राजकिशोर के निधन से बौद्धिक जगत में शोक की लहर

कंवल भारती के शब्दों में राजकिशोर जी को मृत्यु ने स्वस्थ होकर लौटने नहीं दिया। उनसे मुलाकात सिर्फ एक बार की थी, पर पत्राचार मोबाइल के आने से पहले तक लगातार रहा। यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन के प्रेरक राजकिशोर ही थे

वरिष्ठ हिंदी पत्रकार और लेखक राजकिशोर का निधन सोमवार 4 जून 2018 को दिल्ली के एम्स में हो गया। बीते 22 अप्रैल को अपने इकलौते पुत्र विवेक राज के असमय निधन से दुखी राजकिशोर को 15 मई को फेफड़ों में संक्रमण के कारण भर्ती किया गया था। वे अपने पीछे पत्नी, बेटी, पुत्रवधू, पोता और पोती छोड़ गये हैं। वहीं उनके निधन से हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है।

वरिष्ठ दलित लेखक व चिंतक कंवल भारती ने अपने शोक संदेश में कहा है – “राजकिशोर जी को मृत्यु ने स्वस्थ होकर लौटने नहीं दिया। उनसे मुलाकात सिर्फ एक बार की थी, पर पत्राचार मोबाइल के आने से पहले तक लगातार रहा। यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन के प्रेरक राजकिशोर ही थे। मंदिर में क्या रखा है, हिन्दू हिंसा हिंसा न भवति और ईश्वर का उपहास जैसे लेख उनके आग्रह पर ही मैंने लिखे थे, जो आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी मृत्यु से हिन्दी जगत की बहुत बड़ी क्षति हुई है, और मेरे लिए तो यह मेरी व्यक्तिगत क्षति भी है। नम आंखों से उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।”

राजकिशोर (2 जनवरी 1947 – 4 जून 2018)

हिंदी पत्रकारिता में राजकिशोर जी अपने विचारों के लिए जाने जाते थे। उन्हें याद करते हुए जनसत्ता के पूर्व संपादक व वर्तमान में राजस्थान पत्रिका से जुड़े ओम थानवी ने लिखा है – “राजकिशोरजी नहीं रहे। हिंदी पत्रकारिता में विचार की जगह आज और छीज गई। कुछ रोज़ पहले ही उन्होंने अपना प्रतिभावान इकलौता बेटा खोया था। पिछले महीने जब मैं उनसे मिलने गया, वे पत्नी विमलाजी को ढाढ़स बँधा रहे थे। लेकिन लगता था ख़ुद भीतर से कम विचलित न रहे होंगे। मेरे आग्रह पर राजस्थान पत्रिका के लिए वे कुछ सहयोग करने लगे थे। एक मेल में लिखा – “दुख को कब तक अपने ऊपर भारी पड़ने दिया जाये।”  फिर जल्द दूसरी मेल: “तबीयत ठीक नहीं रहती। शरीर श्लथ और दिमाग अनुर्वर। फिर भी आप का दिया हुआ काम टाल नहीं सकता। आज हाथ लगा रहा हूँ।”

लेकिन होना कुछ बुरा ही था। फेफड़ों में संक्रमण था। कैलाश अस्पताल होते एम्स ले जाना पड़ा। आइसीयू में देखा तो अचेत थे। कई दिन वैसे ही रहे। तड़के उनकी बहादुर बेटी ने बताया डॉक्टर कह रहे हैं कभी भी कुछ हो सकता है; कुछ घंटे या दो-तीन रोज़ … और दो घंटे बाद वे चले गए। फ़ोन पर मुझसे कुछ कहते नहीं बना। परिवार पर दूसरा वज्रपात हुआ है। ईश्वर उन्हें इसे सहन कराए।  

मेरा परिचय उनसे तबका था जब सत्तर के दशक में बीकानेर में शौक़िया पत्रकारिता शुरू की थी। वे कलकत्ता में ‘रविवार’ में थे। तार भेजकर मुझसे लिखवाते थे। फिर जब मैं राजस्थान पत्रिका समूह के साप्ताहिक ‘इतवारी पत्रिका’ का काम देखने लगा, उन्होंने हमारे लिए नियमित रूप से ‘परत-दर-परत’ स्तम्भ लिखा जो बरसों चला।  राजकिशोरजी ही नहीं गए, उनके साथ हमारा कुछ काफ़ी कुछ चला गया है।”

राजकिशोर को याद करते हुए प्रेम कुमार मणि ने लिखा –  “राजकिशोर जी के दिवंगत होने की दुखद खबर अभी -अभी मिली है। मर्माहत हूँ। आज उनका होना कितना ज़रूरी था , इसका अनुमान करता हूँ। बेटे की मौत ने उन्हे तोड़ दिया। आह ,ज़िन्दगी भी क्या चीज है। क्या कहूँ ,अवाक हूँ। अब तो श्रद्धांजली ही दे सकता हूँ भाई।”

वहीं फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने लिखा है –  “राजकिशोर जी के निधन की सूचना ने स्तब्ध कर दिया है। गत 22 अप्रैल को ही उनके चालीस वर्षीय बेटे का निधन हुआ था। इस दु:ख को उन्होंने जिस जीवट के साथ झेला था, वह आश्चर्यचकित करने वाला था। उनके पुत्र के निधन पर एक शोक सभा रखने का निर्णय हुआ तो उन्होंने हमारे साझे मित्र डॉ सिद्धार्थ से कहा कि ‘शोक सभा’ नहीं ‘स्मृति सभा’ होनी चाहिए। भाषा और उसके पीछे छिपे विचार की ऐसी गहरी समझ आज कितनी दुर्लभ है। मुझे आजीवन अफसोस रहेगा कि मैं बहुत देर से उनके संपर्क में आया। कलम के योद्धा को सादर श्रद्धांजलि!”

पत्रकार व फिल्म निर्देशक अविनाश दास ने राजकिशोर जी को याद करते हुए लिखा है – “राजकिशोर जी हमारे बनते हुए युवा दिनों के आइकॉन थे। वाणी प्रकाशन ने आज के प्रश्न नाम से एक शृंखला छापी थी, जिसके संपादक राजकिशोर जी थे। रविवार के उनके दिनों का किस्सा पटना के हमारे मित्र सुबोध जी सुनाते थे। वे लंबे समय तक नवभारत टाइम्स में थे, लेकिन विनीत जैन के हाथों में टाइम्स ग्रुप की कमान आयी, तो एक बार वह हिंदी एडिटोरियल रूम में गये। किस्सा है कि राजकिशोर जी को देख कर उन्होंने कहा कि यह काला आदमी यहां क्या कर रहा है? और अगले दिन से राजकिशोर जी नवभारत टाइम्स का हिस्सा नहीं रह गये।

दिल्ली में राजकिशोर जी से मित्रता हुई और बहुत अच्छी घनिष्टता रही। साम्यवाद को लेकर उनके विचार बहुत उदार नहीं थे और हमारे बीच जमकर कहासुनी भी होती रही। लेकिन जब भी मिले, बराबरी महसूस कराने वाले उनके बर्ताव ने मुझ पर हमेशा जादुई असर किया। दिल्ली में मैं एक वेबसाइट मॉडरेट किया करता था, मोहल्ला लाइव। थोड़े दिनों तक उसका दफ्तर मातासुंदरी रोड में था। हम एक दिन वाणी प्रकाशन में मिले और वहां से चल कर मोहल्ला लाइव के दफ़्तर तक आये। उस दिन उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे मैंने उनकी भावुकता से भरा हुआ प्रस्ताव माना। उस दिन मैंने उन्हें घर तक छोड़ा था, जहां दिलीप मंडल के साथ एक बार मैं जा चुका था।

बाद में एक दिन उन्होंने फ़ोन किया और बेटी के विवाह को लेकर चिंता प्रकट की। फिर उन्हीं के आग्रह पर मैंने मोहल्ला लाइव में एक विज्ञापन भी प्रकाशित किया था। दिल्ली के प्रेस क्लब में एक दिन उनके बेटे से भी मुलाक़ात हुई लेकिन राजकिशोर जी के ज़िक्र पर वह बहुत उत्साहित नहीं दिखा। थोड़े दिनों पहले उसी बेटे की मृत्यु के बाद वह शायद टूट गये और आज उनके निधन की ख़बर ने मुझे अंदर से हिला कर रख दिया। अभी उनके जाने की उम्र नहीं थी। उनसे लगभग दस साल बड़े मेरे पिता अभी भी स्वस्थ और सानंद हैं।

आप बहुत याद आएंगे राजकिशोर जी।”

वहीं हेमलता माहिश्वर लिखती हैं कि एक और सकारात्मक हस्तक्षेप ने असमय विदा ली। राजकिशोर जी अब ‘आज के प्रश्न’ कैसे उठाए जाएंगे।

(कॉपी एडिटर : नवल)


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