वाल्मीकियों का सामाजिक और नागरिक बहिष्कार

हरियाणा के मिर्चपुर में जातीय दंगे का शिकार हुए दलित वाल्मीकि परिवार के सामाजिक और नागरिक बहिष्कार को लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के खिलाफ बताते हुए अनिल कुमार उनके खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विविध पहलुओं को स्पष्ट कर रहे हैं

जमीनी हक़ीक़त : अनिल कुमार

भारतीय समाज के लिए जातीय उत्पीडन और बहिष्कार कोई नई घटना नहीं है, लेकिन किसी सरकार को अपने ही नागरिको का बहिष्कार करने का न तो कोई अधिकार है और न ही ऐसी आशा की जाती है। ऐसी आशा राजतन्त्र में भी नहीं की जाती। राज्य की उत्पति की सामाजिक समझौता का सिद्धांत ही नहीं, आधुनिक संविधानवाद भी कहता है कि ‘आधुनिक राज्य’ समाज और सरकार के बीच समझौता का परिणाम है, जिसमें राज्य अपने नागरिको को न्यूनतम नागरिक सुविधाएँ देने के लिए बाध्य है, या कम-से-कम वह उन्हें छीन नहीं सकता।

मिर्चपुर में हमलावरों ने अपेक्षाकृत समृद्ध दलितों को निशाना बनाया, जिनके घर पक्के, कंक्रीट के थे।

भारत में अंग्रेज सरकार ने भी कभी भी अपने नागरिको को नागरिक मानने से इंकार नहीं किया। लेकिन हरियाणा के मिर्चपुर, झझर और गोहाना को देखें तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होता, समय नहीं लगता, कि केंद्र और राज्य, दोनो सरकारों, ने शोषित-वंचित समुदायों को अपना नागरिक ही मानने से इंकार कर दिया है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में दोनो, केंद्र और राज्य सरकारें,  आदिवासियों को अघोषित रूप से अपना नागरिक नहीं मानती हैं, इसलिए उन्हें नागरिक अधिकार देना अपना कर्तव्य नहीं समझती है।

वर्तमान अध्ययन हरियाणा राज्य के हिसार जिला के मिर्चपुर गाँव का है। जो देश की राजधानी से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ के वाल्मीकि जाति के लोग जाट समुदाय के सामाजिक बहिष्कार से जूझ रहे हैं। चूँकि वाल्मीकि जाति के पास अपनी कोई जमीन नहीं है, इसलिए वह अपने जीवन यापन के लिए जाटों से मिलने वाले कृषि मजदूरी पर निर्भर हैं या फिर अन्य मजदूरी पर। जब वे वर्तमान सामाजिक दुष्चक्र के बाहर निकलने के लिए प्रयास करतें है तो उनके साथ अन्य जातियां हिंसक रूप में पेश आती हैं- उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया जाता है। आर्थिक बहिष्कार के तौर पर अपने मनमाने शर्तों और कम मजदूरी दर पर काम देने के साथ-साथ काम न देना भी शामिल है। इस क्षेत्र में लगभग सभी जमीनें जाट या संपन्न जातियों के पास है।

इसलिए जब वाल्मीकि समुदाय का कोई पढ़-लिख कर सरकारी नौकरी करने लगता है और उसके पास कुछ पैसे आ जाता है तब भी वह जमीन नहीं खरीद पाता-यह भी सामाजिक और आर्थिक बहिष्कारका हिस्सा है। इसे हम पंजाब और आदिवासी बहुल राज्यों के सन्दर्भ से भी देख सकते हैं। पंजाब में अनुसूचित जातियों को जमीन के अधिकार के लिए लम्बी लड़ाई पड़ी थी और आज आदिवासियों को अपनी जमीनें बचाने के लिए लड़ाइयाँ लड़नी पड़ रही हैं। उत्तर प्रदेश में 2016 में समाजवादी पार्टी की सरकार ने उन कानूनों को खत्म कर दिया, जिसके अनुसार अनुसूचित जाति और जनजाति की जमीन सिर्फ इन्हीं समुदाय के लोग खरीद सकते थे। दूसरी ओर झारखण्ड की भाजपा सरकार ने CNT और SPT कानूनों में संशोधन प्रस्तावित किया है, जिसके अनुसार आदिवासी का जमीन सिर्फ आदिवासी ही खरीद सकता है, लेकिन यही अधिकार कुछ जगहों पर अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों को भी मिली हुई है। मिर्चपुर (हिसार, हरियाणा) के वाल्मीकि समुदाय के संदर्भ में इन दोनों उदाहरणों का उद्देश्य यह दिखाना है कि सामाजिक स्थिति और सम्मान का जमीन के स्वामित्व के साथ क्या सम्बन्ध है।

तीन पहियों की यह साईकिल, पैरों से लाचार 12वीं के एक विद्यार्थी की है जो 2010 में मिर्चपुर में हुई आगजनी में मारा गया था। उसके पडोसी उसे एक मेधावी विद्यार्थी के रूप में याद करते हैं।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ अनुसूचित जातियों, विशेषकर वाल्मीकि समुदाय का सिर्फ जाटों ने ही सामाजिक बहिष्कार कर रखा है या दबंग जातियां ऐसा करती है। बल्कि अति शोषित-वंचित अनुसूचित जातियों का (सामाजिक) बहिष्कार संपन्न अनुसूचित जातियां भी करती हैं। यह सामाजिक बहिष्कार किसी अधिकार को छिनकर नहीं बल्कि उसकी समस्याओं को अनदेखा कर के किया जाता है। मिर्चपुर के विस्थापितों ने बताया कि “दलितों” के नाम पर अपनी राजनीति करने वाले और खुद को उनका हितैषी कहने वालो ने भी उनके लिए कुछ नहीं किया। उनके अनुसार लोग देखने आये और चले गये, फिर हमें भूल गये। उन्हें देखने आने वालो में कुमारी शैलजा और रामविलास पासवान प्रमुख थे। वही दूसरी ओर सुश्री कुमारी बहन मायावती जी ने दिल्ली में उनसे मिलने का आश्वासन दिया था, लेकिन नहीं मिलीं। उनके साथ उनके मुद्दे पर मायावती से मिलने की कोशिश करने वालो में तब मैं भी शामिल था। मेरी जानकारी में ये सभी नेता अनुसूचित जाति से तो हैं लेकिन अनुसूचित जातियों के संपन्न तबको से। अर्थात इनमें से कोई भी न तो वाल्मीकि समुदाय से है और न हीं उनके समान उत्पीडित हैं। वाल्मीकि समुदाय से देश में कोई बड़ा नेता भी नहीं है, इसलिए इनकी कोई आवाज भी नहीं है। उनके अनुसार उनकी कोई आवाज है तो सिर्फ एक व्यक्ति है वेदपाल सिंह तंवर, जो राजपूत समुदाय से हैं।

2010 और उसके बाद

मिर्चपुर में वाल्मीकि समुदाय के साथ संदर्भित जाटो का अमानवीय घिनौना अपराधिक अत्याचार 21 अप्रैल 2010 से शुरू होता है।

एक दम्पत्ति, जिनका घर मिर्चपुर के दलितों पर 2010 में हुए हमले में जला दिया गया था।

मिर्चपुर के जाटो ने वाल्मीकि समुदाय के 18 घर जला दिए थे। उन्होंने एक पिता पुत्री को भी जिन्दा जला दिया था। वाल्मीकि समुदाय के लडको को अधमरा होने तक पीटा, उनके मुंह में पेशाब किया, पैखाना खिलाया। लड़कियों, महिलाओं के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार के साथ-साथ सामूहिक बलात्कार किया। दो दिन बाद, जब मैं वहां गया था तो वाल्मीकि समुदाय के लोगो ने बताया कि जाट समुदाय के लोग उनकी लड़कियों का अपहरण कर के ले जाते हैं, और उनके साथ पूरा परिवार बलात्कार करता है। उनके अनुसार ऐसा कई बार हुआ कि जाटों ने उनकी लड़कियों को अपहरण किया और दो, तीन या चार दिन के बाद नंगी अवस्था में उनको गाँव के बाहर छोड़ दिया। समाज विज्ञान के विद्यार्थियों को शोध प्राविधि (research method) में बताया जाता है कि शोध के समय अपनी संवेदना को निरपेक्ष (neutral) रखें। शोध वस्तुनिष्ठ (objective) होना चाहिए। लेकिन उनके दर्द को महसूस करते हुए मैंने अपना कैमरा बंद कर लिया था। अपनी व्यथा सुनाते हुए महिला-पुरुष रोने लगे थे।

जनवरी 5-6, 2017 को पुनः उनसे मिलना हुआ। अपने प्रतिरोध और संघर्षो के बाद भी 120 परिवारों को अपने “देश मिर्चपुर” से भागकर फ़रवरी 2011 से वेदपाल सिंह तंवर जी के “तंवर फॉर्म हाउस” हिसार में शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा। “मिर्चपुर देश” क्योकि वहां हरियाणा और भारत सरकार नहीं है।

शर्णार्थियो को शरण देने वाले वेदपाल सिंह तंवर जी बताया कि जातीय हिंसा के शिकार मिर्चपुर के वाल्मीकि समुदाय यहाँ अप्रैल 2011 से रह रहे हैं। उनको रहने, बिजली, पानी, बीमारी पर दवाई, शादी-ब्याह के साथ-साथ जन्म और मृत्यु संस्कार का खर्च वे ही देते हैं। उनके फॉर्म हाउस में रह रहे लोगों में जिनसे भी मिला, सबने कहा कि वेदपाल सिंह तंवर ही मेरे सरकार हैं। जब समाज ने सामाजिक और सरकार ने नागरिकता से बहिष्कृत कर दिया है तो कोई न कोई सरकार तो होगा ही। राज्य और केंद्र की चुनी हुई क़ानूनी सरकार उनके हित में कुछ भी करते हुए नहीं दिख रही है। न सुरक्षा, न चिकित्सा, न शिक्षा, न ही सरकार के उपस्थित होने के कोई संकेत।

कई बार एक देश का अपराधी दूसरा देश भाग जाता है। अगर पहला देश शक्तिशाली हुआ तो वह अपने अपराधी को सौपने की मांग करता है। नहीं सौपने पर वह उसपर आक्रमण कर देता है। ठीक वैसे ही मिर्चपुर के वाल्मीकियों को शरण देने वाले वेदपाल सिंह तंवर को हरियाणा सरकार ने तरह-तरह से तंग किया। उनकी उस जमीन को हड़पने की कोशिश की, जिसपर मिर्चपुर के वाल्मीकि जाति के लोग शरण लिए हुये हैं। जब इससे भी बात नहीं बनी तो उनपर देशद्रोह का मुक़दमा ठोक दिया गया। अगर इस देश में जातीय हिंसा के शिकार को शरण देना देशद्रोह है तो फिर देश प्रेमी कौन है? वह किसका देश है, उसका क्या हित है, जिसके अहित होने से देशद्रोह हो जाता है?

मिर्चपुर के पीड़ित हिसार, हरियाणा में वेदपाल सिंह तंवर के फार्महाउस में टेंटों में रह रहे हैं

आशा की एक किरण

कांग्रेस राज में मिर्चपुर के वाल्मीकियो के “हित” में सरकार के बंदूकधारी खड़ा कर दिये गये, जो आज के भाजपा राज में भी खड़े हैं। मिर्चपुर के जातीय हिंसा के शिकार ने जब अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की मांग चंडीगढ़ उच्च नयायालय में रखी तो सरकार ने कोर्ट में कहा कि उनके हित में सरकार ने उनके गाँव और शरणस्थल पर बंदूकधारी सिपाही खड़ा कर दिया है, इन सिपाहियों पर सरकार का करोडो रूपया खर्च हुआ है। इसपर कोर्ट में कहा कि “क्या सिपाही का बन्दूक उनका पेट भर देगा”? नयायालय में अभी भी मुक़दमा जारी है। तारीखे चल रहीं हैं।

अपने फार्महाउस में वेदपाल (दाहिने)।

जातीय हिंसा के शिकार मिर्चपुर के वाल्मीकि समुदाय ने एक स्वर में बताया कि कांग्रेस के सरकार में जाटो ने बहुत हिंसा की थी, इसलिए इसबार उन्होंने केंद्र और राज्य के चुनावो में भाजपा को वोट दिया था। भाजपा सरकार का आधा कार्यकाल गुजार गया है, लेकिन अभी तक उन्हें कुछ नहीं मिला है, फिर भी उन्हें आशा है कि सरकारें उनके लिए कुछ-न-कुछ करेंगी।

इसी बीच हरियाणा में उभरते गैर-जाट राजनीतिक माहौल और नेतृत्व, जैसे  राजकुमार सैनी,  आदि से बहुत उम्मीद है। हिसार के युवा  क्रांतिकारी पत्रकार राजेश कश्यप ने भी हरियाणा के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक के बारे में बताया कि हरियाणा में गैर-जाट सामाजिक-राजनीतिक समीकरण तेजी से बन रहें हैं। अब लड़ाई पैतीस बनाम एक हो गया है। अर्थात सभी पैतीस समुदाय एक तरफ और जाट एक तरफ। हिसार के वाल्मीकि समुदाय को इस नए सामाजिक-राजनीतिक ताना-बाना से बहुत उम्मीद है। उनलोगों से बातचीत से पता चला कि सरकार से न्याय की आश में अब केंद्र सरकार के मंत्री रामदास आठवले और उपेन्द्र कुशवाहा से मिलने जा रहें हैं। मुझे नहीं मालूम हैं कि ये दोनों उनके साथ न्याय कर पायेंगें या नहीं?


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