अल्पसंख्यक काॅलेजों में ओबीसी आरक्षण के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट पहुंची फडणवीस सरकार

देश के अल्पसंख्यक कॉलेजों में पिछड़ों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है। करीब 17 साल पहले महाराष्ट्र सरकार ने अपने राज्य के ऐसे कॉलेजों व शिक्षण संस्थाओं में पचास प्रतिशत सीटें पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित करने का नियम बनाया था। लेकिन बाम्बे हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया है। इसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट

देश के अल्पसंख्यक धर्म विशेष कॉलेज व शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है। इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार ने एक पहल बाम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। छह महीने पहले बाम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में महाराष्ट्र सरकार के 17 साल पुराने उस फैसले को निरस्त कर दिया था जिसमें उसने अल्पसंख्यक धर्म विशेष शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को पचास प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी। जस्टिस अमजद सैयद और जस्टिस एम एस कार्णिक की खंड पीठ ने सरकार के इस फैसले को पलट दिया और कहा कि अल्पसंख्यक धर्म विशेष शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की उपयोगिता नहीं है। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई सोमवार को होगी।

संत जेवियर कॉलेज, मुंबई का परिसर

बताते चलें कि 30 मई 2001 को तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने अल्पसंख्यक कालेजों में नामांकन में पिछड़ा वर्ग को पचास प्रतिशत आरक्षण देने का नियम बनाया था। इसके तहत कला, विज्ञान, वाणिज्य और अन्य प्रोफेशनल कोर्सों में आरक्षण दिया जाना था। लेकिन सरकार के इस निर्णय को मुंबई के संत जेवियर कॉलेज के ततकालीन प्रिंसिपल फादर जे. एम. डायस और महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ माइनरिटी एडुकेशनल इंस्टीच्यूशंस ने मुंबई हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में तब कहा गया कि सरकार का यह फैसला असंवैधानिक है। हाई कोर्ट ने इस मामले में सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी और यह मामला 17 साल तक विचाराधीन रहा।

करीब छह माह पहले हाई कोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार के फैसले को रद्द कर दिया।

महाराष्ट्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। महाराष्ट्र सरकार के वकील निशांत कत्नेश्वरकर ने इस बारे में बताया कि याचिका में कहा गया है कि अल्पसंख्यक विशेष शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण नहीं दिया जाना अल्पसंख्यकों द्वारा पिछड़ों के साथ अन्याय है। इसे रद्द किया जाना चाहिए। वहीं उन्होंने स्वीकार किया कि याचिका दायर करने में देर हुई है लेकिन विषय की गंभीरता को देखते हुए उन्हें सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है कि वह महाराष्ट्र सरकार की याचिका को स्वीकार करेगी।

कानूनी प्रावधान यह है कि अदालती फैसले को 90 दिनों के भीतर चुनौती दी जा सकती है।

देवेंद्र फड़णवीस, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र सरकार के वकील ने बताया कि याचिका में दो परिदृश्य सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाये गये हैं। पहला तो यह कि अमीर घर के छात्र केवल धर्म और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक होने के कारण ऐसे शिक्षण संस्थानों में दाखिला ले सकता है लेकिन वंचित तबके का गरीब छात्र का दाखिला नहीं हो सकता है, क्योंकि वह अल्पसंख्यक धर्म विशेष का नहीं है। याचिका में दूसरी बात यह कही गयी है कि ऐसे शिक्षण संस्थानों में अल्पसंख्यक धर्म विशेष के छात्रों की संख्या पर्याप्त नहीं होती है। राज्य सरकार की मंशा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। राज्य सरकार ने लोक कल्याण को प्राथमिकता देते हुए यह निर्णय लिया था कि पचास प्रतिशत सीटों पर पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया जाय।

जबकि बाम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 2006 में किये गये संविधान संशोधन के अनुसार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं(अनुदानित और गैर अनुदानित) में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की नीति से अलग रखा जाएगा। वर्ष 2002 में कोर्ट ने सरकार के फैसले पर रोक लगाते हुए अपने अंतरिम आदेश में कहा था कि ऐसे शिक्षण संस्थानों में केवल मेरिट के आधार पर ही गैर अल्पसंख्यक कोटा के तहत दाखिला मिल सकेगा।

बहरहाल, उल्लेखनीय है कि संविधान की धारा 30(1) में धर्म और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थायें स्थापित करने और संचालित करने का अधिकार निहित है।

(कॉपी एडिटर : सिद्धार्थ)


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