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साहित्‍य

बीसवीं सदी के अंतिम दशक की दलित कविता (पहली कड़ी)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस दौर में और आजादी के बाद अनेक दलित कवि हुए, जिन्होंने...
जोतीराव फुले का काव्य-कर्म (पहला भाग)
जोतीराव फुले अपने साहित्य से एक ओर तो शूद्र-अतिशूद्रों को ब्राह्मणवादी नैतिक बोध से मुक्ति दिलवाने के लिए तथा दूसरी ओर इस दलित-वंचित-उपेक्षित वर्ग के विकास के लिए अंग्रेजी सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (पांचवीं कड़ी का अंतिम भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस दौर में और आजादी के बाद अनेक दलित कवि हुए, जिन्होंने...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (तीसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस दौर में और आजादी के बाद अनेक दलित कवि हुए, जिन्होंने...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास (दूसरा भाग)
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर...
हिंदी नवजागरण के मौलिक चिंतक पेरियार ललई सिंह
सनद रहे कि यदि दलित नायकों पर केंद्रित उनके नाटक हिंदी क्षेत्र में दलित-चेतना के विकास में महत्वपूर्ण...
संस्मरण : गाेरखपुर में राजेंद्र यादव
नब्बे के दशक में वे एक बार गोरखपुर आए थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की स्थापना...
दलित कविता की आंबेडकरवादी चेतना का उत्तरोत्तर विकास
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर...
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