बदले की पुलिसिया कार्रवाई : नंदिनी सुंदर और अन्य पर हत्या का मुकदमा

लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर आदिवासियों और बहुजनों के द्वारा अपनी सांस्कृतिक दावेदारी और महिषासुर आन्दोलन की पक्षधर भी रही हैं। नंदिनी ने फॉरवर्ड प्रेस पर हुई कार्रवाई और उसके संपादकों पर मुकदमे को पुलिस की असफलता से जोड़ा और कहा कि इस कार्रवाई के बाद इसके संपादकों ने पीछे न हटने का निर्णय लिया और महिषासुर आन्दोलन की गति और तेज हुई

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नंदिनी सुंदर

इन दिनों बस्तर में काफी हलचल है, अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब सीपीआई के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम के खिलाफ हिन्दूवादियों  संगठनों ने मुकदमा दर्ज कराया था। इसके पहले भी हिन्दूवादियों और आदिवासियों के बीच अपनी-अपनी सांस्कृतिक दावेदारी को लेकर संघर्ष की खबरें थी। इस बीच उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुरूप सीबीआई ने जांच करते हुए 1911 में आदिवासियों के घरों को जलाने के लिए स्पेशल पुलिस ऑफिसर्स (एसपीओ- सलवा जुडूम) के लोगों और और पुलिस के लोगों को जिम्मेवार बताया। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में हुई हिंसा की घटना की जांच का आदेश सामाजिक कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर, मनीष कुंजाम, रामचन्द्र गुहा आदि के द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए दिया था। सीबीआई की रिपोर्ट के बाद पुलिस के लोगों ने 23 अक्टूबर को नंदिनी सुंदर, सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और सोनी सोरी का पुतला जलाया।

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इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद सहित छः लोगों पर स्थानीय पुलिस ने बस्तर के एक ग्रामीण की हत्या का मुकदमा दर्ज किया है। बस्तर के दरभा क्षेत्र के ग्राम नामा में शुक्रवार की रात संदिग्ध लोगों ने सामनाथ बघेल की हत्या कर दी थी। पुलिस के एक अधिकारी के अनुसार, “सामनाथ बघेल की पत्नी की शिकायत पर तोंगपाल थाने में प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर, प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, सीपीएम नेता संजय पराते, विनीत तिवारी, मंजू कवासी और मंगल राम कर्मा के ख़िलाफ़ 302, 120बी, 147, 148, 149 ,452 और 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया है.” गौरतलब है कि सामनाथ बघेल ने अपने गांव के लोगों के साथ मिलकर माओवादियों के ख़िलाफ़ टंगिया ग्रुप बनाया था। नंदिनी सुंदर ने फॉरवर्ड प्रेस को बताया कि’ यह मुकदमा पुलिस की बौखलाहट का परिणाम है.’ वहीं संजय पराते का कहना है कि पुलिस बस्तर में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दबाने के प्रयास में झूठे मुकदमे दर्ज कर रही है।

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जगद्लपुर में पुलिस के लोग नंदिनी सुंदर, मनीष कुंजाम, हिमांशु कुमार और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतलों के साथ, उनके पुतले जलाने के पहले

महिषासुर आंदोलन के पक्ष में नंदिनी सुंदर

नंदिनी सुंदर आदिवासियों और बहुजनों के द्वारा अपनी सांस्कृतिक दावेदारी और महिषासुर आन्दोलन की पक्षधर भी रही हैं। उन्होंने बस्तर में महिषासुर के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान जोड़ने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस के द्वारा किये जा रहे दमनात्मक कार्रवाई पर ‘वायर’ आदि ऑनलाइन पोर्टल में लिखा भी और यह स्पष्ट किया कि पुलिस ने स्थानीय आदिवासी और बहुजन समुदाय के खिलाफ सवर्ण समुदाय का हमेशा साथ दिया है। नंदिनी ने फॉरवर्ड प्रेस पर हुई कार्रवाई और उसके संपादकों पर मुकदमे को पुलिस की असफलता से जोड़ा और कहा कि इस कार्रवाई के बाद इसके संपादकों ने पीछे न हटने का निर्णय लिया और महिषासुर आन्दोलन की गति और तेज हुई। नंदिनी सुंदर छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम को प्रतिबंधित करने के लिए उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका के याचिकाकर्ताओं में से भी एक हैं।

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पुलिस के लोग नंदिनी सुंदर और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाने के बाद जीत की मुद्रा में

आदिवासियों के लिए लड़ने वालों के खिलाफ साजिश की पहचान

नंदिनी सुंदर यह मानती रही हैं कि सरकार को माओवादियों से ज्यादा आदिवासियों के अधिकारों के लिए बात करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से गुस्सा है। उन्होंने 2013 में फॉरवर्ड प्रेस के जुलाई अंक की कवर स्टोरी में 2010 के अपने कथन के हवाले से इस आशय की बात कही थी। उन्होंने आदिवासियों के संघर्ष के प्रति मीडिया और मध्यवर्ग की राय को भी अपने इस लेख में प्रश्नांकित किया था, ‘मैं ऐसी टेलीविजन परिचचार्अों से बुरी तरह आजिज आ गई हूँ , जिनमें यह प्रश्न उछाला जाता है कि क्या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का माओवादियों के प्रति नरम रुख है, क्या माओवादियों के आसपास रूमानी आभा निर्मित की जा रही है आदि। कोई यह क्यों नही पछूता कि हमारे माननीय राजनेता और सुरक्षा विशषेज्ञ, पुलिस प्रताडना और हिरासत में मृत्यु के मामलों में नरम क्यों है ? टेलीविजन चैनलों की रुचि गंभीर चर्चा में नहीं होती- उन्हें तो केवल सूली पर चढा़ने के लिए कोई चाहिए होता है।’

मई के बाद नहीं गई बस्तर

इस साल के मई में नंदिनी सुंदर समेत अन्य लोग सौतनार, नामा और कुमाकोलेंग गये थे। तब सामनाथ समेत दूसरे ग्रामीणों ने कथित रूप से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि नंदिनी सुंदर और दूसरे लोगों ने ग्रामीणों को पुलिस के ख़िलाफ़ भड़काया और माओवादियों का साथ देने के लिए ग्रामीणों को उकसाया। हालांकि नंदिनी कहती हैं कि वे और उनके साथ अन्य लोग आदिवासियों के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा, चाहे वह माओवादी हिंसा ही क्यों न हो, के खिलाफ हैं। सवाल है कि मई के बाद जब नंदिनी और अन्य लोग बस्तर गये ही नहीं तो पुलिस ने किस दवाब में उनपर हत्या और हत्या की साजिश का आरोप लगाया?

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