नेता बनने की चाह, खुद को हत्यारा नहीं मानता फूलन देवी का हत्यारा

फूलन देवी की हत्या का श्रेय लेकर पूरे देश में राजपूतों का सिरमौर बना शेर सिंह राणा अब खुद को हत्यारा नहीं कह रहा है। यहां तक कि फूलन देवी के परिजन भी उसे हत्यारा नहीं मान रहे। क्या यह शेर सिंह राणा की साजिश है? क्या वह अब राजनीति करना चाहता है? विद्या भूषण रावत और नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट :

“मैंने फूलन देवी को नहीं मारा। मैंने यह कभी स्वीकार नहीं किया। वह तो पुलिस थी जिसने मुझे हिरासत में ले लिया था और उस समय यदि पुलिस कहती कि मैंने ही इंदिरा गांधी की हत्या की है तो यह भी स्वीकार कर लेता।” दस्यु सुंदरी से दो-दो बार सांसद बनी फूलन देवी की सांसद रहते हत्या के मामले में सजायाफ्ता शेर सिंह राणा ने यह बात बीते 24 मई को फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में कही।

यह वही शेर सिंह राणा है जिसने 27 जुलाई 2001 को दिल्ली में बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि उसी ने फूलन देवी की हत्या की थी। करीब तेरह वर्ष बाद जब दिल्ली की एक अदालत ने 2014 में इस मामले में उसे सजा दी तब भी उसने इससे इन्कार नहीं किया। अब वह इस अपराध से इन्कार क्यों कर रहा है? क्या इसकी वजह यह है कि अब वह दलित नेता फूलन देवी की हत्या के “कानूनी कलंक” से खुद को मुक्त करके इसका “सामाजिक श्रेय” लेना और राजपूतों का सिरमौर बनकर राजनीति करना चाहता है?

पिछले वर्ष एक कार्यक्रम के दौरान शेर सिंह राणा

गौरतलब है कि 25 जुलाई 2001 को समाजवादी पार्टी की सांसद फूलन देवी की दिल्ली में उनके निवास स्थान पर गोली मरकर हत्या कर दी गयी थी। पुलिस में लिखाई गयी रिपोर्ट के मुताबिक शेर सिंह राणा जो फूलन देवी के घर पर आता रहता था और तब उसे पंकज के नाम से जाना जाता था, उसी ने उनकी हत्या की। राणा ने 27 जुलाई 2001 को बकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके “श्रेय” लेने वाले अंदाज में हत्या की जिम्मेवारी ली। इसके बाद वह फरार हो गया।  

 

इसके पहले शेर सिंह राणा को कोई नहीं जानता था। वह गिरफ्तार हुआ और उसके बाद जेल से फरार भी हुआ। उसे दिल्ली को निचली अदालत ने 2014 में आजीवन कारावास और एक लाख रुपए की सजा सुनाई। इसके खिलाफ वह बड़ी अदालत गया। इस बीच, शेर सिंह राणा जब तिहाड़ जेल से फरार हुआ तो कथित रूप से अफगानिस्तान पहुंच गया। वहां से लौटकर उसने घोषणा की कि वह पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां लेकर लौटा है। फूलन देवी की हत्या से खुश द्विज समाज उसकी इस घोषणा से झूम उठा। देखते-देखते वह हिंदू हृदय सम्राट बन गया। राजपूत बिरादरी ने तो उसे सिर आंखों पर बिठा लिया।

फूलन देवी की हत्या मामले में 2014 में दिल्ली में निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा पाने के बाद शेर सिंह राणा

द्विज समाज, खासकर राजपूतों में, हीरो बने राणा को इनाम मिलना ही था। ऊपरी अदालत ने उसे जमानत दे दी। फिलहाल वह जेल से बाहर है। यहां यह सवाल बेमानी है कि उसे जमानत किस आधार पर दी गई, जबकि ऊपरी अदालत में मामला विचाराधीन है। बेमानी इसलिए कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण को बिना किसी दोष सिद्धि के रासुका लगाकर जेल के अंदर रखा गया है। सवाल यह भी उठता है कि अब ऐसा क्या हो गया कि शेर सिंह राणा अब खुद को फूलन देवी का हत्यारा मानने से इन्कार कर रहा है?

वैसे यह भी हकीकत है कि फूलन देवी हत्याकांड की जांच ईमानदारी से हो, इसमें अब किसी की दिलचस्पी नहीं रही। यहां तक कि फूलन देवी के रिश्तेदारों की भी नहीं। समाजवादी पार्टी पहले ही इस मामले में अपना पिंड छुड़ा चुकी है। फूलन देवी की मां मूला देवी, बड़ी बहिन रुक्मणि और छोटी बहिन मुन्नी ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की बात कही है। अभी हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान मुन्नी देवी ने शेर सिंह राणा के अपनी बहन की हत्या में शामिल होने से इन्कार किया। क्या मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा है? या फिर शेर सिंह राणा की यह कोई नयी साजिश है?

अपनी सास व अपने पति उम्मेद सिंह के साथ फूलन देवी

फूलन देवी के परिजनों के निशाने पर उसके पति उम्मीद सिंह हैं, न कि शेर सिंह राणा। सभी यह बात भी कहते हैं कि शेर सिंह राणा का फूलन देवी के घर आना-जाना उसकी उम्मेद सिंह से दोस्ती के कारण ही संभव हुआ था। इस घटनाक्रम का अगर तथ्यपरक विश्लेषण किया जाए तो धुंध के बादल छंटते दिखायी देते हैं। फूलन देवी के सहारे अलग-अलग लोग अपनी वैतरणी पार करना चाहते हैं।

जैसे फूलन देवी के परिवार वालों का दर्द है कि उसकी सम्पत्ति पर उसके पति उम्मेद सिंह का कब्जा हो गया है और उनकी मां और छोटी बहनें रामकली व मुन्नी देवी दर-दर की ठीकरें खा रही हैं। मनरेगा में मजदूरी करने को मजबूर हैं। फूलन देवी के परिवार वाले इसलिए न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें भी फूलन देवी का वारिस समझा जाय और उसकी सम्पत्ति में उनका भी हिस्सा हो। उनका सवाल कि क्या कोई व्यक्ति कुछ ही सालों में फूलन का पति बनकर उसकी पूरी सम्पति का वारिस बन सकता है? फूलन की मां और बहनों का उससे बहुत नजदीक कर रिश्ता था, इसलिए उस सम्पति में उनका हक क्यों नहीं?

फूलन देवी की बहन रूक्मणि देवी और मां मूला देवी

यह बात समझ से परे है कि समाजवादी पार्टी ने आज तक फूलन देवी की हत्या के सिलसिले में कोई ईमानदार प्रयास नहीं किया। जब तक फूलन जिन्दा थी, नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव उसे बेटी कहते थे। लेकिन फूलन के जाने के बाद उन्होंने उसके परिवार की सुध नहीं ली। ऐसा लगता है कि फूलन के हत्याकांड के विषय में कोई बात भी नहीं करना चाहता और सभी इसको भुला देना चाहते हैं, अपना मुंह बंद रखना चाहते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे सहारनपुर में शब्बीपुर की घटना के बाद किसी भी पार्टी ने साफ़तौर पर आतताइयों के खिलाफ बोलने से इनकार कर दिया था। इसलिए कि राजपूत नाराज़ हो जायेंगे?

खैर, शेर सिंह राणा ने फूलन देवी हत्याकांड में अभियुक्त होने के बाद से ही अपने आप को राजपूत नेता बनाने का प्रयास करना शुरू कर दिया था। आज बेहमई में जहां फूलन के गैंग के सदस्यों ने 20 लोगों की हत्या की थी, वहां स्मारक पर शेर सिंह राणा की फोटो भी लगी है। दूसरी ओर, फूलन के गांव में उनका स्मारक बनाये जाने का विरोध हो रहा है।

सभी समुदायों के लिए जरूरी है कि वे अपराधियों का महिमामंडन न करें। फूलन देवी ने अपने साथ अत्याचार का प्रतिकार किया और उसकी सजा भी भुगती। शेर सिंह राणा सही है या गलत, इसका निर्णय निचली अदालत कर चुकी है। ऊपरी अदालत का फैसला आने तक वह फूलन हत्याकांड का प्रमुख अपराधी ही है। केवल फूलन देवी की बहन मुन्नी देवी के कहने भर से सही-गलत का फैसला नहीं हो सकता।

अबतक जो बातें शेर सिंह राणा के संदर्भ में सामने आयी हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि वह अब राजपूतों की राजनीति करना चाहता है। वैसे ही, जैसे पूर्व थल सेनाध्यक्ष वी. के. सिंह ने की और अब केंद्र में मंत्री पद पर आसीन हैं। हालांकि शेर सिंह राणा खुद को मानव कल्याण करने वाला कहता है, लेकिन उसकी निगाहें कहां टिकी हैं, यह सबको दिख रहा होगा।

(कॉपी एडीटिंग : अनिल)


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