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सम-सामयिकी

आदिवासियों के पुरखों की हत्या का जश्न मनाने वाले क्यों कर रहे हैं उनका सांस्कृतिक समागम?
यह कौतूहल जरूर होता है कि हिंदुओं के संपूर्ण पौराणिक वाङ्मय में जिन्हें अनार्य, राक्षस, असुर, दस्यु, दास, यहां तक कि मानवेतर वानर शब्द से नवाजा गया और जिन्हें आज भी उनके मूल नाम ‘आदिवासी’...
हार से खत्म नहीं हुई है स्टालिन की पेरियारवादी राजनीति
स्टालिन इसलिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे कि उन्होंने राज्य को नीट से छूट और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में तीन भाषा वाली पॉलिसी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पुरजोर मांग की कि शिक्षा राज्य का विषय...
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के नजरिए का नया संस्करण
यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की पृष्ठभूमि भी संस्थागत है। यह उनकी सीमा है। इसीलिए उनमें वह व्यापक सामाजिक नजरिया विकसित नहीं हो सका है जो कि लोकतंत्र के...
गए थे जोतीराव को मारने, बन गए महान सत्यशोधक पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार
संस्कृत तथा धर्म-शास्त्रों में प्रवीण होने के बावजूद धोंडीराम अपने सत्यशोधक होने के लक्ष्य से भटके नहीं थे। सन् 1896 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक उन्होंने ‘वेदाचार’ रखा था। उनकी यह...
जाति-आधारित जनगणना के लिए महाराष्ट्र में राज्यव्यापी अभियान प्रारंभ
पूरे देश में ओबीसी समुदाय की सही आबादी के आंकड़े, साथ ही उनकी शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति...
राजस्थान में आरएसएस के कार्यकर्ताओं द्वारा मंदिर हड़पे जाने पर दलित पुजारी ने मोहन भागवत से लगाई गुहार
“संघ के जातिवादी स्वयंसेवकों द्वारा पैदा किए गए विवाद की आड़ में राजस्थान की भाजपा सरकार ने भाजपा...
बिहार में किनकी जमीनों पर है सम्राट सरकार की नजर?
कारपोरेट परस्त राजनीति लंबे समय से ‘विकास’ के नाम पर भूमि को पूंजी में बदलने की राजनीति रही...
आखिर संसद और श्रम मंत्रालय मजदूरों से किस भाषा में संवाद करते हैं?
श्रम संबंधी स्थायी समिति में यदि हिंदी में प्रतिवदेन के नहीं प्रस्तुत करने का एक चलन लंबे समय...
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