मराठा आरक्षण गतिरोध : देशमुख, चव्हाण और अब फडणवीस

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पूर्व रहे मुख्यमंत्री, मराठा समुदाय को आरक्षण देने में नाकाम रहे हैं। उनके पास भी, आश्वासन देने और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करने के आश्वासन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है| वसुंधरा तिवारी की रिपोर्ट

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पूर्व रहे मुख्यमंत्री, मराठा समुदाय को आरक्षण देने में नाकाम रहे हैं। उनके पास भी, आश्वासन देने और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करने के आश्वासन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है|

तो क्या सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण पाने के लिए दिसंबर में मराठा आंदोलन फिर से भड़क सकता है ? और राज्य में फिर से अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है ?

अब जायें किस राह : पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह मराठा आरक्षण के मामले में फंस गये देवेंद्र फडणवीस

बीते दिनों ऐसे ही हालात तब सामने आये जब कुछ उत्तेजित युवाओं के आत्मदाह के कारण आन्दोलन एक हिंसक आंदोलन में बदल गया। बाद में कुछ बसों में आग दी गई और सरकारी संपत्तियां नष्ट कर दी गईं|

आन्दोलनकारियों को नियंत्रित करने और राज्य में शांति कायम करने के लिए मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने जल्दबाजी में एक फैसला किया और इसी बहाने अपने लिए समय निकाल लिया।|  मुख्यमंत्री ने अपना खून तक बहा देने वाले आन्दोलनकारियों को आश्वासन देते हुए उनसे वादा किया है कि आरक्षण की प्रक्रिया नवम्बर तक पूरी कर ली जाएगी| ऐसा कहकर जाने-अनजाने ब्राह्मण जाति से आने वाले फड़णवीस ने स्वयं के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर ली है।

क्या हैं अड़चनें?

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी मामले में एक फैसले के दौरान यह कहा था कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं दिया जा सकता क्योंकि इससे अधिक आरक्षण, संविधान में वर्णित समानता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।

हालांकि, कुछ राज्यों ने 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण की अनुमति देने के लिए कानून पारित किए हैं, लेकिन इन कानूनों को चुनौती दी गई है और विभिन्न न्यायालयों में मामले विचाराधीन हैं। इनमें से एक राज्य महाराष्ट्र भी है।

अब देवेन्द्र फडणवीस ने मराठों को आरक्षण देने का वादा कर अपने लिए मुश्किलें बढ़ा ली है। वजह यह कि महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा पहले से ही 52 फीसदी है जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत है। इस प्रकार फडणवीस के पास एकमात्र विकल्प यह है कि वे मराठों को आरक्षण, वर्तमान में आरक्षित जातियों के साथ साझा कर दें। हालांकि इस संभावना को लेकर अन्य आरक्षित समुदाय भी अभी से चिंतित हैं।

यानी फडणवीस के पास इस समय इस बात का इन्तजार करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग उनके वादे को पूरा करने लिए मराठों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने को तैयार होता है या नहीं। परंतु क्या आयोग सरकार पर ये मेहरबानी करेगा? फिलहाल तो यह असंभव ही प्रतीत होता है

अपने राजनीतिक लाभ के लिए राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर उम्मीद टिकाये रखने वाली बीजेपी की अगुआई वाली महाराष्ट्र सरकार कोई पहली सरकार नहीं है।

इसके पहले कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के नेतृत्व वाली सरकार ने भी वर्ष 2008 में आयोग से अनुकूल रिपोर्ट की उम्मीद की थी, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया था।

आरक्षण के लिए प्रदर्शन करते मराठा

पांच वर्ष बाद जब यह सोचकर कि गोदावरी नदी से पानी अधिक बह गया है, राज्य सरकार ने आयोग को मनाने की कोशिश की थी तब भी आयोग ने तत्कालीन सरकार की मांग को खारिज ही किया था।तर्क दिया गया कि मराठा समुदाय ने पहले स्वयं को सामान्य श्रेणी में माना था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने आयोग को दरकिनार करते हुए कांग्रेस नेता नारायण राणे के अधीन राणे समिति का गठन  कर अपनी बात मनवाने की कोशिश की। राणे समिति ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके आधार पर संसद में एक विधेयक पारित किया गया था जिसके अनुसार मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना था। लेकिन अदालत ने इस नये कानून को मानने से इनकार कर दिया क्योंकि सरकार के पास राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सहमति नहीं थी।

राज्य सरकार की उम्मीदें एक बार फिर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के अधीन है। आयोग ने मार्च में मराठों के पिछड़ेपन का पता लगाने का कार्य संभाला है और दिसंबर में ही अपनी रिपोर्ट जमा कर पाएगा।

इस बीच फडणवीस सरकार के लिए मराठों को तब तक शांत रख पाना मुश्किल हो सकता है| यदि यह राजनीतिक कदम मराठा समुदाय को शांत करने के अपने प्रयास में विफल रहता है तो आने वाले 2019 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए यह मुद्दा बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

(अनुवाद : अनुपमा  सिंह, कॉपी-संपादन : एफपी डेस्क)


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