सहारनपुर हिंसा : प्रशासन और सामंती सोच जिम्मेवार

अगर पुलिस प्रशासन सजग होता तो निश्चित ही इस घटना को टाला जा सकता था। योगी के सत्ता में आने के बाद भगवा ब्रिगेड पूरे प्रदेश व देश को साम्प्रदायिक व जातीय संघर्षों की आग में झोंकना चाहती है। थान सिंह का विश्लेषण :

सहारनपुर के शब्बीरपुर की घटना के लिए मैं स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार समझता हूं। अगर पुलिस प्रशासन सजग होता तो निश्चित ही इस घटना को टाला जा सकता था। योगी के सत्ता में आने के बाद भगवा ब्रिगेड पूरे प्रदेश व देश को साम्प्रदायिक व जातीय संघर्षों की आग में झोंकना चाहती है। जब मैंने सहारनपुर के शब्बीरपुर के घटना के बारे में सुना तो “दलित शोषण मुक्ति मंच” के बैनरतले एक प्रतिनिधिमंडल का गठन कर शब्बीरपुर का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल में मेरे अलावा मुरादाबाद से एडवोकेट विक्रम सिंह एवं विकास नेगी, देवबंद से एडवोकेट रजनीश कुमार, अजय कुमार एवं नवनीत सिंह, सहारनपुर से सीपीआईएम के जिला सचिव राव दाऊद खाँ, कामरेड सुरेन्द्र कुमार शामिल थे।

पुलिस प्रशासन सहारनपुर ने अभी तक बाहरी व्यक्तियों, किसी भी संगठन एवं राजनीतिक दलों को ग्राम शब्बीरपुर जाने पर पाबन्दी लगा रखी है, जिस कारण प्रतिनिधि मंडल घटना स्थल पर नहीं जा सका। हम लोग 5 मई को हुई घटना में घायलों को देखने जिला अस्पताल सहारनपुर गये। अस्पताल के एक ही वार्ड में स्त्री और पुरूष 13 मरीज भर्ती थे, जिनमें दल सिंह, अनिल, प्रदीप, संदीप, राजू, अग्नि भास्कर, श्याम सिंह, पूर्व प्रधान नरेश कुमार, श्रीमती कमला, रीना, रोशन, शिमला तथा प्रदीप कौर शामिल हैं। पीडि़तों में से एक व्यक्ति जो काफी गंभीर है संत कुमार पुत्र श्री शिवकुमार जौली ग्रान्ट देहरादून में भर्ती है। घायलों की स्थिति और उनके बयानों के आधार पर अस्पताल में चल रहे ईलाज को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।

शब्बीरपुर की घटनाक्रम

घायलों में दल सिंह, श्याम सिंह और पूर्व प्रधान नरेश कुमार से बातचीत के आधार पर ग्राम शब्बीरपुर की घटनाक्रम इस प्रकार है :

महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर दिनांक 5 मई 2017 को सांसद फूलन देवी के हत्यारोपी शेरसिंह राणा की अगुवाई में ग्राम शिमलाना, जनपद सहारनपुर में महाराणा प्रताप की मूर्ति की स्थापना का कार्यक्रम था। शिमलाना और उसके आस-पास के लगभग 30-32 ग्राम ठाकुर बाहुल्य है जहां से विभिन्न जत्थों के रूप में विभिन्न ग्रामों से ठाकुर समुदाय के लोग शिमलाना में एकत्रित हो रहे थे। उन्हीं में से एक जत्था ग्राम महेशपुर से शब्बीरपुर की दलित आबादी से होकर गुजर रहा था। जत्थे के दबंग लोगों के हाथों में नंगी तलवारें, बन्दूक, राइफल आदि हथियार थे और ये लोग ऊँची आवाज में डीजे भी बजा रहे थे। ग्राम प्रधान शिवकुमार की सूचना पर स्थानीय पुलिस द्वारा बिना अनुमति बजाये जा रहे डीजे को बंद करा दिया। जिस पर जत्थेदार भड़क उठे और उन्होंने शिमलाना में एकत्रित लोगों को गलत सूचना दी कि हमारे साथ पुलिस और शब्बीरपुर के दलितों द्वारा दुर्व्यवहार किया गया है। जिससे शिमलाना से हजारों की संख्या में लोग शब्बीरपुर आ गए और पूरे गांव पर हमला किया, गांव में आग लगा दी। इस हमले और आगजनी में लगभग 65 घर भस्म हो गए, पशुओं का चारा, लोगों का ईंधन, मोटरसाईकिलें, बैलगाडि़यां व खेती के अन्य उपकरणों को भी आगजनी के हवाले कर दिया। हमलावरों ने गांव के बूढ़े, बच्चे और महिलाओं को बेरहमी से मारा-पीटा, जिसमें लगभग 15 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इस पूरे घटनाक्रम का शर्मनाक पहलू यह है कि यह सब पुलिस प्रशासन की नजरों की सामने हुआ जो मूकदर्शक बना रहा।

इस मारपीट, पथराव और आगजनी में हमलावरों की ओर से एक व्यक्ति की मौत हो गई जिसको आधार बनाकर पुलिस द्वारा दलित समुदाय के लोगों के खिलाफ विभिन्न गंभीर धाराओं में 5 मुकदमें दर्ज हो चुके हैं और 8 गिरफ्तारियां भी की जा चुकी है। बाद में आयी मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक की मृत्यु दम घुटने के कारण हुई है, न कि कथित घटना में आयी चोटों के कारण। भय और आतंक के कारण गांव के पुरुष पलायन कर चुके हैं, गांव में केवल महिलाएं, बूढ़े और बच्चें ही दिखाई दे रहे हैं, पूरा गांव पुलिस छावनी बना हुआ है। किसी भी बाहरी व्यक्ति, संगठन अथवा राजनीतिक दल को गांव में जाने पर पाबंदी है।

9 मई को सहारनपुर में हुए उपद्रव की कहानी

पुलिस प्रशासन को पूरी जानकारी थी कि भीम आर्मी व अन्य दलित संगठन मिलकर रविदास छात्रावास, देहरादून रोड, सहारनपुर में एक आम सभा करने जा रहे हैं। जिसमें चर्चा के बाद वह पीड़ितों के इलाज, मुआवजा व पुलिस सुरक्षा आदि मांगों से संबंधित एक ज्ञापन प्रशासन को सौंपने वाले थे। पुलिस प्रशासन ने दलित संगठनों को कहा कि रविदास छात्रावास आम सभा करने का स्थान नहीं है। अतः आप लोग गांधी पार्क में अपना कार्यक्रम करें, जहां आम तौर पर आम सभाएं और धरना प्रदर्शन होते रहे हैं। प्रशासन के कहने पर ही छात्रावास में उपस्थित सभी लोग गांधी पार्क में इकट्ठा हो गए। इसके बाद पुलिस द्वारा उन लोगों को लाठी चार्ज करके दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया और सबको तितर-बितर कर दिया। इस लाठी चार्ज की खबर आम सभा में आ रहे लोगों तक तुरंत पहुंची, जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप भीम आर्मी के नेतृत्व में  लोगों द्वारा सहारनपुर शहर के अनेक क्षेत्रों जैसे सदर बाजार, मल्लीपुर रोड, चिलकाना रोड, हलालपुर, रामनगर पुलिस चौकी, नाजिमपुरा, कोर्ट रोड, बेहट रोड इत्यादि जगहों पर जाम लगा दिया। पुलिस ने इन पर भी लाठी चार्ज किया। प्रतिक्रिया स्वरूप जाम लगाने वाले लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। हमें इस विरोध कार्यवाही में सरकारी वाहनों को जलाने की सूचना भी प्राप्त हुई। इस पूरे घटनाक्रम का प्रतिक्रियात्मक प्रभाव सहारनपुर के आस-पास गांवों जैसे बड़गांव, अम्हेटा, नानक मऊ, हसनपुर, सरसहवा तथा रामपुर मनिहार में भी सुनने को मिला।

निष्कर्ष

आज दिनांक 9 मई 2017 को सहारनपुर  नगर में हुई दहशतपूर्ण घटना का बारीकी से आकलन और वहां उपस्थित नौजवानों से बात-चीत करने पर प्रतिनिधि मंडल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भीम आर्मी व अन्य दलित संगठनों द्वारा रविदास छात्रावास में आयोजित की जा रही आम सभा में केवल ग्राम शब्बीरपुर की घटना पर विभिन्न वक्ताओं द्वारा अपने वक्तव्य और भाषण दिए जाने के बाद एक मांग पत्र प्रशासन को सौंपा जाना था जो निश्चित रूप से शान्तिपूर्ण ढंग से ही आयोजित होता, लेकिन प्रशासन ने सुनियोजित तरीके से पहले आयोजनकर्ताओं को रविदास छात्रावास के स्थान पर गांधी पार्क में आम सभा करने की सलाह दी और बाद में गांधी पार्क में एकत्र हुए लगभग 300 लोगों पर अचानक से लाठी-चार्ज कर दिया। इसका सीधा सा अर्थ है कि पुलिस-प्रशासन ग्राम शब्बीरपुर के घटनाक्रम पर दलितों की  अभिव्यक्ति को रोकना चाहता है। इसलिए आम सभा के आयोजन को विफल किया गया। यदि पुलिस प्रशासन द्वारा लाठी चार्ज करने की पहल न की गई होती तो निश्चित रूप से दलित संगठनों का यह कार्यक्रम शान्तिपूर्ण ढंग से चलता और पूरा शहर उपद्रवपूर्ण घटनाओं के हवाले न होता।

इसी प्रकार 5 मई को ग्राम शब्बीरपुर में मौजूद पुलिस प्रशासन द्वारा यदि शुरूआत में ही सजगता दिखाकर पथराव पूर्ण संघर्ष को रोकने का प्रयास किया होता तो शिमलाना गांव से आयी हजारों लोगों की शब्बीरपुर के लोगों पर बर्बरतापूर्ण हमला नहीं कर पाती। गांव के लगभग 65 घर जलकर स्वाहा होने से बचते, जान-माल का भारी नुकसान न होता और न ही गांव के दलित गांव से पलायन को विवश होते।

अतः प्रतिनिधि मंडल का मानना है कि ग्राम शब्बीरपुर में हुआ जातीय संघर्ष के नंगे नाच के तीन कारण है –

1 . घायलों से बातचीत कर एक तथ्य यह ज्ञात हुआ कि 14 अप्रैल के दिन ग्राम शब्बीरपुर के दलित वर्ग के लोगों द्वारा डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित की जानी थी। लेकिन ठाकुर समुदाय के दबंग लोगों ने पुलिस प्रशासन की मदद से गांव में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं होने दी

2 . दूसरा एक कारण पुलिस प्रशासन की उदासीनता ही है

3 . तीसरा बड़ा कारण योगी सरकार के बनने के बाद भगवा ब्रिगेड बेलगाम हो चुकी है जो अपना हिन्दुत्व का एजेण्डा व सामन्तवादी सोच समाज पर जबरन थोपना चाहती है जिसकी परिणति शब्बीरपुर में हुई शर्मनाक और बर्बरतापूर्ण घटना के रूप में हुई है


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  1. harishramarya Reply

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