यूजीसी का फैसला गलत, फारवर्ड प्रेस से बातचीत में बोले केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत

विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों को लेकर यूजीसी की अधिसूचना के बाद विरोध तेज हो गया है। यहां तक कि केंद्र कैबिनेट में भी अंतर्विरोध देखा जा रहा है। यूजीसी के फैसले को लेकर केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत फारवर्ड प्रेस के साथ बातचीत में बता रहे हैं विरोध की वजह

केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के नियोजन को लेकर रोस्टर में बदलाव किये जाने संबंधी अधिसूचना पर एतराज व्यक्त किया है। उन्होंने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेड़कर से इस अधिसूचना को रद्द करने का अनुरोध किया है। फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत के दौरान श्री गहलोत ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर यूजीसी द्वारा जारी अधिसूचना से दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के आरक्षण को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि यह लागू हो गया तो उच्च शिक्षा में आरक्षित वर्गों के लिए कोई जगह नहीं बचेगा।

केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत

श्री गहलोत ने कहा कि पहले विश्चविद्यालय को इकाई मानकर रिक्तियों का निर्धारण होता था और पूर्व से निर्धारित नियम के तहत आरक्षण के कारण आरक्षित वर्गों को अवसर मिलता था। अब यदि विभाग को इकाई मान कर रिक्तियां निर्धारित होंगी तो पूर्व के नियम के हिसाब से आरक्षित वर्ग रोस्टर में जगह नहीं पा सकेंगे। इसलिए इस तरह का फैसला अनुचित है और आरक्षण के अधिकार का हनन है। उन्होंने कहा कि इसे वापस लेने के लिए उन्होंने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेड़कर को पत्र लिखा और उनसे दूरभाष पर अनुराेध भी किया। श्री जावेड़कर ने यूजीसी के फैसले को वापस लेने के संबंध में आश्वासन दिया है।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर

गौरतलब है कि यूजीसी के फैसले का व्यापक विरोध किया जा रहा है। फारवर्ड प्रेस से विशेष बातचीत में पूर्व राज्यसभा सांसद सह योजना आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. भालचंद्र मुणगेकर ने आरोप लगाया था कि आरएसएस के इशारे पर भाजपा सरकार उच्च शिक्षा में ऊंची जाति का वर्चस्व कायम रखना चाहती है। इस कारण वह विश्वविद्यालयों को इकाई न मानकर विभागों को इकाई बनाना चाहती है। उन्होंने कहा था कि यदि यह फैसला लागू हो गया तो देश में दलितों, ओबीसी और आदिवासियों का प्रोफेसर बनना बंद हो जाएगा। डॉ. मुणगेकर ने कहा था कि वर्ष 2004-05 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने राजीव गांधी फेलोशिप योजना की शुरूआत की थी। इसके कारण आरक्षित वर्गों के करीब 27 हजार युवाओं को एम. फिल और पीएचडी करने का मौका मिला। अब उनकी संख्या तीन लाख से अधिक हो चुकी है जो विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हो सकते हैं। लेकिन केंद्र सरकार उन्हें इससे वंचित करना चाहती है।

यूजीसी के फैसले के विरोध में बीते दिनों दिल्ली में एससी/एसटी/ओबीसी शिक्षक संघ के द्वारा आक्रोश मार्च निकाला गया। आक्रोश मार्च में शामिल शिक्षकों ने आरोप लगाया था कि भारत सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के आधार पर आरक्षित वर्गों के हितों की हकमारी कर रही है। पहले विश्वविद्यालय को इकाई मानकर नियोजन होता था और इसके लिए 200 अंकों की प्रणाली का उपयोग किया जाता था। परंतु अब विभाग को इकाई मानने से रोस्टर में स्वभाविक तरीके से आरक्षित वर्गों के लिए जगह सुरक्षित नहीं रह जाती है। इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षित वर्गों की हिस्सेदारी खत्म करने की साजिश की जा रही है।

बहरहाल, केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत की मानें तो केंद्र सरकार यूजीसी के फैसले पर पुनर्विचार करेगी और उच्च शिक्षा में रोस्टर निर्धारण की प्रक्रिया पूर्ववत जारी रहेगी।


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