दलितों के सामूहिक हत्यारे एक बार फिर दोषमुक्त

सन् 1999 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुए ‘शंकर बीघा’ नरसंहार में स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों समेत 23 दलितों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया था। लगभग 16 साल बाद जनवरी 2015 में, जहानाबाद, बिहार के एक सत्र न्यायाधीश ने हत्या के सभी 24 आरोपियों को ‘सबूतों के अभाव’ में ‘बाइज्ज़त बरी’ कर दिया

सन् 1999 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुए ‘शंकर बीघा’ नरसंहार में स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों समेत 23 दलितों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया था। लगभग 16 साल बाद जनवरी 2015 में, जहानाबाद, बिहार के एक सत्र न्यायाधीश ने हत्या के सभी 24 आरोपियों को ‘सबूतों के अभाव’ में ‘बाइज्ज़त बरी’ कर दिया। सभी आरोपी रणवीर सेना के सदस्य थे। न्यायाधीश ने ‘सबूतों का अभाव’ के अलावा ‘गवाहों के मुकरने’ को भी अपने निर्णय का मुख्य आधार बनाया। हमेशा की तरह इस बार भी सुरक्षा न मिलने के कारण गवाहों को डरा- धमका कर अपराधी न्याय व्यवस्था की आंखों में धूल झोंक कर साफ बच निकले। इन्साफ एक बार फिर हार गया।

पहली बार नहीं हुआ है यह
दलित नरसंहार के मामलों में इससे पूर्व में भी ‘साक्ष्यों के अभाव’ का हवाला और ‘संदेह का लाभ’ देकर आरोपियों को ‘बाइज्ज़त बरी’ किया जाता रहा है। ‘नंदू सिंह बनाम बिहार राज्य’ प्रकरण में 9 अक्टूबर, 2013 को सुनाये गए अपने निर्णय में पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. एन. सिन्हा और अमरेश कुमार लाल ने अभियोजन पक्ष के गवाहों को ‘अविश्वसनीय’ बताते हुए ‘लक्ष्मणपुर बाथे’ नरसंहार के सभी 26 आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया था। ‘लक्ष्मणपुर बाथे’ नरसंहार 1997, में 16 बच्चों व 27 औरतों सहित कुल 58 लोगों की हत्या की गयी थी। मारी गईं महिलाओं में से आठ गर्भवती थीं और उनके अजन्मे बच्चे गर्भ में ही मौत के घाट उतार दिए गए थे। ‘बथानी टोला’ और ‘नगरी बाजार’ नरसंहार की तरह, ‘लक्ष्मणपुर बाथे’ नरसंहार मामले में भी पटना उच्च न्यायालय का फैसला चौंकाता कम, डराता अधिक है।

bathaniइसी तरह, जून 2000 में मियांपुर गांव में हुए नरसंहार में 34 दलितों की हत्या के दस अभियुक्तों को निचली अदालत ने दोषी माना। मगर जुलाई 2013 में पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों ने दस में से नौ को ‘बाइज्ज़त बरी’ कर दिया। नवम्बर, 1998 में भोजपुर जिले के नगरी बाजार में हुए नरसंहार के जिन दस अभियुक्तों को निचली अदालत ने सजा सुनाई थी, उन्हें भी पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों ने ही बरी किया था। उल्लेखनीय है कि इन सभी मामलों में बिहार की रणवीर सेना शामिल थी।

भोजपुर जिले के सहर ब्लाक में जुलाई 1996 को बथानी टोला के 21 दलितों की अमानुषिक हत्या के सभी आरोपियों को भी पटना हाईकोर्ट द्वारा दोषमुक्त करार किया गया था। आरा के सत्र न्यायधीश अजय कुमार श्रीवास्तव ने तीन आरोपियों को फाँसी और बीस को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, मगर पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों नवनीति प्रसाद सिंह और अश्विनी कुमार सिंह ने आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए पूरा फैसला ही पलट दिया। यह निर्णय ‘हरे राम सिंह बनाम बिहार राज्य’ प्रकरण में 16 अप्रैल, 2012 को सुनाया गया। राज्य सरकार और पीडि़त परिवारों के सदस्यों द्वारा दायर अपील पर जुलाई 2012 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और चेलामेश्वर ने नोटिस जारी किये हैं। ज़ाहिर है कि सब आरोपी जमानत पर हैंं।

क्यों छूटते हैं अपराधी?
दलितो के साथ अत्याचार के मामलों में पुलिस उन्हें ही डराती- धमकाती है या समझौता करने का दबाव डालती है। अनुसन्धान में कमियों की भरमार होती है। सालों तक आरोपपत्र दायर नहीं किये जाते। फिर मुकदमों की सुनवाई में दस से पंद्रह वर्ष लग जाते हैं। निचली अदालत से सजा हो भी जाये तो उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें होतीं हैं। अगर बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाएँ तो ‘दया याचिका’ का पथ सीधे राजभवन और राष्ट्रपति भवन तक जाता ही है। इस बीच अधिकांश आरोपी मर जाते हैं, गवाहों को मार दिया जाता है और जांच अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं। ‘फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट’ धीरे-धीरे ‘स्लो ट्रैक’ और फिर ‘नो ट्रैक’ बन जाते हैं। गवाहों को किसी भी प्रकार की कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। मुख्य गवाहों की हत्या के कितने ही मामले हमारे सामने है। पुलिस और अदालत के अलावा सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक ढांचा भी मूलत: दलित विरोधी है।

‘बेलछी’ से लेकर ‘शंकरबीघा’ तक दलित नरसंहारों और हत्याओं के मामलों में अदालती फैसले मिलते-जुलते दिखाई देते हैं। ‘मथुरा’ से लेकर ‘भंवरी बाई’ तक शर्मनाक फैसलों की एक लम्बी सूची है। इन फैसलों का गंभीरता से अध्ययन करने पर न्याय व्यवस्था के चेतन-अवचेतन में व्याप्त जातीय, वर्गीय व धार्मिक पूर्वाग्रह स्पष्ट नजऱ आते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि भारतीय गणतंत्र 65वें साल में भी न्यायपालिका में दलितों की भागीदारी शून्य के लगभग है और उच्च न्यायपालिका में ‘आरक्षण’ के सवाल पर मानों सारा समाज और सत्ता फुंफकारने लगती है। दलित वर्ग के प्रतिभाशाली न्यायिक अधिकारियों के उच्च न्यायालय पहुँचने के सपनों को खराब रिकॉर्ड के माध्यम से दफना दिया जाता हैं। शोधार्थी चाहें तो पिछले 65 साल के आंकड़ों का ‘पोस्टमार्टम’ कर के देख लें। तमाम बाधाओं को पार कर, जो किसी तरह उच्च न्यायपालिका में पहुंचे भी हैं, वे जानते हैं कि उन्हें कितने दमघोंटू और विषाक्त वातावरण का सामना करना पड़ता है। यह सन्देश उन तक स्पष्ट रूप से पहुंचा दिया जाता है कि वहां उनका स्वागत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायमूर्तियों तक ने अनुसूचित-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989, की व्याख्या करते हुए कहा है कि प्रामाणित करो कि बलात्कार का मूलाधार जाति है। इसी अधिनियम के तहत अन्य मामलों में कहा गया है कि अपमान सार्वजनिक स्थल पर होना चाहिए और शिकायतकर्ता की वहां उपस्थिति अनिवार्य है वरना कोई अपराध ही नहीं बनता। अगर अदालत के फैसले भी जातीय पूर्वग्रहों से मुक्त नहीं होंगे तो इंसाफ कैसे मिलेगा? इस स्थिति में अत्याचार के शिकार दलित न्याय की आशा कैसे कर सकते हैं?

उच्च वर्ग की दबंग जातियों के सामंतों द्वारा लाखों दलितों को जिन्दा जलाने-मारने के हजारो शर्मनाक हादसे भारतीय प्रजातंत्र के इतिहास में दफऩ है। सत्ता में लगातार बढ़ रहे दलित हस्तक्षेप से आहत और अपमानित महसूस कर रहे सामंती-कुलीन वर्ग के हमले, दलित स्त्रियों के साथ हिंसा या यौन हिंसा का रूप भी ले रहे हैं। समाज और नौकरशाही में अब भी सामंती-कुलीन वर्ग का बोलबाला है। राजनीति में अपनी हार का बदला दलितों पर अत्याचार के माध्यम से निकाला जा रहा है। दलित स्त्रियां दोहरा अभिशाप झेल रहीं हैं। दलित बेबस और लाचार हैं क्योंकि उनके नेता सत्ता और भ्रष्टाचार के मायाजाल में उलझ गए हैं। ऐसे माहौल में आखिर ‘अछूत की शिकायत’ कौन सुनेगा और कैसे होगा इंसाफ? लगातार फलती-फूलती हिंसक संस्कृति से रक्तपात की राजनीति को ही बढ़ावा मिलगा। अगर यह अराजकता जारी रहती है और हमारा दिशाहीन नेतृत्व समय रहते नहीं संभालता तो आम नागरिकों की व्यवस्था में आस्था समाप्त हो जाने का खतरा है। अगर ऐसा होता है तो देश को तबाही के रास्ते पर जाने से कोई नहीं बचा सकता।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2015 अंक में प्रकाशित )


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