ब्रिटिश भारत में दो सत्याग्रह हुए। इन सत्याग्रहों के अर्थ खोजे नहीं गए। लेकिन इन्हें उत्सवों जैसे माहौल में बदल दिया गया। इन दोनों सत्याग्रहों के बीच के संबंध क्या हैं? सीधे तौर पर कहें तो सामाजिक-राजनीतिक साम्राज्यों को चुनौती। सत्य़ाग्रह के दो उद्देश्य होते हैं। एक विरोध और दूसरा हासिल। लेकिन विरोध और हासिल की विवेचना से पहले यह जानना महत्वपूर्ण है कि उस विरोध के सामने कौन है और उसकी पृष्ठभूमि क्या है।
महाड़ सत्य़ाग्रह का यह सौवां साल है। वर्ष 1927 में डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में पीने के लिए पानी पर हक का सत्याग्रह नहीं होता तो क्या 1930 में महात्मा गांधी दांडी मार्च यानी नमक सत्याग्रह के लिए प्रेरित होते?
सत्याग्रह की बुनियाद में अस्तित्व के लिए अधिकार हासिल करने की प्रेरणा होती है। पानी के बिना जीवन के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। ब्रिटिश भारत दो तरह की गुलामी में जकड़ा हुआ था। ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत को नमक जैसी बुनियादी जरूरतों के आधार पर गुलाम बना रखा था। ब्रिटिश सत्ता ने भारत के लोगों को नमक बनाने के अधिकार से वंचित कर दिया था। भारत के लोग नमक नहीं बना सकते थे जबकि नमक प्राकृतिक देन है। इसी तरह से वर्ण और जाति आधारित भारतीय समाज व्यवस्था ने सदियों से अछूतों को पानी लेने के अधिकार से वंचित कर रखा था।
पहली बात तो यह स्पष्ट है कि अस्तित्व के लिए आवश्यक चीजों से वंचित करना गुलामी प्रथा को जारी रखने की सत्ता की पहली शर्त होती है। नमक और पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। दूसरा, सत्ता गुलामी के लिए गुलामों की बुनियादी जरूरतों की पहचान करती है। बुनियादी जरूरतें सत्ता और समाज के चरित्र और बुनावट के अनुसार भिन्न हो सकती है। ब्रिटिश सत्ता नमक जैसी बुनियादी आवश्यकता पर प्रतिबंध लगाने की क्षमता रखती थी, क्योंकि नमक के क्षेत्र का दायरा एक निश्चित सीमा में है। वह पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्र की तरह असीमित नहीं है। कानूनी स्तर पर अधिकारों से वंचित करने के लिए ब्रिटिश सत्ता के लिए एक प्रशासनिक ढांचे की भी व्यवस्था अनिवार्य थी, लेकिन पानी जैसे असीमित क्षेत्र के लिए किसी तरह के प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता नहीं थी। समाज व्यवस्था में ही पानी से वंचित करने के नियम बने हुए थे और उसे भारत में मानव समाज के हर सदस्य को उसका पालन करना था। एक दूसरे पर निगरानी और नियमों का पालन करने और करवाने की फौज सामाजिक व्यवस्था में स्वत: खड़ी थी और है भी।

भारतीय समाज व्यवस्था में भारत के बहुसंख्यक लोगों के लिए पीने का पानी सार्वजनिक जगहों से लेने पर सजायुक्त पाबंदी के खिलाफ 20 मार्च, 1927 को डॉ. आंबेडकर ने महाड़ सत्याग्रह किया। कारण यह रहा कि महाराष्ट्र के महाड़ में जो सार्वजनिक तालाब था, उसका पानी वैसे इंसान नहीं ले सकते थे जिन्हें अछूत घोषित किया गया था। अछूत घोषित करने वाली सत्ता सामाजिक ढांचे में गुलामी अथवा दास प्रथा पर आधारित रही है। सत्ता बिना गुलामी की प्रथा के क्या टिकी रह सकती है? ब्रिटिश भारत दो स्तरों पर गुलाम रही। अछूत दोनों स्तरों पर गुलामी से दबे रहे। पानी पर पाबंदी ब्रिटिश सत्ता की नहीं थी, यह तो स्पष्ट हैं। डॉ. आंबेडकर जिस तालाब से पानी लेने गए थे, उस महाड़ के तालाब के तटबंध में गढ़े पत्थरों में एक पर लिखा था– “नगरपालिका महाड़, 1899। यानी यह पानी का स्रोत लिखित में सबका था, सबकी संस्था का था, लेकिन कब्जा उनका था जो किसी को अछूत घोषित करने के लिए खुद को ताकतवर मानते थे।
जबकि सन् 1923 में ही बंबई विधानमंडल ने पीने के पानी को अछूतों के लिए खोलने का निर्णय सुनाया था। धर्मशाला, स्कूल, दवाखाना आदि भी तब अछूतों के लिए खोले गए थे। यहां बुनियादी जरूरतों को विस्तार से समझा जा सकता है। विधानमंडल के इस निर्णय के बाद 19 मार्च, 1927 को डॉ. आंबेडकर अपने साथियों के साथ उस चावदार तालाब से पानी लेने पहुंचे, जहां उनके साथ मारपीट की गई और फिर तालाब को शुद्ध किया गया। विधानमंडल के कानून सामाजिक कानूनों में तब भी मान्य नहीं थे। लेकिन महाड़ सत्याग्रह ने दो स्तरों पर महत्वपूर्ण संदेश का उत्पादन किया। पहला तो यह कि अछूत समुदायों में प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार को लेकर चेतना के बीज अंकुरित हुए। लेकिन इसे इसी सीमित दायरे में देखना मुनासिब नहीं होगा। महाड़ ने पूरे भारतीय समाज में उनलोगों के मन में भी प्राकृतिक स्रोतों पर अधिकार की चेतना को जन्म दिया जो कि ब्रिटिश सत्ता की गुलामी को महसूस करने लगे थे।
महात्मा गांधी ने आखिर नमक को सत्याग्रह के लिए 1930 में क्यों चुना? यह भी प्रासंगिक है कि मौलिक अधिकार को हासिल करने का मसविदा इसी वक्त कांग्रेस ने तैय़ार किया था। नमक ब्रिटिश सत्ता को बनाए रखने के मूल में था। महात्मा गांधी ने नमक का कानून तोड़ना क्यों जरूरी समझा, क्योंकि वैसा कानून जो गुलामी की प्रथा की एक सैन्य व्यवस्था का आधार हो, उस पर चोट करने का अर्थ, व्यवस्था पर चोट करना है और ऐसे चोट करना है जिसमें उससे प्रभावित व्यक्ति को अपनी गुलामी का एहसास हो और जिसे तोड़ने की प्रेरणा और साहस उसमें विकसित करना, आंदोलन की पहली बुनियादी शर्त होती है। डॉ. आंबेडकर ने दोहरी गुलामी से पीड़ित जनमानस के बीच यही किया। गुलामी को अपनी नियति नहीं मानने और प्राकृतिक संसाधनों को अपना अधिकार मानने का विचार उन्होंने पूरे भारतीय मानस के बीच जगाया।
इस तरह वर्ष 1927 में पानी के लिए डॉ. आंबेडकर का महाड़ सत्याग्रह सामाजिक के साथ राजनीतिक आंदोलनों की दिशा के रूप में भी विकसित होता है। वही, महात्मा गांधी की अगुवाई में दांडी मार्च प्राकृतिक संसाधनों पर आम लोगों के हक का संघर्ष ब्रिटिशों से आजादी तक पहुंचा। भौतिकवादी दुनिया में यह तय होता है कि कौन खुद को शक्तिशाली मानता है और वह अपनी शक्ति के लिए कहीं किसी से पानी छीनता है, पानी रोकता है तो कहीं पेड़ तो कहीं हवा और दूसरे प्राकृतिक संसाधन की लूट करता है। आंदोलन लोगों के बीच खुद के शक्तिशाली होने के विचार जगाते हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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