फ़ुलेवाड़ा : सामाजिक क्रांति की जन्मस्थली

महात्मा जोती राव की जन्मस्थली फ़ुलेवाड़ा हमारे लिए आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र था। वहां पहुंचकर हमने उनके जीवन संघर्ष के साक्षी रहे अवशेषों को करीब से देखा। इस यात्रा ने सुखद अनुभव दिये तो कई सवाल भी। सवाल यह कि आधुनिक भारत के निर्माता से जुड़े धरोहरों की उपेक्षा क्यों की जा रही है

फुलेवाडा के प्रवेशद्वार पर स्थित चित्रवल्लरी जिसमें महात्मा फुले के जीवन और कार्यों को प्रदर्शित किया गया है

आधुनिक भारत के निर्माण में महात्मा जोती राव फ़ुले (जन्म 11 अप्रैल 1827, मृत्यु 28 नवम्बर 1890) की अहम भूमिका रही है। उनके बारे में जानने, समझने और सबकुछ अपनी आंखों से देखने की इच्छा हम सभी के मन में थी। 5 जनवरी 2017 को नयी दिल्ली के इंडिया गेट से शुरु हुई हमारी भारत यात्रा के बीसवें दिन हम उस धरती पर खड़े थे जहां महात्मा फ़ुले रहे और जहाँ से उन्होंने ज्ञान की अलख जगाई। हालांकि इस  मोहल्ले तक पहुंचना आसान नहीं था। यहाँ तक कि गूगल मैप भी हमारी सहायता करने में असमर्थ था। सच्चाई है कि जिस महान इंसान ने भारत के बहुजनों को शिक्षा का संदेश दिया, उसके जीवन के बारे में जानकारियां आज भी सामान्य लोगों को कम ही है।

परेशानियां और सफ़र दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। फ़ुलेवाड़ा तक पहुंचने में हमें भी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। थोड़ी मेहनत करने के बाद हम फ़ुलेवाड़ा  में  खड़े थे। सामने एक विशाल तोरणद्वार इस बात की पुष्टि कर रहा था कि यही वे गलियां हैं जहाँ जोती राव फ़ुले चलते थे। उनके घर, जिसे अब संग्रहालय में बदल दिया गया है, के बाहर  जोतिराव और सावित्रीबाई की आवक्ष प्रतिमाएं हैं । साथ ही उनके द्वारा किये गये कार्यों को भी पेंटिंग्स के जरिए बड़ी खुबसूरती से उकेरा गया है।

वह कुआँ जिसे फुले दम्पति ने दलितों के साथ साँझा किया था

उन पेंटिंग्स के जरिए हमारी आंखों के सामने वे सारे दृश्य मौजूद थे, जिन्होंने उन्हें विषमतम परिस्थियों के बावजूद स्वयं को 19वीं सदी का सबसे महान भारतीय विचारक, समाज सेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी के रुप में स्थापित किया था। उन कठिन परिस्थियों में ही उन्होंने सितम्बर 1873 में उन्होने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया था।

फ़ुलेवाड़ा पहुंचने पर सबसे पहले हमें इस बात की जानकारी मिली कि इस  मोहल्ले  का नाम जोती राव फ़ुले के नाम पर नहीं बल्कि उनके पूर्वजों के बसने के कारण रखा गया। इस गांव में बड़ी संख्या माली समाज के लोग रहते हैं, जिनके लिए आज भी आजीविका का जरिया फूलों की खेती और उसका व्यवसाय है। हालांकि उनका इस तरह से पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ा रहना उनके पिछड़ेपन को ही दर्शाता है। इस मोहल्ले में दलित जातियों की भी अच्छी-खासी संख्या है।

फ़ुलेवाड़ा के ठीक सामने एक और आश्चर्य भी हमारा इंतजार कर रहा था।

लोहे के ग्रिल के दायरे में कैद एक बड़ा सा पीपल का पेड़ और उसकी जड़ के पास रखी थीं देवी-देवताओं की मूर्तियां। हमारे लिए यह एक आश्चर्य ही था। इसकी वजह यह थी कि महात्मा जोती राव फ़ुले का जीवन आडंबर के विरुद्ध था। फ़िर उनकी जन्मस्थली पर शंकर, विष्णु और शनि जैसे देवताओं की पूजा! इसके साथ-साथ यह भी आश्चर्यजनक था कि इन हिन्दू देवी-देवताओं के बीच ही मसोबा की मूर्ति भी रखी हुई थी, जिन्हें महिषासुर भी कहा जाता है।  वहां एक महिला और एक पुरुष  फ़ूल-माला बनाते  नजर आये। पूछने पर एक अधेड़ व्यक्ति ने देवताओं के बारे में जानकारी दी। देखकर लगा कि इस जगह पर बड़ी संख्या में लोग रोजाना पूजा-अर्चना करने आते होंगे और इसी से इन लोगों के जीवन की गाड़ी चलती होगी।

खैर हम अपनी गाड़ी पीछे छोड़ आये थे। आगे बढे तब सामने एक मध्यम आकार का घर था। लोगों ने बताया कि इसी घर में जोती राव फ़ुले का जन्म हुआ था। सब कुछ हमारी आंखों के सामने था। एक सजीव चित्रपट की भांति अब तक की सारी जानकारियां हमारे जेहन में थीं। मसलन महात्मा जोती राव फुले का जन्म 1827 ई. में पुणे में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। इसलिए माली के काम में लगे ये लोग ‘फुले’ के नाम से जाने जाते थे। साथ ही यह भी कि किस तरह उन्होंने पहले तक मराठी में अध्ययन किया फ़िर 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी की सातवीं कक्षा की पढाई पूरी की। हम घर के अहाते में थे। मकान के बरामदे में  जोती राव फ़ुले और उनकी पत्नी सावित्री बाई फ़ुले (3 जनवरी 1831- 10 मार्च 1897)  की संयुक्त आवक्ष प्रतिमायें थीं। सावित्री बाई फ़ुले ने जोती राव फ़ुले के साथ अपना जीवन 1840 में शुरु किया था। दोनों की प्रतिमायें एक साथ देख सावित्री बाई फ़ुले द्वारा रचित एक कविता याद आयी, जिसे “काव्य फ़ुले” नामक काव्य संग्रह में संकलित किया गया है।

गृहस्थ जीवन में आनंद का मार्ग

जैसे फूलों में रस भरता है
मेरे जीवन में भरे खुशी जोतीबा
ऐसे नामी जन को पाकर धन्य हूँ मैं
मेरी खुशी का नहीं कोई ठिकाना
नन्हें बालकों को जनने और पालने की चिंता
इस बोझ को उठाना है औरत की ज़िम्मेवारी
घर-बार चलाना कोई मामूली बात नहीं
शिकायत करने से होगा कोई लाभ नहीं
परिवार में बनी रहे सदा शांति
गृहस्थ जीवन की यही है उत्तम नीति

– हिंदी काव्य रुपांतरणकार आशीष अलेक्जेंडर

फ़ुले दंपत्ति के इस छोटे से घर में वह सब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रुपों में मौजूद है। तीन कमरों के जर्रे-जर्रे में उनका जिया हुआ जीवन और वह संघर्ष भी जिसने भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास की बुनियाद डाली। इसी घर में सजीव है जोती राव फ़ुले का दृढ निश्चय जिसके कारण उन्होंने परिवार-समाज सभी का विरोध झेलते हुए पहले अपनी पत्नी को शिक्षित बनाया और 1848 में उनके साथ मिलकर एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। हालांकि उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकलवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।

फ़ु्ले दंपत्ति के घर के परिसर में वह कुआं भी दिखा, जिसे जोती राव फ़ुले ने दलितों के खोल दिया था। यह कुआं उस संघर्ष का साक्षी भी है, जिसके तहत फ़ुले ने दलितों और पिछड़ों को एक करने का प्रयास किया था।

संग्रहालय के बरामदे में प्रदर्शित चित्र

इस सु्खद अनुभू्ति के अलावा यह देखकर मन कोफ़्त भी हुआ कि भारत के इस महान समाज सुधारक की स्मृतियों को सुरक्षित तरीके से सहेजने और उसके दस्तावेजीकरण को लेकर उदासनीनता बरती गयी है। कहीं कोई सुरक्षा नहीं। घर  की देखभाल के लिए नियुक्त कर्मचारी की शायद अपने काम में तनिक भी रूचि नहीं थी। इसके अलावा जोती राव फ़ुले के घर के ठीक बगल में गणेश का मंदिर मुंह चिढाता नजर आया। सनद रहे कि जोती राव फ़ुले ने ब्राह्म्णवाद को मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक बताया था।

हम अपने साथ ज्योति राव फ़ुले से जुड़ी कई अच्छी तस्वीरों को अपने कैमरे में कैदकर लौट रहे थे। आम तौर जोती राव फ़ुले से जुड़ी तस्वीरों का घोर अभाव है। इसकी एक वजह यह भी कि अभी तक जोती राव फ़ुले की स्मृतियों को सहेजने और शेष दुनिया के साथ साझा करने की दिशा में काम किया जाना बाकी है। दिलचस्प वाक्या यह हुआ कि जब हमारी कैमरे ने तस्वीरों को कैद कर लिया तब एक सूचना पट्ट ने हमें किंकिर्त्व्यविमूढ कर दिया। उसपर तस्वीरें लेने से मना करने संबंधी सूचना थी।

खैर हम फ़ुलेवाड़ा से निकल अपनी यात्रा को आगे बढे। हमारे सामने सावित्री बाई फ़ुले की कविताओं का संकलन “काव्य फ़ुले” था। एक कविता चंपा फ़ूल पर केंद्रित है। फ़ुले दंपत्ति की मेहनत व संघर्ष से चम्पा की रंगों जैसा चमकीला फ़ुलेवाड़ा पीछे छुटता जा रहा था।

सुनहरी चंपा

पीला चंपा का फूल
चमकीले हल्दी के रंग का
खिलते हुए फूल की सुंदरता
चुपचाप मेरा दिल चुराती
इसे सुनहरी चंपा भी कहते हैं
प्रकृति का है गहना
मेरे दिल को देता है सुखानुभूति
यह मनोहर रंग
इसका वैभव और इसकी अदा
इसकी सुगंध
मेरे मन को मोह लेती है
भलाई और सत्य का
यह मुकुट प्रतीत होता है
संपूर्ण सुंदरता की प्रतिमा
हल्दी के रंग का
अपने उद्देश्य को पाता
और बढ़ाई करता
बलिदान के सद्गुण की

– हिंदी काव्य रुपांतरणकार आशीष अलेक्जेंडर

फुले दम्पति के चित्र के समक्ष समाजशास्त्री अनिल कुमार

 

दीवार पर उत्कीर्ण जोतिराव फुले की वसीयत

 

फुले संग्रहालय में प्रमोद रंजन

 

संग्रहालय के प्रांगण में जोतीराव और सावित्रीबाई फुले की आवक्ष प्रतिमाएं

 

संग्रहालय से सड़क के उस पार हमें एक ‘महात्मा फुले मंदिर’ मिला जिसमें गणेश की मूर्ति विराजमान थी

फुलेवाड़ा में पीपल के पेड़ के नीचे फूल और माला बेचते एक पुरुष और महिला

 

(लिप्यांतर : नवल किशोर कुमार)


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