दलितों, आदिवासियों को सताया तो नहीं मिलेगी बेल, पुलिस जांच के पहले दर्ज होगी प्राथमिकी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चौतरफा घिर चुकी नरेंद्र मोदी सरकार ने एससी, एसटी एक्ट को जस का तस बना दिया है। हालांकि केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने इसे और प्रभावी बनाने की बात कही है। बीरेंद्र यादव की खबर

अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधयेक लोकसभा में पारित

अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून को पुराने स्वरूप में लाने वाला विधेयक लोकसभा में  बीते 6 अगस्त 2018 को ध्वनिमत से पारित हो गया। सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक 2018 को लेकर कहा कि इस विधेयक के कानून बनने के बाद दलितों पर अत्याचार के मामले दर्ज करने से पहले पुलिस को किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी और मुजरिम को अग्रिम जमानत भी नहीं मिलेगी। प्राथमिकी दर्ज करने से पहले पुलिस जांच की भी जरूरत नहीं होगी और पुलिस को सूचना मिलने पर तुरंत प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ेगी।

एससी एसटी एक्ट में बदलाव के बाद बीते 2 अप्रैल 2018 को आहूत भारत बंद के दौरान विरोध व्यक्त करते लोग

गेहलोत ने कहा मोदी सरकार ने 2015 में इसी कानून में संशोधन करके 22 की बजाय 47 अपराध शामिल कराये थे। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के फैसले को चुनौती देने में सरकार की देरी के आरोप पर सफाई देते हुए कहा कि इस बार भी 20 मार्च को फैसला आने पर 21 मार्च को आदेश की प्रति प्राप्त की और 23 मार्च को पुनर्विचार याचिका दायर करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि अब चालान पेश होने के दो माह के भीतर फैसला आ जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि 29 राज्यों ने इस प्रकार के मामलों के लिए जिला एवं सत्र न्यायालयों को विशेष न्यायालय अधिसूचित किया है तथा 14 राज्यों ने 195 विशेष अदालतें भी स्थापित करने की बात कही है। गेहलोत ने कहा कि इससे पीड़ित को न्याय और दोषी को सजा जल्द मिल सकेगी। इसके बाद सदन ने ध्वनिमत से विधेयक पारित कर दिया।

अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत करते केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत

प्रस्तावित कानून के माध्यम से 1989 के कानून में एक नयी धारा जोड़ने का प्रावधान किया गया है, जिसमें कहा गया है कि कानून के तहत किसी भी आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं होगी। इसके अलावा जांच अधिकारी को अपने विवेक से आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार होगा और उसे इसके लिए किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी।

विधेयक में यह भी व्यवस्था की गयी है कि किसी भी न्यायालय के फैसले या आदेश के बावजूद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के प्रावधान इस कानून के तहत दर्ज मामले में लागू नहीं होंगे। उच्चतम न्यायालय ने गत 20 मार्च को एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के कुछ सख्त प्रावधानों को हटा दिया था, जिसके कारण इससे जुड़े मामलों में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लग गयी थी और प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी हो गयी थी।

एससी-एसी एक्‍ट को नौवीं अनुसूची में रखने की मांग

लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रस्तावित कानून को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया जाना चाहिए ताकि इससे यह न्यायपालिका की समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाये। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ‘चहेते’ कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए तो अध्यादेश लेकर आयी,  लेकिन दलितों और वंचितों के खिलाफ अत्याचार की रोकथाम के लिए कानून सख्त करने के वास्ते अध्यादेश नहीं ला सकी। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च के फैसले के कुछ समय बाद ही सरकार को इस संबंध में अध्यादेश लाना चाहिए था, क्योंकि ऐसा हो गया होता तो पिछले तीन-चार महीने में एससी/एसटी समुदाय के लोगों के खिलाफ हुए उत्पीड़न में उन्हें न्याय तो मिलता। दुर्भाग्यवश सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया गया।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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