर्दोषों का करते उत्पीड़न जो।
पेशवाई सत्ता वह नष्ट हुई, देखो अंग्रेजी माई आई।।
ब्राह्मणशाही की हार हुई।
अंग्रेजों की जीत हुई।।
शूद्रों के हित में यह बात हुई।।
मनु का विधान जला, देखो अंग्रेजी माई आई।।
शूद्रों को ज्ञान का सहारा मिला।
अतिशूद्रों को प्रोत्साहन मिला।।
अंग्रेजी राज में मानवोचित अधिकार मिला।
जातिभेद की भयानकता घटी, देखो अंग्रेजी माई आई।।
देश इंडिया नहीं किसीका।
न ईरानी, तातार, न यूरोपियों, न हूणों का।
नस-नस में दौड़े खून मूलवासियों का।
भर हुंकार करो जयघोष, देखो अंग्रेजी माई आई।।
अंग्रेजी माई – 2
अंग्रेजी माई की बोली स्पष्ट और बहुत उदार।
पूरे मन से करती है सब शूद्रों का उद्धार।।
यह अंग्रेजी माई का राज है, मुगलों का तख्त-ताज नहीं।
पेशवाई10 के दिन बीते। अब मूर्खों का राज नहीं।।
अंग्रेजी माई ज्ञान सच्चा हमें देती है।
मानवता का दूध पिला, शूद्रों को समर्थ कर देती है।।
दे तालीम उनको, दूर करती है अज्ञानता,
जोड़ती है शूद्रों का मनुष्यता से नाता।।
अंग्रेजी सीखो
उद्यम करो, स्वावलंबी बनो।
श्रम कर तुम। ज्ञानवान-धनवान बनो।।
बिन विद्या के पशुवत जीवन हो जाएगा नाकाम।
नित नव ज्ञान अर्जित करो, मत बैठो निष्काम।।
शूद्रातिशूद्रों को अपने दुख से उबरने का।
सीख अंग्रेजी यह अवसर अपना जीवन सफल बनाने का।।
सीख अंग्रेजी ज्ञान अर्जित करो, जाति-भेद का अंत करो।
ब्राह्मणों की नीति-कथाओं का कर परित्याग, गुलामी उखाड़ फेंको।।
(कविताएं ‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’, मूल मराठी से अनुवाद : उज्ज्वला म्हात्रे, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली से उद्धृत)
कविताओं की पृष्ठभूमि
आंबेडकर ने अंग्रेजी में कई किताबें लिखीं। इनमें भारत का संविधान भी शामिल था। उन्होंने ब्राह्मणवादी दमनकारी कानूनों की संहिता ‘मनुस्मृति’ को सार्वजनिक रूप से जलाया। वे आधुनिक ज्ञान और संवैधानिक लोकतंत्र के पितामह थे। मगर उन्होंने भी कभी अंग्रेजी भाषा के एससी/एसटी/शूद्र/ओबीसी समुदायों की मुक्तिदाता के रूप में भूमिका पर इतनी दृढ़ता और मजबूती से जोर नहीं दिया। उन्होंने अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाने का प्रयास किया मगर वे इसमें सफल नहीं हो सके। मगर संविधान सभा के ब्राह्मणवादी तत्व अंग्रेजी को भारत के प्रशासन की भाषा और हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करने पर राजी हो गए। आरएसएस/भाजपा सरकार इसी प्रावधान का उपयोग कर सरकारी शिक्षा संस्थानों से अंग्रेजी को बाहर धकेल रही है और धीरे-धीरे इस संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन कर रही है कि अंग्रेजी देश में प्रशासन की भाषा रहेगी।
सावित्रीबाई का अंग्रेजी भाषा को मां का दर्जा देना एक बहुत बड़ा कदम था। उन्होंने यह तब किया जब वे पेशवाओं के ब्राह्मणवाद के गढ़ रहे पूना में रह रही थीं और उस नगर में कट्टरवादी ब्राह्मणों का बोलबाला था। वे लोग फुले दंपत्ति के हर सुधार का विरोध कर रहे थे। सावित्रीबाई फुले ने न केवल यह कविता लिखी वरन महात्मा फुले के साथ मिलकर अंग्रेजी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए काम किया। ब्राह्मणवादी उच्च जातियों ने वैदिक काल से ही षड्यंत्रपूर्वक शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को शिक्षा से वंचित रखा। इसके नतीजे में सैंकड़ों वर्षों तक भारत के उत्पादक समुदाय अर्थात कृषक और शिल्पकार अशिक्षित बने रहे और शोषण का शिकार रहे। मुस्लिम शासकों ने भी ब्राह्मणों के हुक्म को नहीं टाला और संस्कृत तो छोड़िए, शूद्र/दलित/आदिवासीजनों को फारसी भाषा सीखने की भी इजाजत नहीं दी।

हमें नहीं मालूम कि इन वर्गों के सदस्यों ने बौद्ध भाषा पालि में लिखना-पढ़ना क्यों नहीं सीखा। हालांकि हम सब जानते हैं कि बाद के वर्षों में बौद्धमठ भी ब्राह्मणवाद के प्रभाव में आ गए और उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि वे भारत में बड़ी संख्या में स्कूल खोलें।
आधुनिक काल में अंग्रेजों ने शूद्रों और दलितों के लिए शिक्षा के द्वारा खोल दिए। मगर ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था पर ब्राह्मणों का संपूर्ण नियंत्रण था। तिलक, एम.के. गांधी और कई अन्य ब्राह्मण-बनिया नेताओं ने ब्रिटिश शासनकाल में भी शूद्र/दलित/आदिवासी वर्गों के अंग्रेजी सीखने का विरोध किया। गांधी लगातार क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा की वकालत करते रहे। उससे पहले सन् 1840 के दशक से ही फुले दंपत्ति ने ब्राह्मणों के वर्चस्व के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी। बंगाली और तमिल ब्राह्मणों ने भी उत्पादक जातियों को अंग्रेजी नहीं सीखने दी।
सावित्रीबाई का अंग्रेजी भाषा को मां का दर्जा देना और शूद्र/दलित/आदिवासी महिलाओं और पुरुषों से यह आह्वान करना कि वे अंग्रेजी सीखें और शिक्षित बनें भारत में अंग्रेजी भाषा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था।
पैकपेट की सोच
पैकपेट ने पिछले साढ़े चार सालों में भारत भर के करीब 1,500 ग्रामीण युवाओं को अंग्रेजी बोलना, पढ़ना और लिखना सिखाया है। इनमें से 750 लड़के और 750 लड़कियां थीं, क्योंकि पैकपेट की प्रवेश नीति में यह प्रावधान है कि लड़के और लड़कियों को बराबर संख्या में प्रवेश दिया जाएगा। हालांकि केवल लड़कियों के लिए डाटा साइंस में प्रशिक्षण की अलग से व्यवस्था है। इन सभी ने पाठ्यक्रम के भाग के रूप में सावित्रीबाई, जोतीराव फुले, आंबेडकर और मेरी रचनाओं का अध्ययन किया है।
सावित्रीबाई का पैकपेट के लिए विशेष महत्व
सावित्रीबाई की ‘अंग्रेजी माई’ कविता में यह संदेश छिपा हुआ है कि सभी जातियों, वर्गों और लिंगों के भारतीयों की मातृभाषा अंग्रेजी होनी चाहिए। पूना में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मनु धर्म पर हमला किया। जवाब में भाजपा-आरएसएस के नेताओं ने कहा कि वे मनु के सनातन धर्म का विरोध कर रहे हैं। दूसरी ओर सावित्रीबाई अपनी कविता में कहती हैं कि अंग्रेजी माई की देहरी पर मनु ने दम तोड़ दिया है। उनके इस संदेश को भारत के घर-घर पहुंचाया जाना चाहिए ताकि हमारी महिलाएं और पुरूष जातिवाद और पिृतसत्तात्मकता से मुक्त हो सके।
सावित्रीबाई को भारत में अंग्रेजी शिक्षा की जननी का दर्जा देकर पैकपेट आरएसएस-भाजपा को जता देना चाहता है कि वे सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी में शिक्षण पर रोक नहीं लगा सकते और न ही प्रशासन की भाषा के रूप में उसके इस्तेमाल को रोक सकते हैं। अंग्रेजी एकमात्र ऐसी भाषा है जो हर राज्य – चाहे उसकी भाषा कोई भी हो – में पढ़ाई जाती है। देश के किसी दूरस्थ इलाके में रहने वाला कोई आदिवासी बच्चा – जिसकी कथित मातृभाषा को समझने वाले एक छोटे से समूह तक सीमित रहते हैं – भी थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानता है। चाहे कोई उर्दू बोलने वाला मुस्लिम लड़का या लड़की हो या गुरुमुखी लिखने और पंजाबी बोलने वाला कोई सिक्ख बालक, अंग्रेजी इन सभी को जोड़ने वाली भाषा है। यही कारण है कि अब तक पैकपेट में प्रशिक्षण हासिल करने वाले युवा देश के 20 अलग-अलग राज्यों से हैं और उनकी मातृभाषाएं अलग-अलग हैं। वे एक-दूसरे से संवाद के लिए अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेज़ी उनके राष्ट्रवाद को मजबूती देती है। हिंदी यह काम न तो आज कर सकती है और न ही आगे कभी कर पाएगी।
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सभी सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी ही शिक्षा का माध्यम है। यद्यपि हिंदुत्ववादी नेताओं जैसे वेंकैया नायडू, जस्टिस एन.वी. रमन्ना और जयप्रकाश नारायण ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा बंद करने के लिए राजी करने के भरपूर प्रयास किए, मगर वे सफल न हो सके।
पैकपेट लंबे समय से हर 5 अक्टूबर को भारतीय अंग्रेजी दिवस मनाता आ रहा है। इस कार्यक्रम में हम भारत में अंग्रेजी शिक्षा की जननी सावित्रीबाई फुले की एक सुंदर तस्वीर लगाते हैं। अब हम सावित्रीबाई की सन् 1854 में की गई उस ऐतिहासिक घोषणा को अमर बनाना चाहते हैं कि अंग्रेजी भारतीयों की मां है।
(यह आलेख पूर्व में मूल अंग्रेजी में वेब पत्रिका ‘काउंटर करेंट्स’ द्वारा प्रकाशित है। यह लेखक की सहमति से हिंदी अनुवाद प्रकाशित, अनुवादक : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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