विशिष्ट समूहों तक सीमित शिक्षा व्यवस्था पर चिंता

अर्थशास्त्री व शिक्षाविद प्रोफेसर के.एस. चालम, जिन्होंने देश में शिक्षा की स्थिति पर कई अध्ययन किए हैं, ने कहा कि स्वाधीनता से लेकर सन् 1990 तक, केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा व विदेशों से प्राप्त सहायता से, शिक्षा के क्षेत्र में जो भी निवेश किया गया, उसका लाभ आबादी के केवल 15 प्रतिशत हिस्से तक पहुंचा-ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों तक

अगर भारत के स्कूलों और कालेजों में अनुसूचित जाति-जनजातियों के विद्यार्थियों की स्थिति का दस्तावेजीकरण हो जाए और वह ऑनलाईन उपलब्ध हो तो उसे गूगल सर्च करने के लिए कौन से शब्द सबसे उपयुक्त रहेंगे? बीच में स्कूल छोडऩा, कला संकाय, हिंदी, संस्कृत, सरकारी स्कूल, मध्यान्ह भोजन, आत्महत्या आदि।

कांस्टिट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में 16 नवंबर को ”अनुसूचित जाति-जनजातियों की शिक्षा-प्रकृति व स्थिति” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने इन सभी मुद्दों पर अपनी चिंता जाहिर की। रविवार की दोपहर को आयोजित इस संगोष्ठी में लगभग 200 व्यक्तियों ने भाग लिया। संगोष्ठी तीन सत्रों में विभाजित थी: प्राथमिकव उच्चतर माध्यमिक शिक्षा, उच्च व तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा।

संगोष्ठी की आयोजक ‘कॉमन कंसर्न’ (एक ऐसी संस्था, जिसमें न कोई अध्यक्ष है, न महासचिव व ना ही अन्य पदाधिकारी) के डॉ. अमर सिंह, आईएएस, ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए वक्ताओं से अनुरोध किया कि वे भारत में शिक्षा व्यवस्था के तेजी से हो रहे निजीकरण और उसकी गिरती हुई गुणवत्ता के संदर्भ में इस प्रश्न पर अपने विचार व्य कहा कि ”हमारे प्रेरणा पुरूष बाबा फुले व बाबा साहेब आम्बेडकर” और उनके विचारों को विभिन्न स्तरों के पाठ्यक्रमों से हटाए जाने से ”हमारी भावनाएं आहत हो रही हैं”।

संगोष्ठी के विषय पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर विवेक कुमार ने बताया कि किस तरह सर्वशिक्षा अभियान ने, विशेषकर उत्तर भारत में, निम्न गुणवत्ता वाली शिक्षण संस्थानों की भीड़ खड़ी कर दी है। उन्होंने कहा कि कॉमन कंसर्न का लक्ष्य एक ऐसी नीति तैयार करना है जो शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावकारी सुधार लाने में मदद कर सके-विशेषकर इसलिए क्योंकि नई सरकार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर पुनर्विचार करने का मन बना रही है।

अर्थशास्त्री व शिक्षाविद प्रोफेसर के.एस. चालम, जिन्होंने देश में शिक्षा की स्थिति पर कई अध्ययन किए हैं, ने कहा कि स्वाधीनता से लेकर सन् 1990 तक, केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा व विदेशों से प्राप्त सहायता से, शिक्षा के क्षेत्र में जो भी निवेश किया गया, उसका लाभ आबादी के केवल 15 प्रतिशत हिस्से तक पहुंचा-ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों तक। इन वर्गों के कुछ सदस्य नोबेल पुरस्कार विजेता बन गए तो कुछ अध्येता और नीति निर्माता। ”हमारे अभिभावकों और हमारे पूर्वजों को शिक्षा व स्वास्थ्य से वंचित रखा गया” और प्रभु वर्ग के सदस्य स्विस बैंकों में अपना धन जमा करते रहे। अब वे शिक्षा का निजीकरण करना चाहते हैं। ”यह एक षडय़ंत्र है, जिसे हम समझ नहीं सके हैं”, उन्होंने कहा।

एक अन्य आईएएस अधिकारी डॉ. दिलीप सिंह, जो कि हरियाणा सरकार में शिक्षा सचिव रह चुके हैं, ने राज्य के एक गांव के स्कूल के अपने दौरे का वर्णन किया। वे वहां एक कार्यक्रम में भाग लेने गए थे। उन्होंने स्कूल के हैडमास्टर से पूछा कि स्कूल में कुल कितने विद्यार्थी हैं। जवाब मिला, ‘पांच सौ साठ’। बाद में हैडमास्टर ने उनके कान में फुसफुसाया कि ”इनमें से चार सौ दो अनुसूचित जातियों के हैं”। डॉ. दिलीप सिंह के अनुसार, हरियाणा के सरकारी स्कूलों के 60 प्रतिशत विद्यार्थी अनुसूचित जातियों के हैं और लगभग 10-12 प्रतिशत पिछड़े वर्गों के। उनके अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए इसलिए बाध्य हैं क्योंकि एक तो ये स्कूल उनके गांवों के नजदीक हैं और दूसरे उन्हें इन स्कूलों में कोई फीस अदा नहीं करनी पड़ती। ऊँची जातियों के अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने में सक्षम हैं।

डॉ. कौशल पवार, जो कि संस्कृत अध्येता हैं और संगोष्ठी की एकमात्र महिला वक्ता थीं, ने दलित विद्यार्थी के रूप में अपने अनुभवों को सांझा करते हुए बताया कि किस तरह उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पीएचडी पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के लिए असाधारण रूप से लंबे साक्षात्कार का सामना करना पड़ा था और किस तरह उनकी पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन करने में जानबूझकर देरी की गई थी ताकि ऊँची जातियों के विद्यार्थी वरिष्ठता की दौड़ में उनसे आगे निकल सकें और प्रतिष्ठित कालेजों व विश्वविद्यालयों में नौकरियां पा लें। एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि हमारे देश में 24 लाख आराधना स्थल हैं जबकि स्कूलों और कालेजों की संख्या 15 लाख और अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की केवल 6 लाख है। इन आंकड़ों से यह साफ है कि हमारे देश में धर्म को स्वास्थ्य और शिक्षा से अधिक महत्व दिया जा रहा है। उन्होंने यह मांग की कि देश में एक-सी शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम लागू किए जाएं। विद्यार्थियों को केवल हिंदू धर्म नहीं वरन् सभी धर्मों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।

चूंकि 99 प्रतिशत दलित विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं इसलिए उनको मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता का सीधा संबंध सरकारी स्कूलों के हालात से है। डॉ. पवार के अनुसार, दिल्ली के 1009 सरकारी स्कूलों में से केवल 12 में कंप्यूटर लैब हैं। ”तकनीकी शिक्षा के नाम पर करोड़ों रूपए आवंटित किए जा चुके हैं। यह पैसा आखिर जा कहां रहा है?” उन्होंने जानना चाहा।

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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