फॉरवर्ड प्रेस में मेरे ढाई साल

इस पत्रिका के दो अवदान तो इतिहास में दर्ज हो गये हैं- एक महिषासुर के नायकत्व की खोज और दूसरा बहुजन साहित्य के रूप में साहित्य की एक नई प्रस्तावना। ये दो मील के पत्थर फॉरवर्ड प्रेस के हिस्से में हैं

लगभग ढाई वर्षों तक फॉरवर्ड प्रेस के लिए का काम करने के बाद मैंने मैंने इस काम से मुक्त होने का फैसला किया है। इस बीच फॉरवर्ड प्रेस का स्वरुप प्रिंट से वेब के रूप में रुपांतरित हो गया। वेब के काम की

संजीव चंदन को शुभकामना देते फारवर्ड प्रेस के सहकर्मी

अपनी प्रकृति होती है, इसलिए यह ज्यादा समय और ज्यादा जुडाव मांगता है। खासकर इसीलिए मैंने हिन्दी संपादक के दायित्व से मुक्त होने का निर्णय लिया। इसी बीच फॉरवर्ड प्रेस ने किताबों के प्रकाशन के क्षेत्र में भी प्रवेश किया है, जो हमारे प्रकाशन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के साथ एक संयुक्त उपक्रम है।

फॉरवर्ड प्रेस के साथ काम करते हुए एक बेहद सुलझे हुए और समर्पित संपादकीय नेतृत्व के साथ काम करने का बेहद उत्साहवर्द्धक और उपयोगी अनुभव रहा। आयवन कोस्का सजग और संवेदनशील हैं। वहीं प्रमोद रंजन के लिए संपादन और पत्रकारिता एक पैशन है इसे वे प्रतिबद्धता के साथ मिशन की तरह देखते रहे हैं, वस्तुनिष्ठता की शर्त का उल्लंघन किये बिना !

इससे जुड़ने के पहले तक, जुड़ने के बाद और अब हिन्दी संपादक के रूप में दायित्वमुक्त होने की स्थिति में, प्रमोद रंजन मेरे मित्र रहे हैं। काम के दिनों में संपादकीय आउटपुट लेने के मामले में वे एक प्रतिबद्ध नेतृत्व की भूमिका अदा करते हुए भी यह कोशिश करते रहे कि काम का वातावरण मित्रवत रहे और मेरा निजी वृत्त सम्मानित रहे, जबकि मेरी कोशिश यह रही कि इतने दिनों में उनका कार्यक्षेत्र और अधिकार क्षेत्र अतिक्रमित नहीं हो- जो अक्सर मित्रता के आवेग से अतिक्रमित होने की स्थिति में होता है, कई मामलों में।

अक्टूबर 2014 में प्रमोद रंजन ने मुझे हिन्दी संपादक के रूप में फॉरवर्ड प्रेस में आमंत्रित किया, इसके पहले तक मैं उनके यहाँ 2012 से प्रायः नियमित लिख रहा था। मेरे अन्य इंगेजमेंट को देखते हुए प्रमोद जी ने पत्रिका के प्रेस में जाने के अंतिम समय में ऑफिस आने की व्यवस्था दी, यानी महीने में अधिकतम चार दिन। हालांकि मैं उनके प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार करने को तैयार नहीं था, मैंने उनसे दो-तीन महीने का समय माँगा। उन दिनों वे मेरे साथ एक सप्ताह लगभग साथ थे, फॉरवर्ड प्रेस पर मुक़दमे के दौरान अंडरग्राउंड रहते हुए। मेरी प्रवृत्ति से वाकिफ़ हो गये थे, ‘ उन्होंने छूटते ही कहा कि आपमें टालने की प्रवृत्ति है। आप एक सप्ताह के अंदर ज्वाइन करें।’ मैं ना नहीं कह सका- और इस तरह फॉरवर्ड प्रेस के साथ मेरी यात्रा शुरू हुई।

लेखक के रूप में फॉरवर्ड प्रेस के साथ जुड़ना एक अलग अनुभव था, लेकिन हिन्दी का संपादन करते हुए एकदम अलग। मैंने जबतक इस रूप में ज्वाइन किया, तबतक पत्रिका का स्वरुप खबरों की सामान्य केन्द्रीयता से भी अलग होकर आलेख और विश्लेषण परक हो गया था। यानी काम की प्रकृति बदल गई थी। इस दौरान मैंने फॉरवर्ड प्रेस में कई नये नामों से लिखवाया, जो पहले यहाँ नहीं लिखते थे। इस दौरान दो साहित्य वार्षिकियां भी प्रकाशित हुईं। बहुजन साहित्य विशेषांक के लिए प्रमोद जी का मुख्य फोकस रहा कि बहुजन साहित्य को स्थापित करती वैचारिकी के आलेख ज्यादा से ज्यादा प्रकाशित किये जायें। यूं तो आयवन कोस्का का हस्तक्षेप पत्रिका के सामान्य अंकों में न्यूनतम ही होता रहा था, लेकिन साहित्य अंक तो पूरी तरह उनके हस्तक्षेप से मुक्त होता।

पत्रिका के प्रेस जाने और फेरो तैयार होने तक आयवन कोस्का निगाह्वान रहते रहे, वे इस द्विभाषी पत्रिका को प्रेस जाने तक अंग्रेजी के माध्यम से ही देखते थे और छोटी से छोटी गलती पर नजर रखते- चाहे भारत में होते हुए वे अपने घर पर हों या भारत से बाहर कनाडा या कहीं और। देर रात तक काम करते हुए हम कभी भी तैयार होते कि उनका मेसेज आ साकता है, ‘स्टॉप प्रेस!’। गलती ठीक करवाने का उनका यह पसंदीदा मेसेज होता।

फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2015 अंक के लिए संजीव चंदन द्वारा लिखी गई कवर स्टोरी

इन ढाई सालों में (हालांकि मेरे ज्वाइन करने के बाद डेढ़ साल ही पत्रिका का प्रिंट प्रकाशित हुआ, जून 2017 से पत्रिका पूरी तरह ऑनलाइन हो गई। मैंने कुछ कवर स्टोरी भी की, ‘जैसे ज्ञान के दुर्ग पर दस्तक’ अथवा एनडीए के ‘दलित-बहुजन नेताओं की कटी पतंग’। ये दोनों कवर स्टोरी दो अलग-अलग मिजाज के थे, एक पूरी तरह राजनीतिक और दूसरा अकादमिक जगत में दलित-बहुजन की बढ़ती उपस्थिति हस्तक्षेप को लेकर।

पत्रिका की लोकप्रियता के कई प्रमाण मुझे इन दिनों मिले। जब इसके प्रिंट के प्रकाशन के स्थगन की घोषणा हुई तो कई जगह से इसे बनाये रखने के लिए फोन आते। मुझसे भी कई लोगों ने अलग-अलग अवसरों पर इसके प्रकाशन को बनाये रखने के लिए प्रबंधन से आग्रह करने को कहा। मुझे दिखा कि फॉरवर्ड प्रेस बहुत थोड़े समय में ही दलित-बहुजन भारत की एक आवाज बन चुका था- उनकी सांस्कृतिक अंगड़ाई का हिरावल।

फारवर्ड प्रेस के फरवरी 2015 अंक के लिए संजीव चंदन की कवर स्टोरी

यहाँ कम करते हुए कई प्रसंग मुझपर जाहिर हुए, मसलन काम करने के पहले तक मैं भी आंशिक रूप से यह मानता था कि पत्रिका का फंड क्रिश्चन संस्थाओं से है। काम करते हुए स्पष्ट हुआ कि मालिकों की निजी आस्था क्रिश्चन जरूर है, लेकिन उसका वित्तीय प्रबंधन क्रिश्चन संस्थाओं का नहीं है। संपादक के रूप में आयवन कोस्का को भी अपनी निजी आस्था को थोपते नहीं देखा, संपादकीय निर्णय प्रायः प्रमोद रंजन के ही हुआ करते रहे, जो अपनी निजी आस्था में नास्तिक हैं। प्रमोद जी के साथ काम करते हुए साथ होने के घंटे भी बढे, एक मित्र के रूप में आप उतने साथ तो होते नहीं है- इस तरह एक व्यक्ति, मित्र, संपादक, विचारक के रूप में प्रमोद जी को और नजदीक से देख-समझ सका-विषयों और मुद्दों को अपने नजरिये से देखने वाला एक बुद्धिजीवी, जो प्रचलित समझ के दवाब से मुक्त अपनी बौद्धिक स्थापनाओं का साहस रखता हो। मंचों और सार्वजनिक जगहों पर बोलने या वाचाल उपस्थिति से संकोच करने वाला एक ऐसा बुद्धिजीवी, जो बहुजन समाज को बौद्धिक नेतृत्व देने की क्षमताओं से लैस भी हो और उद्धत भी। उबाऊ निरंतरता या सनसनी पैदा करने की बौद्धिकता से परहेज रखने वाला यह शख्स ऐसा लगता है कि एक बेचैन बौद्धिक यात्रा पर है, जिसमें प्रचलित पैमाने से मुक्त रहने का साहस है। अपने काम के प्रति ख़ास प्रतिबद्धता- हर आलेख, खबर को अक्षरशः पढ़ना, संपादित करना और उसकी शुद्धतम प्रस्तुति तक नजर बनाए रखना। और हाँ यदि टीम ने कोई गलती की हो तो उसका दायित्व स्वीकार करने की उदारता भी!

इस पत्रिका के दो अवदान तो इतिहास में दर्ज हो गये हैं- एक महिषासुर के नायकत्व की खोज और दूसरा बहुजन साहित्य के रूप में साहित्य की एक नई प्रस्तावना। ये दो मील के पत्थर फॉरवर्ड प्रेस के हिस्से में हैं। मुझे याद है कि कैसे जब तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में महिषासुर के नाम पर जोशीला हमला बोला और विपक्ष की बोलती लगभग बंद कर दी तब प्रमोद रंजन ने हमसब के साथ मिलकर, यानी डिजायनर और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता राजन कुमार, अनिल वर्गीज और मेरे साथ मिलकर न सिर्फ विपक्ष के नेताओं को बहुजन सांस्कृतिक क्रान्ति के प्रति आश्वस्त किया, बल्कि मीडिया को भी सामग्रियां उपलब्ध कराकर हमने खेल को एकतरफा होने से रोका। बल्कि पहले दिन लोकसभा में चैम्पियन होने के बाद दूसरे दिन राज्यसभा में स्मृति ईरानी इसी वजह से अपनी आभा खो चुकी थीं। मीडिया की मुख्यधारा तबतक महिषासुर की देशव्यापी परंपरा पर खबरें बनाने लगी थी।

शांत लेकिन संवेदनशील मिजाज के धनी अंग्रेजी संपादक अनिल वर्गीज के साथ काम करने का अनुभव भी मेरे लिए ख़ास रहा है, वहीं हम सब से दूर यानी भोपाल में बैठे अमरीश हरदनिया अपने अनुवाद के साथ हमारे साथ अपनी मुस्तैद उपस्थिति का अहसास देते रहे। प्रेस जाने के दिनों में काम के बोझ को वे भोपाल में सहजता से झेलते, हालांकि उनके कुछ चुटीले सवाल बड़े रोचक होते। जैसे एक रात जब काम करते हुए हम तीसरे पहर की ओर थे तो उन्होंने मुझे फोन किया और पूछा, ‘क्या आपकी शादी हो गई है?’ बस इतना ही सवाल था और मेरा जवाब सुनकर उन्होंने फोन रख भी दिया। और अगले ही पल दिल्ली में बैठे हमसब उस सवाल की गुत्थी सुलझाने में लग गये। पत्रिका के डिजायनर राजन को हमसब स्नेह करते रहे हैं-वजह उनका हमसब से उम्र में बहुत छोटा होना और उनकी निश्छल वाचालता। यूं तो लगभग डेढ़ सालों तक महीने में चार-पांच दिन ही हम ऑफिस में इकट्ठा होते थे, लेकिन धनंजय और चंद्रिका हमारे लिए तब विशेष ख्याल भाव में होते। वे प्रकाशन और प्रबन्धन के साथी के रूप में एक परिवार की तरह रहे हैं।

और हाँ, सबसे महत्वपूर्ण सिल्विया कोस्का, जिन्हें मैंने फॉरवर्ड प्रेस के प्रति समर्पित भाव में देखा। पत्रिका से जुड़ा हर शख्स इस स्नेहिल शख्सियत के प्रति आभारी रहा है, और हाँ, मैं भी- व्यक्तिगत स्तर पर भी ख्याल रखने के लिए, उनकी चिंताओं में हम और हमारा परिवार सब शामिल होता रहा है।


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply