विश्वविद्यालयों में आरक्षण : न छीनने की घोषणा और न देने की मंशा

हाल में विश्वविद्यालयों में आरक्षण कानूनों की अनदेखी की कई असंवैधानिक गतिविधियां हुईं। संसद के मौजूदा सत्र में केंद्र ने साफ किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में वह एससी-एसटी, ओबीसी को नियुक्तियां देने के अपने संकल्प पर चलते नियुक्ति की प्रक्रिया को रोक रही है, साथ ही बताया कि आने वाले समय में उसके इरादे पर अडिग हैं कि आरक्षण को छीनने नहीं देंगे। हाल के पूरे घटनाक्रम के साथ कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट :

विश्वविद्यालयों में एससी-एसटी ओबीसी को नियुक्तियों में आरक्षण मसले में विसंगतियों का हाल ये हो चुका है कि यूजीसी जो करती है उस पर अमल नहीं होता और सरकार को अचानक दखल देकर ऐसा कहना पड़ता जैसे यूजीसी को सरकार नहीं, विपक्ष के लोग चला रहे थे। लेकिन ऐसा इसलिए हुआ कि अब मिशन 2019 को लेकर केंद्र सरकार ने आरक्षण का कार्ड शोर के साथ खेल दिया है ताकि उसका ढोल सुन पड़े। केंद्र सरकार तो जैसे मानसून सत्र के इंतजार में ही बैठी थी कि अचानक तेजी से (एससी-एसटी, ओबीसी और दबे कुचले समुदाय की सामाजिक सुरक्षा से लेकर) उच्च शिक्षा में आरक्षण से नियुक्तियों को लेकर उसने ऐसा कदम उठाया जो वो सत्र शुरू होने से पहले कर सकती थी।

हिलती नींव : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

दरअसल केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के मौजूदा मानसून सत्र में दो अहम बातें की हैं। एक, सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की किसी भी धारा की ना तो अवहेलना बर्दाश्त करेगी और ना ही पूरे अधिनियम को कहीं से कमजोर पड़ने देगी। दूसरा, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में नियुक्तियों में कोई भी व्यक्ति या संस्था अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों का आरक्षण नहीं छीन सकते।

बाबा साहेब द्वारा लिखित ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ का हिंदी अनुवाद ‘जाति का विनाश’ बिक्री के लिए अमेजन पर उपलब्ध

पहला मामला तो सीधा है। संसद के पिछले सत्र से लेकर अप्रैल तक हल्ला रहा कि एससी-एसटी कानून को तो सरकार की ओर से कमजोर करने की कोशिश हो रही है। इसे लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश में सफाई देनी पड़ी थी जब देशभर  से लोग और संगठन भारत बंद में स्वत: स्फूर्त ही सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन दूसरा मुद्दा, विश्वविद्यालों में आरक्षण के तहत नियुक्तियां ना होना सबसे ताजा है जिसमें सरकार भी बेनकाब हो गई जब कोर्ट के आदेश की आड़ ली गई या फिर यूजीसी के पत्र को धत्ता बता दिया गया। इस पर देश के पूरे बौद्धिक और अकादमिक वर्ग की नजर लगी हुई था- और इसे लेकर ऐसी विसंगतियां सामने आ चुकी थी कि जहां पता चलता है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले आदेश को विश्वविद्यालयों ने अमन में लाया ही नहीं था?

सड़कों पर लड़ाई: दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षकों का ‘सेव एससी, एसटी, ओबीसी रिजर्वेशन’ आंदोलन। इसके बाद पहले यूजीसी फिर सरकार सोचने पर मजबूर हुई

अब क्या है पूरी खबर

जाहिर है गृहमंत्री के बयान के बाद यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय के लिए विकट स्थिति खड़ी हो गई। प्रकाश जावड़ेकर ने राजनाथ सिंह के बयान के कुछ ही घंटों बाद बाद राज्यसभा में कहा कि सरकार ने विश्वविद्यालयों एवं कालेजों में शिक्षण पदों पर भर्ती पर रोक लगा दी है क्योंकि अनुसूचित जाति-जनजाति एवं ओबीसी आरक्षण में कटौती करने के अदालत के फैसले के खिलाफ उसकी विशेष अनुमति याचिका पर निर्णय लंबित है। उन्होंने कहा कि सरकार एससी-एसटी और ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण को लेकर प्रतिबद्ध है। सरकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पिछले अप्रैल में दिए गए उस निर्णय से सहमत नहीं है जिसमें उसने संकाय पदों को भरने के लिए संस्थागत आरक्षण संबंधी एक परिपत्र को खारिज कर दिया था। इस बीच ये भी खबर है कि सरकार ने 2021 से शिक्षकों की भर्ती और प्रमोशन के लिए पीएचडी न्यूनतम योग्यता रख रही है। केंद्र सरकार ने नए नियमों के तहत एकेडमिक जर्नल्स में शोधपत्रों के प्रकाशन को प्रमोशन के मापदंडों से बाहर निकाल दिया है।

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बहरहाल, समाजवादी पार्टी के सांसद ने धर्मेंद्र यादव ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय की पांच मार्च की एक अधिसूचना का हवाला दिया और आरोप लगाया कि सरकार विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आरक्षण खत्म करना चाहती है। यादव ने कुछ विश्वविद्यालयों में निकली रिक्तियों का भी उल्लेख किया था और कहा कि सरकार को अध्यादेश जारी कर उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण को बहाल करना चाहिए। गृहमंत्री ने साफ किया है कोई भी व्यक्ति या संस्था आरक्षण नहीं छीन सकती। एसपी सांसद ने सरकार पर शिक्षण संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति एव पिछड़े वर्गो के आरक्षण के प्रावधान को ठीक ढंग से लागू नहीं की बात उठाई और नारेबाजी की।

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बताते चलें कि एसपी सांसद धर्मेंद्र यादव ने यह मामला गोरखपुर से आए एक प्रतिनिधिमंडल से मिलने के बाद उठाया जो मई में गोरखपुर में दीनदयाल विश्वविद्यालय में एससी-एसटी और ओबीसी की नियुक्तियों में अनदेखी के बाद मिले थे।

ना ऊपर नाम ना नीचे पता : प्रेस नोट की प्रति

उधर, उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी गृहमंत्री को बयान देना पड़ा जहां लेफ्ट के सांसदों ने संविधान में एससी एसटी के लिए मौजूद संरक्षण के संवैधानिक अधिकारों को छीनने को लेकर हंगामा किया। उच्च सदन में प्रश्नकाल के दौरान पूछे गए पूरक सवाल के जवाब में राजनाथ ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों को संविधान में प्रदत्त संरक्षण को कोई व्यक्ति अथवा संस्था नहीं छीन सकती है। जावड़ेकर ने कहा कि सरकार ने विश्वविद्यालयों एवं कालेजों में शिक्षण पदों पर भर्ती पर रोक लगा दी है क्योंकि उसकी विशेष अनुमति याचिका पर निर्णय लम्बित है। जावड़ेकर ने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि एससी-एसटी के आरक्षण को बचाने में कामयाब होंगे।’ उन्होंने कहा, ‘आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है। हम आरक्षण के पक्ष में हैं और इसे एससी एसटी और ओबीसी को प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मंत्री ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और केन्द्र सरकार ने इस आदेश के खिलाफ अलग अलग विशेष अनुमति याचिका दायर की हैं और मामले की अगली सुनवाई की तारीख 13 अगस्त है। जावड़ेकर ने कहा कि उनके मंत्रालय ने विशेष अनुमति याचिका पर निर्णय लंबित रहने तक विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में रिक्तियों को भरे जाने पर रोक लगा दी है। जावड़ेकर ने कहा कि आरक्षण को कोई आंच नहीं आने दी जाएगी।  इसके साथ ही हाल के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय और दूसरी जगहों पर चल रही नियुक्ति की प्रक्रिया रोक दी गई है।

बीते मई में आरक्षण नियमों की अनेदेखी के आरोप में गोरखपुर में दलित बहुजन शिक्षक और प्रबुद्ध वर्ग के लोग सड़कों पर उतरे

कोर्ट ने क्या कहा था?

दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल अप्रैल में यूजीसी द्वारा शैक्षणिक पदों पर भर्ती के लिए संस्थान के आधार पर आरक्षण का निर्धारण करने के सर्कलुर को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को यथावत रखा और यूजीसी को विभाग के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षित पदों के लिए सर्कुलर जारी करने को कहा था। इसके बाद यूजीसी ने आमतौर पर शिक्षा का मुद्दा तब अहम सुर्खियों में नहीं आता जब कि देश में भीड़ हिंसा जैसी भयानक बहस चल रही हो और आम चुनावों के लिए पार्टियों के मंच सज रहे हों। लेकिन सरकार वाकई गंभीर है तो उसे चुनावों से पहले एक इक्का तो चलना ही होगा जो स्थाई नीति का हिस्सा हो। हम ऐसे समय में हैं जब चलन (नीति) देर से लेकिन चाल (छल) लोगों को पहले समझ आती है। सरकार अगर कह रही है कि इस ’थोड़े’ को ज्यादा समझना चाहिए तो यह उसकी भूल होगी क्योंकि दलित पिछड़े समुदाय के साथ हर समय धोखा हुआ है, वो हर बात पर यकीन करने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर होते हैं। और इस समय तो यकीन करना और भी मुश्किल है जब 2019 के लिए केंद्र और बीजेपी की सरकारें यूपी में एसपी-बीएसपी समेत अन्य के महागठबंधन और बिहार में ऐसी ही एकता पर सेंधमारी के फिराक में है। विश्वविद्यालयों में हाल के आरक्षण के नियमों की अनदेखी ने उसे बताया है कि दूध का जला कैसे सबक लेता है।  

(कॉपी एडिटर : नवल)


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