अंधेरों से लड़कर दिनेश मुरार अब उजालों में चले गए

दलित बहुजन सरोकारों से गहराई से जुड़े और आंबेडकर के पदचिन्हों पर चलने वाले प्रतिभाशाली स्कॉलर और युवा पत्रकार दिनेश मुरार का वर्धा में निधन हो गया। पारिवारिक संघर्षों से निकलकर अब वह समाज के अंतर्विरोधों और आत्मसंघर्षों को समझ रहे थे। कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट :

“मुंह मोड़ गए, बन गए पत्थर बहुत-बहुत ज्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम, मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम !! लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया, जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया, स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया, भावना के कर्तव्य त्याग दिए, हृदय के मन्तव्य मार डाले! बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया, तर्कों के हाथ उखाड़ दिए, जम गए, जाम हुए, फंस गए, अपने ही कीचड़ में धँस गए !! विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में आदर्श खा गए! अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया, ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम …”

स्मृति शेष : दिनेश मुरार (जन्म 2 जुलाई 1981, मृत्यु 18 जुलाई 2018)

मुक्तिबोध की मशहूर कविता (अंधेर में) का ये अंश सबसे माकूल है। यहां इसका उल्लेख इसलिए भी किया गया है कि इसका फिल्म रूपांतरण करने वाले दिनेश मुरार अब हमारे बीच नहीं रहे। समाज विज्ञान के इस सजग प्रहरी और दलित शोधार्थी की असमय मौत से सब लोग सन्नाटे और शोक में डूबे हैं। उनको 17 जुलाई शाम को वर्धा के सेवाग्राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ब्लड प्रेशर की दिक़्क़त बढ़ जाने के चलते उन्हें अस्पताल में लाया गया। लेकिन ब्रेन हैमरेज होने से उनको नहीं बचाया जा सका। वह उन संजीदा लोगों में जो हर समय समाज की नब्ज को टटोलते हुए निजी संघर्ष और दलित-पिछड़े समाज के आत्मसंघर्ष को एक साथ लिए होते थे। मुरार को उनके साथी बहुत समझाते थे कि तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी हमें इसी समाज में, इसी अंधेरे में रहना सीखना होगा। वह इस तरह रहना काफी कुछ सीख भी चुके थे लेकिन ऐन उस वक्त जब जब उनको जीवित रहना था तो “वह ज्यादा जी लिए थे-” वह दिग् दिगंत हो गए।

मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का एक दृश्य। दिनेश मुरार ने इस कविता का फिल्म रूपातंरण किया था

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में दिनेश मुरार जनसंचार विभाग से पीएचडी कर चुके थे। वह पोस्ट डॉक्टरेट कर रहे थे। कहते हैं कि वे काफी समय तक फेलोशिप को लेकर परेशान रहे। लेकिन बाद में उन्हें फेलोशिप मिल चुकी थी। ‘अंधेरे में’ कविता की उपस्थिति, जिस पर दिनेश मुरार ने फिल्मांकन किया,  भारतीय मध्य-वर्ग की सामाजिक स्थिति से निकली है जिसे शुरू में ही ‘अँधेरे में’ कहानी में खोज लिया गया था। दूसरा मध्यवर्गीय बौद्धिक या अपराध-बोध है जो ‘जिन्दगी निष्क्रिय बन गई तलघर’ जैसे पद में व्यक्त होता है। यह पद कविता में बरगद के वागल के आत्मालाप में है जो हमें अपना ही अलहदा रूप लगता है। स्पष्ट तौर पर इसके पीछे सकर्मक होने की ज़िद और न हो पाने की व्यथा है। विडंबना बोध ही रचनात्मक ऊर्जा में तब्दील होता है। मध्य-वर्ग है कि वह सत्ता-तंत्र (‘विषपायी वर्ग’) से ‘नाभि-नाल बद्ध’ है। इसीलिए दिन में वह सत्ता-तंत्र के षड्यंत्र में लिप्त रहता है। इस दुरभिसंधि में मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी भी शामिल हैं जिनकी प्रेत-यात्रा को रात में कविता देख लेती है। सत्ता-तंत्र उसे छोड़ेगा नहीं और चक्र-व्यूह में फँसाकर उसकी आस्था को मार डालने की जुगत करेगा। इस कविता में एक कलाकार और विचार के मारे जाने का बिंब है। कविता की यह मूल पृष्ठभूमि है जिसके अनन्तर जन और जन-कवि निरंतर अपनी भूमिकाओं में हैं।

वर्धा स्थित महात्मा गांधी मेडिकल संस्थान जहां दिनेश मुरार ने अंतिम सांस ली

वर्धा में उनके सहयोगी अपने प्रिय साथी की पार्थिव देह को लेकर करीब 40 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के ही हिंगणघाट से लगते गांव में गए जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया। शाम को विश्वविद्यालय में मौजूद उनके अन्य निकट साथियों, शोधरत छात्रों, जनसंचार विभाग और विश्वविद्यालय की ओर से शोक संवेदना कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें विश्वविद्यालय की ओर से उनको दिए संवेदना संदेश में कहा गया कि ‘हमने एक बेहतर इंसान और प्रतिभावान स्कॉलर को खो दिया है। मुरार अभी आईसीएसएसआर की फ़ेलोशिप के तहत ये पीडीएफ भी कर रहे थे। विश्वविद्यालय उनके शोकसंतप्त परिवार को अपनी हार्दिक संवेदनाएं भेजता है।’ हिंदी विश्‍वविद्यालय सहित विदर्भ के अध्‍ययन–अध्‍यापन से जुडे लोग मुरार के जाने से गहरे दुख में हैं। विश्‍वविद्यालय के जनसंचार विभाग विभाग की शोकसभा में शोधरत छात्रों ने माना कि पत्रकारिता में निष्‍ठावान और निष्‍पक्ष पत्रकारिता को स्‍थापित करने वाले गहन व्‍यक्ति का जाना विभाग के लिए बड़ी क्षति है। शोक की इस घड़ी में जनसंचार विभाग व विश्‍वविद्यालय द्वारा उनके परिजनों को इस दुख को सहन करने की प्रार्थना की। वहीं जनसंचार विभाग व प्रशासनिक भवन में अनेक शिक्षक कर्मचारियों शोधार्थियों–विद्यार्थियों ने दिनेश मुरार को श्रद्धांजलि अर्पित की।

मुरार को निजी रूप से जानने वाले और उनके समान विचारधर्मी रहे संजीव चंदन की त्वरित प्रतिक्रिया थी, “ऐसे कोई जाता है क्या भला! आज धीरज कांबले के फोन से नींद खुली। तुम्हारे (दिनेश मुरार) न होने की खबर के साथ। तुम अभी भी वहां सेवाग्राम अस्पताल में हो- डाक्टर तुम्हारे निर्वाण का कारण खोज रहे हैं, लेकिन तुम तो इन कारणों से अब परे जा चुके हो मेरे भाई। तुम खुद जानते हो कि कितना कठिन होता है एक गरीब माँ-बाप, दलित परिवार के सपनों का टूट जाना, जब उसका होनहार बेटा, पोस्ट डॉक्टरेट करता बेटा दुनिया छोड़ जाए। कितना आत्मीय लगाव का तार था हम सबके बीच- याद आता है वह वक्त जब हम विश्वविद्यालय से संघर्ष करते हुए लगभग सड़क पर थे, तुम आंदोलनों में सक्रिय न होते हुए भी हमारे साथ होते थे। मैंने कहा था लडाइयां और मुद्दे अलग जगह, संघर्षशील परिवार के साथियों को सामयिक फैसले करने चाहिए।

मीडिया को दिखाया आईना :  प्रिंट मीडिया में एक तबके के वर्चस्ववाद को अपने शोध में दिनेश मुरार ने बखूबी पकड़ा था

मुरार आंबेडकर स्टूडेंट फैडरेशन के संस्थापक सदस्यों में थे। संगठन ने कहा, “हम सब पीड़ा में हैं। बहुत मेधावी एवं परिश्रमी छात्र हमारे बीच से जाता रहा। वह सम-सामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते रहे। उन्होंने संगठन के लिए हमेशा अपना सक्रिय योगदान दिया है। उनके परिवार के लिए, हमारे लिए और पूरे समाज के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। इस दुःख की घड़ी में हम सब शोक संतप्त परिवार के साथ हैं।” मुरार वर्धा परिसर में इतने लोकप्रिय थे उनके कई साथी भावुक और दुखी है। संदीप वर्मा ने कहा महाराष्‍ट्र व विदर्भ में रहते हुए पत्रकारिता क्षेत्र में अध्‍ययन और शोध के लिए समर्पित हमारे वरिष्‍ठ शोधार्थी डॉक्टर दिनेश मुरार का जाना एक सुनहरे भविष्‍य का अकस्‍मात गुम हो जाने जैसी घटना है। पत्रकारिता में सामाजिक सरोकारों की गहन खोज और उसकी व्‍यावहारिक दृष्टि उनके उत्‍कृष्‍ट कार्य की पर्याय रही।

मुरार का शोध और सफर

37 वर्षीय दिनेश मुरार का पूरा नाम दिनेश कुशाबराव मुरार था। हिंगणघाट तहसील के काचन गांव में 2 जुलाई 1981 में गरीब दलित परिवार में पैदा हुए मुरार के परिवार में माता-पिता, एक बहन और भाई हैं। मुरार ने आरंभिक शिक्षा के बाद महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय से पत्रकारिता विषय में उच्‍च शिक्षा की। पत्रकारिता शिक्षा और शोध के लिए स‍मर्पित दिनेश ने 2008 में एमए,  2009 में एमफिल और 2014 में पीएचडी कर उच्‍च शिक्षा का सफर जारी रखा। वर्तमान में वे वर्धा स्थित हिंदी विश्‍वविद्यालय से पोस्‍ट डॉक्‍टरेट के वरिष्‍ठ शोधार्थी के रूप में अपना शोधकार्य कर रहे थे।

उनका शोध मीडिया जगत में खासकर महाराष्‍ट्र के विदर्भ क्षेत्र को लेकर एक अभूतपूर्व शोधकार्य रहा। उन्‍होंने अपनी पीएचडी के शोध कार्य के रूप में ‘पत्रकारों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि का अध्‍ययन’ को चुना। विदर्भ क्षेत्र केंद्रित इस शोध के परिणामों ने पत्रकारिता जगत के अनेक गंभीर प्रश्‍नों को सार्वजनिक किया। इस शोध में उन्‍होंने पत्रकारों के सामाजिक वर्चस्‍व की धारा और उनके पत्रकारिता के विवेचन ने विदर्भ में पत्रकारों की परिपाटी को वर्गीकृत कर उजागर किया। इस शोध में उन्‍होंने संपादकीय, ब्‍यूरो व पत्रकारों के प्रभुत्‍वशील प्रचलन को सामने लाने का प्रमुख काम किया और बताया किस किस प्रकार पत्रकारिता में पत्रकारों की पृष्‍ठभूमि पत्रों की विषयवस्‍तु पर संभव होती है। शोध में उन्‍होंने पाया कि विदर्भ ही नहीं बल्कि पूरे देश के स्‍तर पर स्‍थापित पत्र–पत्रिकाओं पर सामाजिक स्‍पर पर एक खास वर्ग और धार्मिक आधार पर बोलबाला रहा है। इस कारण अनेक स्‍तर पर मीडिया का सामाजिक संदर्भ पर खरा उतरना संभव नहीं हो पाता। वर्चस्‍व की पत्रकारिता लैंगिक आधार पर भी देखी जा सकती है। पीएचडी में उनके शोध कार्य के मार्गदर्शक प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे बताते हैं कि अनेक संदर्भ उनके गंभीर शोध को दर्शाते हैं। दिनेश का पोस्‍ट डॉक्‍टरेट अधूरा रह जाना अनेक शोध के पक्षों को सामने लाने वाला था। एसे में उनकी असामयिक मृत्‍यु समूचे मीडिया जगत के लिए बड़ी क्षति है। दिनेश ने पोस्‍ट डॉक्‍टरेट के लिए जाति केंद्रित मराठी फिल्‍मों का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन विषय चुना था। आईसीएसएसआर द्वारा आवर्ड प्राप्‍त यह शोध कार्य कई दृष्टि से महत्‍वपूर्ण था।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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