राजस्थान के आखिरी कोने पर प्रकृति और समाज से लड़ते लोग

अनिल वर्गीस बता रहे हैं राजस्थान के रेगिस्तान के एक दूरस्थ हिस्से में बिताई गई रात के बारे में। उन्होंने देखा कि वहां के लोगों की जिंदगी कितनी मुश्किल है और जाना कि फिर भी वे उससे मुक्त होना क्यों नहीं चाहते

जमीनी हक़ीक़त : अनिल वर्गीस

मैसूर, 31 जनवरी, 2016 : 10 जनवरी को हम लोग भारत की पश्चिमी सीमा और उसके पार पाकिस्तान की एक झलक पाने के लिए जैसलमेर से निकले। जैसे-जैसे हम लोग सीमा के नज़दीक पहुंचते गए, हाईवे से देखने पर ऐसा लगने लगा मानो देश पीछे छूटता जा रहा हो। वहां लोग भी बहुत कम थे और पेड़-पौधे भी। अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगभग 30 किलोमीटर पहले, जैसे ही हमारी कार ने एक पहाड़ी से नीचे उतरना शुरू किया, हमने पाया कि हम एक रेगिस्तान के बीचो.बीच हैं। जितनी दूर तक निगाहें जाती थीं, सड़क के दोनो और केवल रेत ही रेत थी। काफी दूर हमें एक छोटा-सा गांव दिखलाई दिया। वह गांव घाटी के नीचे था, जहां सड़क दाहिनी ओर मुड़ रही थी। इस गांव, जिसका नाम रानऔतार था, ने हमें वहां रहने वालों की कठिन जिंदगी और उनके जीवट को समझने का मौका दिया। वहां सिर्फ बीएसएनएल के सिग्नल उपलब्ध थे, पानी बहुत सीमित मात्रा में टैंकरों के ज़रिये प्रदान किया जाता था और गांव में बिजली नहीं थी – यद्यपि गांव के ऊपर से बिजली के मोटे केबिल गुज़र रहे थे।

रानऔतार की हमारी पहली झलक

गांव में मिट्टी से लिपे माचिस के डिब्बेनुमा मकान थे। खिड़की के नाम पर दीवारों में छेद थे और ये छेद इतने छोटे थे कि उनमें से सिर्फ हवा ही गुज़र सकती थी। अगर आकार को छोड़ दें, तो ये मकान रेगिस्तानी इग्लू जैसे लग रहे थे। दोपहर का समय था और गांव के खुले इलाके में भेड़ें, बकरियां और गायें विचरण कर रहीं थीं। सूं-सूं करती हवा, भेड़ों की मिमियाहट और कभी-कभी हाईवे से तेज़ गति से गुज़रते किसी वाहन की आवाज़-इसके अलावा सब कुछ एकदम शांत था।

रानऔतार के घर

गांव से निकटतम शहर जैसलमेर पहुंचने के लिए दिन भर में केवल एक बस उपलब्ध थी, जो कि तानोट से अलसुबह जोधपुर के लिए निकलती थी और देर शाम इसी रास्ते वापस जाती थी। गांव के कई लोगों ने जैसलमेर तक नहीं देखा था।

इन रेगिस्तानी इग्लूओं में से एक के सामने हमने अपनी गाड़ी रोक दीए ताकि हम दीवारों पर उकेरे गए चित्र नज़दीक से देख सकें। वहीं हमारी मुलाकात जगन्नाथ सिंह से हुई, जो पड़ोस के एक गांव, गिरदूवाला, से वहां आए हुए थे। परिचय के बाद हम वहां रह रहे लोगों की जिंदगी की जद्दोजहद के बारे में बातें करने लगे। जगन्नाथ सिंह ने कहा कि हम लोग उनके घर पर रात बिता सकते हैं। ‘‘परंतु मेरे घर में पलंग नहीं है। आपको ज़मीन पर सोना पड़ेगा। इसमें आपको कोई परेशानी तो नहीं है?’’ उन्होंने पूछा। जाहिर है, हमारा उत्तर ना ही था।

प्राथमिक विद्यालयए तनौत में एक मात्र शिक्षक और उनके विद्यार्थी

यह गांव सोलंकियों का है। सोलंकी यहां की दो राजपूत उपजातियों में से एक हैं। दूसरी है चौधरी। सीमा के और नज़दीक स्थित तानोट नाम के गांव में केवल अनुसूचित जाति के मेघवाल रहते हैं। तानोट में हमें एक प्रायमरी स्कूल के दर्शन हुए, जिसमें पहली से लेकर पांचवी कक्षा तक को पढ़ाने के लिए केवल एक ही शिक्षक था। हम लोग स्कूल के बरामदे में बैठे हुए थे। मास्टर साहब ने पांचो क्लास के बच्चों को अलग-अलग निर्देश दिए और बच्चे अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। इसके बाद मास्टर साहब हमसे मुखातिब हुए। ‘‘यहां कोई आना ही नहीं चाहता। मैंने तबादले के लिए अर्जी दी थीए परंतु सरकार को मेरी जगह लेने वाला कोई मिला ही नहीं। इसलिए मैं यहीं बना हुआ हूं’’, उन्होंने कहा।

सीमा पर भी संघर्ष

सीमा पर स्थित बीएसएफ चैकी पर हमारी मुलाकात सीमा सुरक्षा बल की दो महिला कर्मियों से हुई। उनसे हमने उनकी कठिन जिंदगी का हाल जाना। हमें इस चैकी तक जाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए कई टेलीफोन करने पड़े थे। दोनों महिला कर्मी, जिनकी आयु 20-25 वर्ष रही होगी, ने हमें बताया कि उन कुछ महीनों के अलावा, जो वे छुट्टी पर अपने घरों में बिताती हैं, उन्हें 24 घंटे, सातों दिन ड्यूटी पर रहना होता है। दो पालियों के बीच उन्हें केवल छह घंटे आराम करने के लिए मिलते हैं। उन्हें लगातार चैकस रहना होता है कि कहीं सीमा के उस पार से कोई घुसपैठिया भारत में प्रवेश न कर जाए। सीमा के इस ओर मोबाइल फोन के सिग्नल उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि वहां आसपास मीलों तक कोई नहीं रहता। हम जहां तक भी देख सकते थे, हमें केवल झाड़ियां ही झाड़ियां नज़र आ रही थीं।

सानोवल सिंह

देर शाम जब हम रानऔतार पहुंचे तब तक अंधेरा घिर चुका था। जगन्नाथ सिंह, जिन्होंने हमारी मेज़बानी करने की इच्छा व्यक्त की थी, वहां नहीं थे। यह जानकारी रानऔतार के एक और निवासी सानोवाल सिंह ने हमें दी। हमारी कार की खिड़की से झांक कर हमसे बात कर रहे सानोवाल सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हम जगन्नाथ से क्यों मिलना चाहते हैं। गठीले बदन के सानोवाल का रंग गेहुंआ था और उनके चेहरे पर पतली-सी मूंछें थीं। हमें उन्हें इस बात के लिए राजी करने में काफी वक्त लग गया कि वे हमें जगन्नाथ के गांव गिरदूवाला तक छोड़ने चलें। हमारी बातचीत के दौरान नशे में धुत्त एक व्यक्ति बीच-बीच में आकर कुछ न कुछ अनर्गल बातें कर रहा था। हाईवे से नीचे उतरकर एक पतली सड़क पर कुछ दूर जाने के बाद हमें अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी। इसके आगे हमें लगभग 100 मीटर तक रेत में पैदल चलकर जगन्नाथ के घर तक पहुंचना था। हमारी किस्मत अच्छी थी कि उस दिन आकाश में चांद खिला हुआ था और हम आसानी से जगन्नाथ के घर तक पहुंच गए।

जगन्नाथ तब तक घर नहीं लौटे थे। उनके भाई पदम सिंह, सानोवाल और कुछ अन्यों ने एक वैकल्पिक योजना सुझाई। उन्होंने कहा कि हम उसी क्षेत्र में आयोजित एक ‘पार्टी’ में भाग ले सकते हैं। हमारे लिए यह समझना मुश्किल था कि ‘पार्टी’ से उनका क्या मतलब है परंतु हम इसलिए राज़ी हो गए क्योंकि हमें लगा कि वहां हमें बहुत से लोगों से मिलने का मौका मिलेगा। ‘पार्टी’ का स्थान डामर की सड़कों से काफी दूर था। उन लोगों ने हमसे कहा कि हमारी गाड़ी रेत पर नहीं चल सकेगी और इसलिए वे एक ट्रैक्टर का इंतज़ाम कर लेंगे। उन्हें आशंका थी कि हमारी बूढ़ी होण्डा सीआरवी रेत में फंस सकती है, परंतु हम अज्ञानियों को यह पता नहीं था कि हमारी लो-फ्लोर, टू-व्हील ड्राईव गाड़ी को रेत में दौड़ाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। इसलिए हमने यह सोच कर कि हमारे दरियादिल मेज़बानों को कोई परेशानी न हो, उनसे कहा कि उन्हें ट्रैक्टर का इंतज़ाम करने की ज़रूरत नहीं है और हम सब इसी गाड़ी से ‘पार्टी’ में जा सकते हैं। उन्होंने कुछ हिचकिचाहट के साथ हमारी बात मान ली। परंतु उन्होंने कहा कि उन्हें पहले गाड़ी के टायरों की हवा कम करनी होगी। यह करने केे बाद अपनी अनजान मंज़िल की ओर निकल पड़े।

सूनसान रेगिस्तान में अकेले

जिस रास्ते पर हम जा रहे थे, वहां कोई सड़क नहीं थी; थे तो केवल एक-दूसरे को काटते रेत में बने टायरों के निशान। हमें रास्ता दिखाने के लिए सानोवाल सिंह हमारे साथ थे। वे जब और जहां मुड़ने को कहते, हम मुड़ जाते। हमारे ड्रायवर रवीन्दर रविदास की जगह प्रमोद रंजन गाड़ी चला रहे थे। ‘‘तेज़, और तेज़’’, हमारे मेज़बान बार-बार चिल्लाते, ‘‘अगर गाड़ी धीमी हुई तो रेत में फंस जाएगी’’। हमें तब तक उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ जब तक उनकी बात सच सिद्ध न हो गई। जब हम एक हल्की चढ़ाई चढ़ रहे थे तभी अचानक गाड़ी रूक गई। गाड़ी का इंजन गरज रहा था, पहिए तेज़ी से घूम रहे थे परंतु गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ रही थी। हम अब कुछ नहीं कर सकते थे, सिवाए मदद के इंतेजार के।

मदद के इंतज़ार में अनिल कुमार और हौंडा सीआरवी

हम में से किसी का फोन नहीं चल रहा था। रेत के एक टीले पर चढ़कर बीएसएनएल के सिग्नल मिले। काफी कोशिश करने पर एक ट्रैक्टर मालिक का फोन लगा और लगभग एक घंटे के इंतज़ार के बाद ट्रैक्टर वहां पहुंचा। सानोवाल ने स्टीयरिंग संभाला और हम लगभग दस लोग ट्रैक्टर पर लद गए। एक इंच जगह भी खाली नहीं थी। ठंड इतनी थी कि हमारे हाथ सुन्न पड़ गए थे परंतु ट्रैक्टर का जो भी हिस्सा जिसके हाथ लगा उसे कसकर पकड़े रहना उसकी मजबूरी थी। ट्रैक्टर कभी एक ओर झुकता तो कभी दूसरी ओर। कभी-कभी किसी झाड़ी को बचाने के लिए जब ट्रैक्टर को तेज़ी से मोड़ा जाता तो हमें ऐसा लगता कि ट्रैक्टर पलट ही जाएगा। हमें अपनी मंजिल तक पहुंचने में लगभग 30 मिनट लगे परंतु हम जब वहां पहुंचे तो हमें लगा मानो हम न जाने कितने समय से ठंडे रेगिस्तान में घूम रहे थे। ट्रैक्टर से उतरने पर हमारी जान में जान आई।

रानऔतार के लोग एक पार्टी में मटन और रोटा खाते हुए

पार्टी

पार्टी’ का स्थान रेगिस्तान के बीच एक खुला मैदान था, जहां रानऔतार और आसपास के गांव के लोग अपनी भेड़ें और बकरियां चराते थे। वे वहां चैबीसों घंटे रहते थे और अब तो यह और ज़रूरी था क्योंकि बकरियां बच्चों को जन्म देने वाली थीं। आसपास बहुत लोमड़ियां थी जो बकरियों के बच्चों को पकड़ने की फिराक में घूमती रहती थीं। हमने मटन करी और रोटा (कोयले पर सिंकी आटे की बहुत मोटी और बड़ी रोटी) का सुस्वादू भोजन किया। इस बीच हमें एक बकरी के बच्चे की दर्दभरी मिमयाहट सुनाई दी। हमें बताया गया कि शायद किसी लोमड़ी ने उसे पकड़ लिया है। बकरी के बच्चों को पूस से बने छोटे-छोटे पिंजरों में रखा गया था। उनकी मांएं सभी बच्चों का पेट भरने में सक्षम नहीं थीं। वहां मौजूद चरवाहों का यह काम था कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी बच्चों को बराकर दूध उपलब्ध हो सके। वहां मौजूद सभी लोगों के पास बकरियों और भेड़ों के बड़े झुंड थे-कुछ के पास 50, कुछ के पास 100 तो कुछ के पास 1,000।

अपनी भेड-बकरियों के पास सोते गड़ेरिये

सानोवाल सिंह ने हमें बताया कि नोटबंदी के कारण उसके जैसे पशुपालकों की कमर टूट गई है। चारा खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे न होने के कारण उसकी 30 गाय मर गई थीं। जगन्नाथ सिंह के भाई पदम सिंह की आंखों के सामने उसकी 30 बकरियां भूख से मर गईं। कुल मिलाकर, गिरदूवाला में 500 गायें, भेड़ें और बकरियां भूखी मर गईं। जब जानवरों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो अक्सर उनका गर्भपात हो जाता है। इस कारण जो नुकसान हुआ है, उसका तो अभी अंदाज़ा ही लगाया जा रहा है। सानोवाल का कहना था कि जिस तरह किसानों को फसल के नुकसान के लिए बीमा कंपनियों से मुआवज़ा मिलता है, उसी तरह की व्यवस्था पशुपालकों के लिए भी की जानी चाहिए।

सन 1980 के दशक में भारत-पाक सीमा पर बाड़ लगाई जाने से पहले, उन्हें सीमा पार से आने वाले चोरों का भी डर रहता था जो उनके मवेशी चुराकर पाकिस्तान ले जाते थे। अब यह  बंद हो गया है।

हमने कई घंटे उन लोगों से बातें कीं। अब हम रानऔतार जाना चाहते थे, ताकि कुछ घंटे सो सकें। रानऔतार का एक निवासी अपनी महिंद्रा स्कार्पियो से पार्टी में आया था। हम लोग उसकी गाड़ी में वापस रवाना हुए। रास्ते में हम वहां रूके जहां हमारी कार फंसी हुई थी। इस बार हमारे साथ कई लोग थे और हमने किसी तरह धक्का मार कर कार को रेत के दलदल से निकाल लिया। जल्दी ही हम रानऔतार पहुंच गए और वहां एक अधूरे बने मकान में हमने रात बिताई। इस मकान के मालिक ने परंपरा से हटकर अपना मकान जैसलमेर के मकानों जैसा बनाया था। गांव में दो स्कार्पियो खड़ी थीं। इससे हमें लगा कि पशुपालन के काम में भले ही कितनी ही चुनौतियों क्यों न हों, मुनाफा काफी था। भारतीय सीमा सड़क संगठन हाईवे की मरम्मत और उसके चैड़ीकरण का काम कर रहा है। मजदूरों में से अधिकांश झारखंड से आए प्रवासी हैं। स्पष्टतः, इस इलाके के लोगों को मजदूरी करने की जरूरत नहीं थी। हाईवे के किनारे छोटी-छोटी झोपड़ियां बनी हुई थीं जहां ये प्रवासी मजदूर अपने परिवारों के साथ रह रहे थे।

जातिवाद का घिनौना चेहरा

अगले दिल बहुत सुबह हमारी नींद गांव के एक बुजुर्ग के ज़ोर-जोर से कुछ बोलने के कारण खुल गई। बाद में हमें पता चला कि वह यह कह रहा था कि गांव में कुछ मेहमान आए हुए हैं और इस सिलसिले में एक बैठक बुलानी चाहिए। जब हम घर से बाहर निकले तो हमने देखा कि रंग बिरंगी पगड़ियां पहने कई बुजुर्ग अलाव के आसपास बैठे हैं। सानोवाल सिंह ने तो हमें यह नहीं बताया कि बैठक में क्या हुआ परंतु वे अब उतने उत्साहित नज़र नहीं आ रहे थे, जितने कि पिछली रात थे। शायद कुछ ठीक नहीं था। या तो बुजुर्ग इस बात से खफा थे कि सानोवाल सिंह ने बिना उनकी अनुमति के हमारी मेज़बानी की थी या उन्हें पिछली रात हमारी ‘नीची’ जातियों के बारे में पता चल गया था। हो सकता है हमारे ड्रायवर रवीन्दर रवीदास ने पार्टी के दौरान उन्हें अपनी जाति के बारे में बता दिया हो और उन्हें यह अच्छा नहीं लगा हो कि हम एक ही थाली में उनके साथ भोजन कर रहे थे। हमने अपना सामान समेटा, सब को अलविदा कहा और कार में बैठकर जैसलमेर के लिए रवाना हो गए। तो यह थी राजस्थान के राजपूतों की मेज़बानी!

रानऔतार के लोग फॉरवर्ड प्रेस पढ़ते हुए

रानऔतार से लगभग 30 किलोमीटर दूर है रामगढ़, जो कि गांव का सबसे नज़दीकी कस्बा है। वहां हमारी मुलाकात एक सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता से हुई जो हमारे साथ कुछ दूर तक हमारी गाड़ी में गया। वह मेघवाल (अनुसूचित जाति) समुदाय का था। उसने हमें क्षेत्र में व्याप्त जातिवाद के बारे में कुछ बातें बताईं। उसका कहना था कि ऊँची जातियों के परिवारों की शादियों में या तो उसकी जाति के लोगों को आमंत्रित ही नहीं किया जाता और अगर किया भी जाता है तो उन्हें अलग बैठाकर खाना खिलाया जाता है। ‘‘ओबीसी हमारे साथ भेदभाव नहीं करना चाहते परंतु अगर वे ऐसा नहीं करते तो ऊँची जातियों के लोग उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं’’।

रानऔतार के सोलंकी यह नहीं जानते कि ओबीसी किस चिड़िया का नाम है। उनके लिए तो बस राजपूत हैं और दलित। और वे सिर्फ राजपूतों में ही शादियां करते हैं। रानऔतार यदि दुनिया से अलग-थलग है तो उसका एक कारण तो यह है कि वहां के लोगों की जिंदगी भले ही कठिन हो परंतु उनके पास अपने मवेशियों को चराने के लिए पर्याप्त ज़मीन उपलब्ध है और वे काफी समृद्ध हैं। दूसरा कारण यह है कि उन्हें अपने जीवनयापन के लिए बाहरी दुनिया की ज़रूरत नहीं है और वे अपनी ही दुनिया में मस्त रह सकते हैं। हमें यह भी अहसास हुआ कि ऊँची जातियों का रानऔतार जैसा गांव जब अपने बुजुर्गों के चंगुल से मुक्त होता है या सेलफोन की मदद से बाकी दुनिया के नज़दीक आता है तो वह कुछ खोता भी है और कुछ पाता भी है। और जो वह खोता है उसमें शामिल हैए वह उच्च सामाजिक दर्जा जो उसे अपने आसपास की दुनिया में प्राप्त है।


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