एससी-एसटी एक्ट : नये कानून को सुप्रीम कोर्ट में अभिजात्य वर्ग ने दी चुनौती

बीते मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने भले ही विधेयक पारित करवाकर एससी-एसटी एक्ट को मजबूत किया हो। लेकिन चूंकि अभी यह संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, इसलिए इस एक्ट पर खतरा अभी टला नहीं है। इस बार संसद द्वारा पारित कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है। बता रहे हैं वीरेंद्र यादव :

अधिवक्‍ता पृथ्वीराज चौहान और प्रिया शर्मा ने 20 मार्च फैसले को बहाल का किया आग्रह

संसद के मानसून सत्र में पारित एससी-एसटी अत्याचार निवारण संशोधन कानून को निरस्‍त करने के लिए याचिका सर्वोच्‍च न्‍यायालय में याचिका दायर की गयी है। अधिवक्‍ता पृथ्वीराज चौहान और प्रिया शर्मा ने इस कानून को मूल स्वरूप में लाने के लिए किये गये संशोधन को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च के आदेश को फिर से लागू किये जाने का आग्रह किया है। याचिका में नये कानून को असंवैधानिक और संविधान की भावनाओं के विपरीत घोषित करने की मांग की गई है।

गौरतलब है कि एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून में किये गये नये प्रावधान 18-ए  के लागू होने से दलित अत्याचार मामले में तत्काल गिरफ्तारी होगी और अग्रिम जमानत भी नहीं मिल पायेगी। संसद के पिछले मानसून सत्र में एससी-एसटी अत्याचार निवारण संशोधन कानून 2018  को दोनों सदनों ने मंजूरी प्रदान कर दी थी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे अधिसूचित भी कर दिया गया है।

फिर से निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर

उल्‍लेखनीय है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने पिछले 20 मार्च को अपने महत्वपूर्ण फैसले में एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के कुछ प्रावधानों को निरस्त कर दिया था। न्यायालय ने कहा था कि एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून में शिकायत मिलने के बाद तुरंत मामला दर्ज नहीं होगा। सक्षम अधिकारी की जांच के बाद ही प्राथमिकी दर्ज होगी। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी भी नहीं हो सकेगी। साथ ही अग्रिम जमानत का रास्ता भी खुला रहेगा।

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विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के फैसले के खिलाफ बीते 2 अप्रैल को भारत बंद का एलान किया था। बंद का व्‍यापक असर देशभर में दिखा था। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के फैसले के खिलाफ दलितों में नाराजगी जतायी थी और सरकार पर दलित विरोधी होने को आरोप भी लगया था। फैसले के व्यापक विरोध के बाद सरकार ने पुनरीक्षण याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी, जिस पर फैसला आना अभी बाकी है। इस बीच सरकार ने कानून को मूल स्वरूप में लाने के लिए संसद में संशोधन विधेयक पेश किया था, जहां दोनों सदनों ने इसे पारित कर दिया।

संसद में एससी एसटी एक्ट (संशोधन) 2018 प्रस्तुत करते केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के फैसले को रद्द करने के लिए नया कानून बनाने के पीछे 2019 के लोकसभा चुनाव को मूल कारण माना जा रहा है। भाजपा के रणनीतिकार दलितों के आक्रोश को खतरनाक मान रहे थे। एनडीए में शामिल लोजपा के प्रमुख नेता रामविलास पासवान के पुत्र और सांसद चिराग पासवान ने सरकार से कानून को यथावत रूप से लाने के लिए संविधान में संशोधन या अध्‍यादेश लाने की मांग की थी। इसके साथ 20 मार्च, 2018 का फैसला सुनाने वाले जज आदर्श कुमार गोयल को एनजीटी (राष्‍ट्रीय हरित अधिकरण) के अध्‍यक्ष बनाने का विरोध किया था और उन्‍हें 9 अगस्‍त 2018 से पहले हटाने की मांग की थी। लेकिन इसी बीच सरकार ने संसद के मानसून सत्र में कानून में संशोधन लाकर एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून को पुराने रूप में ला दिया। इसके बाद विरोध की आंच ठंडी पड़ गयी। अब देखना होगा कि दलित संगठनों के दबाव में सरकार ने कानून में संशोधन करके उसे पुरानी स्थिति में ला दिया है। लेकिन क्‍या दलित भाजपा के साथ आगामी चुनाव में भी खड़े रह पाएंगे?

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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