स्थान नहीं, व्यक्ति

हरियाणा और राजस्थान से अनिल वर्गीज की पाती

बिलाड़ा (राजस्थान), 13 जनवरी, 2017 : सामान्यतः हम यात्रा इसलिए करते हैं ताकि हम नई जगहें देख सकें और नए लोगों से मिल सकें। परंतु अक्सर हमारी यात्राएं लोगों के बारे में कम होती हैं और जगहों के बारे में अधिक। बल्कि अधिकांशतः हम यात्रा पर जाते ही इसलिए हैं ताकि हम लोगों से दूर हो सकें-उन लोगों से जिनसे हम हमारे शहरी जीवन में घिरे रहते हैं। जब प्रमोद रंजन ने प्रस्तावित किया कि हम देश की बहुजन परंपराओं को खोजने और महसूस करने के लिए यात्रा पर निकलें, तो फारवर्ड प्रेस में हम सभी को यह विचार तुरंत पसंद आ गया। हमें लगा कि यह यात्रा बहुत उपयोगी होगी और हमें हां कहते देर न लगी। यह यात्रा लोगों के बारे में होगी-उन गुमनाम लोगों के बारे में जो इस देश की आत्मा हैं-ना कि उन नयनाभिराम दृश्यों के बारे में, जिन्हें हम अक्सर पर्यटन विभाग के विज्ञापनों में देखते हैं।

वेदपाल सिंह तंवर

गत पांच जनवरी की सर्द सुबह, फारवर्ड प्रेस के हमारे साथियों संजीव चंदन और राजन कुमार और जेएनयू के पीएचडी शोधार्थी विशेष राय ने हमें नई दिल्ली के इंडिया गेट से विदा किया। तब से हम – प्रमोद रंजन, अनिल कुमार व अनिल वर्गीस – दस दिन की यात्रा कर चुके हैं और यह प्रयोग हमारी अपेक्षाओं पर खरा उतरता नज़र आ रहा है। हम हरियाणा को पीछे छोड़ आए हैं और राजस्थान में हैं। हमारी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई, जो धारा के खिलाफ तैर रहे हैं और ऐसे लोगों से भी, जिन्हें धारा ने एक किनारे पटक दिया है।

आप तब क्या करेंगे जब आप अपना एकमात्र पुत्र खो दें और वह भी तब, जब आप समाज के कमज़ोर लोगों के साथ खड़े हों और उनकी मदद कर रहे हों? आप पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ेगा और आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि आपने ऐसा क्या किया था जिसके कारण आपको ये दिन देखना पड़ा। फिर, समाज के सबसे निचले पायदान के सैंकड़ों परिवार आपके निवास के नज़दीक अपने गांव को छोड़कर भागने पर विवश कर दिए जाते हैं। उनके घरों को जला कर राख कर दिया जाता है। वे आपके घर के सामने की सड़क पर शरण लेते हैं। वे आपके घर भीख मांगने आते हैं। आपकी पत्नी, जो अब भी अपने प्रिय पुत्र को खोने के गम से उबर नहीं सकी है, उनकी मदद करती है। अपने घर से बेघर कर दी गई महिलाएं उसे आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं कि वह जल्दी ही दूसरे पुत्र को जन्म देगी। कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो जाती है और अपने पुत्र को जन्म देती है। इस अप्रत्याशित घटना से आप की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहता और आप उन सभी बेघर परिवारों का अपने घर में स्वागत करते हैं। और तब से वे वहीं रह रहे हैं। जितनी आपके पुत्र की उम्र है, उतने समय से वे लोग आपके मेहमान बने हुए हैं। हमारी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हमारी यात्रा के पहले ही दिन हुई।

जिन परिवारों की हम चर्चा कर रहे हैं, वे मिर्चपुर में 2010 में की गई आगजनी के शिकार दलित परिवार हैं और जिस व्यक्ति की हम बात कर रहे हैं, वे हैं वेदपाल सिंह तंवर। तंवर के फार्म हाउस और उनकी ज़मीन पर बनी इन बेघर लोगों के झोपड़ों के बीच एक दीवार है। इस भव्य फार्म हाउस के मुख्य दरवाजे से मैले-कुचैले कपड़े पहने बच्चे ऐसे आते जाते रहते हैं मानो वह उनका ही घर हो। फार्म हाउस में एक स्वीमिंग पुल भी है ,परंतु वह खाली पड़ा है। तंवर ने इस स्वीमिंग पुल में भरे जाने वाले पानी को साफ करने के लिए संयंत्र लगाने पर लाखों रूपए खर्च कर दिए थे परंतु बाद में उन्होंने यह तय किया कि वे इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्हें यह मंजूर न था कि वे स्वीमिंग पुल की ठंडक का आनंद उठाएं और उनके मेहमान हरियाणा की भीषण गर्मी में पसीना बहाएं। स्वीमिंग पुल का इस्तेमाल न करने के बाद भी पानी की नियमित सप्लाई से फार्म हाउस में रहने वालों का काम नहीं चल पाता। तंवर को पानी के टैंकर खरीदने पड़ते हैं। उनका हर महीने का बिजली का बिल ही एक लाख रूपए से ज्यादा का आता है और यह पिछले सात सालों से महीने दर महीने चलता आ रहा है।

जातिवाद से मुक्ति?

कई चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें पैसे से नहीं खरीदा जा सकता। अपनी बेशुमार दौलत से भी तंवर अपने एकमात्र पुत्र को वापस नहीं ला सके, परंतु हां, उन्हें तब एक और पुत्र मिल गया जब वे इसकी बिल्कुल अपेक्षा नहीं कर रहे थे।

जनवरी की धुंध भरी एक सुबह में गोगा की मेडी

सात जनवरी को गोगा जी मेड़ी में हमने देखा कि महिलाएं ज़मीन पर पीठ के बल खिसक-खिसक कर मंदिर की तरफ जा रही थीं। उनकी भी एक ऐसी इच्छा थी, जिसे पूरा करना उनके बस में नहीं था। उनके पहले अन्यों ने भी यही किया था और उन्हें वह मिल गया था, जो वे चाहते थे – संतान, शायद एक पुत्र या बीमारी या सर्पदंश के डर से मुक्ति। हमने देखा कि कुछ पुरूष भी यही कर रहे थे और उनके परिजन बगल में उनके साथ-साथ चल रहे थे। देश के अधिकांश अन्य आराधना स्थलों के विपरीत, इस मेड़ी (जो एक मंदिर के बजाए आश्रम अधिक लगती है) के द्वार हमेशा से सभी जातियों और मुसलमानों के लिए भी खुले रहे हैं। इस तथ्य ने एक मेडिकल चिकित्सक को इस मंदिर की ओर आकर्षित किया। वे तार्किकतावादी हैं और व्यक्तिगत बातचीत में मंदिर में किसी अलौकिक शक्ति के वास की बातों को खारिज करते हैं। परंतु उन्होंने मंदिर के ट्रस्ट में एक महत्वपूर्ण पद स्वीकार कर लिया है। उनका मिशन है समाज को जातिवाद और हर तरह के अंधविश्वास- जिसमें इस मंदिर में आने से मन्नत पूरी हो जाने का विश्वास भी शामिल है- से मुक्ति दिलाना है।

डा. रामेश्वरानंद स्वामी

हम मंदिर परिसर के एक कमरे में रात भर रहे, जहां हमारी देखभाल मधुबनी, बिहार के एक युवक ने की। वह सन 1990 के दशक के अंत में राजस्थान के इस मंदिर में आया था। ‘‘हम तो बस मजदूरी कर रहे हैं’’, उसने कहा। मंदिर के रसोईघर में काम कर रहे सभी दस लोग उसी के गांव के हैं।

हड़प्पा के अवशेषों के बीच

हमें बिहार का एक और युवक भी मिला, जो कालीबंगा में एक धनी सिक्ख सज्जन के लिए काम कर रहा था। कालीबंगा वह स्थान है, जहां आज से लगभग 50 वर्ष पहले सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष मिले थे। सिक्ख सज्जन, जो कि एक युवा पिता, ज़मींदार और व्यापारी हैं, ने हमारी मेज़बानी की। उनके शानदार मकान में ज़रूरत भर की चीजे़ ही हैं। यह मकान गेहूं के हरे खेतों के समुद्र के बीच एक द्वीप जैसा लगता है। वे हमें उस स्थल पर भी ले गए, जहां खुदाई में हड़प्पा सभ्यता के अवशेष निकले थे। हमने उन लोगों की बनाई चीजें देखीं, जो आज से लगभग पांच हज़ार साल पहले रहते थे – टूटे हुए मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के ढेर पर बिखरी चूड़ियां और ईंट की दीवारों के कुछ हिस्से। खुदाई में जो निकला उसमें शामिल थी, उनकी लिपी और एक खेत, जिसमें अनाज बोया गया था। हमने हमारे मेजबान से हम सबके पूर्वजों की प्रतिभा और उनके कौशल पर चर्चा की। उनकी ज़मीन पर खेती करने वाले बटाईदारों को भी खुदाई में प्राचीन मिट्टी के बर्तन मिलते रहते हैं। अन्य स्थानीय किसानों के खेतों में भी कब जब पांच हज़ार साल पुरानी चीज़े निकलती रहती हैं। हो सकता है उनका घर भी हड़प्पा के एक हिस्से के ऊपर खड़ा हो।

गोगा की मेडी पर एक स्त्री अपनी बेटी के साथ

हमारे मेज़बान के पास सब कुछ था – ढेर सारी दौलत और रूतबा। परंतु उनके जीवन का एक बड़ा दुःख भी था, जो वे हमसे छुपा न सके। उन्होंने अपनी आंखों से अपने मानसिक रूप से असंतुलित पिता को उनकी पत्नी और लड़की (हमारे मेज़बान की मां और बहन) को गोली मारते देखा था। कुछ दिनों बाद उनकी भी मृत्यू हो गई। धर्म उन्हें इस दुःख को भूलने में मदद करता था। हमारी उनसे जितनी भी बातचीत हुई वह गुरूनानक और गुरूग्रंथ साहिब और सरकार से उनके मोहभंग के आसपास घूमती रही। हां, उन्होंने हमें यह भी बताया कि उनके गांव का नाम उनके परदादा के नाम पर है और हनुमानगढ़ जिले के जिस हिस्से में वे रहते हैं, वह सिक्खों का गढ़ है।

उस रात जब हम सोने गए तो हम उनकी मनोस्थिति के बारे में ही सोच रहे थे। अगले दिन सुबह-सुबह हमने उनसे इस उम्मीद के साथ विदा ली कि हमारी यात्रा से उनका दर्द कुछ कम हुआ होगा।

रामदेवरा, जैसलमेर में फिर जाति से सामना

अगले दिन आठ जनवरी को हम रामदेवरा गांव पहुंचे, जहां पर स्थित एक मंदिर राजपूताना और सूफी (इस्लामिक) परंपराओं का अनूठा मिश्रण है। वहां पर महंतों की समाधियां थीं और हर एक पर घोड़े पर सवार एक योद्धा का चित्र उत्कीर्ण था। चारों तरफ सूफियों का प्रिय हरा रंग बिखरा हुआ था – दीवारों पर और ढोलों के सिल्क कवर पर भी। पुरोहित ब्राह्मण थे और ट्रस्टी राजपूत। रामदेव आज राजस्थान के सबसे लोकप्रिय देवता हैं और उनके अनुयायियों ने रामदेवरा बसाया है।

वीरपाल सिंह ( बायें) रामदेवरा में रामदेव मंदिर में

रामदेव ने कामड़िया पंथ की स्थापना की थी, जिसमें किसी प्रकार के भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं था और वे नीची जातियों के लोगों को अपने अनुयायी के रूप में प्रशिक्षित करने के लिए चुनते थे। हमारी मुलाकात मंदिर के एक ट्रस्टी वीरपाल सिंह से हुई, जिनका यह दावा था कि वे रामदेव के वंशज हैं। उनकी आयु 30 से 40 वर्ष के बीच लग रही थी। उनका कहना था कि मंदिर के द्वार सभी जातियों और धर्मों के लोगों के लिए खुल हुए हैं। परंतु जातिवाद के बारे में उनके विचार सुन हम चौक गए। उनका कहना था कि शहरी लोगों पर शायद जातिवाद न थोपा जा सके परंतु उनके गृह गांव में आज भी जातिवाद का बोलबाला है। रामदेव का खून भले ही वीरपाल सिंह की रगों में बह रहा हो, परंतु निश्चित रूप से उनके मूल्यों से वीरपाल का कोई लेनादेना नहीं था।

अगले दिन हम जेसलमेर के किले पहुंचे। हमने उस शहर की कल्पना की, जो इस शानदार लाल पत्थर की इमारत के भीतर सिमटा हुआ था। इस इमारत का निर्माण आज से लगभग एक हज़ार साल पहले किया गया था परंतु यह आज भी बहुत भव्य लगती है। किले की इमारत तो सुरक्षित है ही उसके अंदर निवासरत लोगों की जातियां भी वही बनी हुई हैं। आज भी किले में मुख्यतः राजपूत और ब्राह्मण रहते हैं।

अतुल्य भारत?

किले से हम साम नामक एक गांव के लिए निकले, जो लगभग 40 किलोमीटर दूर है और लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। वह रेत के टीलों के लिए जाना जाता है। पर्यटक यहां ऊँट की सवारी करते हैं और टैन्टों में रात बिताते हैं। स्थानीय लोग अपने ऊँट किराए पर देते हैं और उन्होंने वहां कुछ चाय की दुकानें भी खोल रखी हैं परंतु उनके जीवन में कोई समृद्धि नहीं आई है। हमने ऐसी ही एक चाय की दुकान के बगल में अपना खाना पकाया। एक लड़का जो 13-14 साल का था और शायद दुकान के मालिक का पुत्र था, वहां घूम रहा था। हमने जब उससे पूछा कि देश का प्रधानमंत्री कौन है तो उसे यह नहीं मालूम था। ऐसा लगता है कि मोदी जी अब तक यहां नहीं पहुंचे हैं।

हम एक दिन के लिए पर्यटक बन गए। हमने दृश्यावलियों को अपने कैमरों में कैद किया और एक दूसरे को भी। हम इतने भोले भी बन गए कि हमने गाइडों के इस दावे पर विश्वास भी कर लिया कि साम उस रेगिस्तान की झलक है, जिसके लिए राजस्थान विख्यात है। अगले दिन हम भारत-पाक सीमा पर स्थित तामोट गए और वहां हमने ऐसा कुछ देखा जिसने हमें चौका दिया, हमने उन लोगों के संघर्ष के बारे में जाना जिनका जीवन इस रेत के महासागर में बीतता है। बल्कि हमने उसका व्यक्तिगत रूप से अनुभव भी किया। इसके बारे में ज्यादा अगली पाती में।


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