इस संग्रह की तीसरी और अंतिम श्रेणी की कहानियां सामाजिक संघर्षों पर आकर ठहरती हैं। जो लेखक के लेखन का उत्स है। इन कहानियों में ‘लाल सलाम’ प्रमुख है। सुरेंद्र स्निग्ध की रचनाओं में सामंतवादी...
जहां एक तरफ़ इलाहाबाद के सामाजिक यथार्थ की बात करने से गुरेज़ किया गया है, वहीं लेखिका इस शहर के प्रति गहरे ‘नॉस्टेल्जिया’ में डूबी हुई नज़र आती हैं। इलाहाबाद का संस्मरण लिखने का शायद...
शिवमूर्ति ने ‘तिरिया चरित्तर’ लिखी, ‘सिरी उपमा जोग’ लिखी। शिवमूर्ति ने गांव के यथार्थ को नंगा कर दिया। दूसरी ओर मध्यवर्गीय समाजों से आए लेखक अपनी ही कुंठाओं से पीड़ित और चिंतित थे। आप देखिए...
डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर की यह समीक्षा