आय के आधार पर ओबीसी का उपवर्गीकरण खारिज

आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करने वालों की दलील को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बार फिर खारिज कर दिया है। इंदिरा साहनी मामले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि सामाजिक उत्थान के लिए आर्थिक मानदंड एक संकेतांक हो सकता है पर यह एकमात्र मानदंड नहीं हो सकता। फारवर्ड प्रेस की खबर :

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट  ने अधिसूचना निरस्त की

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मंगलवार को हरियाणा सरकार की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया जिसमें पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत आय के आधार पर एक उप-श्रेणी बनाकर कोटे के सीट के आवंटन का प्रावधान किया गया था। यह आदेश 17 अगस्त 2016 को पिछड़ा वर्ग (आरक्षण और सेवा एवं शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश) अधिनियम, 2016 के तहत जारी किया गया था। इसमें प्रावधान किया गया था कि तीन लाख रुपए तक की सालाना सकल आय वाले व्यक्ति के बच्चों को पहले नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण मिलेगा। इसमें कहा गया कि इसका शेष कोटा पिछड़े वर्ग के लोगों को मिलेगा जिनकी वार्षिक आय तीन लाख रुपए से अधिक लेकिन छह लाख रुपए से ऊपर नहीं है।

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न्यायमूर्ति महेश ग्रोवर और न्यायमूर्ति महाबीर सिंह सिन्धु ने कहा कि यह अधिसूचना इस श्रेणी के लोगों को लाभ पहुंचाने के बजाय पिछड़े वर्ग के एक श्रेणी को इस अधिकार से वंचित कर दिया है जबकि इसके बारे में उसने कोई ऐसा आंकड़ा भी पेश नहीं किया है जो इस कदम का औचित्य साबित कर सके। कोर्ट ने कहा, “… किसी साबित करने योग्य आंकड़ों के आधार पर किसी जाति या वर्ग को जो पिछड़ी वृत्ति का है, के बारे में राज्य को इस तरह की जाति की पहचान कर उसे इन आंकड़ों के आधार पर सामाजिक और आर्थिक रूप से ज्यादा पिछड़ा साबित करने का पूरा अधिकार था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसके बदले जो हुआ है वह यह कि तीन लाख से ऊपर की आय वाले लोगों को ,भले ही उनकी जाति कुछ भी हो और वे  किसी भी वृत्ति में हों, इस परिधि से बाहर कर दिया।’

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा, “…अगर राज्य की मंशा पर शक न भी हो…तो भी इस तरह के निर्देश और इसके द्वारा जिस तरह के लक्ष्य को प्राप्त करने का उद्देश्य था वह पूरा नहीं हुआ और उलटे, पिछड़ा होने के बावजूद लोगों के एक वर्ग को इस कोटे से बाहर कर दिया जबकि पिछड़ा वर्ग आयोग खुद ही उसे सामाजिक रूप से पिछड़ा घोषित कर चुका है।”

कोर्ट मेडिकल में प्रवेश पाने के इच्छुक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जो उसने अपने वकील पृथ्वी राज यादव के माध्यम से दायर किया है। इस याचिका में कहा गया कि यह अधिसूचना इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है।  

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राज्य ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उसकी अधिसूचना जायज है और उसका उद्देश्य समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों को आरक्षण का लाभ पहुंचाना है। दिलचस्प यह है कि राज्य ने भी इस अधिसूचना को जारी करने के क्रम में इंदिरा साहनी मामले में आए फैसले पर भरोसा किया। राज्य का कहना था कि आरक्षण का आधार आर्थिक बनाकर ही इसका लाभ वास्तविक रूप से ऐसे लोगों को दिलाया जा सकता है जिनको इसकी सर्वाधिक जरूरत है।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट, चंडीगढ़

हालांकि कोर्ट ने कहा कि राज्य ने जिस वर्ग को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया है उसके सामाजिक पिछड़ेपन के बारे में उसने कोई विश्वसनीय और सत्यापित आंकड़ा पेश नहीं किया है।  कोर्ट ने इस अधिसूचना के मनमानेपन के बारे में कहा, “फर्ज कीजिए कि एक चतुर्थ वर्ग का कमर्चारी किसी महानगर में काम कर रहा है, किसी उपनगर में या छोटे शहर में काम करने वाले अपने किसी सहयोगी से ज्यादा पैसा कमाता है लेकिन इसके बावजूद वह जीवन-यापन का खर्च अधिक होने के कारण बदतर स्थिति में होता है जबकि उसका सहयोगी जीवन-यापन का खर्च कम होने के कारण ज्यादा बेहतर स्थिति में होता है। बड़े शहर में रहने वाला व्यक्ति कई अर्थों में सशक्त होने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक रूप से बदतर स्थिति में होता है…राज्य के अनुरूप आर्थिक मानदंड को लागू करने पर जिस व्यक्ति को कम वेतन मिल रहा है, उसको ज्यादा लाभ होगा जबकि उसको अन्य स्रोतों से ज्यादा कुछ प्राप्त हो रहा है पर इसका उसके सामाजिक स्थिति से कोई संबंध नहीं है। लेकिन दोनों में से किसी का भी इससे भला नहीं होता – एक को उसकी खराब सामाजिक स्थिति से निजात नहीं मिलती जबकि दूसरे को उसकी आर्थिक स्थिति से।”

इसके बाद कोर्ट ने कहा कि 0 से 6 लाख तक की आय का जो दायरा निर्धारित किया गया है, यह कहना मुश्किल होगा कि सामाजिक स्थिति और वृत्ति के हिसाब से, जिसकी आय तीन लाख रुपए है वह उस व्यक्ति से ज्यादा बेहतर स्थिति में है जिसको तीन लाख रुपए से कम की आय हो रही है। पिछड़े वर्ग में बिना किसी आवश्यक जानकारी के इस तरह का कोई उप-वर्गीकरण मनमाना करार दिया जाएगा जो कि “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” सुनिश्चित करेगा और यह पिछड़े वर्गों में समानता पर आधारित वितरण की व्यवस्था के दरवाजे को बंद कर देता है।”

इंदिरा साहनी मामले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि सामाजिक उत्थान के लिए आर्थिक मानदंड एक संकेतांक हो सकता है पर यह एकमात्र मानदंड नहीं हो सकता जैसा कि अधिसूचना में कहा गया है और इस तरह इस अधिसूचना को निरस्त किया जाता है। कोर्ट ने कहा, “अंतिम परिणाम यह हुआ कि राज्य ने एक हाथ से तो लाभ बांटा है पर वह दूसरे हाथ से उसे वापस ले लिया है। सामाजिक रूप से पिछड़े होने और आर्थिक पिछड़ेपन के बीच कोई स्थापित संबंध नहीं है और इस तरह से इस तर्क के आधार पर हमारा मानना है कि यह अधिसूचना क़ानून की नजर में खराब है और इसलिए इसको निरस्त किये जाने की जरूरत है।”

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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