डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर की यह समीक्षा
हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस तरह कोई खबरनबीस या पत्रकार किसी घटना की स्टोरी बनाता है।...
लेखक का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति सजगता जगाना प्रतीत होता है। आदिवासी जीवन का संघर्ष इस उपन्यास का बायप्रोडक्ट जान पड़ता है। चूंकि लेखक मानवशास्त्री हैं इसलिए उन्हें पता है कि प्रकृति के वास्तविक...
पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने से पहले स्त्री माना जाना चाहिए, जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, जिनकी...