संस्कृत में क्यों बढ़ रही है आदिवासी युवाओं की दिलचस्पी?

भाषा को लेकर एक हैरान करने वाला रुझान सामने आया है। अब आदिवासी छात्र भारी तादाद में संस्कृत पढ़ने के लिए शहरों में आ रहे हैं। वह संस्कृत में शास्त्री (बीए-बीएड) और आचार्य (एमए) की डिग्रियां ले रहे हैं। क्या यह रुझान रोजगार के लिए है या फिर आदिवासी समुदाय अपनी मौखिक बचाई गई भाषा को लिपि में ढालने को इच्छुक है? कमल चंद्रवंशी की खबर

हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार देशभर में संस्कृत पढ़ने वाले आदिवासी छात्रों की संख्या में कुछ सालों से भारी बढ़ोतरी हो रही है। संस्कृत के शिक्षा-शास्त्री जैसे कोर्स को पढ़ने वालों में आदिवासी छात्रों की तादाद चार गुना से ज्यादा बढ़ गई है। संस्कृत के इस कोर्स को बीएड के समकक्ष मान्यता प्राप्त है।

‘द प्रिंट’ में प्रकाशित निखिल रामपाल की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में शिक्षा शास्त्री के कोर्स में 30 फीसद अधिक छात्र दाखिला ले रहे हैं। हालांकि शिक्षा शास्त्री के दाखिलों में एसटी के लिए 7.5 फीसद सीट ही आरक्षित होती हैं। बताते चलें कि देश में संस्कृत पढ़ने वाले छात्र ज्यादातर ब्राह्मण परिवारों से होते हैं जिनमें सौ में से एक दो को सरकारी रोजगार मिला तो मिला नहीं तो वह घरों और मंदिरों में पंडिताई करके गुजारा करते हैं।

हाल में उच्च शिक्षा को लेकर एक अखिल भारतीय सर्वे में निकले आंकड़ों के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति के छात्रों की तादाद 2011-12 के 14.14 प्रतिशत के मुकाबले 2017-18 में यह 27.13 प्रतिशत हो गई है। एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 7.5 प्रतिशत से यह कहीं अधिक है। वास्तव में देखें तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी उम्मीदवारों के इन तीनों आरक्षित ग्रुप में तय कुल 49.5 सीटों के मुकाबले यह प्रतिशत 2017-18 बढ़कर 72.27 हो गया है।

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उच्च शिक्षा संकायों से जुड़े विद्धानों का कहना है कि ‘पिछड़े’ समूहों के इन छात्रों ने हाल में ना सिर्फ मैरिट के आधार पर बढ़त हासिल की है बल्कि वे ‘पारंपरिक’ छात्रों से कहीं अधिक बेहतर प्रदर्शन भी कर रहे हैं।

व्यावहारिक और सामाजिक पहलू

एसटी छात्रों के मामलों में एक व्यावहारिक पहलू भी है जिसके चलते उन्हें बढ़त हासिल हुई है। नई दिल्ली स्थित विद्यापीठ के छात्रों के अनुसार, इस पाठ्यक्रम में दाखिले से ना सिर्फ रोजगार के लिए दरवाजे खुलते हैं बल्कि यह मुख्यधारा के बीएड कोर्स की तुलना में अपेक्षाकृत कम महंगा है। संकाय सदस्यों ने बताया कि शिक्षा शास्त्री पाठ्यक्रम के लिए एक साल की फीस सिर्फ 5,000 रुपये है जो अन्य बीएड के कार्यक्रमों की फीस से कहीं कम है।

पुरी में स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संगठन कालेज जहां झारखंड और ओडिशा के सर्वाधिक आदिवासी छात्र संस्कृत पढ़ रहे हैं

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के आदिवासी इलाके बैलामा गांव के रहने वाले तरुण कुमार सिंह ने कहा, “मेरे दोस्तों ने स्कूल के बाद संस्कृत में दाखिला लेने का सुझाव दिया क्योंकि सरकार इसके लिए आर्थिक मदद प्रदान करती है और इसमें भविष्य में रोजगार के लिए काफी गुंजाइश है। संस्कृत भाषा में शास्त्री के बाद ‘आचार्य’ (स्नातकोत्तर) का कोर्स होता है।

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नई दिल्ली के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में के उप-निदेशक डॉ देवनंद शुक्ला का कहना है कि संस्कृत के लिए स्कूल में शिक्षक के लिए डिग्री अनिवार्य करने के सरकार के फैसले से भी संस्कृत को लेकर रुझान बढ़ा है। उनका मानना है कि कई संस्थानों में स्थानीयकरण के कारण भी संस्कृत की सीटों में इजाफा हुआ है। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान का पुरी परिसर ओडिशा और झारखंड के जनजातीय क्षेत्रों में छात्रों से खचाखच भरा है।

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समाजशास्त्री और शिक्षाविद् इस बात पर सहमत हैं कि इन वर्षों में सरकार ने संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार को मजबूती दी है जिससे ‘पिछड़े’ समुदाय के लोग संस्कृत से जुड़ सके हैं। हालांकि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में शिक्षक प्रशिक्षण और गैर-औपचारिक शिक्षा विभाग की प्रोफेसर जानकी राजन का मत है कि  एसटी छात्रों की ज्यादा संख्या के पीछे मुख्य वजह यह है कि सामान्य श्रेणी के छात्र ज्यादा मांग वाले कोर्सों में जा रहे हैं। यदि लगभग 30 प्रतिशत छात्र एसटी श्रेणी से आ रहे हैं तो इसका मतलब यह भी है इस पाठ्यक्रम के लिए सामान्य श्रेणी का रुझान कम हुआ है क्योंकि अधिकांश सामान्य श्रेणी के छात्र विज्ञान, गणित और समाज विज्ञान के पाठ्यक्रमों में चले जाते हैं। राजन कहती है कि आदिवासी छात्र शहरों में जाकर अपने जीवन के गुणवत्ता में सुधार लाना चाहते हैं। संस्कृत एक आसान और स्कोरिंग विषय है। यह अन्य के मुकाबले सरकारी शिक्षक बनने का ज्यादा अवसर देता है। इसी कारण आदिवासी युवाओं का रूझान इस भाषा की ओर हुआ है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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