दलित आंदोलन को नया आयाम दे रही भीम आर्मी

सदियों से शोषित दलित अब जागरुक हो रहे हैं। उनकी राजनीतिक चेतना ने ऊंची जातियों को प्रभावित किया है और नब्बे के दशक के बाद प्रतिरोध के स्वर और मुखर हुए हैं। लेकिन चुनावी तिकड़मों में फ़ंसे दलित राजनीतिक चेतना ने उन्हें निराश भी किया है जो इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी अपमानजनक टिप्पणियों एवं अन्य प्रकार के भेदभाव के शिकार हैं। वह भी तब जबकि देश की राजनीति में उनका हस्तक्षेप निर्णायक बन चुका है। अपनी भीम आर्मी के सहारे चंद्रशेखर इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में दलित आंदोलन के नये स्वरुप को सामने लाने को सियासी गलियारे में प्रचलित तरीकों के जरिए प्रयास कर रहे हैं।

यह सभी दलित संगठनों का मंच है, यह नीली पगड़ी तबतक स्वीकार नहीं करुंगा, जब तक कि देश से भगवा आतंकवाद का खात्मा नहीं हो जाता। यह आह्वान बीते 21 मई नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों की भीड़ के समक्ष चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ ‘ रावण’ ने किया था। वहीं चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ रावण जिसके द्वारा स्थापित भीम आर्मी ने दलितों के प्रतिरोध को नये स्वरुप में स्थापित किया। सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर जो लोग जुटे, उनकी उम्मीदें क्या थीं और उनकी उम्मीदों के संदर्भ में भीम आर्मी के मायने क्या हैं। सवाल यह भी कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण और अध्यक्ष विनय रतन सिंह के क्या सपने हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि भीम आर्मी इन सपनों को कैसे पूरा करना चाहती है। जाहिर तौर पर इन प्रश्नों पर विचार करने और उनका तथ्यपरक जवाब ढूंढने से पहले उस पृष्ठभूमि पर थोड़ा विचार कर लेना आवश्यक है, जिसने भीम आर्मी और उसके संस्थापक चंद्रशेखर को एक झटके में पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया।

प्रतिरोध के कारण चर्चा में आयी “भीम आर्मी”

बीते 5 मई को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के मुख्यालय से करीब 29 किलोमीटर दूर शब्बीरपुर गांव में दलितों पर राजपूतों के हमले और शासन-प्रशासन पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कई दलित नौजवान न्याय की मांग और हमले के विरोध में सहारनपुर की सड़कों पर उतर आए। मौके पर मौजूद बड़ी संख्या में तैनात पुलिसकर्मियों एवं आक्रोशित नौजवानों के बीच तीखा संघर्ष हुआ। विरोध प्रदर्शन के दौरान दलित नौजवानों ने पुलिस चौकी को फ़ूंक दिया। इससे पहले बसों में आग लगायी गई और सड़कों को जाम कर दिया गया। इस तीखे विरोध प्रदर्शन का आह्वान देश के अधिकांश हिस्सों के लिए अनजान एक संगठन भीम आर्मी ने किया था। परिणाम यह हुआ कि अचानक भीम आर्मी और इसके संस्थापक चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण दोनों चर्चा का विषय बन गए। हजारों नौजवानों के इतने बड़े प्रदर्शन से शासन-प्रशासन सकते में आ गया। बड़े पैमाने पर दलित नौजवानों की गिरफ्तारियां होने लगीं। भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर पर पुलिस ने कई सारे मुकदमें दर्ज किए।

वहीं चंद्रशेखर को लेकर कई तरह की कयासबाजियां की जाने लगीं। स्थानीय मीडिया और जिले के आला पुलिस अधिकारी भीम आर्मी और चन्द्रशेखर नक्सलियों से संबंधों की बात करने लगे। उनके खातों में अज्ञात स्रोतों से बड़े पैमाने पर धन आने की चर्चा जोर-शोर से शुरू हो गई। सहारनपुर में पुलिस पर हुई पत्थरबाजी को कश्मीर की पत्थरबाजी से जोड़ने और भीम आर्मी को आतंकी संगठन आईएसआईएस से पैसा और अन्य समर्थन मिलने की खबरे भी सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं। स्थानीय प्रिंट मीडिया ने तो यहां तक खबरें प्रकाशित किया कि पूरे सहारनपुर को साजिश के तहत आग के हवाले और तहस-नहस कर देने की योजना भीम आर्मी ने ही बनाई थी।

भीम आर्मी के कारण लोगों की बढी दिलचस्पी, बढी उम्मीदें

एक तरफ पुलिस प्रशासन और अधिकांश स्थानीय मीडिया भीम आर्मी और चंद्रशेखर को कानून व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ देशद्रोही या देशद्रोहियों के शह और समर्थन पर काम करने वाले संगठन और व्यक्ति की छवि गढ रहे हैं। दूसरी तरफ दलितों-बहुजन भीम आर्मी को न्याय की उम्मीद की एक किरण के रूप में देख रहे हैं और चंद्रशेखर में अपने एक नए नायक की तलाश कर रहे हैं, जो उन्हें न्याय दिलाकर और आखिरकर सामाजिक समता कायम कर बाबा साहब डॉ. भीमराव के सपने को पूरा करेगा। इस उम्मीद का आधार यह कि इसका नाम भीम आर्मी रखा गया, मानों यह डॉ. अंबेडकर की आर्मी है। इस बात का सबूत 21 मई को हजारों की संख्या में जंतर-मंतर पर जुटे लोगों ने दिया। भीम आर्मी और उसके अगुआ लोगों के अलावा किसी को उम्मीद नहीं थी कि शेष भारत के लिए अनजान एक नए संगठन के आह्वान पर सारे जोखिमों को उठाते हुए हजारों लोगों का जन सैलाब जंतर-मंतर पर उमड पडेगा, वह भी सोशल मीडिया की सूचना पर। साथ में इतनी सारी अफवाहों के बावजूद।

यह जन सैलाब किसी राजनीतिक पार्टी या संगठन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का किसी खास परंपरागत वैचारिकी, राजनीतिक झुकाव या व्यक्तिगत स्वार्थो के लिए जमवाड़ा नहीं था। यह शब्बीरपुर में राजपूतों द्वारा दलितों पर की गई बर्बरता, स्थानीय प्रशासन द्वारा राजपूतों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया, भीम आर्मी और चंद्रशेखर के प्रति पुलिस के आक्रमक रूख के विरोध में आक्रोश और शब्बीरपुर के पीड़ित दलितों के प्रति सहानुभूति और भीम आर्मी के प्रति एकजुटता का प्रदर्शन था। यह लोगों की स्वतः स्फूर्त जुटान थी। भले ही इस जुटान के लिए आह्वान भीम आर्मी ने किया था और उसने एक हद तक इसे पूर्व से तय योजनाओं के आधार पर अनुशासित तरीके से सफ़लतापूर्वक आयोजित किया था।

स्थापित दलित नेतृत्व की विफ़लताओं के कारण भीम आर्मी से बढी उम्मीदें

जंतर-मंतर पर जुटे लोगों के बैनर, पोस्टर, तख्तियों पर लिखे नारे, टोपियां, टी शर्ट, लोगों के मनोभाव, मंच की साज-सज्जा और मंच से भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर और विनय रतन सिंह का भाषण सब यह बता रहे थे कि उत्तर भारत, खासकर उत्तरप्रदेश ( उसमें भी पश्चिमी उत्तरप्रदेश ) के दलितों के मनोभावों में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। पहली बात यह कि बसपा और उसकी नेता मायावती जी भले ही अभी भी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर अधिकांश दलितों के लिए एकमात्र राजनीतिक विकल्प हों, क्योंकि अन्य मुख्य राजनीतिक विकल्प खुलेआम या अपनी विचारधारा, मूल्य-मान्यता और सामाजिक-राजनीतिक बुनावट के चलते जमीनी स्तर पर दलितों की विरोधी हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बसपा और उसका नेतृत्व दलितों की सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल साबित हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो सत्ता प्राप्ति के लिए बहुजन समाज पार्टी ने दलितों की इन आकांक्षाओं से किनारा कर लिया है। इन आकंक्षाओं को पैदा करने में कभी उसने मह्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे दलितों के मन में एक मोहभंग पैदा किया है।

मायावती की चुप्पी से बढी चंद्रशेखर की हैसियत

भले ही राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति में इसे वे खुलेआम प्रकट न करें। इसका प्रमाण जंतर-मतंर पर इस रूप में सामने आया कि बसपा या मायावती जी के पक्ष कोई भी बैनर, पोस्टर या तख्ती नहीं थी। न तो कोई नारा ही उनके पक्ष में लगा। इसके अलावा किसी ने भी उनके बारे में मंच से एक शब्द तक नहीं बोला। हां यह भी सच है कि खुलकर सार्वजनिक तौर पर लोग उनके खिलाफ नहीं बोल रहे रहे थे, लेकिन व्यक्तिगत बातचीत में उनके प्रति गुस्सा प्रकट कर रहे थे। खासकर इस बात के लिए कि वे अभी (21 मई तक ) तक क्यों सहारनपुर नहीं गईं और खुलकर सहारनपुर के दलितों का पक्ष क्यों नहीं लिया। मंच से बार-बार चंद्रशेखर का यह कहना कि हम राजनीति करने नहीं आए हैं, राजनीति और राजनीतिज्ञों से मेरा कोई लेना देना नहीं है, दो बातों की और संकेत करता है। एक तो यह कि केवल सत्ता की राजनीति से सामाजिक-सांस्कृतिक न्याय और समता नहीं मिलने वाला है। दूसरी यह कि वे बसपा को राजनीतिक तौर पर कमजोर नहीं करने जा रहे हैं, न ही वे बसपा का राजनीतिक विकल्प बनने की चाहत रखते हैं।

उत्तर प्रदेश के दलित राजनीतिक तौर पर बसपा को विकल्प मानते हुए, सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष को अलग से तेज करना चाहते थे। इसकी सुगबगाहट बहुत पहले ही शुरू हो गई थी। वर्ष 2014 के बाद वर्ष 2017 में लगातार दो पराजयों से यह तेज हो गई थी। भीम आर्मी उनकी इस चाहत को पूरा कर सकती है, ऐसी उम्मीद जंतर-मंतर पर जुटे लोगों में दिख रही थी।

भाजपा की जीत से दलितों में खौफ़

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह दिखी कि देश में और उत्तरप्रदेश में भाजपा की विजय से दलितों में एक खौफ पैदा हुआ है कि यह देश हिंदू राष्ट्र बनने जा रहा है। दलितों का मानना है भाजपा की जीत का मतलब आरएसएस की जीत है। अधिकांश जागरुक दलित मानते हैं कि हिंदू राष्ट्र का मतलब ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना है जिसका अर्थ दलितों पर गैर दलितों का वर्चस्व। यही अभिव्यक्ति जंतर-मंतर पर लग रहे नारों, पोस्टरों और चंद्रशेखर के भाषण में हुई। लोगों के हाथों में जो तख्तियां थीं, उसमें मनुवाद खत्म करो, ब्राह्मणवाद का नाश हो, हिंदू धर्म हाय-हाय. भगवा आतंकवाद खत्म करो आदि लिखा हुआ था और लोग अगल-अलग समूहों में ये नारे लगा रहे थे। इतना ही नहीं, कुछ समूह हिंदू धर्म के प्रतीकों जैसे हाथ में बांधे हुए लाल धागे, माले, ताबीज व कड़े आदि उतारकर उन्हें पैरों से कुचल रहे थे।

भाजपा-आरएसएस व ब्राह्म्णवाद के खिलाफ़ उल्लेखनीय विरोध तब सामने आयी जब लोगों ने चंद्रशेखर को नीली पगड़ी पहनाने की कोशिश की। चद्रशेखर ने इंकार करते हुए कहा कि यह सभी दलित संगठनों का मंच है और यह पगड़ी मैं तब तक स्वीकार नहीं करूंगा, जब तक देश से भगवा आतंकवाद खत्म नहीं हो जाता। पूरे आयोजन के दौरान यदि कोई राजनीतिक नारा लग रहा था, तो उसके केंद्र में मोदी-योगी थे। इस नारे में लोगों की उनके प्रति घृणा और नफरत झलक रही थी।

चंद्रशेखर के आह्वान से चरम पर पहुंचा दलितों का जोश

जुटे लोगों की उम्मीदें तब चरम पर पहुंच गयी जब चंद्रशेखर ने कहा कि जबतक इस देश से ब्राह्मणवाद का विनाश नहीं हो जाता और अंबेडकरबाद की स्थापना नहीं हो जाती, मैं चैन से नहीं बैठूंगा। उन्होंने यहां तक कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि मेरा संबंध संघ से रहा है। मैं कहता हूं कि मैं संघ से नफरत करता हूं। वे ब्राह्मणवाद के रक्षक हैं, जबकि मैं अंबेडकरवादी हूं। दोनों में कोई मेल ही नहीं हो सकता।

मुख्य बात यह कि जंतर- मंतर के जन सैलाब के केंद्र में दो व्यक्ति थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर और चंद्रशेखऱ उर्फ रावण। कार्यक्रम स्थल जय भीम के नारों और चंद्रशेखर जिंदाबाद के नारे से गूंज रहा था। एक बात साफ तौर उभर कर सामने आ रही थी कि दलितों के मन में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की जिस भावना का विकास डॉ. अंबेडकर ने किया था वह सामाजिक समता कायम हुए बिना शान्त नहीं होने वाला है। चंद्रशेखर के प्रति दलितों का इतना अपनापन इसी न्याय और समता दिलाने के लिए उनके संघर्ष के चलते है।

चंद्रशेखर ने बताया “द ग्रेट चमार” का मतलब

जंतर-मंतर पर जुटे लोगों में अधिकांश 15-16 वर्ष से लेकर 30-35 वर्ष के युवा थे। यह पढ़े-लिखे दलितों की तीसरी पीढ़ी थी, जिसके संस्कारों में जातीय श्रेणी-क्रम की स्वीकृति नहीं है। उनके अन्दर अपनी जाति को लेकर कोई हीनताबोध नहीं दिखता। उन्होंने अपनी टोपियों, बैनरों और पोस्टरों पर साफ-साफ “द ग्रेट चमार” लिख रखा था। लोग “द ग्रेट चमार जिंदाबाद” के नारे भी लगा रहे थे। इस संदर्भ में चंद्रशेखर कहते हैं कि लोग हमसे पूछते हैं कि आप लोग जब जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते हैं, तो “द ग्रेट चमार” क्यों लिखते हैं। जाति पर गर्व क्यों करते हैं, इसका जवाब देते हुए वे डॉ. अबेडकर के हवाले से देते हुए उन्होंने कहा कि यदि जाति व्यवस्था पूरी तरह खत्म न हो पाए, तो अपनी जाति पर इतना गर्व करो कि अपने को श्रेष्ठ जाति का मानने वाले वाले शर्मिंदा महसूस करें। साथ चंद्रशेखर यह भी कहते हैं कि जब शासन-प्रशासन हमें चमार मानता है तो हमे अपने को चमार कहने में शर्म क्यों करें। इसका उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि जब हमसे जाति प्रमाण-पत्र मांगा जाता है, तो अनुसूचित जाति लिखने के साथ ही हमें उप जाति के तौर पर चमार लिखना पड़ता है।

रावण ने उठाया स्त्रियों के आत्म सम्मान का सवाल

जंतर- मंतर पर चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ रावण ने अपने भाषण में दलित-बहुजनों के सवाल के अलावा स्त्रियों के सवाल को भी शामिल किया। चंद्रशेखर ने कहा कि कुछ लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि भीम आर्मी सवर्णों द्वारा दलित महिलाओं के अपमान का बदला सवर्ण महिलाओं को अपमानित करके लेना चाहती है। यह पूरी तरह से झूठ है और हमें बदनाम करने की साजिश है। भीम आर्मी इस देश की हर स्त्री की गरिमा और इज्जत की रक्षा करना अपना कर्तव्य मानती है, चाहे वह स्त्री किसी भी कौम, जाति, सम्प्रदाय या क्षेत्र की हो। इस संदर्भ में हमारे आदर्श बाबा साहब अंबेडकर और काल्पनिक पात्र रावण है। उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने आजीवन सभी महिलाओं की बराबरी के लिए संघर्ष किया। इसी बराबरी के लिए हिंदू कोड बिल पेश किया। इस बिल को पास नहीं करा पाए तो, विधि मंत्री जैसे पद से इस्तीफा दे दिया। अपने नाम के आगे रावण लगाने का कारण भी स्त्री के प्रति रावण के सम्मान की भावना को मानते हैं। चंद्रशेखर ने जंतर-मतंर पर अपने भाषण में कहा कि जहां राम ने एक स्त्री ( सूर्पणखा ) का नान- कान कटवा कर उसे बेईज्जत किया, वहीं इसके बदला चुकाने लिए रावण भले ही सीता को ले गया, लेकिन उसने शक्तिशाली होने के बावजूद भी सीता की पूरी तरह से इज्जत किया। किसी भी तरह से उनकी गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाया।

दो वर्ष पहले 21 जुलाई 2015 को हुआ था भीम आर्मी का गठन

भीम आर्मी के अध्यक्ष विनय रतन सिंह बताते हैं कि इसकी पहली बैठक 21 जुलाई 2015 को हुई थी। वे बताते हैं कि इसकी पहली बैठक में 10-15 लोग थे। जब इसका गठन हुआ तो, इसके दो मुख्य उद्देश्य थे। पहला बहुजन समाज के लोगों को शिक्षित करना और दूसरा बहुजन समाज के लोगों को शोषण-उत्पीड़न से रक्षा। पहले उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भीम आर्मी ने भीम पाठशालाओं का निर्माण करना शुरू किया। ये पाठशालाएं लोगों के सहयोग से चलाई जाती हैं। इसमें पढाने वाले लोग छात्र या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लोग होते हैं। भीम पाठशाला में प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी कराई जाती है। विनय रतन सिंह बताते हैं कि भीम पाठशालाओं में बाबा साहब के विचारों की भी शिक्षा दी जाती है। चंद्रशेखर भी कहते हैं कि शिक्षा संघर्ष का हथियार है। अब तक लगभग 300 भीम पाठशालाएं सहारनपुर और आस-पास के इलाकों में खोली जा चुकी हैं।

अपने गांव से चंद्रशेखर ने की शुरुआत

संघर्ष की शुरूआत चंद्रशेखर ने अपने गांव छुटमलपुर के एएचपी इंटर कॉलेज से शुरू की। इस कॉलेज का प्रबंधन राजपूतों के हाथ में है। यहां परंपरा थी कि बहुजन समाज के लड़के छात्रों के बैठने की सीटों की सफाई करेंगे। चंद्रशेखर बताते है कि जो दलित लड़का ज्यादा अंक लाता था, उसे तरह-तरह से उत्पीड़ित किया जाता था। यहां इसके साथ यह भी परंपरा थी कि स्कूल के अंदर जो नल था, उससे पहले राजपूत लड़के ही पानी पी सकते थे। 2015 में ही एक घटना घटी, जिसमे एक कश्यप ( पिछड़े वर्ग के ) लड़के ने राजपूतों से पहले पानी पीने की गुस्ताखी की। विरोध करने पर उसे राजपूतों ने बुरी तरह से पीटा। इस मामले में भीम आर्मी ने हस्तक्षेप किया। कई बार पंचायत हुई और मामला शासन-प्रशासन तक पहुंचा। अन्ततः यह समझौता हुआ कि सभी छात्रों के साथ समानता की व्यवहार किया जायेगा। इस घटना ने इलाके में भीम आर्मी की साख बनायी। चन्द्रशेखर और उनके साथियों के अनुसार भीम आर्मी की सहारनपुर के आस-पास सदस्य संख्या 10 हजार के करीब है।

मूलरुप से उत्तराखंड के हैं चंद्रशेखर

भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर सहारनपुर के छुटमलपुर के निवासी हैं। उनका पैतृक गांव वहां से 10 किलोमीटर दूर डाडा पट्टी में है, जो उतराखण्ड मे पड़ता है। उनके पिता गोवर्द्धन दास छुटमलपुर में आकर बस गए थे। वे प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे। उनकी 2013 में कैंसर से मृत्यु हुई। चंद्रशेखर के परिवार में तीन बहनें हैं जिनकी शादी हो चुकी हैं। एक बड़े भाई और एक छोटा भाई है। उनके परिवार के पास 12-13 बीघा खेत है। परिवार का खर्चा खेती से प्राप्त आय और पिता की मृत्यु के बाद मां को मिलने वाली पेंशन से चलता है। जब खेती-किसानी की स्थिति के बारें में उनसे पूछा जाता है, तो वे कहते हैं कि इस देश में किसान को कोई पूछने वाला नहीं है। वे भीम आर्मी को एक विचारधारा मानते हैं और कहते हैं कि मैं बाबा साहब के उस सिद्धांत पर चलता हूं कि जब निजी हित और देश हित में टकराव हो तो, निजी हित कुर्बान कर दो और यदि देश हित और दलित समाज के हित में टकराव हो तो समाज के हित को वरीयता दो।

बहरहाल, भीम आर्मी फिलहाल दलितों-बहुजनों के न्याय और समता की आकंक्षाओं को अभिव्यक्त कर रही है। जंतर-मंतर पर अपनी जिस टीम की घोषणा चंद्रशेखर ने की उसमें दलितों के साथ पिछड़ी जातियों के लोग भी थे। बहुत सारे अन्य समुदाय खास कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक भी उसकी ओर आशा भरी निगाह देख रहे हैं क्योंकि दोनों समुदायों पर अत्याचार करने वाली ताकतें एक ही हैं। जंतर-मंतर के मंच पर मुस्लिम समुदाय की भी उपस्थिति थी। दलितों के संघर्षों की देश व्यापी एकजुटता के प्रतीक के तौर पर जिग्नेश मेवानी की उपस्थिति महत्वपूर्ण थी, जिन्होंने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को अपने हमले का निशाना बनाया। वामपंथी पार्टी न्यू डेमोक्रेसी के लोग भी अपने पोस्टर और नारों के साथ हिस्सेदारी कर रहे थे।

वैसे भीम आर्मी आने वाले समय में क्या स्वरूप लेगी और विविध आकंक्षाओं पर किस कदर खरी उतरेगी, इन प्रश्नों के जवाब भविष्य के गर्भ में ही हैं।


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