किसी को परवाह नहीं है हरियाणा के दलित ‘शरणार्थियों’ की

वेदपाल सिंह तंवर के फार्महाउस में शरणार्थी जीवन जी रहे मीर्चपुर कांड के पीड़ित दलित परिवार के हालात को व्यक्त करता फोटो फीचर

वेदपाल सिंह तंवर के फ़ार्म हाउस में दलित परिवार के लोगों की एक तस्वीर।

तंवर फार्म हाउस, हिसार, हरियाणा : “हमलोगों को मोदी जी से बहुत उम्मीदें थीं। इसीलिए हमने उन्हें पिछले चुनाव में वोट दिया था। उन्होंने हमसब के लिए घर के वायदे किये थे। लेकिन दो साल बाद भी हम यहाँ हैं,’ ऐसा मिर्चपुर के दलित परिवारों के एक सदस्य ने कहा, जो हिसार शहर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित तंवर फार्म हाउस के परिसर में रह रहे हैं। यहां रह रहे 120 परिवार, मिर्चपुर में जाटों द्वारा उनके घर जलाकर राख कर दिए जाने के बाद अपने गांव को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए थे। यह घटना 21 अप्रैल 2011 को हुई थी। परंतु राज्य की भाजपा सरकार, जो अपने आपको गैर-जाटों की सरकार बताती है और जिसका मुखिया एक गैर-जाट है, ने इन लोगों के लिए कुछ नहीं किया।

पार्टी का कोई प्रतिनिधि उनसे मिलने तक नहीं पहुंचा-राजकुमार सैनी भी नहीं, जो भाजपा के पिछड़े वर्गों के नेता हैं। पार्टी जाटों – जो राज्य की कुल आबादी का 32 प्रतिशत हैं – से मुकाबला करने के लिए अन्य समुदायों का गठबंधन तैयार करने के प्रयासों में लगी हुई है, जैसा कि रोहतक के एक चर्चित पत्रकार राजेश कश्यप पिछले कुछ सालों से नोट कर रहे हैं, परंतु शायद भाजपा के चुनावी समीकरणों में दलितों के लिए कोई स्थान नहीं है। इन 120 परिवारों की बदहाली इस बात का सुबूत है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा आज भी ऊँची जातियों से आगे नहीं देख पा रहे हैं। भाजपा चाहे कुछ भी कहे, दरअसल उन जाटों के साथ है, जिन्होंने दलितों के घरों को जलाकर उन्हें मिर्चपुर से खदेड़ दिया था।

इन परिवारों के कुछ बच्चों ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है। कई ने यहां आने के बाद स्कूल जाना बंद कर दिया है। वे अपने ही राज्य में शरणार्थी बन गए हैं और उनकी शरणस्थली, उनके गांव से केवल 70 किलोमीटर दूर है। गर्मियों की तपती धूप, सांपों और अब कड़कड़ाती ठंड से बचाव के लिए उनके पास प्लास्टिक के पुराने बैनर भर हैं। उनमें से कुछ उन राजनैतिक दलों के हैं, जो उनकी अनदेखी करते आ रहे हैं और अन्य एक बैंक की आवासीय ऋण योजना का ढिंढोरा पीट रहे हैं।

पिछले सात सालों से इन हालातों में रह रहे लोगों में से एक ने हमें बताया, ‘‘हमारे लिए तो केवल एक ही सरकार हैं और वे हैं वेदपाल सिंह तंवर।’’ हिसार के इस व्यवसायी ने उन्हें अपने फार्म हाउस में छः साल से शरण दे रखी है। तंवर के घर के बाहर ठंड में सिकुड़ा बैठा पुलिस का एक सिपाही यहां सरकार का एकमात्र प्रतिनिधि है।

जब उसके परिवार को मिर्चपुर से खदेड़ा गया तब आशु (एकदम दाएं) केवल 10 साल की थी। तब से उसका स्कूल जाना बंद है।

 

शरणार्थी अपने साथ अपने मवेशी भी लाए हैं।

 

वेदपाल सिंह तंवर (बाएं) और उनके दो मेहमान

 

कक्षा दो की विद्यार्थी भारती को यह तो पता है कि वह मिर्चपुर की है परंतु वह यह नहीं जानती कि वो तंवर फार्म हाउस में क्यों रह रही है।

 

दिनेश आज भी यह याद कर सिहर जाता है कि जाटों ने उसके और अन्य दलितों के साथ क्या किया था। ‘‘ऐसा नहीं था कि अचानक कोई बंदूक चल गई और परिवार का कोई सदस्य मारा गया। उन्होंने हमारे घर जला कर खाक कर दिए। वह सब बहुत भयावह था। ऐसा लगता है कि वे हमारा सफाया करना चाहते थे।’’

 

राजनीतिज्ञों ने मिर्चपुर के इन परिवारों के लिए कुछ नहीं किया परंतु वे अपने घरों की छतों पर खडे़ मुस्कुराते देखे जा सकते हैं।

 

नवदीप (दायें) पांच साल का था, जब वह तंवर फार्महाउस में आया, अब वह 12 साल का है।


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