न्यायिक व्यवस्था में डाइवर्सिटी एकमात्र उपाय

न्यायपालिका में दलित-आदिवासी-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात नहीं सुनी जाती, उन्हें न्याय नहीं मिलता, यह एक ऐसी अप्रिय सच्चाई है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता

दलित-बहुजन तबके की ओर से लगातार यह आवाज उठती रही है कि भारतीय न्यायपालिका में उनकी बात नहीं सुनी जाती, उन्हें न्याय नहीं मिलता। उनके आरोप की पुष्टि इस बात से हो जाती है कि एक अनुमान के अनुसार जेलों में बंद 90 प्रतिशत से ज्यादा कैदी दलित-बहुजन पृष्ठभूमि के हैं। फांसी पर चढऩे वाले कैदी भी इन्हीं वर्गों के होते हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या जुर्म के अधिकांश मामलों को इन्हीं के द्वारा अंजाम दिया जाता है? कतई नहीं। कानून की नजर में वही अपराधी होता है जो अपने बचाव में पर्याप्त साक्ष्य और मजबूत दलीलें पेश नहीं कर पाता। इसका भुक्तभोगी दलित-बहुजन समाज सबसे ज्यादा होता है क्योंकि न्यायपालिका में उसका प्रतिनिधित्व शून्य है। उनका मानना है कि अगर न्यायिक व्यवस्था में उनको समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाए तो उनकी ओर से बोलने वाला भी वहां कोई होगा और उनको न्याय मिल पाएगा। आइए जानते हैं, इस मुद्दे पर फारवर्ड प्रेस के अमरेंद्र यादव और अशोक चौधरी से विशेषज्ञों ने क्या कहा…

 

सुभाष कश्यप

सुभाष कश्यप,

संविधानविद्

दलितों का दलित बने रहना ही उनके लिए सबसे बड़ी बाधा है। नेता उन्हें दलित बनाए रखना चाहते हैं और वे दलित बने रहना चाहते हैं। दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले लोग उनके लिए कुछ करना ही नहीं चाहते।

 

 

 

कमलेश जैन

कमलेश जैन,

वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में जो फैसले होते हैं, उनका आधार पीडि़त पक्ष द्वारा की गई शिकायत होती है। ये शिकायतें ठीक से दर्ज नहीं की जाती हैं। उनमें कानूनी कमियां रहती हैं। दलितों के पास अपने अच्छे वकील नहीं होते हैं, जबकि विरोधी पक्ष के पास अच्छे वकील होते हैं। कानून की गलत व्याख्या की जाती है। कई ऐसे फैसले हैं जिनकी निंदा की जा सकती है। मैं यह भी कहूंगी कि कहीं न कहीं एक पूर्वाग्रह भी है-निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में-और यह पूर्वाग्रह फैसलों में झलकता है। इसलिए उनको न्याय नहीं मिल पाता है।

 

लालजी प्रसाद निर्मल

लालजी प्रसाद निर्मल,

आम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष

दलित-बहुजन की बात भारतीय न्यायपालिका में नहीं सुनी जाती, इसके मूल में जहां एक ओर बार और बेंच में दलितों की लगभग शून्य भागीदारी है, वहीं दूसरी ओर यहां का सामाजिक ताना-बाना भी जिम्मेदार है। दलित स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें न तो बार का समर्थन प्राप्त है और ना ही बेंच का। न्यायपालिका में बिना किसी प्रतियोगिता के पहुंचे जज अपने सामाजिक संस्कारों और सवर्ण मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाते। उत्तरप्रदेश में स्थाई अधिवक्ताओं की नियुक्ति में आरक्षण का आदेश देने वाले जजों में से एक अनुसूचित जाति से और एक पिछड़े वर्ग से थे। उत्तरप्रदेश में सत्तर के दशक में प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ जो पहला मुकदमा हुआ  उसकी पैरवी मार्केंडेय काटजू ने की थी, जो तब वकील थे और अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश व भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष हैं। विगत वर्ष पोन्नति में आरक्षण के खिलाफ जो मुकदमा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ा गया उसमें कोई अधिवक्ता दलित-बहुजन समाज से नहीं था। यूपी में दलित सरकार थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट में कोई एडवोकेट-ऑन-रिकार्ड दलित या पिछड़ा नहीं था। इस देश की न्यायिक व्यवस्था में विविधता बेहद जरूरी है।

जहां सरकारें न्यायालय परिसर में मनु की प्रतिमा स्थापित करती हो वहां बहुजन की भागीदारी के बिना न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती।

 

एचएल दुसाध

एचएल दुसाध,

डाइवर्सिटी मिशन के संस्थापक

न्यायपालिका में दलित-आदिवासी-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात नहीं सुनी जाती, उन्हें न्याय नहीं मिलता, यह एक ऐसी अप्रिय सच्चाई है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि इन वर्गों में न्यायपालिका के प्रति काफी क्षोभ है। बहरहाल, न्यायपालिका में दलित-बहुजन के प्रति अन्याय के पीछे मेरे ख्याल से सबसे बड़ा कारण भारत की जाति-केन्द्रित सामाजिक सोच है। वैसे तो विश्व के एकमात्र जाति-आधारित समाज में कई बुराईयां हैं लेकिन इसकी अन्यतम बुराई यह है कि असंख्य जातियों में बंटे हिन्दू समाज में भ्रातृत्व नहीं, परस्पर शत्रुता और घृणा का बोलबाला रहा है। इससे भी बड़ी समस्या यह रही है कि इसमें पले-बढे व्यक्ति की सोच निज-जाति/वर्ण के स्वार्थ के दायरे में ही रहती है। इस दायरे का अतिक्रमण हिमालय लांघने जैसा कठिन काम रहा है। उनकी चेतना समग्र वर्ग से संबंधित नहीं है।

हरेक हिन्दू में जो चेतना पाई जाती है, वह उसकी अपनी जाति के बारे में होती है। समग्र वर्ग की चेतना के अभाव की व्याधि हिन्दुओं में इतनी प्रबल रही है कि इससे बड़े से बड़े साधु-संत, राजा-महाराजा, समाज सुधारक, लेखक-कलाकार इत्यादि तक मुक्त नहीं हो पाए तो फिर न्यायाधीश ही कैसे अपवाद हो पाते। बहरहाल, समग्र वर्ग की चेतना से शून्य न्यायाधीशों का कहर झेलने के लिए बहुजन समाज इसलिए अभिशप्त है क्योंकि स्वाधीन भारत में न्यायपालिका का लोकतांत्रिकरण न हो पाने के कारण यहां ऐसे परंपरागत व सुविधासंपन्न तबके का वर्चस्व है जो परंपरागत वर्ण व्यवस्था में घनघोर आस्था रखने के कारण दलित-बहुजन को मनुष्येतर प्राणी मानते हैं। चूंकि हिन्दुओं को समग्र वर्ग की चेतना से लैस करना असंभव है इसलिए दलित-बहुजन को यदि न्याय दिलाना है तो उसका एकमेव उपाय निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में जज से लेकर पेशकार तक के पदों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन है। ऐसा होने पर हर तबके के स्त्री-पुरुषों को उनकी संख्यानुपात में हिस्सेदारी मिलेगी। इससे वहां संतुलन कायम होगा जिससे ‘समग्र वर्ग की चेतना’ की दरिद्रता के बावजूद नाइंसाफी की गुंजाइश काफी हद तक कम हो जाएगी।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित )


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