तुगलकी फरमान के खिलाफ दलित छात्रा की नागपुर हाईकोर्ट से गुहार

महात्मा गांधी हिंदी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में यौन उत्पीड़न की शिकार दलित पिछड़ी जाति की उच्च शिक्षारत छात्रा ने विश्वविद्यालय प्रशासन से हारकर नागपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। लेकिन हार की उसकी बाजी जब भी पलटे, विश्वविद्यालय प्रशासन और उच्चशिक्षा की एक बड़ी दीवार पर हार की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी है। कमल चंद्रवंशी दे रहे हैं पूरा ब्यौरा :

हाल के दिनों तक किसी भीषण सड़क हादसे के बाद घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले मददगार शख्स को पुलिस केस में इतना फंसा देती थी कि लोगों ने सड़क चलते किसी की मदद से तौबा करनी शुरू कर दी थी। तब न्यायपालिका ने व्यवस्था दी कि मदद करने वाले से पुलिस अनावश्यक पूछताछ या परेशान नहीं करेगी। लेकिन वर्धा में मदद करने वाले कैसे फंसाए जाते हैं यह देखना हो तो उन उच्चशिक्षा में शोध कर रही चार दलित छात्राओँ से पूछा जा सकता है जो यौन उत्पीड़न केस में अपनी एक मित्र की मदद के लिए आगे आईं लेकिन नतीजा कि विश्वविद्यालय ने उनकी विश्वविद्यालय से छुट्टी कर दी। कहना न होगा महाराष्ट्र का वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय दिन-ब-दिन ऐसे कारनामों को अंजाम दे रहा है जिससे उसकी नींव खोखली होती जा रही है।

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा का मुख्य द्वार

असल में विश्वविद्यालय प्रशासन ने मारपीट की एक कथित घटना, उससे जुड़ी एक प्राथमिकी (धारा 143, 147, 312 और 323) के आधार पर 5 महिला शोधरत विद्यार्थियों (चार पीएचडी, एक बीएड-एमएड) को विश्वविद्यालय से निष्कासित किया। इनमें चार छात्राएं दलित समुदाय से जुड़ी हैं। छात्र हितों के लिए अक्सर धरना-प्रदर्शन में शामिल होने वाले राजेश के बताए एक विवरण के मुताबिक इसके लिए विश्वविद्यालय ने अपने स्तर से कोई जांच कमेटी बनाने कि जरूरत भी नहीं समझी। छात्राओं के अनुसार, “बिना किसी कमेटी के न ही प्रॉक्टर, न वेलफेयर डीन और न ही संबंधित विभाग से कोई पूछताछ की गई। घटना वाले दिन दो छात्राओं में से कोई भी परिसर से बाहर ही नहीं गया था जिसका पुख्ता सबूत विश्वविद्यालय के सीसीटीवी फुटेज और हॉस्टल का आवाजाही वाला रजिस्टर है।”

वर्धा विश्वविद्यालय ने 6 जुलाई को पीड़ित छात्रा और उसकी मदद करने वाली छात्राओँ को निलंबित किया

छात्राएं विश्वविद्यालय प्रशासन से बार-बार पूछती रहीं कि उन्हें उनका कुसूर बता दें। लेकिन छात्राओँ को प्रभारी रजिस्ट्रार ने दस दिन तक घुमाया और बाद में कहा कि कुलपति महोदय ने कोई भी जानकारी देने से मना किया है। जब छात्राओं ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही तो उनसे कहा गया, “ये मामला विश्वविद्यालय के बाहर का है। जब छात्राओं के अभिभावकों ने कुलपति एवं कुलसचिव से बात करनी चाही कि बिना किसी कमेटी गठन के निष्कासन कैसे किया, तो कुलपति ने कोई बात सुनने से इनकार कर दिया और पीड़ित छात्राओं को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया। दिलचस्प है कि न तो घटनास्थल विश्वविद्यालय की परिधि में आता है और न ही शिकायतकर्ता का संबंध इस विश्वविद्यालय से है।

मंगलवार 17 जुलाई 2018 को इस संवाददाता ने पीड़िता से उनकी आपबीती जानी और ताजा घटनाक्रम का सिलसिला पूछा। छात्रा का कहना है, “एक शख्स विवाह करने का झांसा देकर दस साल तक संबंध बनाए और अंत में मुकर जाए तो इसका कहीं तो न्याय होगा। मैंने आरोपी चेतन को विश्वविद्यालय से निकालने की बात नहीं कही थी। पढ़ने का अधिकार तो उसे हासिल ही है। लेकिन मैंने न्याय की गुहार लगाई है तो गलत तो नहीं किया। मेरे साथ क्या न्याय होना चाहिए यह विश्वविद्यालय देखे या फिर अदालत…। मुझे न्याय मिलना चाहिए। मेरा मेडिकल हुआ है, 376 में बयान हुए हैं…। पुलिस आरोपी को बचा रही है क्योंकि मुझे अंदेशा है कि जिस गुड़गांव की महिला के साथ आरोपी ने शादी की है वह अपने पारिवार से सियासी तौर पर रसूखदार है।”

रामनगर पुलिस स्टेशन पर आरोपी को बचाने का आरोप है। (फोटो: महाराष्ट्र पुलिस)

जानकारी के मुताबिक, मामले का मुख्य आरोपी चेतन सिंह दिल्ली निवासी है और हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा का छात्र है। पीड़ित छात्रा (जिसके नाम का हम खुलासा नहीं ठीक नहीं समझते) बीएड-एमएड एकीकृत की छात्रा हैं। चेतन सिंह हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग का पीएचडी शोधार्थी है। दिसंबर 2017 में पीड़िता ने चेतन पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय रामनगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में मामला दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजया लक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता के गवाह थीं। हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में विश्वविद्यालय के महिला सेल के सिफारिश पर निष्कासित कर दिया। कुछ ही दिन पहले आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिल गई थी जब कोर्ट ने कहा कि जमानत के बाद पीड़िता व गवाहों को किसी प्रकार से परेशान नहीं किया जाएगा। आरोप है कि चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराये पर रहने लगा और पीड़िता के साथ-साथ गवाहों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास करने लगा।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, इसी साल 3 मई को पीड़ित छात्रा के साथ हाथापाई हुई। पीड़िता के मुताबिक उसे साजिशन इस घटना में फंसाया गया था जिसका पूरा ब्यौरा पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन को दिया गया। लेकिन हैरानी की बात ये कि चेतन सिंह ने उसी दिन अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर पीड़िता के खिलाफ क्रास दर्ज करा दी थी। इसमें धारा 504, 506 के तहत आरोप लगाए गए। पीड़िता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने जाकर चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। 8 मई 2018  को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें केस की पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों के नाम शामिल कर आरोप लगाए गए कि 4 गवाह और पीड़िता ने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की जिससे उसका गर्भपात हो गया। इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 7 जून 2018 को एफआईआर दर्ज की गई। एनसीआर में पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था लेकिन बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम जोड़ दिए गए।

कुहासा कब छंटेगा : वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्याल (फोटो : आर. सारथी)

सवालों के घेरे में पुलिस : पीड़िता के मुताबिक, “पुलिस स्टेशन में अफसरों की पहले दिन से कोशिश है कि वह जिस हद तक डरा सकती है, उसने डराया। उसके कारण ही इस केस में इतने पेंच आए। तहरीर पर काम करने वाले अधिकारी सचिन पर पीड़िता ने आरोप लगाया, “वह मेरी सहयोगियों के अविभावकों और मुझे लगातार धमकी देता रहा कि पांचों लड़कियों की पीएचडी खत्म करवा दूंगा और सब को जेल में भिजवाउंगा।” पीड़िता ने कहा कि पुलिस के इस रवैये को देखते हुए मैंने पूरी शिकायत नागपुर आईजी से की।” आईजी ने मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए वर्धा एसपी से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज कराए गए। इसी दिन यानी 6 जुलाई को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया। यानी आईजी की जांच प्रक्रिया पूरी हुए बगैर इन पाँच छात्राओं को विश्वविद्यालय ने निष्कासित किया, जो असंवैधानिक है। जानकारों के मुताबिक यह मुंबई न्यायालय के आदेश का खुला उल्लंघन है जिसमें साफ- साफ लिखा है कि किसी भी एफआईआर दर्ज होने के कारण विद्यार्थियों को शिक्षा के संवैधानिक अधिकार के हनन का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है।

सोमवार 16 जुलाई को पीड़ित लड़की ने हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से गुहार लगाई। जाहिर है अब न्याय के मंदिर को देख रहे वर्धा विश्वविद्यालय प्रशासन को शिक्षा के अपने मंदिर में झांकना होगा और कुछ सवाल अपने से जरूर पूछने चाहिए जैसे (1) विश्वविद्यालय परिसर से बाहर हुई घटना पर कार्रवाई करना कितना सही था जब कि आरोपी और पीड़िता न्यायालय की शरण में है? (2) पूर्व में ऐसी कितनी घटनाओं पर इस विश्वविद्यालय ने कार्रवाई की- उसका विवरण भी देना चाहिए। (3) क्या उसे नहीं लगता है कि मामला की गंभीरता को देखते हुए कार्यकारी कुलसचिव के पत्र पर जानकारी देना महज ‘बाबूगिरी’ वाली खानापूरी थी? क्या ये आदेश कुलपति को नहीं जारी करना चाहिए था? (4) सवाल ये भी है कि विश्वविद्यालय के लिए बने कानूनों में कहां पर लिखा है कि वह इस तरह के सामूहिक निलंबन के फैसले ले सकता है? (5) आरोपियों की श्रेणी में डाल दी गईं छात्राओं ने अपनी बेगुनाही के सबूत के तौर पर जब सीसीटीवी फुटेज और हॉस्टल गेट का आवक-जावक रजिस्टर मांगा तो उनको क्यों नहीं दिया गया? (6) सवाल ये भी कि क्या कल के दिन कोई बाहरी व्यक्ति (यहां आरोपी चेतन की पत्नी के संदर्भ में) विश्वविद्यालय से जुड़े किसी शख्स (शिक्षक,  विद्यार्थी, प्रशासनिक कर्मी) की शिकायत करता है तो क्या यही कार्रवाई संभव हो सकेगी। जाहिर है किसी भी हाल में नहीं। ऐसा ही मामला प्रदीप त्रिपाठी का भी था तब विश्वविद्यालय ने भला क्या कार्रवाई की थी? और अंतिम, (7) विश्वविद्यालय प्रशासन यौन उत्पीड़न के आरोपी छात्र के पक्ष में मिलकर पांचों छात्राओं के जैसा बर्ताव कर रहे हैं- क्या पुलिस अधिकारी और रजिस्ट्रार दोनों ही डरा या ब्लैकमेल तो नहीं कर रहे? इन सब सवालों का जबाव देने के लिए विश्वविद्यालय को तैयार रहना होगा।

इस बीच विश्वविद्यालय का पक्ष जानने के लिए हमने विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क किया। छात्राओँ के निलंबन का आदेश जारी करने वाले कार्यकारी कुलसचिव केके सिंह ने कहा कि हां यह बात तो सही है कि जब भी इस तरह के मामले होते हैं तो विश्वविद्यालय की साख पर आंच आती है। लेकिन हम नियमों से बंधे हैं। क्या निलंबन में जरूरी था कि आप छात्राओँ को कैंपस छोड़ने के लिए भी बाध्य करें? इस सवाल पर केके सिंह ने माना कि लड़कियों की सुरक्षा के लिए हम भी चिंतित हैं। लेकिन हमें अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए छात्राओँ ने विवश किया है। छात्राओँ को चाहिए कि कैंपस से बाहर वो ऐसी कोई गतिविधियां ना करें जिनमें विश्वविद्यालय को आना पड़े। कुलसचिव कहते हैं, विश्वविद्यालय के पास नागपुर हाईकोर्ट में मामला जाने की कोई जानकारी नहीं है।

साफ है कि विश्वविद्यालय अपने नियम कायदों को तो भूल ही चुका है, उसके तंत्र में मानवता के लिए ईमान-धर्म भी नहीं बचा है। लगता है हाल में भगत महतो प्रकरण में अपनी करतूत के लिए शर्मिंदा हो चुके विश्वविद्यालय प्रशासन ने उस मामले से भी कोई सीख नहीं ली है।

(कॉपी एडिटर : नवल)


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